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Monday, 28 November 2011

खबर कहाँ गुम होगयी?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 28th November 2011
अफ़ीफ़ अहसन
पिछले बुधवार टीवी पर एक खबर देखी जिसमें बताया गया था कि आयकर के छापे में झारखंड के एक कोयला ठेकेदार के पास से 75 करोड़ की नकदी बरामद हुई है. अगली सुबह यानी के गुरुवार के अख़बारों में जब अधिक जानकारी के लिए खोजा तो खबर नज़र नहीं आई. बहुत खोजने के बाद अन्दर के पन्नों पर एक छोटी सी खबर छपी हुई नज़र आई. जिस खबर को मुखपृष्ठ की सज्जा बनना चाहिए था और वह भी “मैन लीड” उसे इस तरह दबा दिया गया था कि जैसे कुछ हुआ ही न हो. यह छापे गुरुवार को भी जारी रहे और तब तक बरामद की गई राशि बढ़कर 125 करोड़ रुपये हो गई.
मैंने सोचा कि हो सकता है कि 75 करोड़ की रकम हमारे देश के बड़े- बड़े अखबार वालों को मामूली लगी होगी इसलिए उसे अधिक महत्व नहीं दिया गया. अब तो मुझे उम्मीद थी कि देश के बड़े अखबार उस ख़बर को मुखपृष्ठ की सज्जा बनायेंगे. ठेकेदार और उसके किस किस से संबंध थे के बारे में वर्णन दिया जाएगा. यह भी लिखा जाएगा कि वह अमुक दुकान से जो के चोरसया चलाता है दैनिक पान खाता था, यही नहीं चोरसया तक का साक्षात्कार फोटो सहीत दिया जाएगा. मगर अगले दिन तो मुझे पहले से भी बड़ा झटका लगा. अधिकांश अख़बारों ने इस ख़बर पर चुप्पी साध ली, और अपने अखबार की एक पंक्ति भी बर्बाद करना गवारा नहीं कि और कुछ अखबारों ने खबर से न्याय करते हुए या यूं कहिए कि पत्रकारिता की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए अंतिम पन्नों में एक छोटी सी खबर छाप दी. ऐसा लग रहा था कि हमारे देश के बड़े अखबार “टाइम्स नाव” के खिलाफ दिए गए सौ करोड़ के निचली अदालत के फैसले और उसके विरुद्ध याचिका पर हाईकोर्ट की इस चैनल को बीस करोड़ नकद जमा कराने और अस्सी करोड़ की बैंक गारंटी देने की शर्त से सकते में हैं, जिस को कि सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा था. या फिर शायद वह इस छापे और इसमें बरामद राशि पर विश्वास नहीं करते हैं और शायद इसी लिए इस पर कुछ अधिक कहने और लिखने से डर रहे हैं. यह भी हो सकता है कि ये लोग उसे खबर ही न समझ रहे हों.
इसलिए आइए थोड़ा समझने की कोशिश करते हैं कि यह “खबर” क्या चीज़ होती है. जब से होश संभाला तब से एक बात यह सुनी कि भई खबर यह नहीं कि कुत्ते ने इंसान को काट लिया, खबर यह है कि इंसान ने कुत्ते को काट लिया. हैरानी की बात नहीं कि अभी भी यह बात इधर उधर सुनने को मिल जाती है. यह संवाद एक दो फ़िल्मों में भी इस्तेमाल हुआ है. यह था पत्रकारिता का वह पुरानी सोच जिसके पास किसी बात का खबर होने का माप दंड इसका नयापन, अनोखा पन, विशेषता होता था. यह अलग है कि अब खबर इस पैमाने पर जांची या बनाई जाती है या नहीं, लेकिन इतना ज़रूर है कि अभी तक मन के कोनों में यही पैमाना जीवंत है.
शायद इसी लिए शुक्रवार के अख़बार शरद पवार पर एक सिर फिरे के हमले की खबरों से पटे पड़े थे. समाचार मुखपृष्ठ से शुरू होकर अंदर के पन्नों तक फैला हुआ था. अखबारों के रिपोर्टर जब हमलावर के घर उसके परिवार के बारे में विवरण जानने पहुंचे तो उन्हें घर के बाहर मोटा सा ताला लटका हुआ ‍मिला. कुछ फ़ोटो ग्राफ़्रों ने घर पर लटके ताले की तस्वीर खींचने पर ही संतोष किया मगर दूसरे अधिक समझदार और चालाक रिपोर्टरों ने पड़ोसियों को घेर लिया और उनके लंबे चौड़े इंटरव्यू छापे और पड़ोसियों की तस्वीरों से ही अखबारों के पन्नों को पाट दिया. ऐसा लगता था कि समाचार पत्रों के पास प्रकाशित करने के लिए कोई महत्वपूर्ण खबर थी ही नहीं. देश के जाने माने पत्रकारों और कालम लिखने वालों ने इस हमले पर ढके छिपे अंदाज़ में चुटकी लेने में भी कोई कसर उठा न रखी. इस हमले पर बड़े-बड़े स्तम्भ लिखे गए. हालांकि इस हमले पर हर तरफ से निंदा की आवाज़ आई मगर फेसबुक और अन्य सोशल नेटवर्किंग साइटों पर भी हमला ही चर्चा का विषय बना रहा और यारों ने खूब खूब मज़ा लिया.
यही नहीं जाने माने तथाकथित गांधीवादी भी उसमें बह गए और उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि “बस एक ही थप्पड़ मारा”. हालांकि बाद में इनहोंने एनसीपी के डर से अपना बयान बदल लिया लेकिन उनकी प्रतिष्ठा में ओर भी पतन आया और उनकी ओर से बयान देकर पलटने की घटनाओं में एक की और वृद्धि हो गयी. देश का हर व्यक्ति गांधीवादी तो बनना चाहता है मगर गांधी जी के उसूलों और उनके जीवन स्तर पर खरा नहीं उतर पाता. जो चीज़ गांधी जी को महात्मा यानी कि एक अज़ीम हसती बनाती है और सबसे अलग करती है वह है सब्र इसतेकामत, हक ओर सदाकत, इसार और कुरबानी, जो कि हर एक के बस की बात नहीं है. चर्खेा तो हर कोई चला सकता है मगर कपास कातना और धागा बनाना हर एक के बस की बात नहीं है. वह भी प्रेम का ऐसा धागा जो हर एक को जोड़ सके. प्रत्येक व्यक्ति अनशन कर सकता है, सत्याग्रह कर सकता है, लेकिन गांधी नहीं बन सकता.
लगता है कि मैं भी अपनी बिरादरी वालों की तरह असल खबर से भटक गया हूं इसलिए आइए वापस चलते हैं असल खबर की ओर, वह है झारखंड के झरिया में बीसीसीआईएल के एक कोयला व्यापारी के पास से बुधवार को आयकर विभाग को प्राप्त हुई काली कमाई और संपत्ति. छापे मारी के बाद से अब तक कोयला व्यापार के पास से लगभग 125 करोड़ रुपये की बरामदगी की गई है. आयकर विभाग ने बुधवार को कोयला ठेकेदार लाल बाबू के घर और कार्यालय में छापे मारी शुरू की थी. अधिकांश राशि बैंक खाते में ही जमा थी जबकि कुछ राशि घर और कार्यालयों से भी बरामद की गई. हालांकि आयकर विभाग को उनके नाम पर कोई भी खाता नहीं मिला है, लेकिन उनकी पत्नी और घर के दूसरे सदस्यों के नाम पर रकम जमा थी.
जब बैंक ऑफ इंडीया के अधिकारियों की नज़र बाबू सिंह के खातों में भारी भरकम राशि के लेनदेन पर गई तो उनहोंने आयकर विभाग को इस बात की जानकारी दी. जिसके बाद हरकत में आए आयकर विभाग के अधिकारियों ने लाल बाबू के घर और ऑफिस में छापे मारी की. वैसे अगर ‍इन पूरी घटनाओं को देखा जाए तो इसे आयकर विभाग के इतिहास की सबसे बड़ी सफलता कहा जा सकता है. इससे पहले आयकर विभाग की रीकवरी का रिकॉर्ड केवल 45 करोड़ रुपये था, लेकिन लाल बाबू के पास से बरामद किए 125 करोड़ ने आयकर विभाग के रिकॉर्ड को तोड़ दिया है. विभाग यह भी पता करने की कोशिश में लगा हुआ है कि यह करोड़ों रुपया लाल बाबू को कहाँ से मिला है. देश में न जाने ऐसे कितने ही लाल बाबू होंगे जिनके पास करोड़ों की अघोषित चल और अचल संपत्ति है, लेकिन आयकर विभाग को इस बारे में कोई जानकारी नहीं है.
हमारे देश में काली कमाई के खिलाफ जोर शोर से बोलने वाले और अभियान चलाने वाले नेता, अभिनेता और साधु-संतों को भी जैसे इस बारे में कुछ पता ही नहीं चला है. क्योंकि किसी ने भी इस बारे में न तो कोई बयान दिया है और न ही आयकर विभाग की प्रशंसा ही की है और न ही सरकार के ब्लैक मनी रोकने के इस कदम की सराहना की है. जबकि दूसरी ओर राजनीतिज्ञों के स्विस बैंक खातों की फर्जी कहानियाँ फेसबुक और इंटरनेट की सज्जा बनी हुई हैं.
विकी लीक्स की स्विस बैंक खातों की जाली सूचियां इंटरनेट पर आम हैं, और एक योग गुरु की वेबसाइट पर भी इसे देखा गया है. मगर कोई भी काले धन को रोकने के सराहनीय कदम की प्रशंसा के लिए आगे नहीं आया. इस खबर को दबाने में आयकर विभाग ने खुद भी काफी बड़ा हिस्सा निभाया है. वह इसलिए कि उसके पास राष्ट्रीय स्तर पर पीआरओ नहीं है और अगर है भी तो उसे कतई सक्षम नहीं कहा जा सकता. कोई ऐसा व्यक्ति जो समय समय पर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस प्रकार की कार्यवाही का ब्योरा पेश कर सके. चूंकि आयकर की चोरी, काली कमाई और उससे लड़ना केंद्र के तहत आता है इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर उसकी व्यापक प्रचार की जरूरत है जिससे दूसरे लोग भी इन घटनाओं से सबक हासिल करें और काले धन से तौबा करें.
नोट: आप यह लेख और पुराने सभी लेख http://afifahsen.blogspot.com पर भी पढ़ सकते हैं.

