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Monday, 25 July 2011

बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 25th July 2011
अफ़ीफ़ अहसन
जब पिछले दिनों नॉर्वे की राजधानी ओसलो पर हमला हुआ तो उसके तुरंत बाद यह खबर भी आई कि किसी इस्लामी नाम वाली आतंकवादी संस्था 'ग्लोबल जिहाद' ने इस घटना की ज़िम्मेदारी स्वीकार कर ली है. इस घटना को पहले अलकाईदा से भी जोड़ने की कोशिश की गई थी, क्योंकि नॉर्वे के 500 सैनिक अफ़ग़ानिस्तान में तैनात हैं. कहा यह भी जा रहा था के क्योंकि नॉर्वे के अख़बारों ने कई साल पहले रसूले अकरम (स.अ.) के काल्पनिक चित्र प्रकाशित किए थे और यह हमले इस की प्रति‍क्रया हो सकते हैं. मगर फिर कुछ देर बाद यह ख़बर आई की एक आतंकवादी ने ओसलो के पास ऐक छोटे से टापू पर अंधाधुंध गोलीबारी करके काफी युवाओं का नरसंहार कर दिया है. ओसलो में हुए बम धमाकों में अब तक 7 लोगों के मारे जाने और सौ के करीब के घायल होने की और यूटोया में गोला बारी में 85 लोगों की मौत की ख़बरें हैं.
इन खबरों के बाद सभी लोगों का शक इसी तरफ था कि हमले में हो न हो इस्लामी आतंकवादियों का हाथ है. मगर जब बम धमाकों का ग़ूबार छंटा तो इसके बाद जो छवि नज़र आई वह बहुत ही हैरान करने वाली और दुखद थी. यह एक भूरे बालों, नीली आंखों यूनानी नाक नकश के एक सुंदर युवक का चेहरा था जो कि कथित तौर पर एक ईसाई दाहिने बाजू़ की पार्टी से संबंध रखता है. यही नहीं वह इस्लाम का कट्टर दुश्मन है और अपने इस्लाम दुश्मन विचारों के लिए जाना जाता है. उस व्यक्ति का नाम आंद्रे बीरंग बरयूक है और उसकी उम्र 32 साल है. आंद्रे शिकार का शौकीन है और बहुत शिक्षित है और उसने ओसलो स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट से पढ़ाई की है. आंद्रे की गिरफ्तारी के बाद सभी थ्योरियां गलत साबित हुईं.
पुलिस ने ओसलो बम विस्फोट की जिम्मेदारी भी उस पर डाली है. इंटरनेट पर प्रकाशित होने वाले आंद्रे के संदेशों से स्पष्ट होता है कि वह कट्टर मुस्लिम विरोधी जुनूनी ईसाई है. आंद्रे पागलों की तरह सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट पर भड़काऊ टिप्पणी करता था. उसने कई वेबसाइटों पर इस्लाम विरोधी विचार व्यक्त किये थे. पुलिस को फेसबुक और टवीटर पर जारी उसके बयानों के अलावा और कुछ हाथ नहीं लगा है. ऐसा लगता है कि सोशल नेटवर्किंग साइटों पर उसने कुछ दिनों पहले ही अपना खाता खोला था. अपने फेसबुक प्रोफाइल में आंद्रे ने अपने आप को एक कनज़र्वै‍टयू ईसाई बताया था और अपने शौक में शिकार, शारीरिक कसरत और फ़्री मेसनरी लिखा था. अपनी प्रोफाईल में उसने खुद को गैर शादीशुदा भी लिखा है. मगर अब उसका फेसबुक पृष्ठ ब्लॉक कर दिया गया है.
