Search

Monday, 13 December 2010

पहले आप! पहले आप!


प्रकाशित: 13 दिसम्बर 2010

अफीफ अहसन

एक किस्सा मशहूर है कि लखनऊ के रेलवे स्टेशन पर रेल में चढ़ते समय दो नवाबों की मुलाकात हो गई और शिष्टाचार के नाते एक नवाब साहब ने दूसरे से कहा कि पहले आप सवार,  दूसरे नवाब शिष्टाचार और संस्कृति में पहले से भी दो हाथ आगे थे, उन्होंने पहले नवाब साहब से फ़रमाया हुजूर आप बड़े हैं, पहले आप सवार, इस पर दोनों में पहले आप पहले आप की तकरार शुरू हो गई और इसी बीच ट्रेन प्लेटफार्म से निकल गई और दोनों नवाब पहले आप पहले आप ही करते रह गए ऐसा लगता है कुछ इसी प्रकार की पहले आप पहले आप की तकरार दुनिया के सभी प्रमुख देशों के बीच पर्यावरण को बचाने के विषय पर जारी है और यह तब तक जारी रहेगी जब तक उसको हल करने का मौका हाथ से निकल नहीं जाता।

पिछले कई दिनों से इसी तरह की बातचीत कानकुन में पर्यावरण की सुरक्षा को लेकर जारी थी, अंततः इस पर  एक अपनाया गया। संयुक्त राष्ट्र के मुख्य सम्मेलन के मसौदे में 2020 ई. से हर साल विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने  के लिए एक सौ अरब डॉलर  देने की पुष्टि की गई है। यह मुद्दा कोपेनहेगन सम्मेलन में भी उठाया गया था। मेक्सिको के पर्यटन के लिये जाने जाने वाले शहर में पावार की रात तक दुनिया के लगभग 192 देशों के प्रतिनिधि लंबी बहस और चर्चा में व्यस्त रहे। इसमें ग्रीन कलाईमेट निधि की स्थापना का प्रस्ताव पारित किया गया जिसे विकसित और विकासशील देशों की प्रतिनिधित्व वाला 24 सदस्यीय बोर्ड संभालेगा।

दक्षिण अमेरिकी देश बोलीविया और वेनेज़ूवेला ने कानकुन मसौदा इस आधार पर खारिज कर दिया है क्योंकि उन्हें दुनिया भर से अलग करने की कोशिश की गई है। बोलीविया के मंत्री पाबलो सोलन का कहना है कि इस मसौदे में अमरीका को बहुत अधिक प्रभाव प्राप्त है और यह वास्तव में कोपेनहेगन सम्मेलन ही में प्रस्तुत किये गये अमरीकी प्रस्ताव जैसा है।  कोपेनहेगन की विफलता से सबक सीखते हुए इस बार आक्रामक रूप से व्यापक समझौते की प्राप्ति के प्रयास नहीं किए गए बल्कि ऐसी प्रािढया अपनायी गयी जिस पर अगले साल जोहान्स्बर्ग में प्रगति हो सके। इस मसौदे को संयुक्त राष्ट्र की मंज़ूरी के लिए कानकुन सम्मेलन में शामिल सभी देशों का समर्थन आवश्यक है। इस समय उसे मंत्रियों के समूह की पुष्टि हुई है। कानकुन सम्मेलन के मेज़बान देश मेक्सिको ने मसौदा आम करते हुए उसे प्राकृतिक वातावरण के बचाव के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण प्रगति बताया। मसौदे के अनुसार विकासशील देशों के लिये यह निधि विश्व तापमान में कमी और जंगलों के बचाने मे उपयोग किया जाएगा। पर्यावरण मंत्री जेराम रमेश ने कहा कि बड़ी उभरती हुई आर्थिक शक्तियां, ब्राज़ील, दक्षिण अफीका, भारत ओर चीन ने इस फ़ैसले का स्वागत किया। हम इस मसौदे के से बहुत खुश हैं, उन्होंने कहा, कानकुन महत्वपूर्ण कदम का प्रतिनिधित्व करता है। विकासशील देशों का कहना है कि चूंकि विश्व तापमान में वृद्धि के लिए विकसित देश ज़िम्मेदार हैं इसलिए वह औद्योगिक ाढांति के बाद से कार्बन गैस के उत्सर्जन का हिसाब लगाकर कोई निधि स्थापित करें। इसी संदर्भ में चीन, भारत और ब्राजील जैसे देशों का कहना है कि वह अपने यहां कार्बन गैस के उत्सर्जन में फिलहाल ज्यादा कमी इसलिए नहीं कर सकते क्योंकि वे विकास और गरीबी को समाप्त की राह पर चल रहे हैं। लेकिन माहौल के बचाव के लिए सािढय संगठनों को यह आशंका सता रहा है कि अगर इस मुद्दे पर इसी तरह गतिरोध चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हम हाथ मलने के सिवा कुछ और करने  में सक्षम नहीं रहेंगे। लेकिन अब यह उम्मीद जागी है कि सहायता प्रदान करने के उनके पक्के वादों के कारण पर्यावरण पर बातचीत के बारे में निरंतरता बन पाएगी, लेकिन इसके लिए 2020 तक इंतजार करना होगा, और तब तक शायद बहुत देर न हो जाए। एक ओर जहां अमेरिका और चीन जैसे देश मेक्सिको के शहर कानकुन में व्यापक वैश्विक समझौते की राह में रुकावट बने रहे, वहीं दूसरी ओर युरोप दुनिया का वह क्षेत्र है जहां उत्साह के साथ पर्यावरण सुरक्षा के कदम प्रािढया में लाए जा रहे हैं।  युरोपीय संघ ने पिछले साल अपने लिए यह लक्ष्य निर्धारित किया था कि कार्बन डाईआक्साईड के उतसर्जन की मात्रा में 1990 ई। के स्तर की तुलना में कम से कम बीस प्रतिशत की कमी की जाएगी। यूरोपीय संघ अभी तक इस दर को 17 प्रतिशत तक ला चुकी है। हालांकि कुछ युरोपीय देश, जिनमें जर्मनी, फांस और ब्रिटेन भी शामिल हैं, इस लक्ष्य को बढ़ाकर तीस फीसदी तक ले जाने की वकालत कर रहे हैं लेकिन इस पर अभी सहमति नहीं बन पायी है। अन्य देश राज़ी हो जाएं तो यूरोपीय संघ तीस प्रतिशत कमी के लक्ष्य के लिए तैयार है। अन्य देशों को भी अपने वादों को निभाना चाहिए। अमेरीका ने कोपेनहेगन में वादा किया था कि वह अपने यहां हानिकारक गैसों के उत्सर्जन की मात्रा में 2005 की तुलना में 17 प्रतिशत कमी करेगा। मगर अमेरिका अपना यह वादा पूरा करने में बिल्कुल भी गंभीर नज़र नहीं आता। जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक प्रभाव बांग्लादेश और भारत पर होता हे जिन की निर्भरता हिमालय के पहाड़ों से आने वाले नदियों के पानी पर है। लेकिन हिमालय के ग्लेशियरों के तेज़ी से पिघलने की वजह से आगे चल कर इन दोनों देशों में सूखे का खतरा है। हिमालय के दामन में स्थित क्षेत्र लद्दाख में कोई असामान्य बारिश नहीं होती थी और इसी लिए इस साल छह अगस्त की रात को लद्दाख की राजधानी लेह के पास रहने वालों को जिस भारी वर्षा और तूफान का सामना करना पड़ा, वह उनके लिए अनअपेक्षित और अचानक था। भारतीय मौसम विशेषज्ञों का दावा है कि लद्दाख में आने वाली यह असाधारण तूफानी बारिश वैश्विक जलवायु परिवर्तन के प्रभाव की एक कड़ी है। काठमंडू में हिमालय और हिंदू कुश के क्षेत्र के लिए गठित अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान केन्द्र के अनुसार इन ऊंचे पहाड़ी  क्षेत्रों में मौसम विश्व औसत की तुलना में अधिक तीव्रता के साथ गरम हो रहा है। इन सब बातों को अनदेखा करते हुए देश में कानकुन सम्मेलन पर जयराम रमेश की भूमिका को लेकर राजनीति शुरू हो गई है और यह आरोप लगाया जा रहा है कि भारत ने अपने आप को पूरी तरह से विकसित देशों के हाथों  सौंप दिया है। भाजपा और वामपंथी दलों ने पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर विकसित देशों की ओर से प्रस्तावित लाइन पर समझौता करने के होश मंदाना निर्णय पर  नाराजगी जताई है। पूर्व मंत्री और अनुभवी कांग्रेसी नेता सैफुद्दीन सोज़ ने दावा किया है कि रमेश ने गलत सलाह दी।  रमेश ने गुरुवार को कानकुन में कहा था कि  देशों को उत्सर्जन को रोकने के लिए कानून के तहत आवश्यक बाध्य संकल्प लेना  इस बात को भारत की इस नीति के खिलाफ देखा जाता है जिसमें उसका कहना था कि प्रदूषण पैदा करने वाले देश ही पैसा दे और यह कि वह किसी भी कानूनी प्रतिबंध को कबूल नहीं करेगा क्योंकि इस से भारत की प्रगति की गति रूक सकती है। विकसित देशों का भी कहना है कि अगर उन्होंने इन प्रतिबंधों पर सख्ती से अमल किया तो उनके विकास की गति थम जाएगी और उन को ज़र्बदस्त आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा मगर विकसित देशों को इससे कोई फर्प नहीं पड़ेगा, इसलिए उन्हें कुछ और समय के लिए इन प्रतिबंधों से बाहर रखा जाए। क्या किसी ने कभी यह भी सोचा है कि अगर जल्द पर्यावरण की सुरक्षा का उपाय नहीं किया गया और वैश्विक जलवायु परिवर्तन के प्रभाव ने खतरनाक रूप धारण कर लिया तो धरती पर जीवन की गति ही थम जाएगी ऐसे में विकास कैसे और  किसके काम आएगा?  क्या इस बात का यह मतलब हुआ कि क्योंकि विकसित देश क़ाफी समय से प्रद्षूण फैला रहे हैं इसलिए विकासशील देशों को भी उतना ही प्रद्षूण फैलाने की छूट दी जाए। मगर हम यह भूल जाते हैं कि किसी भी प्रकार का प्रद्षूण फैलाना नूह की सृष्टि के विरुद्ध एक अपराध है जो हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के साथ कर रहे हैं और अगर किसी एक देश से कोई अपराध हो गया है तो इस से किसी दूसरे को कतई यह अधिकार नहीं मिलता कि वह भी वही अपराध करता रहे। पर्यावरण को बचाने में जितनी कोताही की जाएगी और जितनी देर होगी इसका खमियाज़ा पूरी दुनिया को देर सवेर भुगतन पड़ेगा और इससे कोई भी देश बचा नही रह सकता। हम बड़े गर्व के साथ यह शीर्षक लिख देंगे कि कानकुन वार्ता समझोता निर्णय के साथ समाप्त हुई मगर समझोते और सर्वसम्मति के चक्कर में पर्यावरण के साथ जो समझौता किया जा रहा है उसकी वजह से होने वाले नुकसान का अनुमान सभी को है मगर हर देश अपनी हठधर्मी पर अड़ा है।

