प्रकाशित: 13 दिसम्बर 2010
अफीफ अहसन
एक किस्सा मशहूर है कि लखनऊ के रेलवे स्टेशन पर रेल में चढ़ते समय दो नवाबों की मुलाकात हो गई और शिष्टाचार के नाते एक नवाब साहब ने दूसरे से कहा कि पहले आप सवार, दूसरे नवाब शिष्टाचार और संस्कृति में पहले से भी दो हाथ आगे थे, उन्होंने पहले नवाब साहब से फ़रमाया हुजूर आप बड़े हैं, पहले आप सवार, इस पर दोनों में पहले आप पहले आप की तकरार शुरू हो गई और इसी बीच ट्रेन प्लेटफार्म से निकल गई और दोनों नवाब पहले आप पहले आप ही करते रह गए ऐसा लगता है कुछ इसी प्रकार की पहले आप पहले आप की तकरार दुनिया के सभी प्रमुख देशों के बीच पर्यावरण को बचाने के विषय पर जारी है और यह तब तक जारी रहेगी जब तक उसको हल करने का मौका हाथ से निकल नहीं जाता।
पिछले कई दिनों से इसी तरह की बातचीत कानकुन में पर्यावरण की सुरक्षा को लेकर जारी थी, अंततः इस पर एक अपनाया गया। संयुक्त राष्ट्र के मुख्य सम्मेलन के मसौदे में 2020 ई. से हर साल विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एक सौ अरब डॉलर देने की पुष्टि की गई है। यह मुद्दा कोपेनहेगन सम्मेलन में भी उठाया गया था। मेक्सिको के पर्यटन के लिये जाने जाने वाले शहर में पावार की रात तक दुनिया के लगभग 192 देशों के प्रतिनिधि लंबी बहस और चर्चा में व्यस्त रहे। इसमें ग्रीन कलाईमेट निधि की स्थापना का प्रस्ताव पारित किया गया जिसे विकसित और विकासशील देशों की प्रतिनिधित्व वाला 24 सदस्यीय बोर्ड संभालेगा।
दक्षिण अमेरिकी देश बोलीविया और वेनेज़ूवेला ने कानकुन मसौदा इस आधार पर खारिज कर दिया है क्योंकि उन्हें दुनिया भर से अलग करने की कोशिश की गई है। बोलीविया के मंत्री पाबलो सोलन का कहना है कि इस मसौदे में अमरीका को बहुत अधिक प्रभाव प्राप्त है और यह वास्तव में कोपेनहेगन सम्मेलन ही में प्रस्तुत किये गये अमरीकी प्रस्ताव जैसा है। कोपेनहेगन की विफलता से सबक सीखते हुए इस बार आक्रामक रूप से व्यापक समझौते की प्राप्ति के प्रयास नहीं किए गए बल्कि ऐसी प्रािढया अपनायी गयी जिस पर अगले साल जोहान्स्बर्ग में प्रगति हो सके। इस मसौदे को संयुक्त राष्ट्र की मंज़ूरी के लिए कानकुन सम्मेलन में शामिल सभी देशों का समर्थन आवश्यक है। इस समय उसे मंत्रियों के समूह की पुष्टि हुई है। कानकुन सम्मेलन के मेज़बान देश मेक्सिको ने मसौदा आम करते हुए उसे प्राकृतिक वातावरण के बचाव के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण प्रगति बताया। मसौदे के अनुसार विकासशील देशों के लिये यह निधि विश्व तापमान में कमी और जंगलों के बचाने मे उपयोग किया जाएगा। पर्यावरण मंत्री जेराम रमेश ने कहा कि बड़ी उभरती हुई आर्थिक शक्तियां, ब्राज़ील, दक्षिण अफीका, भारत ओर चीन ने इस फ़ैसले का स्वागत किया। हम इस मसौदे के से बहुत खुश हैं, उन्होंने कहा, कानकुन महत्वपूर्ण कदम का प्रतिनिधित्व करता है। विकासशील देशों का कहना है कि चूंकि विश्व तापमान में वृद्धि के लिए विकसित देश ज़िम्मेदार हैं इसलिए वह औद्योगिक ाढांति के बाद से कार्बन गैस के उत्सर्जन का हिसाब लगाकर कोई निधि स्थापित करें। इसी संदर्भ में चीन, भारत और ब्राजील जैसे देशों का कहना है कि वह अपने यहां कार्बन गैस के उत्सर्जन में फिलहाल ज्यादा कमी इसलिए नहीं कर सकते क्योंकि वे