خبر کہاں گم ہوگئی؟


Daily Pratap, Indias Oldest Urdu Daily
Published on 28th November 2011
عفیف احسن
گذشتہ بدھ کو ٹیلی ویژن پر ایک خبر دیکھی جس میں بتایا گیا تھا کہ انکم ٹیکس کے ایک چھاپے میں جھاڑکھنڈ کے ایک کوئلہ ٹھیکیدار کے پاس سے75کروڑ کی نقدی برآمد ہوئی ہے۔اگلی صبح یعنی کے جمعرات کے اخبارات میں جب مزید تفصیلات کے لئے تلاش کیا تو خبر نظر نہیں آئی ۔بہت تلاش کرنے کے بعد اندرونی صفحات پر ایک چھوٹی سی خبر چھپی ہوئی نظرآئی۔ جس خبر کو صفحہ اول کی زینت بننا چاہئے تھا اور وہ بھی’’ مین لیڈ‘‘ اسے اس طرح دبادیاگیاتھاکہ جیسے کچھ ہو ا ہی نہ ہو۔ یہ چھاپے جمعرات کو بھی جاری رہے اور تب تک برآمد کی گئی رقم بڑھ کر 125کروڑ روپئے ہوگئی۔
میں نے سوچا کہ ہو سکتا ہے کہ 75کروڑ کی رقم ہمارے ملک کے بڑے بڑے اخبار والوں کومعمولی لگی ہو گی اس لئے اس کو زیادہ اہمیت نہیں دی گئی۔ اب مجھے امید تھی کے دیش کے بڑے بڑے اخبارات اس خبر کو صفحہ اوّل کی زینت بنائیں گے۔ ٹھیکیدار اور اس کے کس کس سے تعلقات تھے کے بارے میں ایک ایک تفصیل دی جائیگی۔ یہ بھی رقم کیاجائے گا کے وہ فلاں دکان سے جس کو کے چورسیا چلاتا ہے روزانہ پان کھاتا تھا، یہی نہیں چورسیا تک کے انٹرویو بمع تصویر دئے جائیں گے۔
مگر اگلے د ن تو مجھے پہلے سے بھی بڑا جھٹکا لگا۔ زیادہ تر اخبار نے اس خبر پر چپّی سادھ لی ، اوراپنے مؤخر اخبار کی ایک سطر بھی ضائع کرنا گوارا نہ کیا اور کچھ اخباروں نے خبر سے انصاف کرتے ہوئے یا یوں کہئے کہ صحافت کے تقاضہ کو ملحوظ رکھتے ہوئے آخرے صفحات میں ایک چھوٹی سی خبر چھاپ دی۔ ایسا لگ رہا تھا کہ ہمارے ملک کے بڑے بڑے اخبارات ’’ٹائمس ناؤ‘‘ کے خلاف دئے گئے سو کروڑ کے ذیلی عدالت کے فیصلے اور اس کی اپیل پر ہائی کورٹ کے اس چینل کو بیس کروڑ نقد جمع کرانے اور اسّی کروڑ کی بینک گارنٹی دینے کی شرط سے سکتے میں ہیں،جس کو کہ سپریم کورٹ نے بھی برقرار رکھا تھا۔ یاپھر شاید وہ اس چھاپے پر اور اس سے برآمد رقم پر یقین نہیں رکھتے ہیں اوراس لئے اس پر کچھ زیادہ کہنے اور لکھنے سے ڈر رہے ہیں۔ یہ بھی ہوسکتا ہے کہ یہ لوگ اس کو خبر ہی نہ سمجھ رہے ہوں۔
اس لئے آئیے تھوڑا سا سمجھنے کی کوشش کرتے ہیں کہ یہ ’خبر‘ کیا چیزہوتی ہے ۔ جب سے ہوش سنبھالا تب سے ایک بات یہ سنی کہ بھئی خبر یہ نہیں کہ کتے نے انسان کو کاٹ لیا، خبر یہ ہے کہ انسان نے کتے کو کاٹ لیا ۔ حیرانی کی بات نہیں کہ ابھی بھی یہ بات اِدھر اْدھر سننے کو مل جاتی ہے ۔یہ ڈائیلاگ ایک دو فلموں میں بھی استعمال ہوا ہے۔ یہ تھا صحافت کا وہ پرانا مکتبِ فکر جس کے نزدیک کسی بات کے خبر ہونے کا پیمانہ اس کا نیا پن، انوکھا پن، خاص پن ہوتا تھا ۔ یہ الگ ہے کہ اب خبر اس پیمانے پر جانچی یا بنائی جاتی ہے یا نہیں، تاہم اتنا ضرور ہے کہ ابھی تک ذہنوں کے سانچوں میں یہی پیمانہ جاگزیں ہے ۔
شاید اسی لئے جمعہ کے اخبارات شرد پوارپر ایک سر پھرے کے حملہ کی خبروں سے پٹے پڑے تھے۔ خبر صفحہ اوّل سے شروع ہوکر اندر کے صفحات تک پھیلی ہوئی تھی۔ اخبارات کے رپورٹر جب حملہ آور کے گھر اس کے خاندان کے بارے میں تفصیلات جاننے پہنچے تو انہیں گھر کے باہر موٹا سا تالہ لٹکا ہواملا۔ کچھ فوٹو گرافروں نے گھر پر لٹکے تالے کی تصویر کھینچنے پر ہی اکتفا کیا مگر دوسرے زیادہ سمجھدار اور چالاک رپورٹر وں نے پڑوسیوں کو ہی گھیر لیا اور انکے لمبے چوڑے انٹرویو چھاپے اورپڑوسیوں کی تصاویر سے ہی اخبارات کے صفحات کو پاٹ دیا۔ ایسا لگتا تھا کہ اخبارات کے پاس شائع کرنے کے لئے کوئی اور اہم خبر تھی ہی نہیں۔ دیش کے جانے مانے صحافیوں اور کالم نگاروں نے اس حملہ پر ڈھکے چھپے انداز میں چٹکی لینے میں بھی کوئی کسر اٹھا نہ رکھی۔ اس حملہ پر بڑے بڑے کالم لکھے گئے۔ حالانکہ اس حملہ پر ہر طرف سے مذمت کی آواز بلند ہوئی مگر فیس بک اور دوسری سوشل نیٹورکنگ سائٹس پر بھی یہ حملہ ہی گفتگو کا موضوع بنا رہا اور یاروں نے خوب خوب مزالیا۔
یہی نہیں جانے مانے نام نہاد گاندھی وادی بھی اس میں بہہ گئے اور انہوں نے چٹکی لیتے ہوئے کہا کہ ’’ بس ایک ہی تھپڑ مارا‘‘۔حالانکہ بعد میں انہوں نے این سی پی کے ڈر سے اپنا بیان بدل لیا مگر اس سے ان کے وقار میں مزید زوال آیا اور ان کی طرف سے بیان دے کر پلٹنے کے واقعات میں ایک اورکا اضافہ ہوگیا۔ ملک کا ہرشخص گاندھی وادی تو بننا چاہتا ہے مگر گاندھی جی کے اسولوں اور ان کے معیار زندگی پر کھرا نہیں اترپاتا۔جو چیز گاندھی جی کو مہاتما یعنی کہ ایک عزیم ہستی بناتی ہے اور سب سے منفرد کرتی ہے وہ ہے صبر واستقامت، حق و صداقت، ایثاراور قربانی جوکہ ہر ایک کے بس کی بات نہیں ہے۔ چرخہ تو ہر کوئی چلا سکتا ہے مگر کپاس کاتنا اور دھاگا بنانا ہر ایک کے بس کی بات نہیں ہے۔وہ بھی پریم کا ایسا دھاگا جو ہر ایک کو جوڑ سکے ۔ہر شخص انشن کر سکتا ہے، ستیہ گرہ کرسکتا ہے، مگر گاندھی نہیں بن سکتا۔
لگتا ہے کہ میں بھی اپنے برادری والوں کی طرح اصل خبر سے بھٹک گیا ہوں اس لئے آئیے واپس چلتے ہیں اصل خبر کی طرف وہ ہے جھارکھنڈ کے جھریا میں بی سی سی ایل کے ایک کوئلہ کاروباری کے پاس سے بدھ کو محکمہ انکم ٹیکس کو حاصل ہوئی کالی کمائی اور جائداد۔ چھاپے ماری کے بعد سے اب تک کوئلہ کاروباری کے پاس سے تقریبا 125کروڑ روپے کی برآمدگی کی گئی ہے۔ محکمہ انکم ٹیکس نے بدھ کو کوئلہ ٹھیکیدار لال بابو کے گھر اور آفس میں چھاپے ماری شروع کی تھی ۔ زیادہ تر رقم بینک اکاؤنٹس میں ہی جمع تھی جبکہ کچھ رقم گھر اور دفتروں سے بھی برآمد کی گئی۔ حالانکہ محکمہ انکم ٹیکس کو ان کے نام پر کوئی بھی اکاؤنٹ نہیں ملا ہے، لیکن ان کی بیوی اور گھر کے دوسرے ارکان کے نام پررقم جمع تھی ۔
جب بینک آف انڈیاکے اعلیٰ افسران کی نظر بابو سنگھ کے اکاؤنٹس میں بھاری بھرکم رقم کے ٹرانزیکشن پر گئی تو اس نے محکمہ انکم ٹیکس کو اس بات کی اطلاع دی ۔ جس کے بعد حرکت میں آئے محکمہ انکم ٹیکس کے افسران نے لال بابو کے گھر اور آفس میں چھاپے ماری کی۔ ویسے اگر ان پورے واقعات کو دیکھا جائے تو اسے محکمہ انکم ٹیکس کی تاریخ کی سب سے بڑی کامیابی کہا جا سکتا ہے۔ اس سے قبل محکمہ انکم ٹیکس کی ریکوری کا ریکارڈ صرف45 کروڑ روپے تھا، لیکن لال بابو کے پاس سے برآمد کیے 125 کروڑ نے محکمہ انکم ٹیکس کے اس ریکارڈ کو توڑ دیا ہے ۔ محکمہ یہ بھی معلوم کرنے کی کوشش میں لگا ہوا ہے کہ یہ کروڑوں روپیہ لال بابو کو کہاں سے حاصل ہوا ہے۔ ملک میں نہ جانے ایسے کتنے ہی لال بابو ہوں گے جن کے پاس کروڑوں کا غیر اعلانیہ منقولہ اور غیر منقولہ اثاثہ موجود ہے، لیکن محکمہ انکم ٹیکس کو اس بارے میں کوئی معلومات نہیں ہے۔
ہمارے ملک میں کالی کمائی کے خلاف زور شور سے بولنے والے اور مہم چلانے والے نیتا، ابھینیتا، اور سادھو سنتوں کو بھی جیسے اس بارے میں کچھ پتا ہی نہ چلا ہے۔ کیونکہ کسی نے بھی اس بارے میں نہ تو کوئی بیان دیا ہے اور نہ ہی انکم ٹیکس محکمہ کی ستائش کی ہے اور نہ ہی حکومت کے بلیک منی روکنے کے اس قدم کی تعریف ہی کی ہے۔ جبکہ دوسری طرف سیاست دانوں کے سوس بینک کھاتوں کی فرضی کہانیاں فیس بک اور انٹرنیٹ کی زینت بنی ہوئی ہیں۔
وکی لیکس کی سوس بینک کھاتوں کی جالی فہرستیں انٹرنیٹ پر عام ہیں، اور ایک یوگ گرو کی ویب سائٹ پر بھی اس کو دیکھا جاسکتاہے۔ مگر کوئی بھی کالے دھن کو روکنے کے اس قابل تعریف قدم کی ستائش کے لئے آگے نہیں آیاہے۔ اس خبر کو دبانے میں انکم ٹیکس محکمہ نے خود بھی کافی بڑا حصہ ادا کیا ہے۔ وہ اس لئے کہ اس کے پاس قومی سطح پر کوئی پی آراو نہیں ہے اور اگر ہے بھی تو اسے قطعی فعّال نہیں کہا جاسکتا ۔کوئی ایسا شخص جو کہ وقتاً فوقتاً پریس کانفرنس کر کے اس قسم کی کارروائی کا بیورا پیش کرسکے۔چونکہ انکم ٹیکس کی چوری ،کالی کمائی اور اس سے لڑنا مرکز کے تحت آتاہے اس لئے قومی سطح پر اس کی وسیع پبلسٹی کی ضرورت ہے جس سے دوسرے لوگ بھی ان واقعات سے عبرت حاصل کریں اور کالے دھن سے توبہ کریں۔
نوٹ: یہ مضمون اوراس سے قبل کے تمام مضامین پڑھنے کے لئے http://afifahsen.blogspot.comپر جائیں۔