पुलिस आंद्रे से पूछताछ कर रही है और वह तोते की तरह बोल रहा है और अपना पक्ष रख रहा है. रिपोर्ट के अनुसार आंद्रे ने एक कंपनी बनाई जिसका नाम बरयूक जीओ फार्म है और वह उसका इकलौता निदेशक है. यह कंपनी खेती से जुड़ी और ऐसा माना जा रहा है कि इसी के सहारे आंद्रे ने खाद ख़रीदी जिसे उसने विस्फोट के लिए इस्तेमाल किया. नॉर्वे की एक ऐगरिकलचर सहकारी के कर्मचारी ने बताया कि मीडिया में जो आदमी दिखाया जा रहा है उसी ने इस कंपनी से 6 टन खाद खरीदी थी. ओडमी एसटैंडसटाड जो फ़ेलस कोआपट एग्री में काम करती है ने बताया कि उसे इस से पहले यह नहीं महसूस हुआ कि इस खाद की खरीद में कोई शक की गुंजाइश है क्योंकि संदिग्ध के पास खेत थे. मगर बम विस्फोट के बाद उसने पुलिस को फोन करके जानकारी दी क्योंकि उसे मालूम था कि इस खाद का इस्तेमाल बम विस्फोट में किया जा सकता था.
जिस समय ओसलो पुलिस बम धमाकों के पीड़ितों की मदद में लगी हुई थी उसी समय एक व्यक्ति जिस ने पुलिस की वर्दी पहन रखी थी और अपने आप को पुलिस अधिकारी बता था एक नाव से ओसलो से लगभग बीस मील दूर यूटोया द्वीप पर पहुंचा और वहाँ पर मोजूद सैकड़ों युवाओं को जो लेबर पार्टी का समर कैंप अटेंड कर रहे थे एक जगह जमा होने का आदेश दिया और उनको ओसलो में हुए हमले की जांच में शामिल होने के लिए कहा. उसके बाद उसने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी जिससे घब्राकर लोग इधर उधर भागने लगे. कुछ लोग यह समझे कि यह एक सामान्य अभ्यास है और आंद्रे के तरफ भी दौड़ पड़े.
कुछ लोग वहां से भागने में सफल रहे, इस द्वीप से तेर कर निकलने की कोशिश में किनारे की ओर भागे तो आंद्रे ने वहां तक ​​उनका पीछा किया और पानी में तैरते लोगों पर भी गोलियां बरसाएँ और बहुत से युवाओं को मार दिया. जब पुलिस द्वीप पर पहुंची तो आंद्रे ने अपने आप को बिना किसी मज़ाहमत के पुलिस के हवाले कर दिया.
यूटोया द्वीप और ओसलो में हुए हमले अपने आप में निराले है, ​​अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ में भी. केवल इसलिए नहीं वह बहुत ही दरनदगी भरा था या यह कि इसमें बहुत अधिक मौतें हुई है बल्कि इसलिए भी कि इन हमलें के द्वारा किसी देश की लीडरशप के पूरी मरकज़यत को समाप्त करने की कोशिश की गई है. जबकि सिटी सेंटर पर हमला सरकार, नागरिक प्रशासन के अधिकारियों और प्रधानमंत्री जीन्स स्टोलटन बर्ग को निशाना बनाकर किया गया था. और अव्यवस्था का फायदा उठाते हुए आंद्रे यूटोया के लेबर यूथ लीग समर कैम्प पहुंच गया जहां लेबर पार्टी की भविष्य की लीडरशप की अहम और चीदह व्यक्ति राजनीति और पार्टी नेटवर्क को मजबूत करने पर बात के लिए जमा थे. यहां पर पार्टी के प्रमुख सदस्यों और अन्य युवा लोगों पर हमला किया गया और उन्हें खत्म कर दिया गया. घटना के सिलसिले से यह पता चलता है कि हमलावर का इरादा बड़े मंत्रियों के साथ ही अधिकतम पार्टी के वर्तमान और भविष्य के राजनेताओं को समाप्त करने का था.