विकास और गरीबी को समाप्त की राह पर चल रहे हैं। लेकिन माहौल के बचाव के लिए सािढय संगठनों को यह आशंका सता रहा है कि अगर इस मुद्दे पर इसी तरह गतिरोध चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हम हाथ मलने के सिवा कुछ और करने में सक्षम नहीं रहेंगे। लेकिन अब यह उम्मीद जागी है कि सहायता प्रदान करने के उनके पक्के वादों के कारण पर्यावरण पर बातचीत के बारे में निरंतरता बन पाएगी, लेकिन इसके लिए 2020 तक इंतजार करना होगा, और तब तक शायद बहुत देर न हो जाए। एक ओर जहां अमेरिका और चीन जैसे देश मेक्सिको के शहर कानकुन में व्यापक वैश्विक समझौते की राह में रुकावट बने रहे, वहीं दूसरी ओर युरोप दुनिया का वह क्षेत्र है जहां उत्साह के साथ पर्यावरण सुरक्षा के कदम प्रािढया में लाए जा रहे हैं। युरोपीय संघ ने पिछले साल अपने लिए यह लक्ष्य निर्धारित किया था कि कार्बन डाईआक्साईड के उतसर्जन की मात्रा में 1990 ई। के स्तर की तुलना में कम से कम बीस प्रतिशत की कमी की जाएगी। यूरोपीय संघ अभी तक इस दर को 17 प्रतिशत तक ला चुकी है। हालांकि कुछ युरोपीय देश, जिनमें जर्मनी, फांस और ब्रिटेन भी शामिल हैं, इस लक्ष्य को बढ़ाकर तीस फीसदी तक ले जाने की वकालत कर रहे हैं लेकिन इस पर अभी सहमति नहीं बन पायी है। अन्य देश राज़ी हो जाएं तो यूरोपीय संघ तीस प्रतिशत कमी के लक्ष्य के लिए तैयार है। अन्य देशों को भी अपने वादों को निभाना चाहिए। अमेरीका ने कोपेनहेगन में वादा किया था कि वह अपने यहां हानिकारक गैसों के उत्सर्जन की मात्रा में 2005 की तुलना में 17 प्रतिशत कमी करेगा। मगर अमेरिका अपना यह वादा पूरा करने में बिल्कुल भी गंभीर नज़र नहीं आता। जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक प्रभाव बांग्लादेश और भारत पर होता हे जिन की निर्भरता हिमालय के पहाड़ों से आने वाले नदियों के पानी पर है। लेकिन हिमालय के ग्लेशियरों के तेज़ी से पिघलने की वजह से आगे चल कर इन दोनों देशों में सूखे का खतरा है। हिमालय के दामन में स्थित क्षेत्र लद्दाख में कोई असामान्य बारिश नहीं होती थी और इसी लिए इस साल छह अगस्त की रात को लद्दाख की राजधानी लेह के पास रहने वालों को जिस भारी वर्षा और तूफान का सामना करना पड़ा, वह उनके लिए अनअपेक्षित और अचानक था। भारतीय मौसम विशेषज्ञों का दावा है कि लद्दाख में आने वाली यह असाधारण तूफानी बारिश वैश्विक जलवायु परिवर्तन के प्रभाव की एक कड़ी है। काठमंडू में हिमालय और हिंदू कुश के क्षेत्र के लिए गठित अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान केन्द्र के अनुसार इन ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में मौसम विश्व औसत की तुलना में अधिक तीव्रता के साथ गरम हो रहा है। इन सब बातों को अनदेखा करते हुए देश में कानकुन सम्मेलन पर जयराम रमेश की भूमिका को लेकर राजनीति शुरू हो गई है और यह आरोप लगाया जा रहा है कि भारत ने अपने आप को पूरी तरह से विकसित देशों के हाथों सौंप दिया है। भाजपा और वामपंथी दलों ने पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर विकसित देशों की ओर से प्रस्तावित लाइन पर समझौता करने के होश मंदाना निर्णय पर नाराजगी जताई है। पूर्व मंत्री और अनुभवी कांग्रेसी नेता सैफुद्दीन सोज़ ने दावा किया है कि