Monday, 21 November 2011

मनरेगा से पैदा होती मजदूरों की कमी

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 21st November 2011
अफ़ीफ़ अहसन
एक सबक आमोज़ कहानी है जिसे हम बचपन में पढ़ा करते थे. कहते हैं कि किसी किसान के खेत में एक चिड़िया ने अपना घोंसला बनाया हुआ था जिस में उसने अंडे दिए, उन अंडों से नन्हे नन्हे बच्चे निकले, जिनकी वह बहुत देखभाल करती थी. ठीक उसी तरह जिस तरह कि किसान अपने खेत की देखभाल किया करता था. एक दिन किसान अपने खेतों पर आया और उसे लगा कि अब फसल तैयार हो गई है, उसने लहलहाती हुई फसल की तरफ देखकर बहुत जोश से कहा कि फसल तैयार हो गई है और वह जल्द ही उसे काटने की तैयारी करेगा. यह बात चिड़िया के नन्हे नन्हे बच्चों ने भी सुनी और वह परेशान हो गए कि अब हमारा आशियाना उजड़ जाएगा, जब चिड़िया शाम को वापस लौटी तो नन्हे नन्हे बच्चों ने यह बात उसको बताई कि किसान आया था और वह फसल काटने की बात कह रहा था, उस पर चिड़िया ने कहा कि घबराने की कोई बात नहीं है अभी फसल नहीं कटेगी. ऐसा ही हुआ कई दिन तक किसान का कोई आता पता नहीं चला और कोई भी फसल काटने नहीं आया. कुछ दिन बाद किसान फिर खेत पर आया और उसने फसल देखकर कहा कि मैं कल ज़रूर गांव के लोगों के साथ आकर फसल कटवालुंगा. जब शाम को चिड़िया आई तो बच्चों ने उसे किसान के फिर आने के बारे में बताया इस पर चिड़िया ने कहा कि अभी घबराने की कोई बात नहीं है. दिन इसी तरह गुज़रते चले गए और कोई फसल काटने नहीं आया. कुछ दिन बाद फिर किसान खेत पर आया और उसने कहा कि कल अपने मित्रों के साथ फसल काटने आऊँगा. उस दिन भी जब शाम को चिड़िया लौटी तो उसके बच्चों ने यह कहानी उसे सुनाई उसने कहा के अभी भी घबराने की कोई बात नहीं है. इसी तरह ज्यादा दिन गुजरते चले गए और फसल न कटी, कुछ दिन बाद किसान फिर खेतों पर आया और उसे इस बात पर बहुत चिंता हुई के अभी तक फसल नहीं कट सकी है, उसने यह फैसला किया कि अब वह खुद ही अपने हाथों से फसल काटेगा और यह कहते हुए खेत से चला गया कि वह कल खुद ही आकर फसल काटेगा और अब किसी का इंतजार नहीं करेगा. जब शाम को चिड़िया लोट कर आई तो उसके बच्चों ने यह बात उसे बताई कि किसान कह गया है कि वह कल खुद आकर फसल काटेगा. यह सुनते ही चिड़िया ने कहा कि अब हम को तुरंत यह जगह छोड़ देनी चाहिए और कहीं और बसेरा करना चाहिए. अब तक चिड़िया के बच्चे बड़े हो गए थे और वे इस लायक हो गए थे कि उड़ सकें इसलिए चिड़िया अपने बच्चों को लेकर उड़ गए और कहीं और चली गई. इस कहानी का सबक यह था कि जब तक कोई काम खुद नहीं करोगे वह काम नहीं हो सकता.
उस समय में इस कहानी के सबक आमोज़ पहलू से अधिक इस बात पर हैरान हुआ करता था कि हिंदुस्तान जैसे देश में जहां इतनी बेरोजगारी है कैसे किसान को फसल काटने के लिए लोग नहीं मिल रहे थे. इसलिए मेरा यह मानना ​​था कि यह कहानी मन घड़ंत है. हिंदुस्तान में तो काम का अकाल है मज़दुरों की तो भरमार हे. मगर पिछले दिनों वाशिंगटन पोस्ट की एक कहानी पढ़ी जिस में यह बताया गया है कि कैसे मनरेगा के चलते खेती के मजदूरों की किल्लत हो गई है. यही नहीं उद्योगों और निर्माण परियोजनाओं को भी मजदूरों की कमी का सामना है.
कांग्रेस ने पूरे देश में मनरेगा कार्यक्रम चलाया हुवा हे. यह कार्यक्रम बहुत लोकप्रिय है और पार्टी का सारा जोर इसी कार्यक्रम पर है क्योंकि इस कार्यक्रम के सहारे कांग्रेस पार्टी दो बार सत्ता में आई है. और उसे लगता है कि उसके सहारे वह उत्तर प्रदेश में सत्ता की सीढ़ियों चढ़ सकती है, शायद इसी लिए ग्रामीण विकास मंत्री जैराम रमेश इस योजना में मायावती सरकार के जरिये हो रही धान्दलियों पर एक के बाद एक तीर छोड़ रहे हैं. इसमें उनका उद्देश्य तो शायद यह ही लगता है के उत्तर प्रदेश के लोगों को यह पता चले की यह योजना केंद्र सरकार के रहम व करम पर है और इसी के चलते उत्तर प्रदेश सरकार को आठ हज़ार करोड़ से अधिक राशि इस मद में खर्च करने को मिल रही है.
वॉशिंगटन पोस्ट ने भारत के एक गांव में कुएँ की खुदाई और गडों में मिट्टी भरने में लगी एक दर्जन से अधिक महिलाओं का उदाहरण दिया है जिनमें से हर कोई एक दिन में कम से कम से कम दो डॉलर यानी के सो रूपये से अधिक कमाई कर रही हैं, जो ग्रामीण गरीबों के लिए सरकारी मजदूरी कार्यक्रम की वजह से ही संभव हो सका है. “यह काम मुझे रोज़ाना का दाल दलिया और आत्म सम्मान देता है” 42 वर्षीय ‍चिन्नासवामी ईश्वरी ने वॉशिंगटन पोस्ट के प्रतिनिधि को बताया. दक्षिण राज्य तमिलनाडु में उस ने महिलाओं की एक क़तार में मिट्टी भरा तसला एक से दूसरे को देते हुए कहा “मुझे भूखे नहीं सोना पड़ता, और मैं अब बड़े खेत मालिकों से कम भुगतान पर काम देने के लिए भीख नहीं माँगता हूँ.” खेती के लिए मजदूरों की कमी को देखते हुए ही कृषि मंत्रालय ने पिछले जुलाई में यह अनुरोध किया था कि इस कार्यक्रम को खेती के सीज़न के दौरान रोका जाना चाहिए.
छह साल पहले राष्ट्रीय स्तर पर शुरू की गई राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना ने किसी भी परिवार के लाखों असहाय, गरीब और नादार लोगों को साल में 100 दिन का काम देकर उन लोगों की मदद की है जो काम करना चाहते हैं. लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह कार्यक्रम मजदूरों को का‍हिल बना रहा है, कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों में मजदूरों की कमी पैदा करता है और पैसे की बर्बादी होती है जिसका आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में निवेश हो सकता था. वह कहते हैं कि हिंदुस्तान की आर्थिक महाशक्ति बनने की गति धीमी हो जाएगी क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में काम की आयु वाले लोग रोजगार के नए अवसरों के लिए आवश्यक कौशल नहीं सीख रहे हैं.
उनका कहना है कि ग़रीबों के लिए ग्रामीण रोज़गार प्रोग्राम अंतिम कदम होना चाहिए था. इसके बजाय यह एक पसंदीदा काम बन गया है क्योंकि इस में आसानी से पैसा मिल जाता है और यहां वहां खुदाई का मामूली सा काम करना पड़ता है. ‍इन्डीयन चेम्बरस ऑफ कामर्स और इंडस्ट्रीज (फिक्की) में कृषि विभाग के प्रमुख एस भास्कर रेड्डी ने कहा. “यही समय है जब हमें नए कौशल के लिए प्रशिक्षण देना चाहिए था, लेकिन हम उनके हुनर ​​को समाप्त कर रहे हैं.”
मजदूरों की कमी की समस्या से ग्रामीण कार्यों और औद्योगिक कार्यों में आवश्यक अनुपात पैदा करके ही निपटा जा सकता है. चीन में खेती के मौसम में तो ग्रामिण लोग खेती बाड़ी का काम करते हैं मगर जिस दौरान खेतों में कोई काम नहीं होता तो वह इस बीच फ़ैक्टरियों और निर्माण प्रोजैक्टों में काम करते हैं जहां उनके लिए अंतरिम रूप से रहने ओर खाने पीने का इंतज़ाम किया जाता है. इस तरह औद्योगिक कार्य और खेती बाड़ी में बराबर अनुपात बना रहता है. दोनों क्षेत्रों को मजदूरों की कमी का सामना नहीं करना पड़ता.
सरकार को चाहिए कि वे मनरेगा को एक बहुत बड़े मज़दूर एक्सचेंज के रूप में इस्तेमाल करे. इस से यह होगा कि अगर किसी फैक्टरी, कंस्ट्रक्शन कंपनी आदि को मजदूरों की जरूरत होगी तो वह मनरेगा से संपर्क करेगी जो अपने यहां पंजीकृत मजदूरों से आवश्यकतानुसार मजदूर इन निजी संस्थानों को देगा ओर इन संस्थाओं से मानक के अनुरूप वेतन प्राप्त होगा इससे मजदूरों का शोषण रुकेगा और मनरेगा को आय भी होने लगेगी.
सरकार यह कर सकती है कि यह अनिवार्य बनाए कि उसके द्वारा दिए गए बड़े ठेकों में मज़दूरों की आपूर्ती मनरेगा से होगी और ठेकेदार मनरेगा को मानक के अनुसार मजदूरी का भुगतान करेगा. इससे जो अधिक आय होगी उसे मनरेगा दूसरे कामों पर लगा सकता है. इस तरह वे मज़दूर जो अभी तक असंगठित था संगठित हो जाएगा. आगे चलकर मनरेगा के मजदूरों और उनके परिवार को मनरेगा के तहत चिकित्सा सुविधाओं का लाभ प्रदान किया जा सकता हैं. उनका बीमा किया जा सकता है और सामाजिक सुरक्षा के ऐसे ही कई अन्य लाभों का निष्पादन किया जा सकता है. अब समय आ गया है के मनरेगा को नया रंग रूप दिया जाए ओर निजी क्षेत्र को भी इसमें शामिल किया जाए ताकि अधिक से अधिक लोगों को इस योजना में शामिल किया जा सके और इसका लाभ दिलाया जा सके.
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منریگا سے پیدا ہوتی مزدوروں کی قلت