एक बड़ा सवाल यह है कि आंद्रे को किस बात ने ऐसा करने के लिये प्रोत्साहित किया. वर्ष की शुरुआत में वह नॉर्वे की प्रोग्रेसिव पार्टी और उसके युवा विंग का सदस्य था. मगर वह उससे तब अलग हो गया जब उसके तीखे विचार इस पार्टी से मेल नहीं खाटते. वह इस्लाम विरोधी वेबसाइटों पर बला‍गिंग और टिप्पणी करता था. यह वेबसाइट विदेशियों खासकर मुसलमानों के खिलाफ नफरत और हिकारत से भरी पड़ी हैं. और बिना आधार साज़िश की थ्योरियों से पट्टी पड़ी हैं. और अभिव्यक्ति राय स्वतंत्रता के बहाने ऐसी वेबसाइटों पर कोई भी रोक नहीं लगाई जाती है और उन पर मन घड़ंत कहानियों और साम्प्रदायिक्ता फैलाई जाती है, ऐसा करने वाले यह नहीं सोचते कि आम आदमी के दिमाग पर क्या असर हो सकता है. यही मुस्लिम विरोधी रविश और इस्लाम दुश्मनी है जिसने आंद्रे को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि इस सबके लिए नॉर्वे सरकार की इमीग्रेशन नीति ज़िम्मेदार है और उसने पागलपन में बहुत सफ़ाकाना कदम उठाया. ऐसा लगता है कि इस्लाम की दुश्मनी में वह इतना पागल हो गया था कि उसको मुसलमानों और अपने ही देश के लोगों में कोई अंतर नज़र नहीं आया और उसने अपने ही लोगों का इतनी सफ़ाकी से नरसंहार कर दिया और अपने देश की एक पूरी लीडरशप को समाप्त करने की कोशिश की. नफरत के बीज बोने का यही अंजाम होता है.

بویا پیڑ ببول کا توآم کہاں سے ہوئے


Daily Pratap, Indias Oldest Urdu Daily
Published on 25th July 2011
عفیف احسن
جب گزشتہ دنوں ناروے کی راجدھانی اوسلو پر حملہ ہو ا تو اس کے بعدفوراً یہ خبر بھی آئی کے کسی اسلامی نام والی دہشت گرد جماعت’گلوبل جہاد‘کی طرف سے اس واقعہ کی ذمہ داری قبول کرلی گئی ہے۔ اس واقعہ کو پہلے القائدہ سے بھی جوڑنے کی کوشش کی گئی تھی، کیونکہ ناروے کے 500فوجی افغانستان میں تعینات ہیں۔ کہا یہ بھی جارہا تھا کے کیونکہ ناروے کے اخبارات نے کئی سال قبل رسول اکرم ؐ کے خیالی خاکے شائع کئے تھے اور یہ حملے اس کا رد عمل ہوسکتے ہیں۔مگرپھر کچھ دیر بعد یہ خبر آئی کے ایک دہشت گرد نے اوسلو کے نزدیک ایک چھوٹے سیجزیرے پر اندھادھند فائرنگ کرکے کافی نوجوانوں کا قتل عام کردیا ہے۔اوسلو میں ہوئے بم دھماکوں میں ابھی تک 7اشخاص کے ہلاک ہونے اور سو کے قریب زخمی ہونے کی اور یوٹویامیں گولا باری میں 85لوگوں کی ہلاکت کی خبریں ہیں۔