Saturday, 4 December 2010

"सांप का सर काट दो"


प्रकाशित: 04 दिसम्बर 2010

अफीफ अहसन

विकिलीक्स के द्वारा अमरीकी दूतावासो से सम्बन्धित ढाई लाख गुप्त संदेश जारी किए जाने के बाद से पूरी दुनिया में हड़कंप मच गया है। इतिहास में कोई गुप्त जानकारी का इतना बड़ा खुलासा इससे पहले कभी नहीं हुआ। विकिलीक्स ने इससे पहले इराक और अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना की जियादतियों की पोल खोल कर अमेरिका की नींद उड़ा दी थी।

1971 में जन्मे जूलियन असांज ने 2006 में विकिलीक्स वेबसाइट की नींव डाली थी। असांज विकिलीक्स डॉट ओरग के मुख्य संपादक और प्रवक्ता हैं। असांज का मानना है कि उनकी पांच लोगों की टीम ने इतने कम समय में इतने महत्वपूर्ण और गुप्त दस्तावेज जारी किए हैं,  जितने दुनिया की मीडिया ने नहीं किए। ताजा मामला दुनिया भर के देशों में अमरीकी दूतावासो से विदेश मंत्रालय को भेजे गए कई संदेशो से जुड़ा है जिसने अमेरिकी विदेश मंत्रालय की 'कूट नीति' की पोल खोल दी है। यह आरोप लगाया गया है कि गुप्त संदेश अमरीकी सैनिक ब्रैड मेनिंग ने ही वेबसाइट के संस्थापक जूलियन असांज को सौंपे है।

यह दस्तावेज़ 1.6 गीगाबाइट की टेकस्ट फ़ाइल में थे जो कि पहले एक सीडी में थी जिसके कवर पर प्रसिद्ध पॉप गायिका लेडी गागा की तस्वीर थी जिससे ऐसा लगता था कि यह लेडी गागा की किसी एलबम की सीडी है। बाद में उसे एक मैमोरी स्टिक में स्थानांतरित किया गया जो इतनी छोटी थी कि उसे चाबी के छल्ले में आसानी से लटकाया जा सकता था। इन दस्तावेजों में अरब ईरान और अमरीका के बारे में बहुत ही सनसनीखेज़ बातें हैं जिनके मंज़रे आम पर आने के बाद से अरब देशों को सांप सूंघ गया है और अमेरिका अपनी सफाई पेश करने के लिए दर दर भटक रहा है।

उनमें यह सार है कि किस तरह अमेरिका पर यह दबाव डाला गया कि सांप का सर काट दो और (ईरानी) परमाणु कार्यक्रम का अंत कर दो। यह बात मध्य पूर्व की एक सरकार के सर्वे सर्वा ने वाशिंगटन के नीति निर्माताओं से कही थी जो कुछ ऐसी नई बात नहीं कह रहे थे जो अमेरिका ने दुनियां के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में से एक के अपने कट्टर बल्कि खतरे में घटक दलों में से एक से पहले कभी नहीं सुनी थी। क्योंकि इज़राईल कई वर्षों से परमाणु हथियारों से लैस ईरान के एक असहनीय खतरनाक अस्तित्व के कारण इस पर पहले हमला करने की अशद जरूरत की संभावना रटता रहा है।

मगर इस मामले में ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमला करने के लिए शोर ग़ोग़ा मचाने वाला नेता इज़राईल के प्रधानमंत्री नहीं बल्कि शाह अब्दुल्लाह हैं जो सऊदीअरब के शाह हैं जो के एक साथी मुस्लिम देश है और इस्लाम के सबसे पवित्र स्थानों का केन्द्र है और तेहरान के साथ पूरण पर शीत राजनयिक संबंध रखता है। सऊदी अरब के शाह के इन कठोर विचारों का खुलासा विकिलीक्स ने अपनी वेब साइट पर जारी किये गए राजनयिक केबल में से एक सबसे अधिक आश्चर्यचकित करने वाली केबल में किया है। शाह ने बार बार अमेरिका पर ईरान के परमाणु हथियार कार्पाम को समाप्त करने के लिए उस पर हमला करने का ज़ोर डाला। एक केबल के अनुसार अप्रैल 2008 में शाह अब्दुल्लाह और अमेरिकी जनरल डेविड पीटरियास की बैठक के बाद वाशिंगटन में सऊदी अरब के राजदूत आदिल अलजुबर से संबंधित एक बयान में कहा गया है "उन्होंने (शाह) तुम (अमरीका) से कहा है कि सांप का सर काट डालो।

मगर शाह पर दोहरी बात करन का आरोप नहीं लगाया जा सकता है क्योंकि उन्होंने कथित तौर पर ईरान के विदेश मंत्री मनोचेहर मुत्तकी से कहा था कि हमें अपनी बुराइयों से बख्श दो,  उन्होंने कहा था कि आप को ईरानी के तोर पर अरब मामलों में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है व्हाइट हाउस के एक सीनियर अ़फसर से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि ईरान का उद्देश्य समस्याएं पैदा करना ह"। उन्होंने कहा इसमें कोई शक नहीं के उनके बारे में कोई बात अस्थिर है।

सऊदी अरब की इस दुश्मनी को हवा देने के पीछे इस की यह आशंका है कि परमाणु हथियारों से लेस ईरान को अगर खुली छूट मिल गई तो वह पड़ोसी इराक में बर्चस्व प्राप्त कर लेगा और व्यापक क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ा लेगा, जहां सऊदी अरब ओर ईरान प्रभाव के लिए एक दूसरे के आमने सामने है। यह महत्वपूर्ण दस्तावेज अप्रैल 2008 से संबंध रखती हैं और इराक की ओर भी इशारा करती हैं, केवल ईरान पर नहीं र्और इन में यह बहुत स्पष्ट है कि सऊदी अरब की मुख्य चिंताओं में से एक इराक में ईरान का बढ़ता बर्चस्व व प्रभाव है। लेकिन सबसे आश्चर्यजनक बात पूरे अरब देशों में इस तरह के व्यवहार का पाया जाना है। ईरान की परमाणु गतिविधियों को रोकने के लिए सैन्य कार्रवाई की सदा, जोर्डन और बहरीन के अधिकारियों द्वारा भी उठाई गई जिनकी के अमेरिकी राजनयिक केबल में चर्चा है। बहरीन के शाह हमाद बिन ईसा अलखलीफा को पीटरियास से बातचीत में जबरदस्त चर्चा करते हुए बताया गया है कि (ईरानी) परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करने के लिए जो कुछ भी आवश्यक हो कार्रवाई करें ओमान के एक वरिष्ठ मंत्री ने कुवैत और कतर के साथ बहरीन व खाड़ी के देशों की पहचान की है जो ईरान के खिलाफ अमेरिकी हमले के पक्ष में हैं। संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्री शेख अब्दुल्ला बिन ज़ायद अलनहयान,  ईरान को बड़ी समस्या बताते हैं जो खलीज के क्षेत्रों, अफगानिस्तान, यमन, और अफीका में आतंकवादी समूहों के कथित समर्थन के कारण परमाणु क्षमताओं के खतरे से भी बड़ा खतरा है। मिस्र के राष्ट्रपति हुसना मुबारक ईरान के खिलाफ अपनी घृणा को राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेज़ाद पर व्यक्तिगत हमले से निकालते हैं जिन्हें वह एक अतिवादी कहते हैं जो तर्काधार  रूप से नहीं सोचता। वे कहते हैं कि ईरान हमेशा मुसीबत बढ़ाता रहता है इन विचारो को अबू धाबी के वलीअहद प्रिंस शेख मोहम्मद बिन ज़ायद ने भी वयक्त किया है जो बिना किसी दैरी के कार्रवाई पर जोर दे रहे थे। उन्होंने ईरान के बारे में कहा मुझे विश्वास है कि यह आदमी हमें युद्ध में ले जाएगा। यह बस समय की बात है।