Daily Pratap, Indias Oldest Urdu Daily
Published on 21st November 2011
عفیف احسن
 ایک سبق آموز کہانی ہے جسے ہم بچپن میں پڑھاکرتے تھے۔ کہتے ہیں کہ کسی کسان کے کھیت میں ایک چڑیا نے اپنا گھونسلا بنایاہو ا تھا اور اس میں اس نے انڈے دئے، ان انڈوں سے ننے ننے بچے نکلے، جن کی وہ بہت دیکھ بھال کرتی تھی۔ بالکل اسی طرح جس طرح کہ کسان اپنے کھیت کی دیکھ بھال کیا کرتا تھا۔ ایک دن کسان اپنے کھیتوں پر آیا اور اس کو لگا کہ اب فصل تیا ر ہوگئی ہے، اس نے لہلہاتی ہوئی فصل کی طرف دیکھ کر بہت جوش سے کہا کہ اب فصل تیار ہوگئی ہے اور وہ جلد ہی اسے کاٹنے کی تیاری کرے گا۔ یہ بات چڑیا کہ ننے منے بچوں نے بھی سنی اور وہ پریشان ہوگئے کہ اب ہمارا آشیانہ اجڑ جائے گا، جب چڑیا شام کو واپس لوٹی تو ننے منے بچوں نے یہ بات اسکو بتائی کہ کسان آیا تھا اور وہ فصل کاٹنے کی بات کررہا تھا،اس پر چڑیا نے کہا کہ گھبرانے کی کوئی بات نہیں ہے ابھی فصل نہیں کٹے گی۔ ایسا ہی ہوا کئی دن تک کسان کا کوئی اتا پتہ نہیں چلا اور کوئی بھی فصل کاٹنے نہیں آیا۔کچھ دن بعد کسان پھر کھیت پر آیا اور اس نے فصل دیکھ کر کہا کہ میں کل ضرور گاؤں کے لوگوں کے ساتھ آکر فصل کٹوالوں گا۔ جب شام کو چڑیا آئی تو بچوں نے اس کو کسان کے دوبارہ آنے کے بارے میں بتایااس پر چڑیا نے کہا کہ ابھی گھبرانے کی کوئی بات نہیں ہے ۔ دن اسی طرح گزرتے چلے گئے اور کوئی فصل کاٹنے نہیں آیا۔ کچھ روز بعد پھر کسان کھیت پر آیا اور اس نے کہا کہ کل میں اپنے دوستو ں کے ساتھ فصل کاٹنے آؤں گا ۔ اس دن بھی جب شام کو چڑیا واپس آئی تو اس کے بچوں نے یہ روداد اس کو سنائی اس نے کہا کے ابھی بھی گھبرانے کی کوئی بات نہیں ہے۔ اسی طرح مزید دن گزرتے چلے گئے اور فصل نہ کٹی، کچھ دن بعد کسان پھر کھیتوں پر آیا اور اس کو اس بات پر بہت تشویش ہوئی کے ابھی تک فصل نہیں کٹ سکی ہے ، اس نے یہ فیصلہ کیا کہ اب وہ خود ہی اپنے ہاتھوں سے فصل کاٹے گا اور یہ کہتے ہوئے کھیت سے چلا گیا کہ وہ کل خود ہی آکر فصل کاٹے گا اور کسی کا انتظار نہیں کرے گا۔ جب شام کو چڑیا لو ٹ کر آئی تو اس کے بچوں نے یہ بات اس کو بتائی کہ کسان کہہ گیا ہے کہ وہ کل خودآکر فصل کاٹے گا۔ یہ سنتے ہی چڑیا نے کہا کہ اب ہم کو فوراً یہ جگہ چھوڑ دینی چاہیے اور کہیں اور بسیرا کرنا چاہئے۔ اب تک چڑیا کے بچے بڑے ہوگئے تھے اور وہ اس لائق ہوگئے تھے کہ اڑ سکیں اس لئے چڑیا اپنے بچوں کو لیکر اڑگئی اور کہیں اور چلی گئی۔ اس کہانی کو سبق یہ تھا کہ جب تک کوئی کام خود نہیں کروگے وہ کام نہیں ہوسکتا۔
اس وقت میں اس کہانی کے سبق آموز پہلو سے زیادہ اس بات پر حیران ہوا کرتا تھا کہ ہندوستان جیسے ملک میں جہاں اتنی بیروزگاری ہے کیسے کسان کو فصل کاٹنے کے لئے لوگ نہیں مل رہے تھے۔اس لئے میرا یہ خیال تھا کہ یہ کہانی من گھڑنت ہے۔ ہندوستان میں تو کام کا اکال ہے مزدورں کی تو بھرمارہے۔ مگر گزشتہ دنوں واشنگٹن پوسٹ کی ایک کہانی پڑھی جس میںیہ بتایا گیا ہے کہ کس طرح منریگا کے چلتے کھیتی کے مزدوروں کی قلت ہوگئی ہے۔یہی نہیں صنعتوں اور تعمیراتی پروجیکٹوں کو بھی مزدوروں کی کمی کا سامنا ہے۔
کانگریس پارٹی نے پورے دیش میں منریگا پروگرام چلایا ہوا ہے۔ یہ پروگرام بہت محبوب ہے اور اس کا سارا زور اسی پروگرام پر ہے کیونکہ اسی پروگرام کے سہارے کانگریس پارٹی دو بار برسراقتدار آئی ہے ۔ اور اس کو لگتا ہے کہ اس کے سہارے وہ یوپی میں بھی اقتدار کی سیڑھیاں چڑھ سکتی ہے شاید اسی لئے دیہی ترقی کی وزیر جیرام رمیش اس اسکیم میں مایاوتی حکومت کے دوران ہورہی دھاندلیوں پر ایک کے بعد ایک تیر چھوڑ رہے ہیں۔ اس میں ان کا زیادہ مقصد تو شاید یہ ہی لگتا ہے کے یوپی کے لوگوں کو یہ پتا چلے کے یہ اسکیم مرکز ی حکومت کی مرہون منّت ہے اور اسی کے چلتے یوپی حکومت کو آٹھ ہزار کروڑ سے زیادہ رقم اس مد میں خرچ کرنے کو مل رہی ہے۔
واشنگٹن پوسٹ نے ہندوستان کے ایک گاؤں میں کوئیں کی کھدائی اورگڈھوں میں مٹی بھرنے میں لگی ایک درجن سے زیادہ خواتین کی مثال دی ہے جن میں سے ہرکوئی ایک دن میں کم از کم دو ڈالر یعنی کے سورروپیہ سے زیادہ کمائی کررہی ہے، جوکہ دیہی غریبوں کے لئے سرکاری مزدوری پروگرام کی وجہ سے ہے ممکن ہوسکا ہے۔ ’’یہ کام مجھے میری روزانہ کی دال دلیا اور وقار دیتا‘‘ 42سالہ چناسوامی ایشوری نے واشنگٹن پوسٹ کے نمائندہ کو بتایا۔ جنوب کی تامل ناڈو ریاست میں خواتین کی ایک قطارمیں مٹی بھرا تسلا ایک سے دوسرے کو دیتے ہوئے اس نے مزید کہا’’مجھے اب بھوکے نہیں سونا پڑتا، اور میں اب بڑے کھیت مالکان سے کم ادائیگی پر کام دینے کے لئے بھیک نہیں مانگتی ہوں‘‘۔کھیتی کے لئے مزدوروں کی کمی کو دیکھتے ہوئے ہی ر زراعت کی وزارت نے گذشتہ جولائی میں یہ درخواست کی تھی کہ اس پروگرام کو کھیتی کے موسم کے دوران روکا جانا چاہئے۔
چھ سال پہلے قومی سطح پر شروع کی گئی قومی دیہی روزگار گارنٹی اسکیم نے کسی بھی خاندان کے لاکھوں بے سہارا، غریب اور نادار لوگوں کو سال میں100دن کا کام دیکر ان لوگوں کی مدد کی ہے جو کہ کام کرنا چاہتے ہیں۔ لیکن ناقدین کا کہنا ہے کہ یہ پروگرام مزدوروں کوکاہل بنا دیا ہے ، زراعت اور صنعتی شعبوں میں مزدوروں کی کمی پیدا کرتا ہے اوراس پیسے کی بربادی ہوتی ہے جس کی اقتصادی ترقی کو فروغ دینے میں سرمایہ کاری ہوسکتی تھی۔ وہ کہتے ہیں کہ ہندوستان کی ایک اقتصادی سپر پاور بننے کی رفتار سست ہوجائے گی کیونکہ دیہی علاقوں میں کام کی عمر کے ہندوستانی روزگار کے نئے مواقع کے لیے ضروری مہارت نہیں سیکھیں گے ۔
ان کا کہنا ہے کہ غریبوں کے لئے دیہی روزگارپروگرام آخری اقدام ہونا چاہیے تھا۔ اس کے بجائے یہ ایک پسندیدہ کام بن گیا ہے کیونکہ اس میں آسانی سے پیسہ مل جاتا ہے اور یہاں وہاں کھدائی کا معمولی سا کام کرنا پڑتا ہے۔ انڈین چیمبرس آف کامرس اینڈ انڈسٹریز(فکی) میں زراعتی شعبہ کے سربراہ ایس بھاسکر ریڈی نے کہا۔’’ یہی وقت ہے جب ہمیں ان کو نئے ہنر کے لیے تربیت دینا چاہئے تھا، مگر ہم ان کے ہنر کو ختم کررہے ہیں۔‘‘
مزدوروں کی کمی کے مسئلہ سے دیہی کاموں اور صنعتی کاموں میں ضروری تناسب پیدا کرکے ہی نپٹا جاسکتا ہے۔چین میں کھیتی کے سیزن میں تودیہی لوگ کھیتی باڑی کا کام کرتے ہیں اورجس دوران کھیتوں میں کوئی کام نہیں ہوتا تو وہ اسبیچ فیکٹریوں اور تعمیراتی پرجیکٹوں میں کام کرتے ہیں جہاں پر ان کے لئے عبوری طور پر رہنے اورکھانے پینے کا انتظامبھی کیا جاتا ہے۔ اس طرح صنعتی کام اور کھیتی باڑی میں برابر تناسب بنا رہتا ہے۔ اور دونوں شعبوں کو مزدوروں کی قلت کا سامنا نہیں کرنا پڑتا۔
حکومت کو چاہیے کہ وہ منریگا کو ایک بہت بڑے لیبر ایکسچینج کے طور پر استعمال کرے ۔ اس میں یہ ہوگا کہ اگر کسی فیکٹری ، کنسٹرکشن کمپنی وغیرہ کو مزدوروں کی ضرورت ہوگی تو وہ منریگا سے رابطہ قائم کرے گا جو کہ اپنے یہا ں رجسٹرڈ مزدوروں میں سے ضرورت کے مطابق مزدور ان نجی اداروں کو دے گااور ان اداروں سے معیار کے مطابق اجرت وصولے گا اس سے مزدوروں کا استحصال رکے گا اور منریگا کو آمدنی بھی ہونے لگے گی۔
حکومت یہ بھی کر سکتی ہے کہ اس بات کو لازمی بنائے کہ اس کے ذریعہ دئے گئے بڑے بڑے ٹھیکوں میں مزدورں کی بازیابی منریگا سے ہوگی اور ٹھیکیدار منریگا کو معیار کے مطابق مزدوری ادا کرے گا۔ اس سے جو زائد آمدنی حاصل ہوگی اس کو منریگا میں دوسرے کاموں پر لگایاجاسکتا ہے۔ اس طرح وہ مزدور جو کہ ابھی تک غیر منظم تھا منظم ہوجائے گا۔ آگے چل کر منریگا کے مزدوروں اور ان کے خاندان کومنریگا کے تحت طبّی سہولیات بہم پہنچائی جاسکتی ہیں۔ ان کی انشورنس کی جاسکتی ہے اور سوشل سیکیورٹی کے ایسے ہی کئے دوسرے فوائد ان کو بہم پہنچائے جاسکتے ہیں۔ اب وقت آگیا ہے کے منریگا کو نیارنگ روپ دیاجائے اورنجی شعبہ کو بھی اس میں شامل کیا جائے تاکہ زیادہ سے زیادہ لوگوں کو اس اسکیم میں شامل کیا جاسکے اور ان کو اس سے فائدہ دلایا جاسکے۔

Sunday, 20 November 2011

Beware, threat is looming large

Afif Ahsen
India's economy is considered to be among world's fifteen largest economies. Following liberalization and economic reforms policy in 1991, development in India took on wings and India emerged as an economic super power in the world. Prior to reforms, especially Indian industry and business was reeling under government control. In the beginning, reforms were severely opposed, but the protest petered down to large extent after beneficial results of these reforms were visible. But there is still a large section, which has not been benefited with these reforms and is not happy with the reforms.
India's current account balance of payment has been negative since independence. Under the pressure of the balance of payment crisis, in the wake of economic reforms of 90s, Indian exports witnessed an increasing trend. Country's export during 2002-03 was 80.3 %, whereas it was only 66.2% in 1990-91. It, however, came down to 61.4 % only following the great recession in world trade due to global economic crisis. India's constant and fast increasing oil import bill is considered to be an important factor behind the widening current account deficit, which increased to 118.7 billion $ or 9.7% of GDP in 2008-09. India imported crude oil worth 82.1 billion $ during January to October 2010.
India's exports and imports registered a decline of 29.2% and 39.2% respectively during June 2009 due to the global recession towards the end of 2000. This sharp decline was due to the fact that US and EU countries were the most affected by the global financial markets, whose share in Indian exports amounted to more than 60%. But fortunately there were considerable decline in imports in comparison to the exports and due to this India's fiscal deficit was reduced to 25,250 crores of rupees. The decline in oil prices also played an important role in this. In view of worldwide recession, FII started to invest in India with the objective of exploring better sources of income and the resultant decline in exports was, to a large extent was compensated by FDI.
But, after US announcement of increasing the loan accepting limits, FII has started withdrawing its money from India and investing it in US, which has resulted in constant increase in price of dollar vis-à-vis rupee and foreign exchange reserve is constantly shrinking.
According to an RBI report, foreign exchange reserve was 15,43,811 crore rupees in week ending11th November 2011, which is 20,642 crore rupees less than previous week. Today, the rupee is at the lowest level vis-à-vis dollar in the last 30 months. It appears that a phase of recession has set in, in the Indian economy, which is clearly reflected by the 1.9% decline in industrial production, which is quite high in comparison to two years' decline. This decline in Industrial Production Index for September is quite high to the strong 6.1% for September last year. During this financial year, the Industrial Production Index was stationary at 5% during April to September, where it was 8.2% during the same period of last year. Principal Economic Adviser, Kaushik Basu said that IPI for September are subject of grave concern and he says that global economic situation is responsible for this. Commenting on IPI for September, released on Friday, General Secretary, FICCI, Rajiv Kumar said that the outlook for industrial development has worsen during last few months. Businesses have been adversely influenced by the uncertainty of the economic environ and the negative development in capital goods and non-durable goods sectors reflects the mistrust of consumers. There have been decline of 6.8% in capital goods sector. Negative development has been registered in the readymade garments and textile sector during last few months.
This will adversely affect jobs in the country, as after agriculture, this is the biggest sector providing employment to people. It appears that the reason for this biggest decline in two years is due to increase in interest rates by RBI and unbridled inflation, which has resulted in decline in purchasing power of people. It is surprising that this has happened immediately after the festival season, during which it was expected of people to spend more.
Tax collection by the government has also gone down considerably due to lesser industrial production and increase in production cost. Petrol-prices are being increased daily. This is being done with a view to directly increase the government revenue, resulting in the increase in government's income. Meanwhile, Moody has down-graded the ratings of Indian banks. Reacting irresponsibly, the government has said that this rating is meaningless, as domestic loan provider is in a better position in comparison to its global colleagues. He is not worried. We are not influenced by this downgrading. In view of performance of global banks, we are quite strong and ratings have no meaning for us. Secretary, Financial Services, DK Mittal said that Moody has said that increase in the recession in domestic and foreign economies has been influencing the capitalization of Banks' assets standard and profits. Moody has said in the report that in view of quality, we fear the situation will worsen within next 12 to 18 months. Thus there will be increase in problems of banks during 2012 and 2013 financial years.
Senior BJP leader and former Finance Minister, Yashwant Sinha has expressed concern over country's economic situation. BJP has announced its decision to demand debate in both the Houses on deteriorating economic condition of the country. Expressing dis-satisfaction and concern over industrial development statistics released by the government, Yashwant Sinha said that there is hardly a thing in our economy which could make us happy. He said that condition of our economy is causing concern and the revenue deficit declared in the statistics released by the government, is far from the budget target. He said that if we compare industrial development of this period of last year, with that of April, then we will see that there has been decline of more than five per cent. The former Finance Minister said that on one side the condition of our economy is very grave, while on the other hand our Prime Minister is certifying good work to Heads of the States of other countries.
In an advisory tone, the former Finance Minister has said that the nation expects Prime Minister would call a press conference and explain the country about the economic health of the country. Our country is reeling under grave industrial crisis and our government is not cutting unnecessary and unessential expenditure. It is possible that no road has been constructed in your village, but in cities a single road is being constructed again and again during a year. Old footpaths are demolished and new ones are constructed. Old parks are re-developed, new memorials of departed leaders are constructed, not only departed, but statues of living leaders are installed and whenever the issue of spending on very essential heads comes up, then every government, whether it is state government of the central government, shakes off its responsibility and starts lamenting for the paucity of funds. Our government is lacking funds for its own needs, but it is trying to please other countries and promising them large-hearted aid.
Manmohan Singh has declared aid for Maldives and Pranab Mukherjee is talking of helping Europe and of pulling them out of crisis. In order to improve its financial condition, the government is also trying to get the additional cash reserves with public undertakings transferred to it, so that it can meet its expenses. If the government does not awake to the situation, it appears the country would head from bad to worse and then India will have to face the situation, that is prevailing in US and Europe.
In a couplet, Vasim Barelavi says first priority is to save the house, its decoration comes at a later stage. This fits to the present situation of the country.