रमेश ने गलत सलाह दी। रमेश ने गुरुवार को कानकुन में कहा था कि देशों को उत्सर्जन को रोकने के लिए कानून के तहत आवश्यक बाध्य संकल्प लेना इस बात को भारत की इस नीति के खिलाफ देखा जाता है जिसमें उसका कहना था कि प्रदूषण पैदा करने वाले देश ही पैसा दे और यह कि वह किसी भी कानूनी प्रतिबंध को कबूल नहीं करेगा क्योंकि इस से भारत की प्रगति की गति रूक सकती है। विकसित देशों का भी कहना है कि अगर उन्होंने इन प्रतिबंधों पर सख्ती से अमल किया तो उनके विकास की गति थम जाएगी और उन को ज़र्बदस्त आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा मगर विकसित देशों को इससे कोई फर्प नहीं पड़ेगा, इसलिए उन्हें कुछ और समय के लिए इन प्रतिबंधों से बाहर रखा जाए। क्या किसी ने कभी यह भी सोचा है कि अगर जल्द पर्यावरण की सुरक्षा का उपाय नहीं किया गया और वैश्विक जलवायु परिवर्तन के प्रभाव ने खतरनाक रूप धारण कर लिया तो धरती पर जीवन की गति ही थम जाएगी ऐसे में विकास कैसे और किसके काम आएगा? क्या इस बात का यह मतलब हुआ कि क्योंकि विकसित देश क़ाफी समय से प्रद्षूण फैला रहे हैं इसलिए विकासशील देशों को भी उतना ही प्रद्षूण फैलाने की छूट दी जाए। मगर हम यह भूल जाते हैं कि किसी भी प्रकार का प्रद्षूण फैलाना नूह की सृष्टि के विरुद्ध एक अपराध है जो हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के साथ कर रहे हैं और अगर किसी एक देश से कोई अपराध हो गया है तो इस से किसी दूसरे को कतई यह अधिकार नहीं मिलता कि वह भी वही अपराध करता रहे। पर्यावरण को बचाने में जितनी कोताही की जाएगी और जितनी देर होगी इसका खमियाज़ा पूरी दुनिया को देर सवेर भुगतन पड़ेगा और इससे कोई भी देश बचा नही रह सकता। हम बड़े गर्व के साथ यह शीर्षक लिख देंगे कि कानकुन वार्ता समझोता निर्णय के साथ समाप्त हुई मगर समझोते और सर्वसम्मति के चक्कर में पर्यावरण के साथ जो समझौता किया जा रहा है उसकी वजह से होने वाले नुकसान का अनुमान सभी को है मगर हर देश अपनी हठधर्मी पर अड़ा है।
पिछले कई दिनों से इसी तरह की बातचीत कानकुन में पर्यावरण की सुरक्षा को लेकर जारी थी, अंततः इस पर एक अपनाया गया। संयुक्त राष्ट्र के मुख्य सम्मेलन के मसौदे में 2020 ई. से हर साल विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एक सौ अरब डॉलर देने की पुष्टि की गई है। यह मुद्दा कोपेनहेगन सम्मेलन में भी उठाया गया था। मेक्सिको के पर्यटन के लिये जाने जाने वाले शहर में पावार की रात तक दुनिया के लगभग 192 देशों के प्रतिनिधि लंबी बहस और चर्चा में व्यस्त रहे। इसमें ग्रीन कलाईमेट निधि की स्थापना का प्रस्ताव पारित किया गया जिसे विकसित और विकासशील देशों की प्रतिनिधित्व वाला 24 सदस्यीय बोर्ड संभालेगा।
दक्षिण अमेरिकी देश बोलीविया और वेनेज़ूवेला ने कानकुन मसौदा इस आधार पर खारिज कर दिया है क्योंकि उन्हें दुनिया भर से अलग करने की कोशिश की गई है। बोलीविया के मंत्री पाबलो सोलन का कहना है कि इस मसौदे में अमरीका को बहुत अधिक प्रभाव प्राप्त है और यह वास्तव में कोपेनहेगन सम्मेलन ही में प्रस्तुत किये गये अमरीकी प्रस्ताव जैसा है। कोपेनहेगन की विफलता से सबक सीखते हुए इस बार आक्रामक रूप से व्यापक समझौते की प्राप्ति के प्रयास नहीं किए गए बल्कि ऐसी प्रािढया