यह भावनाओं इज़राइल के रक्षा मंत्री एहुद बराक की जून 2009 की चेतावनी के संदर्भ में फ़ाइलों से छह से 18 महीने के बीच के अंतराल की हें जब ईरान को परमाणू हथियार हासिल करने से रोका जा सकता था, सैनिक कार्रवाई कि पहल के परिणाम में भरपाई ना हो सकने वाला और जाना बूझा नुकसान उठाना पड़ता। यदि अलग से लिया जाए तो बराक की यह टिप्पणी युद्ध घोषणा के अनुरूप है। वह व्यापक अरब की ईरान विरोधी दुश्मनी की पृष्ठभूमि में प्रभावी रूप से एकसहमति के निकट नज़र आते हैं। लेकिन जंग की इस मिलीजुली आवाज़ का सबसे महत्वपूर्ण पहलू राष्ट्रपति बाराक ओबामा के तहत तैयार की गई अमेरिकी नीति पर प्रकाश डालना है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों, अमरीका, ब्रिटेन, फांस, रूस और चीन और साथ ही में जर्मनी जिन से ईरान की दूसरे दौर की परमाणु वार्ता 5 दिसंबर को होने वाली है, ओबामा प्रशासन अपने अरब घटक दलों की जंग जूयाना रविश के विपरीत ऐहतेमाल का प्रदर्शन करता नज़र आता है। लीक दस्तावेज़ का स्टाइल ओबामा की नीति की साख को विश्वसनीयता देता है ईरान के साथ बातचीत की पेशकश और दूसरी और अधिक संगठित अंतरराष्ट्रीय मोर्चा खड़ा करना जिसका परिणाम संयुक्त राष्ट्र के चौथे दौर के प्रतिबंध के रूप में सामने आया है।

इसका मतलब यह हुआ कि युद्ध के खतरे की बात आज से एक साल या उससे पहले की है। ओबामा प्रशासन द्वारा ली गई लाइन के कारण, जिससे अमेरिका और ईरान के बीच सीधे बातचीत की पेशकश से महानतर अंतर्राष्ट्रीय समन्वय में मदद मिली है, ऐसा लगता है कि ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों पर किसी भी हमले के परिणाम में होने वाले नुकसान पर और उससे प्राप्त होने वाले कथित लाभ की ओर लोगों का ध्यान केंद्रित करने में अमेरिका को कुछ हद तक सफलता मिली है। अरब की गलियां ईरान के साथ हैं, जबकि केवल अरब के ज़ालिमों और जाबिरों को ही ईरान और अपनी ही जनता का डर सताता रहता है। यह शाह मानते हैं कि अगर कहीं ईरान का असर बडा तो उनके यहां भी लोकतंत्र की महामारी फैल सकती है जिससे उनकी अय्याशियों पर लगाम लग जाएगी क्योंकि उनके सारे अधिकार खत्म हो जाएंगे। एक जनमत में जो 29 जून से 20 जुलाई, 2010 के बीच मिस्र, सऊदी अरब, मोरक्को, जॉर्डन, लेबनान और संयुक्त अरब अमीरात में 3976 लोगों पर किया गया था यह स्पष्ट हुआ कि केवल 12 प्रतिशत लोगों ने कहा कि अमेरिका के पक्ष में उनका दृष्टिकोण सकारात्मक है जबकि 47 प्रतिशत ने नकारात्मक विचार व्यक्त किया। ऐसा लगता है कि यह लीक ओबामा की ईरान नीति में मददगार हो सकती है जिस का इशारा अहमदी निज़ाद के 29 नवम्बर को तेहरान में एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए किए गए दावे से चलता है जिनका कहना है कि यह दस्तावेज लीक नहीं बल्कि उन्हें राजनीतिक लाभ के लिए अमेरिकी सरकार द्वारा जारी किया गया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि ईरान अपने अरब पड़ोसी देशों के साथ हमेशा दोस्त था।

ऐसा नहीं लगता कि इस लीक से माहौल को बदलने में कोई असर होगा। जो आम तौर पर समझा जा रहा था उस को यह केवल कुछ शक्ति देगी। ईरान को सऊदी अरब से कभी भी गर्मजोशाना संबंधों की उम्मीद नहीं थी और दोनों अच्छी तरह समझते हैं कि इराक के भविष्य को लेकर दोनों एक दूसरे के आमने सामने हैं। विकिलीक्स और असांज ने जो दस्तावेज़ आम की हैं उनसे अरब शासकों के इरादे का पता चलता है परन्तु यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिका अपने संस्थानों जैसे डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस और डिपार्टमेंट ऑफ इस्टेट पर बंदन न लगा पाने के कारण बोना नज़र आता है।