Tuesday, 15 November 2011

मुल्क की फिक्र कर नादां मुसीबत आने वाली है!

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 15th November 2011
अफ़ीफ़ अहसन
भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की पंद्रह सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है. 1991 से जब के उदारीकरण और आर्थिक सुधार की नीति लागू की गई भारत में बहुत तेजी से आर्थिक विकास हुआ और भारत दुनिया की आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभर कर सामने आया.
सुधारों से पहले विशेष रूप से भारतीय उद्योगों और व्यापार पर सरकारी नियंत्रण का बोलबाला था, सुधार लागू करने से पहले इसका जोरदार विरोध भी हुआ लेकिन आर्थिक सुधार के अच्छे परिणाम सामने आने के बाद विरोध में काफी हद तक कमी हुई. हालांकि मूल ढाँचों में तेज प्रगति न होने से एक बड़ा वर्ग अभी भी नाखुश है और इन सुधारों से अभी भी लाभांवित नहीं हुआ है.
आज़ादी के बाद से ही भारत का अपने चालू खाते में भुगतान संतुलन नकारात्मक रहा है. नब्बे के दशक में आर्थिक सुधारों के बाद भुगतान संकट के संतुलन के दबाव की वजह से भारतीय निर्यात में लगातार वृद्धि हुई, वर्ष 2002-03 में निर्यात देश के आयात के 80.3 प्रतिशत के बराबर था जोकि 1990-91 में केवल 66.2 प्रतिशत था. हालांकि, वैश्विक आर्थिक संकट के बाद विश्व व्यापार में आई एक आम मंदी के कारण 2008-09 में यह घटकर 61.4 प्रतिशत ही रह गया. भारत के लगातार और तेजी से बढ़ते तेल आयात बिल को चालू खाता के बढ़ते घाटे के पीछे एक महत्वपूर्ण तत्व के रूप में देखा जाता है. जो वर्ष 2008-09 में बढ़कर 118.7 अरब डॉलर, या कुल घरेलू उत्पाद का 9.7 प्रतिशत हो गया. जनवरी और अक्टूबर 2010 के बीच, भारत ने कच्चे तेल का 82.1 अरब डालर की कीमत का आयात किया.
2000 के अंत में विश्व मंदी की वजह से भारतीय निर्यात और आयात दोनों में जून 2009 में क्रमशः 29.2 प्रतिशत और 39.2 प्रतिशत की कमी आई. यह तेज़ गिरावट इसलिए थी क्योंकि वैश्विक वित्तीय बाजार की मार से सबसे प्रभावित देश अमेरिका और योरुपीये संघ सदस्य थे जिनका हिस्सा भारतीय निर्यात में 60 प्रतिशत से अधिक है. लेकिन इसे सौभाग्य ही कहेंगे कि इस दौर में आयात में निर्यातों की तुलना में पर्याप्त कमी आई और इस वजह से भारत का वित्तीय घाटा घट कर 25,250 करोड़ रुपये रह गया. जिसमें तेल के दाम में आइ कमी ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
वैश्विक बाजार में मंदी के चलते आय के बेहतर अवसर की तलाश में एफआईआई ने भारत में अपना पैसा लगाना शुरू कर ‍दिया और इससे निर्यात में आई कमी को एफडीआई ने कुछ हद तक पूरा कर दिया. मगर हाल में अमेरिका द्वारा अपने ऋण लेने की सीमा बढ़ाने के बाद से एफआईआई ने अपना पैसा निकाल कर अमेरिका में लगाना शुरू कर दिया जिसके चलते भारतीय रुपये के मुकाबले डॉलर की कीमत लगातार बढ़ रही है और विदेशी मुद्रा के भंडार में लगातार कमी आ रही है. रिजर्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार 11 नवम्बर 2011 को समाप्त सप्ताह में देश में विदेशी मुद्रा का भंडार 15,43,811 करोड़ रुपये का था जिसमें कि पिछले सप्ताह की तुलना 20,642 करोड़ रुपये की कमी दर्ज की गई है. आज हालत यह हे की रुपया डॉलर के मुकाबले तीस महीने के सबसे निचले स्तर पर है.
ऐसा लगता है की भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी का दौर शुरू हो चुका है जिस की स्पष्ट निशानियों में औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि में 1.9 प्रतिशत की कमी है जो पिछले दो सालों के मुकाबले बहुत अधिक है. सितंबर के लिए औद्योगिक उत्पादन सूचकांक की यह डुबकी पिछले साल सितंबर के एक मजबूत 6.1 प्रतिशत के विपरीत है. अप्रैल से सितंबर की अवधि के दौरान इस वित्तीय वर्ष में औद्योगिक उत्पादन का सूचकांक 5 प्रतिशत पर खड़ा है जबकि पिछले साल की इसी अवधि में यह 8.2 प्रतिशत था.
मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने कहा कि सितम्बर के औद्योगिक उत्पादन सूचकांक के आंकड़े बड़ी चिंता का विष्य हैं और दावा किया कि वैश्विक आर्थिक स्थिति इस के लिए जिम्मेदार है. सितंबर के लिए औद्योगिक उत्पादन सूचकांक के आंकड़े जो शुक्रवार को जारी किये गये पर टिप्पणी करते हुए फिक्की के महासचिव राजीव कुमार ने कहा कि “देश में औद्योगिक विकास का आउटलुक पिछले कुछ महीनों में बिगड़ा है. आर्थिक माहौल में अनिश्चितता की स्थिति से कारोबार प्रभावित हुए हैं व के‍पिटल गुडस क्षेत्र और गैर ड्युरेबिल गुड्स क्षेत्र के नकारात्मक विकास से उपयोगकर्ताओं का अविश्वास प्रदर्शित होती है.
कैपिटल गुडस के क्षेत्र में 6.8 प्रतिशत की कमी हुई है. पिछले कुछ महीनों में सिले कपडों और कपड़ा उद्योग में लगातार नकारात्मक विकास दर्ज किया गया है. इससे देश में नौकरियों पर असर पड़ेगा क्योंकि खेती के बाद ‍इस उद्योग से ही सबसे अधिक लोग जुड़े हुए हैं.
ऐसा माना जाता है कि दो साल में सबसे बड़ी गिरावट का कारण रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि और महंगाई में अनियंत्रत वृद्धि है जिसके कारण लोगों की खरीदने की शक्ति में कमी हुई है. आशचर्य की बात यह हे की ऐसा त्योहार के सीजन के तुरंत बाद हुआ है जिस में यह आशा की जाती थी कि लोग ज्यादा से ज्यादा खर्च करेंगे.
औद्योगिक उत्पादन कम होने और उत्पादन लागत में वृद्धि के चलते सरकार की कर वसूली में भी पर्याप्त कमी हुई है. मगर सरकारी खर्च में कोई कमी नहीं की जा रही है. पेट्रोल के दाम में रोज़बरोज़ वृद्धि की जा रही है. ऐसा इसलिए किया जा रहा है कियोंकी इस से सरकारी कर में सीधे वृद्धि होगी जिसके चलते सरकार की आय में वृद्धि हो जाएगी.
दूसरी ओर मोडीज़ ने भी भारतीय बैंकों की रेटिंग ‍गिरादी है. इस पर लापरवाही वाला बयान देते हुए सरकार ने कहा है कि इस रेटिंग का कोई महत्व नहीं है क्योंकि घरेलू ऋणदाता अपने विश्व साथियों की तुलना में बहतर हैं, “हम चिंतित नहीं हैं. हम डाउनग्रेड से प्रभावित नहीं हैं. वैश्विक बैंकों के प्रदर्शन को देखते हुए, हम बहुत मजबूत हैं और रेटिंग का कोई महत्व नहीं है.” वित्तीय सेवाओं के सचिव डीके मित्तल ने कहा.
रेटिंग एजेंसी मोडीज़ ने भारतीय बेंक प्रणाली के आउटलुक को “स्थिर” से कम करके “नकारात्मक” कर दिया है. एक “नकारात्मक” आउटलुक “उतार चढ़ाव” और “अनिश्चित स्थिति” को दिखाता है. मोडीज़ ने कहा है कि देश और विदेशी दोनों अर्थव्यवस्थाओं में मंदी में वृद्धि, बैंकों की सम्पत्ति के मानक का केपिटलाईज़ेशन और लाभ पर दबाउ पड रहा है. रिपोर्ट में मोडीज़ ने कहा, “संपत्ति की गुणवत्ता को देखते हुए हमें यह लगता है अगले 12 से 18 महीनों में हालात अधिक ‍बिगड़ जाएंगे, इस तरह वित्तीय वर्षा 2012 और वित्तीय वर्ष 2013 में बैंकों की समस्याओं में वृद्धि होगी.
“वीर अर्जुन” को एक बयान में भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा ने देश के आर्थिक हालात पर चिंता व्यक्त की है. भाजपा ने देश की बिगड़ती अर्थव्यवस्था पर संसद के दोनों सदनों में अलग-अलग बहस कराने की मांग करने की घोषणा की है. भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा ने सरकार द्वारा जारी औद्योगिक विकास के आंकड़ों में आई गिरावट पर खेद व दुख व्यक्त करते हुए कहा कि आज हमारी अर्थव्यवस्था में शायद ही ऐसी कोई बात हो जिस पर प्रसन्न हुआ जा सके. उन्होंने कहा कि हमारी अर्थव्यवस्था की हालत बहुत चिंता जनक है, सरकार द्वारा जारी आंकड़ों में आय घाटा अपने बजट लक्ष्य से काफी दूर है.
उन्होंने कहा कि जहां तक ​​औद्योगिक विकास के पिछले साल के इन दिनों की तुलना अप्रैल माह से करें तो इसमें लगभग पांच प्रतिशत से अधिक की कमी आई है. पूर्व वित्त मंत्री ने कहा की एक तरफ तो हमारे देश की अर्थव्यवस्था इतनी चिंताजनक हे जबकि दूसरी ओर हमारे प्रधानमंत्री दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्षों को अच्छे कामकाज का प्रमाणपत्र बाँट रहे हैं. पूर्व वित्तमंत्री ने प्रधानमंत्री को सलाह के अंदाज़ में कहा कि प्रधानमंत्री से राष्ट्र यह उम्मीद करता है कि वह एक संवाददाता सम्मेलन बुलाकर देश के आर्थिक स्वास्थ्य के बारे में विस्तार से बताएं.
एक तरफ तो हमारा देश और उद्योग गंभीर संकट से जूझ है और दूसरी ओर हमारी सरकार अनावश्यक और गैर जरूरी खर्चों में कटौती नहीं कर रही है. हो सकता है कि आपके गांव में वर्षों से सड़क ना बनी हो, मगर शहरों में एक ही सड़क को साल में कई कई बार बनाया जाता है. पुराने फुटपाथ तोड़कर नये फुटपाथ बनाए जाते हैं. पुराने पार्कों का कायाकल्प किया जाता है, दिवंगत राजनेताओं के लिए नए-नए समारक बनाए जाते हैं, दिवंगत की ही नहीं जीवितों की भी मूर्तियाँ लगाई जाती हैं और जब अतिआवश्यक मदों पर खर्च करने की बात आती है तो हर सरकार चाहे राज्य की हो या केंद्र की, अपने हाथ झाड़ कर खड़ी हो जाती है और फंडस की कमी का बहाना करने लग जाती है. हमारी सरकार तो दूसरे देशों को खुश करने के लिए उनको लंबी चौड़ी मदद देने का वादा करने से भी नहीं चूक रही है, जबकि खुद उसके पास अपना खर्च चलाने के लिए पैसे नहीं है. मनमोहन सिंह मालदीव को सहायता की घोषणा कर चुके हैं और प्रणब मुखर्जी यूरोप की मदद करके उसे वित्तीय संकट से उबारने की बात कर रहे हैं. अपनी वित्तीय स्थिति को बेहतर बनाने के लिए एक कोशिश यह भी हो रही है कि सरकारी कंपनियों के पास जो अतिरिक्त कैश रिजर्व है, उसे केंद्र सरकार अपने पास हस्तांतरित करा ले और अपने खर्च पूरे करे.
अगर सरकार अब भी नहीं चैती तो इन हालात को देखते हुए तो यही लगता है कि आने वाले दिनों में देश की आर्थिक स्थिति बद से बदतर होने के राह पर चल पडेगा और फिर भारती का भी वही हाल होगा जो अमेरिका और यूरोप का हो रहा है.
वसीम बरेलवी का एक प्रसिद्ध शेर है जो देश के मौजूदा हालात के लिए उपयुक्त है:
घर सजाने का तस्व्वर (कल्पना) तो बहुत बाद का है।
पहले यह तै तो हो इस घर को बचाएँ कैसे।।
नोट: आप यह लेख और पुराने सभी लेख http://afifahsen.blogspot.com पर भी पढ़ सकते हैं.
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ملک کی فکر کر ناداں مصیبت آنے والی ہے!