ان خبروں کے بعد تمام لوگوں کا شک اسی طرف تھا کہ اس حملہ میں ہو نہ ہو اسلامی دہشت گردوں کا ہاتھ ہے۔ مگر جب ان بم دھماکوں کاغبار چھنٹاتو اس کے بعد جو شبیہ نظر آئی وہ بہت ہی حیران کن اور افسوس ناک تھی۔ یہ ایک بھورے بالوں، نیل آنکھوں اور یونانی ناک نقش کے ایک خوبصورت نوجوان کا چہرا تھاجو کہ مبینہ طور پر ایک عیسائی دائیں بازو کی جماعت سے تعلق رکھتا ہے۔ یہی نہیں وہ اسلام کا کٹر دشمن ہے اور اپنے اسلام دشمن خیالات کے لئے جانا جاتا ہے۔ اس شخص کا نام آندرے بیرنگ بریوک ہے اور اس کی عمر 32سال ہے۔ آندرے شکار کا شوقین ہے اور انتہائی تعلیم یافتہ ہے اور اس نے اوسلو اسکول آف مینجمنٹ سے تعلیم حاصل کی ہے۔آندرے کی گرفتاری کے بعد یہ تمام تھیوریاں غلط ثابت ہوئیں۔
پولیس نے اوسلو بم دھماکے کی ذمہ داری بھی اس پر عائد کی ہے۔ انٹرنیٹ پر شائع ہونے والے اس کے پیغامات سے واضح ہوتا ہے کہ وہ کٹر مسلم مخالف جنونی عیسائی ہے۔ آندرے پاگلوں کی طرح سوشل نیٹ ورکنگ ویب سائٹ پر اشتعال انگیز تبصرے کرتا تھا۔ اس نے کئی ویب سائٹس پر اسلام مخالف خیالات کا اظہار کیا تھا۔ پولیس کو فیس بک اور ٹویٹر پر جاری اس کے بیانات کے علاوہ اور کچھ ہاتھ نہیں لگا ہے۔ ایسا لگتا ہے کے سوشل نیٹ ورکنگ سائٹس پر اس نے کچھ دنوں قبل ہی اپنا اکاؤنٹ کھولا تھا۔اپنے فیس بک پروفائل میں آندرے نے اپنے آپ کو ایک کنزرویٹیو عیسائی بتایاتھااور اپنے شوق میں شکار، جسمانی کسرت اورفری میسنری لکھا تھا۔اپنی پروفائل میں اس نے خود کو غیر شادی شدہ بھی لکھا ہے۔مگر اب اس کا فیس بک کا صفحہ بلاک کردیا گیا ہے۔
پولیس آندرے سے پوچھ تاچھ کررہی ہے اور وہ توتے کی طرح بول رہا ہے اور اپنا موقف رکھ رہا ہے۔اطلاعات کے مطابق آندرے نے ایک کمپنی بنائی جس کا نام بریوک جیوفارم ہے اور وہ اس کا اکلوتا ڈائریکٹر ہے۔یہ کمپنی کاشتکاری سے جڑی ہوئی ہے اور ایسا مانا جارہا ہے کہ اسی کے سہارے آندرے نے کھادخریدی جسے اس نے دھماکہ کے لئے استعمال کیا۔ناروے کی ایک ایگریکلچر کوآپریٹیو کے ایک کارندے نے یہ بتایا ہے کہ میڈیا میں جوآدمی دکھایا جارہا ہے اسی نے اس کی کمپنی سے 6ٹن کھاد خریدی تھی۔اوڈمی ایسٹینڈسٹاڈ جوکہ فیلس کوآپٹ ایگری میں کام کرتی ہے نیبتایا کہ اسے پہلے یہ نہیں محسوس ہو ا کہ اس کھاد کی خرید میں کوئی شک کی گنجائش ہے کیونکہ مشتبہ کے پاس کھیت تھے۔مگر بم دھماکے کے بعد اس نے پولیس کو فون کرکے اطلاع دی کیونکہ اسے معلوم تھا کہ اس کھاد کا استعمال بم دھماکے میں کیاجا سکتا تھا۔
جس وقت اوسلو میں پولیس بم دھماکوں کے متاثرین کی مدد میں لگی ہوئی تھی اسی وقت ایک شخص جس نے پولیس کی یونیفارم پہن رکھی تھی اور اپنے آپ کو پولیس آفیسر بتارہا تھا ایک کشتی سے اوسلو سے تقریباً بیس میل دور یوٹویا جزیرے پر پہنچا اور اس نے وہاں پر موجودسیکڑوں نوجوانوں کو جوکہ لیبر پارٹی کا سمر کیمپ اٹینڈ کررہے تھے ایک جگہ جمع ہونے کا حکم دیا اور ان کو اوسلو میں ہوئے حملہ کی جانچ میں شامل ہونے کے لئے کہا۔اس کے بعد اس نے اندھادھند فائرنگ شروع کردی جس سے گھبراکر لوگ ادھر ادھر بھاگنے لگے ۔کچھ لوگ یہ سمجھے کہ یہ ایک عمومی مشق ہے اور وہ آندرے کے طرف بھی دوڑ پڑے ۔