Monday, 22 November 2010

ایک تھا راجہ

 ڈیلی پرتاپ مورخہ 22.11.2010 میں شائع
عفیف احسن
گزشتہ دنوں جب شری لال کرشن ایڈوانی کو سپریم کورٹ کے اے راجہ معاملہ پر وزیر اعظم سردار منموہن سنگھ کو حلف نامہ داخل کرنے کی ہدایت ملنے پر بولتے ہوئے سنا اور دیکھا توشیکسپیئر کے اوتھیلو کا ایک سین یاد آگیا جس میں کیسیو کہتا ہے ”وقار ، عزت ، وقار!ہائے! میں نے اپنی ساکھ گنواں دی ہے۔ میں نے خود کا امر حصہ کھو دیا ہے ، اور جو کچھ باقی رہ گیا ہے وہ بہیمانہ ہے۔ میرا نام ،لاگو ، میری عزت!“
 بعد میں اس عظیم المیہ میں ، لاگو اس سے کہتا ہے۔”کیونکہ میں ایک دیانتدار آدمی ہوں ، میں نے سوچا کہ آپ کو کچھ جسمانی زخم پہنچے تھے ،اس میں ساکھ کے مقابلے میں زیادہ جرم ہے۔ وقارتو ایک بے کار اور سب سے زیادہ غلط نفاذ ہے، زیادہ تر بغیرکسی قابلیت کے حاصل کیاہوا اور بغیراہلیت کے ہارا : تم نے کوئی ساکھ نہیںکھو ئی ، جب تک کہ تم خود کوایساہاراہوانہ سمجھو۔
ہمارے ملک میں اس وقت گھوٹالوں کی بہار سی آئی ہوئی ہے۔اس میں ملک کے ہر علاقہ کے لوگ، ہر پارٹی کے لوگ شامل ہیں۔یہ لوگ الگ الگ زبانیں بولتے ہیںجو شاید ایک دوسرے کو سمجھ میںنہ آئےں لیکن ایک زبان ہے جو ہر ایک کو سمجھ میں آتی ہے اور وہ ہے پیسے کی زبان۔
 یہی نہیںہمارے ملک میں سب سے اوپر ی سطح پر لوٹ پاٹ کا ایسا نظام پنپ چکا ہے ، جس میں بڑے رہنما ، نوکرشاہ ، بچولئیے اور صحافی شامل ہیں۔ یہ انکشاف انکم ٹیکس محکمہ کی طرف سے ٹیپ کرائے گئی کچھ اہم ٹیلی فون بات چیت سے ملا ہے۔
2 جی اسپیکٹرم تقسیم گھوٹالے کے خبر بننے سے پہلے ہی محکمہ ایک با اثر بچولیا خاتون کا فون ٹیپ کروا رہا تھا ، جوکہ پٹرولیم اور قدرتی گیس جیسے اہم علاقوں سے متعلق صنعت کاروں کے مفادات کے لئے کام کرتی ہے۔ ٹیپ بتاتے ہیں کہ مرکزی کابینہ میں اہم محکمہ ہتھیانے کے لئے کس قدر لوبئنگ ہوئی۔ایک جریدے نے اپنے تازہ شمارہ میں بڑے صنعتی گھرانوں کے لئے لابئنگ کرنے والی نیرا راڈیا کی سابقمواصلاتی وزیر اے راجہ، ڈی ایم کے ایم پی کنموزی اور سابق وزیر اعظم اٹل بہاری واجپئی کے داماد رنجن بھٹاچاریہ کے ساتھ بات چیت کی ٹیپوں کا انکشاف کیا ہے۔ ان میں صاف اشارہ ملتا ہے کہ راڈیا کی لوبئنگ سے اے راجا سمیت کئی رہنما مرکزی کابینہ میں جگہ بنانے میں کامیاب رہے۔ راجہ کو وزیر بنانے کے لئے دو بڑے صحافیوں نے بھی کانگریسیوں پر دباو ¿ بنایا۔ حالانکہ ان صحافیوں کا کہنا ہے کہ راڈیا سے ان کی بات چیت صحافی ہونے کے ناطے ہوئی تھی۔
کئی دیگر صحافیوں کی راڈیا سے ٹیلی کام اور امبانی بھائیوں کے گیس قیمت تنازعہ جیسے مسائل پر بات چیت بھی ٹیپ کی گئی ہے۔ ٹیپ کرنے کا کام 20 اگست 2008 کو شروع ہوا ، جب راجہ مواصلاتی وزیر بننے کے لئے زور لگا رہے تھے اور راڈیا ان کی مدد کر رہی تھی۔ راجہ اور کنموزی کی راڈیا سے بات چیت یو پی اے حکومت کی دوسری مدت میں منموہن سنگھ کی کابینہ بننے سے کچھ دن پہلے ہوئی تھی۔
راڈیا سے متعلق 104 سے زیادہ یہ ٹیپ وکیل پرشانت بھوشن کی سپریم کورٹ میں دائرپٹیشن کے ساتھ منسلک ہیں۔ بھوشن نے اے راجا کے خلاف الزامات چلانے کی درخواست دے رکھی ہے۔کانگریس قیادت حیران ہے کہ یو پی اے کی دونوں حکومتوں کے دوران یہ ٹیپ وزیر اعظم منموہن سنگھ سے لے کر پرنب مکھرجی اور پی چدمبرم تک کو دستیاب تھے۔ سوال اٹھنا لازمی ہے کہ ٹیپوں کو نظر انداز کرتے ہوئے یو پی اے حکومت کی دوسرے مدت میں راجہ کو ٹیلی کام وزارت کس طرح دی گئی۔
اب حکومت نے ٹیلی کام شعبہ میں راجہ کے پسند کے لوگوں کی تقرری پرروک لگادی ہے۔ راجہ کی مدت میں بی ایس این ایل کے چیرمین کے عہدے کے لیے آر کے اپادھیائے ، ایم ٹی این ایل کے چیرمین کے عہدے کے لئے کلدیپ سنگھ کو نامزد کیا گیا تھا۔ لیکن اب ان کی تقرری روک دی گئی ہیں وہیںٹرائی کے رکن کے طور پر راکیش مہروترا کی تقرری بھی روک دی گئی ہے۔مانا جا رہا ہے کہ ٹرائی سیکریٹری آر کے آرنلڈٹرائی کے نئے رکن ہو سکتے ہیں۔ یہ ساری تقرریاں راجہ کے جانے کے اڑتالیس گھنٹے کے اندر روکی گئیں۔ اور تو اور راجہ کے سابق سیکریٹری آر کے چندولیا کو بھی ٹیلی کام شعبہ سے باہر بھیج دیا گیا ہے۔ ٹیلی کام ڈپارٹمنٹ میں اور بھی تبدیلیاں جاری ہیں دیکھنا ہوگا کہ اب اگلا ، نمبر کس کا آتا ہے۔
دوسری طرف 2 جی اسپیکٹرم تقسیم کے تنازعہ کے چھینٹے وزیر اعظم کے دفتر پر بھی پڑنے کے بعد مرکزی حکومت اب اسپیکٹرم حاصل کرنے والی کمپنیوں کے خلاف سخت کارروائی کر سکتی ہے۔ اس کے لئے ٹیلی ریگولیٹری ایجنسی ٹرائی کی طرف سے جمعرات کو پیش کی گئی ایک رپورٹ کو بنیاد بنایا جا سکتا ہے۔ ٹرائی نے اپنی رپورٹ میں سال 2008 میں اس وقت کے متعلقہ وزیر اے راجا کی مددسے 2 جی اسپیکٹرم حاصل کرنے والی پانچ کمپنیوں کے 62 لائسنس رد کرنے کی سفارش کی ہے۔
ٹیلی کام رےگولیٹر ی اتھارٹی آف انڈیا نے 2 جی اسپیکٹرم حاصل کرنے کے وقت حکومت کے ساتھ کئے گئے معاہدے کے مطابق اپنی خدمات شروع نہیں کئے جانے کی بنیاد پر ان تمام کمپنیوں پر بھاری بھرکم اقتصادی جرمانہ لگانے یا ان کے لائسنس کو خارج کرنے کی بات کہی ہے۔اتھارٹی کی اس رپورٹ میں صاف طور پر ویڈیوکان ، یونینار ، ایتیسلات (سوان) جیسی کمپنیوں کے لائسنس خارج کرنے کا مطالبہ کیاہے۔ ان میں سے کئی کمپنیاں فی الوقت ملک کے کچھ اہم سرکلوں میں اپنی خدمات انجام دے رہی ہیں اور ان میں اب بھاری بھرکم غیر ملکی سرمایہ کاری بھی ہو چکی ہے۔ جانکاروں کے مطابق ڈاٹ نے اس رپورٹ کو عمل میں لانے کا عمل بھی شروع کر دیا ہے۔