अपनायी गयी जिस पर अगले साल जोहान्स्बर्ग में प्रगति हो सके। इस मसौदे को संयुक्त राष्ट्र की मंज़ूरी के लिए कानकुन सम्मेलन में शामिल सभी देशों का समर्थन आवश्यक है। इस समय उसे मंत्रियों के समूह की पुष्टि हुई है। कानकुन सम्मेलन के मेज़बान देश मेक्सिको ने मसौदा आम करते हुए उसे प्राकृतिक वातावरण के बचाव के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण प्रगति बताया। मसौदे के अनुसार विकासशील देशों के लिये यह निधि विश्व तापमान में कमी और जंगलों के बचाने मे उपयोग किया जाएगा। पर्यावरण मंत्री जेराम रमेश ने कहा कि बड़ी उभरती हुई आर्थिक शक्तियां, ब्राज़ील, दक्षिण अफीका, भारत ओर चीन ने इस फ़ैसले का स्वागत किया। हम इस मसौदे के से बहुत खुश हैं, उन्होंने कहा, कानकुन महत्वपूर्ण कदम का प्रतिनिधित्व करता है। विकासशील देशों का कहना है कि चूंकि विश्व तापमान में वृद्धि के लिए विकसित देश ज़िम्मेदार हैं इसलिए वह औद्योगिक ाढांति के बाद से कार्बन गैस के उत्सर्जन का हिसाब लगाकर कोई निधि स्थापित करें। इसी संदर्भ में चीन, भारत और ब्राजील जैसे देशों का कहना है कि वह अपने यहां कार्बन गैस के उत्सर्जन में फिलहाल ज्यादा कमी इसलिए नहीं कर सकते क्योंकि वे विकास और गरीबी को समाप्त की राह पर चल रहे हैं। लेकिन माहौल के बचाव के लिए सािढय संगठनों को यह आशंका सता रहा है कि अगर इस मुद्दे पर इसी तरह गतिरोध चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हम हाथ मलने के सिवा कुछ और करने में सक्षम नहीं रहेंगे। लेकिन अब यह उम्मीद जागी है कि सहायता प्रदान करने के उनके पक्के वादों के कारण पर्यावरण पर बातचीत के बारे में निरंतरता बन पाएगी, लेकिन इसके लिए 2020 तक इंतजार करना होगा, और तब तक शायद बहुत देर न हो जाए। एक ओर जहां अमेरिका और चीन जैसे देश मेक्सिको के शहर कानकुन में व्यापक वैश्विक समझौते की राह में रुकावट बने रहे, वहीं दूसरी ओर युरोप दुनिया का वह क्षेत्र है जहां उत्साह के साथ पर्यावरण सुरक्षा के कदम प्रािढया में लाए जा रहे हैं। युरोपीय संघ ने पिछले साल अपने लिए यह लक्ष्य निर्धारित किया था कि कार्बन डाईआक्साईड के उतसर्जन की मात्रा में 1990 ई। के स्तर की तुलना में कम से कम बीस प्रतिशत की कमी की जाएगी। यूरोपीय संघ अभी तक इस दर को 17 प्रतिशत तक ला चुकी है। हालांकि कुछ युरोपीय देश, जिनमें जर्मनी, फांस और ब्रिटेन भी शामिल हैं, इस लक्ष्य को बढ़ाकर तीस फीसदी तक ले जाने की वकालत कर रहे हैं लेकिन इस पर अभी सहमति नहीं बन पायी है। अन्य देश राज़ी हो जाएं तो यूरोपीय संघ तीस प्रतिशत कमी के लक्ष्य के लिए तैयार है। अन्य देशों को भी अपने वादों को निभाना चाहिए। अमेरीका ने कोपेनहेगन में वादा किया था कि वह अपने यहां हानिकारक गैसों के उत्सर्जन की मात्रा में 2005 की तुलना में 17 प्रतिशत कमी करेगा। मगर अमेरिका अपना यह वादा पूरा करने में बिल्कुल भी गंभीर नज़र नहीं आता। जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक प्रभाव बांग्लादेश और भारत पर होता हे जिन की निर्भरता हिमालय के पहाड़ों से आने वाले नदियों के पानी पर है। लेकिन हिमालय के ग्लेशियरों के तेज़ी से पिघलने की वजह से आगे चल कर इन दोनों देशों में सूखे का खतरा है। हिमालय के दामन में स्थित