Daily Pratap, Indias Oldest Urdu Daily
Published on 15th November 2011
عفیف احسن
ہندوستانی معیشت دنیا کی پندرہ سب سے بڑی معیشتوں میں سے ایک ہے۔ 1991 سے جب کہ لبرلائزیشن اور اقتصادی اصلاحات کی پالیسی لاگو کی گئی ہندوستان میں بہت تیز اقتصادی ترقی ہوئی اور ہندوستان دنیا کی ایک اقتصادی سپر پاور کے طور پر ابھرکرسامنے آیا۔ اصلاحات سے قبل خاص طور پر ہندوستانی صنعتوں اور کاروبار پر سرکاری کنٹرول کا بول بالا تھا اور اصلاحات لاگو کرنے سے پہلے اس کے خلاف پرزور احتجاجات بھی ہوئے لیکن اقتصادی اصلاحات کے اچھے نتائج سامنے آنے سے مخالفت کافی حد تک کم ہوئی ہے۔حالانکہ بنیادی ڈھانچوں میں تیز پیش رفت نہ ہونے سے ایک بڑا طبقہ اب بھی ناخوش ہے اور ایک بڑاطبقہ ان اصلاحات سے ابھی تک مستفید نہیں ہوسکا ہے۔
آزادی کے بعد سے ہی ہندوستان کا اپنے چالو کھاتے پر ادائیگی کا توازن منفی رہا ہے۔نبّے کی دہائی میں، اقتصادی اصلاحات کے بعد ادائیگی کے بحران کے توازن کے دباؤ کی وجہ سے ہندوستان کی برآمدات میں مسلسل اضافہ ہوا،سال 2002-03میں برآمدات نے ملک کی درآمد کے 80.3 فیصد کا احاطہ کیا جوکہ 1990-91میں صرف 66.2فیصد تھا۔اگرچہ، عالمی اقتصادی بحران کے بعد عالمی تجارت میں آئی ایک عام مندی کی وجہ سے 2008-09میںیہ کم ہوکر 61.4 فیصد ہی رہ گیا۔ہندوستان کے لگاتار اور تیزی سے بڑھتے تیل درآمد کے بل کو بڑھتے چالو کھاتہ کے خسارہ کے پیچھے ایک اہم محرک کے طور پر دیکھا جاتا ہے۔ جو سال 2008-09میں بڑھ کر118.7 ارب ڈالر، یا مجموعی ملکی پیداوار کا 9.7فیصد ہوگیا۔جنوری اور اکتوبر 2010 کے درمیان، ہندوستان نے خام تیل کا 82.1 ارب ڈالرکی قیمت کا درآمد کیا۔
2000کے اواخر کی عالمی کساد بازاری کی وجہ سے، ہندوستانی برآمدات اور درآمدات دونوں میں جون 2009میں بالترتیب 29.2 فیصد اور 39.2 فیصد کی کمی آئی۔یہ تیز گراوٹ اس وجہ سے تھی کیونکہ عالمی کساد بازاری کی مار سے سب سے زیادہ متائثر ممالک امریکہ اوریورپی یونین کے ارکان تھے جن کا حصہ ہندوستانی برآمدات میں 60 فیصد سے زیادہ کا ہے۔تاہم ،اس کو خوش قسمتی ہی کہیں گے کہ اس دور میں درآمدات میں برآمدات کے مقابلہ خاطر خواہ کمی آئی اور اس وجہ سے ہندوستانی کاتجارتی خصارہ کم ہوکر 25,250 کروڑ روپے ہی رہ گیا۔ جس میں تیل کے دام کم ہونے نے بھی ایک اہم کردار ادا کیا۔
عالمی بازار میں کساد بازاری کے چلتے آمدنی کے بہتر مواقع کی تلاش میں ایف آئی آئی نے ہندوستان میں اپنا پیسہ لگانا شروع کردیااور اس سے برآمدات میں آئی کمی کو ایف ڈی آئی نے کچھ حد تک پورا کردیا۔مگرگذشتہ دنوں امریکہ کے ذریعہ اپنے قرض لینے کی حد کو بڑھانے کے بعد سے ایف آئی آئی نے اپنا پیسہ نکال کر امریکہ میں انویسٹ کرنا شروع کردیا ہے جس کے چلتے ہندوستانی روپیہ کے مقابلہ ڈالر کی قیمت لگاتار بڑھ رہی ہے اور زرمبادلہ کے ذخیرہ میں لگاتار کمی آرہی ہے۔ ریزرو بینک کی ایک رپورٹ کے مطابق11نومبر 2011 کو ختم ہفتہ میں دیش میں زرمبادلہ کا ذخیرہ15,43,811کروڑ روپیہ کا تھا جس میں کہ سابقہ ہفتہ کے مقابلہ 20,642کروڑ روپیہ کی کمی درج کی گئی ہے۔یہی نہیں روپیہ ڈالر کے مقابلہ تیس ماہ کے سب سے کم نشان پر ہے۔
ایسا لگتا ہے کہ ہندوستان کی معیشت میں سست روی کی شروعات ہوگئی ہے جس کی واضح نشانیوں میں ایک صنعتی پیداوار میں اضافہ میں 1.9 فیصد کی کمی ہے جوکہ پچھلے دو سالوں کے مقابلہ میں بہت نیچے ہے۔ ستمبر کے لئے صنعتی پیداوار کے انڈیکس کی یہ ڈبکی گزشتہ سال ستمبر کی ایک مضبوط 6.1 فی صد کے برخلاف ہے۔ اپریل سے ستمبر کی مدت کے دوران اس مالی سال میں صنعتی پیداوار کا انڈیکس 5 فی صد پر کھڑا ہے جب کہ گزشتہ سال کی اسی مدت میںیہ 8.2 فی صدتھا۔
چیف اقتصادی مشیر کوشک بسو نے کہا ہے کہ ستمبرکے صنعتی پیداوار انڈیکس کے اعداد و شمار بڑی تشویش کا باعث ہیں اور دعویٰ کیا کہ عالمی اقتصادی صورتحال اس کے لیے ذمہ دارہے۔ ستمبر کے لئے صنعتی پیداوار کے انڈیکس کے اعداد و شمار جن کو جمعہ کو جاری کیا گیا تھا پر تبصرہ کرتے ہوئے فکّی کے سیکرٹری جنرل راجیو کمار نے کہا کہ ’’ملک میں صنعتی ترقی کی آؤٹ لک گزشتہ چند ماہ کے دوران بگڑی ہے۔اقتصادی ماحول میں غیر یقینی صورتحال سے کاروبار متاثر ہوئے ہیں اورکیپٹل گڈس کے شعبے اور نان ڈیوریبل گڈس کے شعبے کی منفی ترقی سے صارفین کے عدم اعتماد کی عکاسی ہوتی ہے۔‘‘
کیپٹل گڈس کے شعبے میں 6.8فیصد کی کمی واقع ہوئی ہے۔پچھلے چند مہینوں میں ملبوسات اور کپڑوں کی صنعت میں بھی لگاتار منفی ترقی درج کی گئی ہے۔اس سے ملک میں نوکریوں پر اثر پڑرہا ہے،کیونکہ کھیتی باڑی کے بعد اسی صنعت سے سب سے زیادہ لوگ جڑے ہوئے ہیں۔
ایسا مانا جاتاہے کہ دو سال میں سب سے بڑی گراوٹ کی وجہ ریزرو بینک کے ذریعہ شرح سود میں اضافہ اور مہنگائی میں بے لگام اضافہ ہے جس کے سبب لوگوں کی قوت خرید میں کمی واقع ہوئی ہے۔ ایسا تہواری سیزن کے فوراً بعد ہوا ہے جس میں کہ یہ امید کی جاسکتی تھی کہ لوگ زیادہ سے زیادہ خرچ کریں گے۔
صنعتی پیداوار کم ہونے اورپیداور کی لاگت بڑھنے کے چلتے سرکار کی ٹیکس وصولی میں بھی خاطر خواہ کمی واقعہ ہوئی ہے۔مگرسرکاری اخراجات میں کوئی کمی نہیں کی جارہی ہے۔ دوسری طرف پیٹرول کے دام میں روزبروز اضافہ کیاجارہا ہے۔ ایسا اس لئے کیا جارہا ہے کے اس سے سرکاری ٹیکس میں براہ راست اضافہ ہوجائے گا جس کے چلتے سرکار کی آمدنی میں اضافہ ہوجائے گا۔
دوسری طرف موڈیز کی طرف سے ہندوستانی بینکوں کی ریٹنگ گرادی گئی ہے ۔اس پر لاپرواہی والا بیان دیتے ہوئے حکومت نے کہا ہے کہ اس درجہ بندی کی کوئی اہمیت نہیں ہے کیونکہ گھریلو قرض دہندہ اپنے عالمی ساتھیوں کے مقابلے میں بہتبہتر ہیں’’ہم فکر مند نہیں ہیں۔ ہم ڈاؤن گریڈ سے متاثر نہیں ہیں۔ عالمی سطح پر بینکوں کی کارکردگی کو دیکھتے ہوئے، ہم بہت مضبوط ہیں اور درجہ بندی کی کوئی اہمیت نہیں ہے۔‘‘ مالیاتی خدمات کے سیکرٹری ڈی کے متّل نے کہا۔
ریٹنگ ایجنسی موڈیز نے بھارتی بینک کاری نظام کے آؤٹ لک کو ’’مستحکم‘‘ سے کم کرکے ’’منفی‘‘ کر دیا ہے۔ ایک ’’منفی‘‘ آؤٹ لک اتار چڑھاؤ اور غیر یقینی حالات کو دکھاتا ہے۔ موڈیز نے کہا ہے کہ ملکی اور غیر ملکی دونوں معیشتوں میں سست اضافہ، بینکوں کے اثاثہ کا معیار، کیپٹلائزیشن، اور منافع پردباؤ ڈال رہا ہے۔ رپورٹ میں موڈیزنے کہا کہ، ’’اثاثہ کے معیار کو دیکھتے ہوئے ہمیں یہ لگتا ہے کے اگلے 12سے 18 ماہ کے دوران حالات مزیدبگڑ جائیں گے، اس طرح مالی سال2012 اورمالی سال 2013 میں بینکوں کی دشواریوں میں مزید اضافہ ہوگا۔‘‘
ویر ارجن کو ایک بیان میں بی جے پی کے سینئر لیڈر اور سابق وزیر خزانہ یشونت سنہا نے ملک کے اقتصادی حالات پر تشویش ظاہر کی ہے۔ بی جے پی نے ملک کی بگڑتی معیشت پر پارلیمنٹ کے دونوں ادوار میں الگ الگ بحث کرانے کا مطالبہ کرنے کا اعلان کیا ہے۔ بی جے پی کے سینئر لیڈر اور سابق وزیر خزانہ یشونت سنہا نے حکومت کی طرف سے جاری صنعتی ترقی کے اعداد و شمار میں آئی گراوٹ پرغم اور غصہ کا اظہار کرتے ہوئے کہا کہ آج ہماری معیشت میں شاید ہی ایسی کوئی بات ہو جس پر خوش ہوا جا سکے۔ انہوں نے کہا کہ ہماری معیشت کی حالت بہتتشویش ناک ہے ، حکومت کی طرف سے جاری اعداد و شمار میں آمدنی گھاٹا اپنے بجٹ ہدف سے کافی دور ہے۔
انہوں نے کہا کہ جہاں تک صنعتی ترقی کے گزشتہ سال کے ان ہی دنوں کا موازنہ اپریل کے مہینے سے کریں تو اس میں تقریبا پانچ فیصد سے زیادہ کی کمی آئی ہے۔ سابق وزیر خزانہ نے کہا ایک طرف تو ہمارے ملک کی معیشت اتنی تشویش ناک ہے جبکہ دوسری طرف ہمارے وزیر اعظم دوسرے ممالک کے سربراہوں کواچھے کام کاج کا خطاب بانٹ رہے ہیں۔ سابق وزیر خزانہ نے وزیر اعظم کو مشورے والے انداز میں کہا کہ وزیر اعظم سیقوم یہ امید کرتی ہے کہ وہ ایک پریس کانفرنس بلا کر ملک کی اقتصادی صحت کے بارے میں تفصیل سے بتائیں۔
ایک طرف تو ہمارا ملک اور اس کی صنعت شدید بحران سے دوچار ہے اور دوسری طرف ہماری سرکار غیر ضروری اور غیر لازمی خرچوں میں کٹوتی نہیں کررہی ہے۔ ہوسکتا ہے کہ آپ کے گاؤں میں برسوں سے سڑک نہ بنی ہو مگر شہروں میں ایک ہی سڑک کو سال میں کئی کئی بار بنایا جاتاہے۔ پرانے فٹ پاتھ توڑ کر نئی فٹ پاتھ بنائے جاتے ہیں۔پرانے پارکوں کی تزئین کاری کی جاتی ہے، مرحوم قائدین کے لئے نئے نئے سمارک بنائے جاتے ہیں،مرحومین کی ہی نہیں زندوں کی بھی مورتیاں لگائی جاتی ہیں اور جب اشد ضروری مدوں پر خرچ کی بات آتی ہے تو ہر حکومت چاہے وہ ریاستی ہو یامرکزی اپنے ہاتھ جھاڑ کر کھڑی ہوجاتی ہے اور فنڈس کی کمی کا بہانہ کرنے لگ جاتی ہے۔ہماری حکومت تودوسرے ممالک کو خوش کرنے کے لئے ان کو لمبی چوڑی امداددینے کا وعدہ کرنے سے بھی نہیں چوک رہی ہے، جبکہ خود اس کے پاس اپنا خرچ چلانے کے لئے پیسے نہیں ہیں۔منموہن سنگھ مالدیپ کو امداد کااعلان کرچکے ہیں اور پرنب مکھرجی یوروپ کی مددکرکے اس کو مالی بحران سے ابھارنے کی بات کررہے ہیں۔اپنی مالی حالت کو بہتر بنانے کے لئے ایک کوشش یہ بھی ہورہی ہے کہ سرکاری کمپنیوں کے پاس جو اضافی کیش ریزرو ہے اس کو مرکزی سرکار اپنے پاس منتقل کرلے اور اس سے اپنے اخراجات پورے کرے۔
اگر حکومت اب بھی نہیں جاگی تو ان حالات کو دیکھتے ہوئے تویہی لگتا ہے کہ آنے والے دنوں میں ملک کی معاشی حالت بد سے بدتر ہونے کے راہ پرتیزی سے گامزن ہوجائے گی اور پھر ہندوستان کا بھی وہی حال ہوگا جو امریکہ اور یوروپ کا ہورہاہے۔
وسیم بریلوی کا ایک مشہور شعر ہے جو ملک کے موجودہ حالات کے لئے موزوں ہے،
گھر سجانے کا تصور تو بہت بعد کا ہے
پہلے یہ طے تو ہو اس گھر کو بچائیں کیسے
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کیا گاندھی وادی انا جھوٹ بول رہے ہیں؟