ذرائع کے مطابق ٹرائی کی یہ رپورٹ بے ضابطگیاں کرکے لائسنس حاصل کرنے والی کمپنیوں کو بھاری مصیبت میں ڈال سکتی ہےں۔ اگر حکومت ان کے لائسنس رد کرتی ہے تو ان کے لاکھوں گاہکوں کو بھی پریشانی اٹھانی پڑ سکتی ہے۔ یہ بھی ثابت ہوتا ہے کہ ان کمپنیوں کا بنیادی مقصد لائسنس حاصل کر اسے کسی دوسرے کمپنیوں کو بیچنا تھا۔
ٹرائی نے پایا ہے کہ 34 معاملوںمیں کمپنیوں نے لائسنس معاہدے کے خلاف کام کیا ہے۔ چار معاملوں میں سروس شروع کرنے میں تاخیر کی گئی جبکہ 31 معاملوںمیں تاخیر بہت زیادہ تھی۔ ریگولیٹری ایجنسی ایتیسلات کو 15 سرکلوں ، یونینار کو آٹھ ، سسٹیما شیام ٹیلی کام کو 10 ، ویڈیوکان کو10 اور لوپ ٹیلی کام کو 19 سرکلوں میں فراہم کردہ لائسنس رد کرنے کے حق میں ہے۔
 کنٹرولر اور آڈیٹر جنرل کی رپورٹ میںبھی سابق مواصلاتی وزیر اے۔ راجہ پر بھاری گڑبڑی کرنے کا الزام لگایا گیا ہے۔ ٹرائی کی رپورٹ میں جن کمپنیوں کا ذکر ہے ان کے بارے میں سی اے جی کی 2 جی اسپیکٹرم تقسیم رپورٹ میں بھی کافی کچھ کہا گیا ہے۔سی اے جی نے اسپیکٹرم تقسیم میں گڑبڑی سے ملک کو ایک لاکھ 76 ہزار کروڑ روپے سے زیادہ کی آمدنی کے نقصان کی بات کہی ہے۔
اسپیکٹرم گھوٹالے میں مواصلاتی وزارت پر گڑبڑی کا براہ راست الزام عائد کرتے ہوئے سی اے جی نے اپنی رپورٹ میں کہا ہے کہ 2 جی اسپیکٹرم تقسیم میں وزارت نے منمانی اور خودغرضی کی ہر حد لانگھ دی۔ کچھ مخصوص کمپنیوں کو فائدہ دینے کے لئے بغیر کسی واجب وجہ کے سابق مواصلاتی وزیر اے راجہ نے قانون ، خزانہ اور ٹیلی کمیشن کے مشورہ کو نظر انداز کیا۔ یہی نہیں ، وزیر اعظم کی صلاح کو بھی حاشیے پر رکھا گیا۔
اس سے 2 جی اسپیکٹرم تقسیم میں سرکاری خزانے کو بھاری نقصان ہوا۔ نئی کمپنیوں کو لائسنس دینے میں براہ راست وزیر کی شرکت کی طرف اشارہ کرتے ہوئے سی اے جی نے اپنی رپورٹ میں کہاہے ، ’تقسیم کے عمل میں گڑبڑی اسی سے صاف ہو جاتی ہے کہ پہلے آو ¿ پہلے پاﺅکی پالیسی کے باوجود تمام درخواست دہندگان کو ایک ہی دن لیٹر آف انٹینٹ جاری کیا گیا اور یہ فیصلہ وزیر کی سطح پر لیا گیا۔‘
رپورٹ یہ بھی کہتی ہے کہ ،’وزیر اعظم نے تقسیم کے عمل میں شفاف اورجامع پالیسی بنانے کی صلاح دی تھی لیکن ان کی صلاح نظر انداز کرکے مواصلاتی وزارت نے سال 2008 میں 2001 کی شرح پر 2 جی اسپیکٹرم تقسیم کیا۔ اس کے لیے تمام قوانین اور عمل کو نظر انداز کیا گیا۔
 سی اے جی نے اپنی رپورٹ میں کہا ہے کہ 2 جی اسپیکٹرم لائسنس دینے کے لئے پہلے آو ¿ پہلے پاﺅکی شرط پر عمل کرنے کا دعویٰ ٹیلی وزارت نے کیا تھا۔ اس سلسلے میں وزیر اعظم کے دفتر کو بھی یہی پیغام ایک خط کے ذریعے دیا گیا تھا،لیکن حقیقت میں ایسا نہیں کیا گیا۔ جو درخواست مارچ 2006 سے 25 ستمبر 2007 کے درمیان جمع کرائی گئیں تھیں ، ان تمام کو ایک ہی دن 10 جنوری 2008 کو لیٹر آف انٹینٹ جاری کیا گیا۔
 سی اے جی نے کہا کہ پہلے آﺅ پہلے پاﺅشرط میں تبدیلی اور پیسہ جمع کرانے کی بنیاد پر اسپیکٹرم ملنے کو لے کر شاید کچھ کمپنیوں کو پہلے سے ہی پتہ تھا۔ یہی وجہ ہے کہ یہ کمپنیاں ڈیمانڈ ڈرافٹ بنا کر پہلے سے ہی تیار تھیں۔
 سی اے جی نے شبہ ظاہر کےا ہے کہ آخر کچھ کمپنیاں کس طرح ایک ہی دن میں پندرہ سو کروڑ روپے سے زیادہ کا ڈیمانڈڈرافٹ بنا سکتی ہیں۔
ان سب باتوں سے لگتا ہے کہ اس نام نہاد’ راجہ‘ نے کس طرح ہمارے ملک کے اصلی راجہ یعنی وزیر اعظم اورآئینی اداروں کودرکنار کرتے ہوئے مواصلاتی وزارت پر اپنا راج تھونپ دیا اور خود راجہ بن گیا۔
حالانکہ یہ ممکن نہیں ہے کہ راجہ نے اکیلے ہی بغیر کسی مدد کے یہ کارنامہ انجام دیا ہوگا بلکہ اب تو ایسامحسوس ہوتا ہے کہ راجہ کے پیچھے ان کی پوری پارٹی ڈی ایم کے بھی اس گھوٹالے میں شامل تھی ورنہ ان کو دوبارہ مواصلاتی وزارت ہرگز نہ دی جاتی، حالانکہ وزیر اعظم دوسری بار راجہ کو وزیر بنانے کے حق میںقطعی نہیں تھے مگر جب ڈی ایم کے اڑ گئی تو ان کو جھکنا پڑا اور راجہ کو دوبارہ وزیر ہی نہیں بنایا گیا بلکہ ان کو پھر سے وہی محکمہ دے دیا گیا جس میں ان پر گھوٹالے کا الزام تھاتاکہ اس گھوٹالے کو دبادیا جائے اور ان کی منظور نظر کمپنیوں پر کو ئی آنچ نہ آنے پائے۔
اب تو تفتیش اس بات کی ہونی چاہئے کہ کس کس کو کتنی کتنی رقم ملی ہے اور اس تفتیش کو نہ تو جے پی سی سے کرایا جائے اور نہ ہی اس کو سی بی آئی سے کرایا جائے بلکہ اس تفتیش کے لئے ایک جوڈیشل کمیشن بنایا جائے جو کہ آزادانہ طور پر سپریم کورٹ کے تحت اپنی تفتیش کرے۔
 میں یہ مضمون لاگو کے اس ڈائیلاگ کے ساتھ ختم کرناچاہوں گا”مانا کہ ، تم ایک بہت ہی نیک خو ہو۔مگر موجودہ وقت ، اس ملک کی پوزیشن اور حالات کو دیکھتے ہوئے میری دلی خواہش ہے کہ یہ نا ہوا ہوتا، لیکن کیونکہ یہ جیسا ہے ویسا ہی ہے ،اس لئے اپنے ہی فائدے کے لئے اس کی اصلاح کر لو۔“