क्षेत्र लद्दाख में कोई असामान्य बारिश नहीं होती थी और इसी लिए इस साल छह अगस्त की रात को लद्दाख की राजधानी लेह के पास रहने वालों को जिस भारी वर्षा और तूफान का सामना करना पड़ा, वह उनके लिए अनअपेक्षित और अचानक था। भारतीय मौसम विशेषज्ञों का दावा है कि लद्दाख में आने वाली यह असाधारण तूफानी बारिश वैश्विक जलवायु परिवर्तन के प्रभाव की एक कड़ी है। काठमंडू में हिमालय और हिंदू कुश के क्षेत्र के लिए गठित अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान केन्द्र के अनुसार इन ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में मौसम विश्व औसत की तुलना में अधिक तीव्रता के साथ गरम हो रहा है। इन सब बातों को अनदेखा करते हुए देश में कानकुन सम्मेलन पर जयराम रमेश की भूमिका को लेकर राजनीति शुरू हो गई है और यह आरोप लगाया जा रहा है कि भारत ने अपने आप को पूरी तरह से विकसित देशों के हाथों सौंप दिया है। भाजपा और वामपंथी दलों ने पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर विकसित देशों की ओर से प्रस्तावित लाइन पर समझौता करने के होश मंदाना निर्णय पर नाराजगी जताई है। पूर्व मंत्री और अनुभवी कांग्रेसी नेता सैफुद्दीन सोज़ ने दावा किया है कि रमेश ने गलत सलाह दी। रमेश ने गुरुवार को कानकुन में कहा था कि देशों को उत्सर्जन को रोकने के लिए कानून के तहत आवश्यक बाध्य संकल्प लेना इस बात को भारत की इस नीति के खिलाफ देखा जाता है जिसमें उसका कहना था कि प्रदूषण पैदा करने वाले देश ही पैसा दे और यह कि वह किसी भी कानूनी प्रतिबंध को कबूल नहीं करेगा क्योंकि इस से भारत की प्रगति की गति रूक सकती है। विकसित देशों का भी कहना है कि अगर उन्होंने इन प्रतिबंधों पर सख्ती से अमल किया तो उनके विकास की गति थम जाएगी और उन को ज़र्बदस्त आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा मगर विकसित देशों को इससे कोई फर्प नहीं पड़ेगा, इसलिए उन्हें कुछ और समय के लिए इन प्रतिबंधों से बाहर रखा जाए। क्या किसी ने कभी यह भी सोचा है कि अगर जल्द पर्यावरण की सुरक्षा का उपाय नहीं किया गया और वैश्विक जलवायु परिवर्तन के प्रभाव ने खतरनाक रूप धारण कर लिया तो धरती पर जीवन की गति ही थम जाएगी ऐसे में विकास कैसे और किसके काम आएगा? क्या इस बात का यह मतलब हुआ कि क्योंकि विकसित देश क़ाफी समय से प्रद्षूण फैला रहे हैं इसलिए विकासशील देशों को भी उतना ही प्रद्षूण फैलाने की छूट दी जाए। मगर हम यह भूल जाते हैं कि किसी भी प्रकार का प्रद्षूण फैलाना नूह की सृष्टि के विरुद्ध एक अपराध है जो हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के साथ कर रहे हैं और अगर किसी एक देश से कोई अपराध हो गया है तो इस से किसी दूसरे को कतई यह अधिकार नहीं मिलता कि वह भी वही अपराध करता रहे। पर्यावरण को बचाने में जितनी कोताही की जाएगी और जितनी देर होगी इसका खमियाज़ा पूरी दुनिया को देर सवेर भुगतन पड़ेगा और इससे कोई भी देश बचा नही रह सकता। हम बड़े गर्व के साथ यह शीर्षक लिख देंगे कि कानकुन वार्ता समझोता निर्णय के साथ समाप्त हुई मगर समझोते और सर्वसम्मति के चक्कर में पर्यावरण के साथ जो समझौता किया जा रहा है उसकी वजह से होने वाले नुकसान का अनुमान सभी को है मगर हर देश अपनी हठधर्मी पर अड़ा है।