Daily Pratap, Indias Oldest Urdu Daily
Published on 7th November 2011
عفیف احسن
ابھی تک تو یہی الزام لگ رہا تھا کہ ٹیم انا کوپارلیمنٹری ڈیموکریسی پر یقین نہیں ہے، مگر گزشتہ دنوں کے دوران ٹیم انا میں نظر آئے انتشار ات کا جائزہ لینے سے یہ لگتا ہے کہ ٹیم انا میں اندرونی جمہوریت کا بھی فقدان ہے اور اس کا شکار نہ صرف ٹیم کے دوسرے ممبران ہوئے ہیں بلکہ اناہزارے خود بھی اس کا شکارنظر آرہے ہیں۔ اس کا پتا اسی بات سے لگ جاتاہے کہ انا ہزارے کو بار بار اپنا بیان بدلنے پر مجبور کیا جارہاہے۔ اور ان کو اپنے خیالات ظاہر کرنے کی پوری آزادی نہیں ہے۔
پہلے2نومبر کو انا کا یہ بیان سامنے آیا تھا کہ اب وہ کسی ایک پارٹی یا امیدوارکی مخالفت نہیں کریں گے بلکہ وہ لوگوں سے یہ اپیل کریں گے کہ وہ صرف صاف ستھرے شبیہہ والے امیدواروں کو ہی ووٹ دیں۔ مگر بعدمیں 4نومبر کو نہ جانے کس کے دباؤ میں انہوں نے اپنا بیان بدل دیا اوریہ کہا کہ وہ لوگوں کے بیچ جائیں گے اور ان سے کانگریس کو ووٹ نہ دینے کی اپیل کریں گے۔
کچھ عرصہ قبل ٹیم انا سے کئی لوگ ناطہ توڑ چکے ہیں۔ کچھ دن پہلے ہی پی وی راجگوپال اور راجندر سنگھ نے ٹیم انامیں کچھ لوگوں کی طرف سے غیر جمہوری طریقے اپنائے جانے اور دوسرے ممبروں کی رائے نا لئے جانے پر اپنے آپ کواس مہم سے الگ کرلیا تھا۔
اب انا ہزارے کے بلاگر راجو پرولیکرنے جن لوکپال بل پاس کرنے کا مطالبہ کر رہی ٹیم انا کے ارکان اروند کیجریوال ، پرشانت بھوشن اور کرن بیدی کی جم کر سرزنش کرتے ہوئے انہیں غیر جمہوری اورفاشسٹ بتا ڈالا ہے۔ انا کے بلاگ پر ڈالی گئی اپنی پوسٹ میں راجو نے انا کا دفاع کرتے ہوئے ان کی ٹیم کے اہم ارکان پر حملہ بولا ہے۔ ایک نجی چینل سے بات چیت میں راجو پرولیکر نے اروند کیجریوال پر سیدھا نشانہ لگاتے ہوئے کہا کہ وہ انا کا احترام نہیں کرتے ہیں۔ راجو کے مطابق اروند ٹیم کی میٹنگوں میں حاوی ہو تے ہیں اور کسی کی بات نہیں سنتے ۔ راجو نے کہا کہ کمار وشواس سے بھی انا ہزارے کو خط سازش کے تحت لکھوایاگیا تھا۔ راجو کا دعویٰ ہے کہ کرن بیدی اور اروند کیجریوال نے ان سے کہا تھا کہ کوئی بھی بلاگ پوسٹ پر ڈالنے سے پہلے ان کی اجازت لی جائے۔
راجو نے اپنی پوسٹ میں لکھا ہے ، کیجریوال ، بیدی اورپرشانت بھوشن نے 30 اکتوبر کو رالیگن سدّھی میں سب کے سامنے انا ہزارے کے خیالات کو دبا دیا۔کیجریوال ،پرشانت بھوشن ، کرن بیدی نے غیر جمہوریت ، فاشسٹ اور انا کے تئیں توہین آمیز رخ دکھاتے ہوئے کور کمیٹی کی میٹنگ کے فیصلے کو انا ہزارے پر تھونپ دیا۔ راجو نے کہا کہ انہوں نے انا کی طرف سے مخالفت کی۔ ٹیم انا کے جانے کے بعد ہزارے نے بند کمرے میں ان سے بات کی۔ 23 اکتوبر کے انا کے مبینہ خط کے بارے میں راجو نے بلاگ پر لکھا ہے کہ جب انا، کیجریوال ، بیدی ،بھوشن اور ان کے پیادو سے پریشان ہوکر انہیں کور کمیٹی سے ہٹانے کا من بنا کر خط لکھ رہے تھے تب ان کے سیکریٹری سریش پربھوپٹھارے وہاں موجود تھے۔ پٹھارے نے انا کو روکنے کی کوشش کی تھی ، لیکن وہ رکے نہیں۔ اس کے بعد سریش پربھو نے مجھ سے درخواست کی کہ میں انا کا یہ خت پوسٹ کے طور پر بلاگ پر اپ لوڈ نہ کروں۔
راجو نے ٹیم انا کے ارکان پر سخت تنقید کرتے ہوئے کہا ،ملک کی غیرسیاسی تنظیموں اور بھگت سنگھ ، راجگر واور سہدیو جیسے نوجوانوں کو بدعنوانی کے خلاف انا جی کے لئے لڑائی لڑنی ہوگی۔ ان نوجوانوں کو 25 لوگوں کی خود ساختہ ٹیم (غیر جمہوری اور غیر آئینی) سے کچھ پوچھنے کی ضرورت نہیں ہے۔راجو کے مطابق ، 23تاریخ کا خط اور ان تمام باتوں سے ثابت ہو جاتا ہے کہ کیجریوال ،پرشانت بھوشن اور بیدی موقع پرست ہیں۔
انا بلاگ کے لئے مراٹھی میں اپنی بات لکھ کر راجو کو دیتے تھے۔ وہ اس کا ترجمہ کرکے اسے انا کے بلاگ پر ڈالتے تھے۔ راجو کا کہنا ہے کہ انا نے 23 اکتوبر کو لکھا یہ خط بھی انہیں انٹرنیٹ پر ڈالنے کے لئے دیا تھا۔ راجو پرولیکر نے انا کے لکھے اس خط کو عام کرکے ٹیم انا کے لئے نئی مشکلات کھڑی کر دی ہیں۔ اس خط کے مطابق انا ہزارے اپنی کور کمیٹی کو تحلیل کرکے نئی ٹیم کی تشکیل کرنا چاہتے تھے۔ یہ خط انا کے بلاگ پر انگریزی اور مراٹھی میں پوسٹ کیا گیا ہے جس کا متن اس طرح ہے:
’’میں ٹیم انا کے تمام اراکین کو یہاں یہ معلومات دے رہا ہوں کہ بہت جلد میں اپنی کور کمیٹی کے دوبارہ قیام کی بارے میں سوچ رہا ہوں۔ اس کی وجہ یہ ہے کہ مجھے مسلسل ملک بھر سے تحریک کی حمایت میں خط مل رہے ہیں اور لوگ بدعنوانی کے خلاف لڑائی میں اپنی زندگی سونپنے کے لئے تیار ہیں۔ یہ خطوط سپریم کورٹ کے ریٹائرڈ جج ، فوج کے کرنل ، بریگیڈیر ، پروفیسر ، پرنسپل اور اپنی خیالات رکھنے والے پڑھے لکھے لوگوں نے لکھے ہیں۔ بہت جلد ان لوگوں کی شناخت کرکے انہیں ان کے مطابق کام سونپ دیا جائے گا۔ میں ملک کے تمام حصوں اور ریاستوں سے ایسے لوگوں کو تحریک میں شامل کرنا چاہتا ہوں جو سماج کی خدمت کرنا چاہتے ہیں۔
خط لکھنے والے لوگوں کا کوئی نجی ایجنڈا نہیں ہے اور ان لوگوں نے صرف دیش کی خدمت اور خدمت خلق کے مقصد سے تحریک میں شامل ہونے کی منشا ظاہر کی ہے۔ اب ہمیں ٹیم انا کی توسیع کرنا چاہئے اور ان لوگوں کو شامل کرنا چاہئے۔ ورکنگ کمیٹی بنانے کے لئے ہمیں کارگر لوگوں کو اپنے ساتھ شامل کرنا ہوگا۔ کور کمیٹی بناتے وقت ملک کے تمام صوبوں کے لوگوں کو نمائندگی دی جائے گی۔ مؤثر مواصلات کے لئے ان سب کو آن لائن جوڑا جائے گا۔
ان رضاکاروں ، مثال کے طور پر 100 رضا کاروں کے رہنے اور کھانے کا خرچہ صاف کردار کے لوگوں سے عطیات لے کرپورا کیا جائے گا۔ اس سے ہمیں ملک بھر میں موثر احتجاج منظم کرنے میں مدد ملے گی۔ ہمیں طویل جنگ لڑنی ہے۔ بدعنوانی سے پاک ہندوستان بنانے کے لئے ہمیں ان تمام لوگوں، جو اب تک مہم سے الگ تھلگ ہیں، کا استعمال کرنا ہوگا۔ مجھے یقین ہے کہ یہ نہ صرف ہندوستان بلکہ بدعنوانی سے نجات چاہنے والے دیگر ممالک کے لئے بھی ایک اچھی مثال ہوگی۔ ہم ادارہ کی تعمیر نہیں کر رہے ہیں بلکہ ریاست اور ضلع کی سطح پر اپنے رضاکار بنا رہے ہیں۔
جب قومی سطح پر تحریک چل رہی ہوگی تو ریاستی سطح پر بھی اس سے لوگ مربوط ہوتی ہوئے دکھائی دیں گے۔ اس جدوجہد میں کوئی صدر ، سیکرٹری یا خزانچی نہیں ہوگا۔ لوگ صرف رضاکاروں کے طور پر ہی کام کریں گے۔ قدرتی طور پر ہمیں مالی امداد کی ضرورت ہوگی لیکن عطیہ کے طور پرنقدرقم قبول نہیں کی جائے گی صرف چیک اور ڈرافٹ کے ذریعے ہی عطیات لئے جائیں گے۔ لیکن یہ عطیات بھی ان لوگوں سے ہی لئے جائیں گے جنہیں بھگت سنگھ ، راجگرو اور سہدیو کی شہادت میں یقین ہوگا۔کے بی ہزارے۔‘‘
لیکن انا نے ہفتہ کو راجو پرولیکر کے الزامات کا جواب دیتے ہوئے اعلان کیا ،’’میں اپنا بلاگ اب بند کر دوں گا۔ اگر خط پر دستخط ہوں گے تو وہ صحیح خط ہے۔ میں اپنے خیالات کبھی کبھی لکھتا رہتا ہوں۔ لیکن آخری طور پر اسے تب ہیحتمی مانا جائے گا جب اس پر میرے دستخط ہوں گے۔ میری ٹیم پر الزامات لگ رہے ہیں۔ الزامات لگنے کے بعد میں سوچ رہا تھا کیا ٹیم میں تبدیلی لایائی جانی چاہئے؟ مجھے لگتا ہے کہ ہمیں بدنام کرنے کی سازش ہے۔‘‘
جب جمعہ کے روز انا سے پریس کانفرنس میں اس بارے میں سوال کیا گیا تھاتو انہوں نے کہا تھاکہ میں نے کور کمیٹی تحلیل کرنے کی کبھی بات نہیں کی۔ انا نے راجو سے کبھی بات یا ملاقات تک سے انکار کر دیاتھا الٹے ان پر نشانہ سادھتے ہوئے کہا تھا کہ وہ ہوا میں بات کرتے ہیں؟ ان باتوں سے ٹھیس پہنچنے کے بعد راجو نے خود کو صحیح ثابت کرنے کے لئے 23 اکتوبر ، 2011 کو لکھا انا کا خط ان کے بلاگ پر ڈال دیا ۔
ان سب باتوں سے یہ سوال پیدا ہوتا ہے کہ کیا گاندھی وادی انا جھوٹ بول رہے ہیں؟
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Monday, 7 November 2011