एक था राजा


वीर अर्जुन दिनाक 13-11-2010 में प्राकाशित
 अफीफ अहसन
पिछले दिनों जब श्री लाल कृष्ण आडवाणी को, सुप्रीम कोर्ट के ए राजा मामले पर प्रधानमंत्री सरदार मनमोहन सिंह को शपथ पत्र दाखिल करने का निर्देश मिलने पर, बोलते हुए सुना और देखा तो शेक्सपीयर के ओथेलो का एक सीन याद आ गया जिसमें केसियो कहता है "प्रतिष्ठा, सम्मान, प्रतिष्ठा! हाय! मैंने अपनी साख गंवा दी है. मैंने खुद का अमर हिस्सा खो दिया है, और जो कुछ शेष रह गया है वह बेकार है. मेरा नाम, लागो, मेरी इज़्ज़त!"
बाद में इस महान दुखद नाटक में लागो उससे कहता है. "क्योंकि मैं एक ईमानदार आदमी हूँ
, मैंने सोचा कि आपको कुछ शारीरिक घाव पहुंचे थे, इसमें प्रतिष्ठा की तुलना में अधिक अपराध है. प्रतिष्ठा एक बेकार और सबसे अधिक गलत वस्तु है, अधिकतर बिना किसी योग्यता के प्राप्त की हुई और बगैर योगयता के हारी: तुमने कोई साख नहीँ खोई, जब तक तुम खुद को एसा हारा होआ ना समझो."
हमारे देश में इस समय घोटालों की बहार सी आई हुई है. इसमें देश के हर क्षेत्र के लोग
, हर पार्टी के लोग शामिल हैं. ये लोग अलग अलग भाषाएं बोलते हैं जो शायद एक दूसरे को समझ में ना आयें लेकिन एक भाषा है जो सभी को परसपर समझ में आती है और वह है पैसे की भाषा.
यही नहीं हमारे देश में शीर्ष स्तर पर लूटपाट का ऐसा सिस्टम पनप चुका है जिसमें बड़े नेता
, नोकरशाह, बिचौलिए और पत्रकार शामिल हैं. यह खुलासा आयकर विभाग की ओर से टेप कराए गई कुछ टेलीफोन बातचीत से मिला है.
2 जी स्पैक्ट्र्म वितरण घोटाले की खबर बनने से पहले ही आयकर विभाग एक असरदार बिचौलिया महिला का फोन टेप करवा रहा था
, जो पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों के बारे में उद्योगपतियों के हितों के लिए काम करती है. टेप बताते हैं कि केंद्रीय मंत्रिमंडल के महत्वपूर्ण विभाग हथियाने के लिए कितनी लाबिइंग हुई. एक पत्रिका ने अपने ताजा अंक में बड़े औद्योगिक परिवारों के लिए लाबिइंग करने वाली नीरा राडिया की संचार मंत्री ए राजा, डी एम के सांसद कनिमूझी
और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दामाद रंजन भट्टाचार्य के साथ बातचीत की टेपों का खुलासा किया है. उनमें साफ संकेत मिलता है कि राडिया की लाबिइंग से ए राजा समेत कई नेता केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह बनाने में सफल रहे. राजा को मंत्री बनाने के लिए दो बड़े पत्रकारों ने भी कांग्रेसयों पर दबाव बनाया. हालांकि इन पत्रकारों का कहना है कि राडिया से उनकी बातचीत पत्रकार होने के नाते हुई थी.
कई अन्य पत्रकारों की राडिया से दूरसंचार और अंबानी भाइयों के गैस मूल्य विवाद जैसे मुद्दों पर बातचीत भी टेप की गई है. टेप करने का काम 20 अगस्त 2008 को शुरू हुआ
, जब राजा संचार मंत्री बन ने के लिए जोर लगा रहे थे और राडिया उनकी मदद कर रही थी. राजा और कनिमूझी की राडिया से बातचीत यूपीए सरकार के दूसरी री में मनमोहन सिंह की सरकार बन ने से कुछ दिन पहले हुई थी.
राडिया के बारे में 104 से अधिक यह टेपें वकील प्रशांत भू
न की सुप्रीम कोर्ट में दायर टीशन के साथ संलग्न हैं. भून ने ए राजा के ख़िलाफ़ आरोप चलाने के लिए आवेदन कर रखा है. कांग्रेस नेतृत्व हैरान है कि यूपीए की दोनों सरकारों के दौरान यह टेप प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर प्रणव मुखर्जी और पी. चिदंबरम तक को उपलब्ध थे. सवाल उठना चाहिए कि टेपों की अनदेखी करते हुए यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में राजा को दूरसंचार मंत्रालय कैसे दिया गया.
अब सरकार ने दूरसंचार क्षेत्र में राजा की पसंद के लोगों की नियुक्ति पर रोक लगा दी है. राजा की अवधि में बीएसएनएल के अध्यक्ष पद के लिए आरके उपाध्याय
, एमटीएनएल के अध्यक्ष पद के लिए कुलदीप सिंह को नामित किया गया था. लेकिन अब उनकी नियुक्ति रोक दी गई हैं वहीं ट्राई के सदस्य के रूप में राकेश महरोतरा की नियुक्ति भी रोक दी गई है. माना जा रहा है कि ट्राई सचिव आरके आरनोलड नए सदस्य हो सकते हैं. यह सारी नियुक्तियाँ राजा के जाने के 48 घंटे के अंदर रोकी गईं. और तो और राजा के पूर्व सचिव आरके चन्दोलिया को भी दूरसंचार विभाग से बाहर भेज दिया गया है. दूरसंचार विभाग में और भी बदलाव जारी हैं देखना होगा कि अब अगला नंबर किसका आता है.
दूसरी ओर 2 जी स्पैक्ट्र्म विवाद के छींटे प्रधानमंत्री के कार्यालय पर भी पड़ने के बाद केंद्र सरकार अब स्पैक्ट्र्म
पाने वाली कंपनियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर सकती है. इसके लिए दूरसंचार नियामक एजेंसी ट्राई की ओर से गुरुवार को पेश की गई एक रिपोर्ट को आधार बनाया जा सकता है. ट्राई ने अपनी रिपोर्ट में वर्ष 2008 में उस समय के संबंधित मंत्री ए राजा की मदद से 2 जी स्पैक्ट्र्म प्राप्त करने के लिए पांच कंपनियों के 62 लाइसेंस रद्द करने की सिफारिश की है.
दूरसंचार नियामक प्राधिकरण 2 जी स्पैक्ट्र्म प्राप्त करने के समय सरकार के साथ किए गए समझौते के अनुसार अपनी सेवाओं शुरू नहीं होने के आधार पर सभी कंपनियों पर भारी भरकम आर्थिक जुर्माना लगाने या लाइसेंस रद्द करने की बात कही है. प्राधिकरण की इस रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से वीडियोकान
, यूनिनार, एतीसलात (स्वान) जैसी कंपनियों के लाइसेंस रद्द करने की मांग की है. इनमें से कई कंपनियां इस समय देश के कुछ सर्किलों में अपनी सेवाएं दे रही हैं और अब भारी भरकम विदेशी निवेश हो चुका है. जानकारों के अनुसार डॉट ने इस रिपोर्ट को अमल में लाने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है.
सूत्रों के अनुसार ट्राई की यह रिपोर्ट गडबडियाँ करके लाइसेंस हासिल करने वाली कंपनियों को भारी मुसीबत में डाल सकती हैं. अगर सरकार उनके लाइसेंस रद्द करती है तो उनके लाखों ग्राहकों को भी परेशानी उठानी पड़ सकती है. यह भी साबित होता है कि इन कंपनियों का मुख्य उद्देश्य लाइसेंस प्राप्त कर उसे अन्य कंपनियों को बेचना था.
ट्राई ने पाया है कि 34 मामलों में कंपनियों ने लाइसेंस समझौते के खिलाफ काम किया है. चार मामलों में सेवा शुरू करने में देरी की गई जबकि 31 मामलों में देर बहुत अधिक थी. नियामक एजेंसी एतीसलात को 15 सर्किलों
, यूनिनार को आठ, सिस्टेमा श्याम टेलीकाम को 10, वीडियोकान को 10 और लुप दूरसंचार को 19 सर्किलों में दिए गए लाइसेंस रद्द करने के पक्ष में है.
नियंत्रक और परीक्षक जनरल की रिपोर्ट में भी पूर्व संचार मंत्री ए. राजा पर भारी गड़बड़ी करने का आरोप लगाया गया है. ट्राई की रिपोर्ट में जिन कंपनियों का उल्लेख है उनके बारे में सीए जी की 2 जी स्पैक्ट्र्म वितरण रिपोर्ट में भी काफी कुछ कहा गया है. सीए जी ने स्पैक्ट्र्म वितरण में गड़बड़ी से देश को एक लाख 76 हजार करोड़ रुपए से अधिक आय के नुकसान की बात कही है.
स्पैक्ट्र्म घोटाले में संचार मंत्रालय में गड़बड़ी का सीधा आरोप लगाते हुए सीए जी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 2 जी स्पैक्ट्र्म वितरण में मंत्रालय ने मनमानी और खुदग़रज़ी की हर सीमा लांघ दी. कुछ कंपनियों को लाभ देने के लिए बिना वाजिब कारण के पूर्व संचार मंत्री ए राजा ने कानून
, वित्त और दूरसंचार आयोग के सुझाव की अनदेखी की. यही नहीं, प्रधानमंत्री की सलाह को भी हाशिए पर रखा गया.
इससे 2 जी स्पैक्ट्र्म वितरण में सरकारी खजाने को भारी नुकसान हुआ. नई कंपनियों को लाइसेंस देने में सीधे मंत्री की भागीदारी की ओर संकेत करते हुए सीए जी ने अपनी रिपोर्ट में कहा
, 'विभाजन की प्रक्रिया में गड़बड़ी इसी से साफ हो जाती है कि पहले आओ पहले पाओ की नीति के बावजूद सभी अनुरोध दाताओं को एक ही दिन लेटर ऑफ इन्टेंट जारी किया गया और यह निर्णय मंत्री के स्तर पर लिया गया.
रिपोर्ट यह भी कहती है कि
, 'प्रधानमंत्री ने विभाजन की प्रक्रिया में पारदर्शीता सक्श नीति बनाने की सलाह दी थी लेकिन उनकी सलाह की अनदेखी करके संचार मंत्रालय ने वर्ष 2008 में 2001 की दर
पर 2 जी स्पैक्ट्र्म आवंटित किया. इसके लिए सभी कानून और प्रक्रिया की अनदेखी की गई.
सीए जी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 2 जी स्पैक्ट्र्म लाइसेंस देने के लिए पहले आओ पहले पाओ की शर्त का पालन करने का दावा दूरसंचार मंत्रालय ने किया था. इस संबंध में प्रधानमंत्री कार्यालय को भी यही संदेश पत्र के माध्यम से गया
, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं किया गया. जो अनुरोध मार्च 2006 से 25 सितम्बर 2007 के बीच जमा की गई थीं, उन सभी को एक ही दिन 10 जनवरी 2008 को लेटर ऑफ इन्टेंट जारी किया गया.
सीएजी ने कहा कि पहले आओ पहले पाओ शर्त में परिवर्तन और पैसा जमा कराने के आधार पर स्पैक्ट्र्म मिलने को लेकर शायद कुछ कंपनियों को पहले से ही पता था. यही वजह है कि कंपनियां बैंक ड
राबनाकर पहले से ही तैयार थीं.
सीए जी ने संदेह जताया है कि आखिर कुछ कंपनियां किस तरह एक ही दिन में पंद्रह सौ करोड़ रुपए से अधिक का बैंक ड
राट बना सकती है.
इन सब बातों से लगता है कि इस तथाकथित
'राजा' ने कैसे हमारे देश के वास्तविक राजा यानी प्रधानमंत्री ओर संवेनिक संस्थाओं को किनारे करते हुए संचार मंत्रालय पर अपना राज थोप दिया और स्वयं राजा बन गया.
हालांकि यह संभव नहीं है कि राजा ने अकेले ही बिना किसी सहायता के यह कारनामा अंजाम दिया होगा बल्कि अब तो एसा महसूस होता है कि राजा के पीछे उनकी पूरी पार्टी डी एम के इस घोटाले में शामिल थी वरना उन्हें फिर संचार मंत्रालय कभी नहीं दिया जाता
, हालांकि प्रधानमंत्री दूसरी बार राजा को मंत्री बनाने के पक्ष में नहीं थे मगर जब डी एम के अड़ गई तो उन्हें झुकना पड़ा और राजा को फिर से मंत्री ही नहीं बनाया गया बल्कि उन्हें वही विभाग दिया गया जिसमें उन पर घोटाले का आरोप था ताकि इस घोटाले को दबाया जाए और उनकी चहीती कंपनियों पर कोई ऑच न आने पाए.
अब तो जांच इस बात की होनी चाहिए कि किस किस को कितनी कितनी रकम मिली है और जांच न तो जेपीसी से कराया जाए और न ही इसे सीबीआई से कराया जाए बल्कि इस की जांच के लिए न्यायिक आयोग बनाया जाए जो स्वतंत्र रूप से सुप्रीम कोर्ट के तहत अपनी जाँच करे.
यह लेख लागो के इस संवाद के साथ समाप्त करन चाहता हुं "माना कि तुम एक बहुत ही नेक नाम हो. मगर मौजूदा समय ओर इस देश की स्थिति और हालात को देखते हुए मेरी दिली इच्छा है कि यह ना हुआ होता
, लेकिन क्योंकि यह जैसा है वैसा ही है, इसलिए अपने लाभ के लिए इस का सुधार कर लो."

Saturday, 13 November 2010

“کا بلی والے ،کا بلی والے! تمہاری جھولی میں کیا ہے؟”

 عفیف احسن
 
ڈیلی پرتاپ مورخہ 13.11.2010 میں شائع
اسکول کے دنوں میں میں نے رابندر ناتھ ٹیگور کی ایک کہانی پڑھی تھی، جس کا عنوان تھا ’کابلی والا‘ اس کہانی میں کندھے پر میووں کی جھولی لٹکائے ، ہاتھ میں انگور کی پٹار ی لئے ایک لمبے چوڑے کابلی کا بیان ہے۔ جس سے پانچ برس کی لڑکی منی بہت ڈرتی تھی۔ ایک دن جیسے ہی وہ اس کے گھر کی طرف آنے لگا ، منی جان لے کر اندر بھاگ گئی۔ اسے ڈر لگا کہ کہیں وہ اسے پکڑ نہ لے جائے۔ اس کے دل میں یہ بات بیٹھ گئی تھی کہ کابیلی والے کی جھولی کے اندر تلاش کرنے پر اس جیسے اور بھی دو چار بچے مل سکتے ہیں۔
کابلی نے لڑکی کے والدکومسکراتے ہوئے سلام کیا۔انہوں نے اس سے کچھ سودا خریدا۔ پھر وہ بولا ، ” بابو صاحب ، آپ کی لڑکی کہاں گئی؟“لڑکی کے والد نے منی کے دل سے خوف دور کرنے کے لئے اسے بلوا لیا۔ کابلی نے جھولی سے کشمش اور بادام نکال کر منی کو دینا چاہا پر اس نے کچھ نہ لیا۔ ڈرکر وہ لڑکی والد کے گھٹنوں سے چپٹ گئی۔ کابلی سے اس کا پہلا تعارف اس طرح ہوا۔ کچھ دن بعد منی کی کابلی سے خوب دوستی ہوگئی اور وہ گھنٹوں ایک دوسرے سے باتیں کیاکر تے۔اور وہ منی کی جھولی بادام کشمش سے بھردیتاجبکہ اس کے والد کابلی والے کو ایساکرنے کے لئے منع کرتے۔
کابلی کو دیکھتے ہی لڑکی ہنستی ہوئی کہتی تھی ،” کا بلی والے ،کا بلی والے! تمہاری جھولی میں کیا ہے؟’’
ہر سال سردیوں کے آخر میں کابلی اپنے ملک چلا جاتا۔ جانے سے پہلے وہ سب لوگوں سے پیسہ وصول کرنے میں لگا رہتا۔ اسے گھر گھرگھومنا پڑتا ، مگر پھر بھی ہر روز وہ منی سے ایک بار مل جاتا۔
کہانی کے آخر میں کابلی والے کے ہاتھوں ایک آدمی جس نے اس سے ایک چادر خریدی اور اس کے کچھ روپے اس پر باقی تھے ، جنہیں وہ دینے سے انکار کر رہا تھا، کا خون ہوجاتا ہے اور اسے جیل ہوجاتی ہے۔
اس بیان کا مقصد یہ ہے کہ جب ہمارے یہاں اوباما آنے والے تھے تو ایسالگ رہا تھا کہ ہر ایک کو کابلی والے کا انتظار ہے۔ ان کے آنے کے بعدہر ایک یہی پوچھ رہا تھا ” کا بلی والے ،کا بلی والے! تمہاری جھولی میں کیا ہے؟“ مگر اس بار جو امریکی صدر آئے تھے ان کے کاندھے پر میووں کی جھولی اور ہاتھ میں انگور کی پٹار ی کے بجائے وہ خالی ہاتھ تھے۔پانچ سال کی منی(ہندوستان) اب جوان ہو چکی تھی اور اس کی شادی ہونے والی تھی۔ یہی نہیں یہ صدر ابھی حال ہی میں عراق سے رہا ہوکر آئے تھے۔ اور عراق اور افغانستان کی جنگ نے امریکہ کی کمر ہی توڑدی ہے ۔
اب تک جو بھی امریکی صدر آتے تھے توان سے یہ امید کی جاتی تھی کہ وہ ہندوستان کے لئے جھولی بھر کر لائیںگے اورآتے ہی اس کا منہ کھول دیں گے، مگر یہ پہلی بار ہوا ہے کہ کوئی امریکی صدر ہندوستان سے کچھ لینے کے ارادے سے آیا اور اس میں کامیاب بھی رہا۔اسی بات سے عالمی بازار میںہندوستان کی قدرومنزلت کا اندازہ لگایا جاسکتا ہے۔
جس طرح منی کے والد نے آخر میں کابلی والے کے ہاتھوں میں چندروپئے رکھ دئے تھے تاکہ وہ کابل واپس جاکر اپنی بیٹی سے مل سکے اسی طرح ہندوستان نے بھی کیا۔
جاتے جاتے اوباما صاحب ہندوستان کو اس راستے پر چلنے کی نصیحت کرگئے جس پر امریکہ ہمیشہ ہی چلتا رہاہے، یعنی کہ دوسرے ممالک کے اندرونی معاملات میں دخل اندازی کرنا۔
جگ ظاہر ہے کہ امریکہ کی ان ہی پالیسیوں کی وجہ سے آج اسکی معاشی حالت نازک ہوئی ہے ۔امریکہ کو یہ شکایت ہے کہ ہندوستان میانمار میں دخل اندازی کیوں نہیں کر رہا، جبکہ ہندوستان کی ہمیشہ سے یہ پالیسی رہی ہے کہ وہ کسی ملک کے داخلی معاملات میں کوئی دخل نہیں کرتا،چاہے وہ میانمار ہو، نیپال ہو یا اور کوئی ملک ہو ۔
اگر ایسا نہ ہوتا تو ہندوستان کب کا پاکستان پر حملہ کرچکا ہوتا، حالانکہ اس طرح کے مواقع بارہا آئے اور ہندوستانی حکومت پر اس کے عوام کا اس کے لئے بہت زبردست دباؤ تھا،ایسا موقعہ پارلیمنٹ پرحملہ کے وقت،اکشردھام مندر پر حملہ کے وقت اورممبئی حملہ کے وقت بھی آیا تھا، مگر ہندوستان نے صبر سے کام لیا اورایسا کرنے سے گریز کیا۔
امریکہ ہندوستان سے تویہ امید کرتا ہے کہ وہ میانمار میں جمہوریت ہامی عناصر کی مدد کرے مگر دوسری طرف اسکا شمار مشرق وسطیٰ میں جمہوریت کے ہامیوں میں نہیں ہوتاہے۔ کیوں نہیں وہ خود سعودی عرب میں جمہوریت کے حمایت کرتا جہاں پر بادشاہت قائم ہے اور حکومت ایک موروثی جائداد بن کر رہ گئی ہے۔ اسی طرح کا حال مشرق وسطیٰ کی دوسرے زیادہ ترممالک کا ہے۔
جب پولیس کابلی والے کو گرفتار کرکے اور باندھ کر لے جارہی تھی تواتنے میں ” کا بلی والے ،کا بلی والے“ ، کہتی ہوئی منی گھر سے نکل آئی تھی ،کابلی کا چہرہ ایک لمحے کے لیے کھل اٹھاتھا۔ منی نے آتے ہی پوچھا تھا، ”تم سسرال جاوگے؟“ رحمت نے ہنس کر کہا ، ”ہاں ، وہیں تو جا رہا ہوں۔ “ کابلی کو لگا کہ منی اس کے جواب سے خوش نہیں ہوئی۔ تب اس نے گھونسا دکھا کر کہا ، ”سسر کو مارتا، پر کیا کروں ، ہاتھ بندھے ہوئے ہیں۔ “ مگر منی کو تو اس سے یہ امید تھی کہ وہ کہے گا، ” ہم سسر کومارےگا۔ “جیسا کہ وہ ہمیشہ کہا کرتا تھا۔
یہی حال ہمارے اوباما صاحب کا ہے، وہ پاکستان کو کچھ نہیں کہہ سکتے کیونکہ ان کے ہاتھ بندھے ہوئے ہیں۔ پاکستان چاہے کتنی من مانی کرے، دہشت گردوں کے ٹریننگ کیمپ قائم کرے،سرحد کے پار اپنے دہشت گرد بھیجے مگر کیونکہ امریکہ کے ہاتھ بندھے ہوئے ہیں اس لئے وہ اس کو کچھ نہیں کہہ سکتا، حالانکہ وہ اپنے آپ کو دہشت گردوں کا سب سے بڑا دشمن گردانتا ہے اور دہشت گردوں کو ختم کرنے کے لئے کسی بھی حد تک جانے کو تیار رہتا ہے۔ مگریہ سب کچھ اسی وقت نظر آتا ہے جب کہ اس پر دہشت گردانہ حملہ ہو، ورنہ وہ دہشت گردوں اور ان کے حمایتیوں کی طرف سے آنکھیں موندے رہتا ہے۔
اگر امریکہ اپنے نیت میں نیک ہے تو اس کو چاہئے کہ جو پیمانہ وہ اپنے لئے اپناتا ہے وہی پیمانہ دوسروں کے لئے بھی اپنائے بجائے اس کے کہ وہ دوسروں کو تو لٹھاگز سے ناپ کر دے اور جب خود لٹھا خریدے تو لٹھا لاٹھی سے ناپے۔

काबुली वाले! तुम्हारी झोली में क्या है?