क्या गांधीवादी अन्ना झूठ बोल रहे हैं?


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 7th November 2011
अफ़ीफ़ अहसन
अभी तक तो यही आरोप लग रहा था कि टीम अन्ना को संसदीय लोकतंत्र पर विश्वास नहीं है, लेकिन पिछले दिनों टीम अन्ना में दिखाई दिऐ बिखराव की समीक्षा करने से यह लगता है कि टीम अन्ना में आंतरिक लोकतंत्र का भी अभाव है और उसका शिकार न केवल टीम के अन्य सदस्य हुए हैं बल्कि अन्ना हज़ारे खुद भी इसका शिकार नजर आ रहे हैं. इसका पता इसी बात से लग जाता है कि अन्ना हज़ारे को बार बार अपना बयान बदलने पर मजबूर किया जा रहा हे. उन्हैं अपने विचारों को व्यक्त करने की पूरी स्वतंत्रता नहीं है.
पहले 2 नवंबर को अन्ना का यह बयान सामने आया था कि वह किसी एक पार्टी या उम्मीदवार का विरोध नहीं करेंगे बल्कि वह लोगों से यह अपील करेंगे कि वे केवल साफ छवी वाले उम्मीदवारों को ही वोट दें. मगर बाद में 4 नवंबर को न जाने किस दबाव में उन्होंने अपना बयान बदल दिया और यह कहा कि वह लोगों के बीच जाएंगे और उनसे कांग्रेस को वोट न देने की अपील करेंगे.
गत दिनों टीम अन्ना से कई लोग नाता तोड़ चुके हैं. कुछ दिन पहले ही पीवी राजगोपाल और राजेंद्र सिंह ने टीम अन्ना में कुछ लोगों द्वारा गैर लोकतांत्रिक तरीके अपनाए जाने और अन्य सदस्यों की राय ना लिए जाने पर अपने आप को इस अभियान से अलग कर लिया था.
अब अन्ना हज़ारे ब्लॉगर राजू परूलेकर ने जन लोकपाल बिल पास करने की मांग कर रही टीम अन्ना सदस्यों, अरविंद केजरीवाल, प्रशान्त भूषण और किरण बेदी की जमकर निंदा करते हुए उन्हें अलोकतांत्रिक ओर फ़ा‍सिस्ट बता डाला है. अन्ना के ब्लॉग पर डाली गई अपनी पोस्ट में राजू ने अन्ना का बचाव करते हुए उनकी टीम के प्रमुख सदस्यों पर हमला बोला है. एक निजी चैनल से बातचीत में राजू परूलेकर ने अरविंद केजरीवाल पर सीधा निशाना साधते हुए कहा कि वह अन्ना का सम्मान नहीं करते. राजू के अनुसार अरविंद टीम की सभाओं में हावी होते हैं और किसी की बात नहीं सुनते. राजू ने कहा कि कुमार विश्वास से अन्ना हज़ारे को पत्र साजिश के तहत लिखवाया गया था. राजू का दावा है कि किरन बेदी और अरविंद केजरीवाल ने उनसे कहा था कि कोइ भी ब्लॉग पोस्ट पर डालने से पहले उनकी अनुमति ली जाए.
राजू ने अपनी पोस्ट में लिखा है, केजरीवाल, बेदी प्रशान्त भूषण ने 30 अक्टूबर को रालेगण सिद्धि में सबके सामने अन्ना हज़ारे के विचारों को दबा दिया. केजरीवाल, प्रशान्त भूषण, किरण बेदी ने गैर लोकतांत्रिक, फ़ासिस्ट और अन्ना के प्रति अपमान भरा रुख दिखाते हुए कोर कमेटी की बैठक के फैसले को अन्ना हज़ारे पर थोप दिया. राजू ने कहा कि उन्होंने अन्ना की तरफ से विरोध किया. टीम अन्ना के जाने के बाद हज़ारे ने बंद कमरे में उनसे बात की. 23 अक्टूबर के अन्ना के कथित पत्र के बारे में राजू ने ब्लॉग पर लिखा है कि जब अन्ना, केजरीवाल, बेदी, भूषण और उनके प्यादों से परेशान होकर उन्हें कोर कमेटी से हटाने का मन बनाकर पत्र लिख रहे थे तब उनके सचिव सुरेश पठारे वहां मौजूद थे. पठारे ने अन्ना को रोकने की कोशिश की थी, लेकिन वे रुके नहीं. इसके बाद सुरेश ने मुझसे अनुरोध किया कि अन्ना का यह खत पोस्ट के लिए ब्लॉग पर अपलोड नहीं करें.
राजू ने टीम अन्ना सदस्यों की आलोचना करते हुए कहा, देश के गैर राजनीतिक संगठनों और भगत सिंह, राजगुरू और सहदेव जैसे युवाओं को भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना जी के लिए लड़ाई लड़ना होगी. इन युवाओं को 25 लोगों की स्वंयभु टीम (अलोकतांत्रिक और गैर संवैधानिक) से कुछ पूछने की जरूरत नहीं है.
राजू के अनुसार, 23 तारीख का पत्र और सभी बातों से साबित हो जाता है कि केजरीवाल, प्रशांत भूषण और बेदी अवसरवादी हैं.
अन्ना ब्लॉग के लिए मराठी में अपनी बात लिख कर राजू को देते थे. वह उसका अनुवाद करके उसे अन्ना के ब्लॉग पर डालते थे. राजू का कहना है कि अन्ना ने 23 अक्टूबर को लिखा यह पत्र भी उन्हें इंटरनेट पर डालने के लिए दिया था. राजू ने अन्ना के लिखे इस पत्र को सार्वजनिक करके टीम अन्ना के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर दी हैं. इस पत्र के अनुसार अन्ना हज़ारे अपनी कोर कमेटी को भंग कर नई टीम का गठन करना चाहते थे. यह पत्र अन्ना ब्लॉग पर अंग्रेजी और मराठी में पोस्ट किया गया है जो इस प्रकार है.
“मैं टीम अन्ना के सभी सदस्यों को यहां यह जानकारी दे रहा हूँ कि बहुत जल्द मैं अपनी कोर कमेटी के पुनर्गठन के बारे में सोच रहा हूँ. इसकी वजह यह है कि मुझे लगातार देश भर से आंदोलन के समर्थन में पत्र मिल रहे और लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में अपने जीवन सौंपने के लिए तैयार हैं. यह पत्र सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज, सेना के कर्नल, ब्रिगेडियर, प्रोफेसर, प्रिंसिपल और अपने विचारों वाले पढ़े लिखे लोगों ने लिखे हैं. बहुत जल्दी उन लोगों की पहचान करके उन्हें उनके अनुसार काम सौंप दिया जाएगा. देश के सभी भागों और राज्यों से ऐसे लोगों को आंदोलन में शामिल करना चाहता हूँ जो समाज सेवा करना चाहते हैं.
पत्र लिखने वाले लोगों का कोई निजी एजेंडा नहीं है और उन लोगों ने सिर्फ देश की सेवा और सेवा भाव के उद्देश्य से आंदोलन में शामिल होने की मंशा जताई है. अब हमें टीम अन्ना का विस्तार करना चाहिए और उन लोगों को शामिल करना चाहिए. कार्यसमिति बनाने के लिए हमें कारगर लोगों को अपने साथ शामिल करना होगा. कोर कमेटी बनाते समय देश के सभी राज्यों के लोगों को प्रतिनिधित्व दिया जाएगा. प्रभावी संचार के लिए उन सब को ऑनलाइन जोड़ा जाएगा.
इन स्वयंसेवकों, उदाहरण के लिए 100 स्वयंसेवकों के रहने और खाने का खर्च साफ छवी के लोगों से दान लेकर उठाया जाएगा. हमें देश भर में प्रभावी प्रदर्शन आयोजित करने में मदद मिलेगी. हमें लंबा युद्ध लड़ना है. भ्रष्टाचार मुक्त हिंदुस्तान बनाने के लिए हमें उन सभी का जो अब तक अभियान से अलग थलग हैं उपयोग करना होगा. मुझे विश्वास है कि यह न केवल भारत बल्कि भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहने वाले अन्य देशों के लिए भी एक अच्छा उदाहरण होगा. हम संस्था का निर्माण नहीं कर रहे हैं बल्कि राज्य और जिला स्तर पर अपने स्वयंसेवक बना रहे हैं.
जब राष्ट्रय स्तर पर आंदोलन चल रहा होगी तो राज्य स्तर पर भी लोग जुड़ते हुए दिखाई देंगे. इस संघर्ष में अध्यक्ष, सचिव या खजांची नहीं होगा. लोग केवल स्वयंसेवकों के तौर पर ही काम करेंगे.
स्वाभाविक रूप से हमें वित्तीय सहायता की जरूरत है लेकिन दान के रूप में नकद रकम स्वीकार नहीं की जाएगी केवल चेक और ड्राफ्ट के माध्यम से ही दान लिया जाएगा. लेकिन यह दान भी उन लोगों से ही लिया जाएगा जिन्हें भगत सिंह, राजगुरो और सहदेव की शहादत में विश्वास होगा. के बी हज़ारे”
लेकिन अन्ना ने शनिवार को राजू के आरोपों का जवाब देते हुए घोषणा की, “मैं अपना ब्लॉग अब बंद दूंगा. अगर पत्र पर हस्ताक्षर होंगे तो वह सही पत्र है. में अपने विचार कभी कभी लिखता रहता हूँ. लेकिन उसे तब ही अंतिम माना जाएगा जब इस पर मेरे हस्ताक्षर होंगे. मेरी टीम पर आरोप लग रहे हैं. आरोप लगने के बाद मैं सोच रहा था क्या टीम में बदलाव लाया जाना चाहिए? मुझे लगता है कि हमें बदनाम करने की साज़िश है.
जब शुक्रवार को अन्ना से संवाददाता सम्मेलन में इस बारे में पूछा गया था तो उन्होंने कहा था कि मैंने कोर कमेटी भंग करने की कभी बात नहीं की. अन्ना ने राजू से कभी बात या मुलाकात होने तक से इनकार कर दिया था. उल्टे उन पर निशाना साधते हुए कहा था कि वह हवा में बात क्यों करते हैं? इससे ठेस पहुंचने पर ही राजू ने खुद को सही साबित करने के लिए 23 अक्तूबर, 2011 को लिखा अन्ना का पत्र उनके ब्लॉग पर डाल दिया है.
इन सब बातों से यह सवाल पैदा होता है कि क्या गांधीवादी अन्ना झूठ बोल रहे हैं?
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