आफीफ अहसन
वीर अर्जुन दिनाक 13-11-2010 में प्राकाशित
 
स्कूल के दिनों में मैंने राबिन्द्र नाथ टैगोर की एक कहानी पढ़ी थी, जिसका शीर्षक था 'काबुली वाला' इस कहानी में कंधे पर मेवों की झोली लटकाए, हाथ में अंगूर की पिटारी लिय एक लंबे चौड़े काबुली का बयान है. जिससे पांच साल की लड़की मिनी बहुत डरती थी. एक दिन जैसे ही वह उसके घर की ओर आने लगा, मिनी जान लेकर भीतर भाग गई. उसे डर लगा कि कहीं वह उसे पकड़ ले जाए. उसके मन में यह बात बैठ गई थी कि काबुली वाले की झोली में खोजने पर उस जैसे और भी दो चार बच्चे मिल सकते हैं.
काबुली ने लड़की के वा‍‍लिद को मुस्क्रात हुए सलाम किया. उन्होंने उससे कुछ सौदा खरीदा. फिर वह बोला, "बाबू साहब, आप की लड़की कहाँ गई?" लड़की के पिता नेमिनी के दिल से डर दूर करने के लिए उसे बुला लिया. काबुली ने झोली से किश्मिश और बादाम निकालकर मिनी को देना चाहा पर उसने कुछ लिया. डरकर वह लड़की पिता के घुटनों से चिपक गई. काबुली से उसका पहला परिचय इस तरह हुआ. कुछ दिन बाद मिनी की काबुली से खूब दोस्ती हो गई और वह घंटों एक दूसरे से बातें किया करते. और वह मिनी की झोली बादाम,किश्मिश से भर दिया करता जब कि उसके पिता काबुली को एसा करन के लिए मना करते.
काबुली को देखते ही लड़की हंसती हुई कहती थी, " काबुली वाले, काबुली वाले ! तुम्हारी झोली में क्या है?"
हर साल सर्दियों के अंत में काबुली अपने देश चला जाता. जाने से पहले वह सब लोगों से पैसा वसूल करने में लगा रहता. उसे घर घर घूमन पड़ता, मगर फिर भी प्रतिदिन वह मिनी से एक बार मिल जाता.
कहानी के अंत में काबुली वाले के हाथों एक आदमी जिसने उससे एक चादर खरीदी और उसके कुछ रुपए उस पर बाकी थे, जिन्हें वह देने से इनकार कर रहा था, का खून हो जाता है और उसे जेल हो जाती है.
इस बयान का उद्देश्य यह है कि जब हमारे यहाँ ओबामा आने वाले थे तो एसा लग रहा था कि हर एक को काबुली वाले का इंतजार है. उनके आने के बाद हर एक यही पूछ रहा था " काबुली वाले, काबुली वाले ! तुम्हारी झोली में क्या है? " लेकिन इस बार जो अमेरिकी राष्ट्रपति आए थे उनके कंधे पर मेवों की झोली और हाथ में अंगूर की पिटारी की बजाय वह खाली हाथ थे. पांच वर्ष की मिनी (भारत) अब जवान हो चुकी थी औरउस की शादी होने वाली थी. यही नहीं यह राष्ट्रपति अभी हाल ही में इराक़ से रिहा होकर आए थे. और इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान युद्ध ने अमरीका की कमर ही तोड़  दी  है.
अब तक जो भी राष्ट्रपति आते थे उन से यह उम्मीद की जाती थी कि वह भारत के लिए झोली भर कर लाएँगे और आते ही उसका मुंह खोल देंगे, लेकिन यह पहली बार हुआ है कि अमेरिकी राष्ट्रपति भारत से कुछ लेने के इरादे से आया और सफल भी रहा. इसी बात से विश्व बाजार में हिन्दोस्तान की पोजिशन का अनुमान लगाया जा सकता है.
जिस तरह मिनी के पिता ने आखिर में काबुली वाले के हाथों में चन्द रपये रख दिए थे ताकि वह काबुल वापस जाकर अपनी बेटी से मिल सके इसी तरह भारत ने भी किया.
जाते जाते ओबामा साहब भारत को उस रास्ते पर चलने की नसीहत कर गये जिस पर अमेरिका हमेशा ही चलता रहा, यानी कि दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करना.
जग जा़हिर है कि अमेरिका की इन्हीं नीतियों के कारण आज उसकी आर्थिक हालत गंभीर है. अमेरीका को यह शिकायत है कि भारत मयानमार में दखल अंदाजी क्यों नहीं कर रहा, जबकि भारत की हमेशा से यह नीति रही है कि वह किसी देश के आंतरिक मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं करता, चाहे वह मयानमार हो, नेपाल हो या और कोई देश है.
यदि ऐसा होता तो भारत कब का पाकिस्तान पर हमला कर चुका होता, हालांकि इस तरह के अवसर कई बार आए और भारत सरकार पर जनता का इस के लिए बहुत भारी दबाव था, ऐसा मौका संसद पर हमले के समय, अकशरधाम मंदिर पर हमले के समय ओर मुंबई हमले के समय भी आया था, मगर भारत ने सब्र से काम लिया और ऐसा करने से बचा.
अमेरिका को भारत से तो यह उम्मीद है कि वह मयानमार में लोकतंत्र हामी तत्वों की मदद करे मगर दूसरी ओर उसका जोड़ मध्य पूर्व में लोकतंत्र के हामियों में नहीं होता. क्यों नही वह खुद सऊदी अरब में लोकतन्त्र का समर्थन करता जहां पर बादशाहत कायम है और सरकार एक आनुवंशिक संपत्ति बन कर रह गई है. इसी तरह का हाल मध्य पूर्व के अन्य अधिक मुलकों का है.
जब पुलिस काबुली को गिरफ्तार करके बांध कर ले जा रही थी तो इतने में काबुली वाले, काबुली वाले, कहती हुई मिनी घर से निकल आई थी, काबुली का चेहरा एक क्षण के लिए खिल गया था. मिनी ने आते ही पूछा था, "तुम ससुराल जाओगे? " रहमत ने हंस कर कहा, "हाँ, वहीं तो जा रहा हूँ." काबुली को लगा कि मिनी उसके उत्तर से प्रसन्न नहीं हुई. तब उसने घूंसा दिखाकर कहा, "ससुर को मारता, पर क्या करूँ,  हाथ बंधे हुए हैं. "मग मिनी को तो इससे यह उम्मीद थी कि वह कहेगा," हम ससुर को मारेगा." जैसा कि वह हमेशा कहा करता था.
यही हाल हमारे ओोबामा साहब का है, वह पाकिस्तान को कुछ नहीं कह सकते क्योंकि उनके हाथ बंधे हुए हैं. पाकिस्तान चाहे कितनी मन मानी करे, आतंकवादियों के प्रशिक्षण शिविर स्थापित करे, सीमा के पार अपने आतंकवादी भेजे लेकिन क्योंकि हाथ बंधे हुए हैं इसलिए वह उसको कुछ नहीं कह सकता, हालांकि वह अपने आप को आतंकवादियों का सबसे बड़ा दुश्मन समझता है और आतंकवादियों को खत्म करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहता है. मगर यह सब कुछ उसी समय दिखता हैं जब कि उस पर आतंकवादी हमला हो, वरना वह आतंकवादियों और उनके समर्थक की ओर से आंखें बद किये रहता है.
यदि अमेरिका अपने इरादे में नेक है तो उसे चाहिए कि जो पेमाना वह अपने लिए अपनाता है वही पेमाना वह दूसरों के लिए भी अपनाए बजाय इसके कि वह दूसरों को तो गज से नाप कर लठा दे मगर जब वह खुद लठा खरीदे तो लठा लाठी से नापे.