کچھ لوگ وہاں سے بھاگنے میں کامیاب رہے ،وہ اس جزیرے سے تیر کر نکلنے کی کوشش میں کنارے کی طرف بھاگے تو آندرے نے وہاں تک ان کا پیچھا کیا اور پانی میں تیرتے لوگوں پربھی گولیاں برسائیں اور بہت سے نوجوانوں کو ہلاک کردیا۔ جب پولیس جزیرے پر پہنچی تو آندرے نے اپنے آپ کو بغیر کسی مزاہمت کے پولیس کے حوالے کردیا ۔
یوٹویا جزیرے اور اوسلو میں ہوئے حملے اپنے آپ میں نرالے ہے ، یہاں تک کے بین الاقوامی تناظر میں بھی ۔ صرف اس لئے نہیں کے یہ بہت ہی درندگی آمیز تھا یا یہ کہ اس میں بہت زیادہ ہلاکتیں ہوئیں ہیں بلکہ اس لئے بھی کے اس حملہ کے ذریعہ ایک ملک کی لیڈرشپ کے پوری مرکزیت کو ختم کرنے کی کوشش کی گئی ہے۔جبکہ سٹی سینٹر پر حملہ حکومت ، شہری انتظامیہ کے اعلیٰ افسران اور وزیراعظم جینس اسٹولٹن برگ کو نشانہ بناکر کیا گیا تھا۔اور اس افراتفری کا فائدہ اٹھاتے ہوئے آندرے یوٹویا کے لیبر یوتھ لیگ سمر کیمپ پہنچ گیا جہاں پر لیبر پارٹی کی مستقبل لیڈرشپ کی چیدہ شخصیات سیاست اور پارٹی نیٹ ورک کو مضبوط کرنے پر بات کے لئے جمع تھی۔ یہاں پر پارٹی کے کلیدی ارکان اور دوسرے نوجوان لوگوں پر حملہ کیا گیااور ان کو فنا کردیا گیا۔ واقعہ کے سلسہ سے یہ پتا چلتا ہے کہ حملہ آور کاارادہ بڑے بڑے وزراء کے ساتھ ہی ساتھ زیادہ سے زیادہ پارٹی کے موجودہ اور مستقبل کے قائدین کو ختم کرنے کاتھا۔
ایک بڑا سوال یہ ہے کہ آندرے کو کس بات نے ایسا کرنے کی تحریک دی۔سن دو ہزار کی شروعات میں وہ ناروے کی پروگریسیو پارٹی اور اس کے یوتھ ونگ کا ممبر تھا۔مگر وہ اس سے تب الگ ہوگیا جب اس کے شدید خیالات اس پارٹی سے میل نہیں کھائے۔ وہ اسلام مخالف ویب سائٹوں پر بلاگنگ اور تبصرہ کرتا تھا۔یہ ویب سائٹس غیر ملکیوں خاص کر مسلمانوں کے خلاف نفرت اور حقارت سے بھری پڑی ہیں۔اوربے بنیاد سازش کی تھیوریوں سے بھی پٹی پڑی ہیں۔اور اظہار رائے کی آزادی کے بہانے ایسی ویب سائٹس پر کوئی بھی روک نہیں لگائی جاتی ہے اور ان پر من گھڑنت کہانیاں اور مذہبی منافرت پھیلائی جاتی ہے، ایسا کرنے والے یہ نہیں سوچتے کہ اس کااثر ایک عام آدمی کے دماغ پر کیا ہوسکتا ہے۔
یہی مسلم مخالف روش اور اسلام دشمنی ہے جس نے آندرے کو یہ سوچنے پر مجبور کردیا کہ اس سب کے لئے ناروے حکومت کی امیگریشن پالیسی ذمہ دار ہے اور اس نے پاگل پن میں یہ انتہائی سفاکانہ قدم اٹھایا۔ ایسا لگتا ہے کہ اسلام کی دشمنی میں وہ اتنا پاگل ہوگیا تھا کہ اس کومسلمانوں اور اپنے ہی ملک کے لوگوں میں کوئی فرق نظر نہیں آیا او ر اس نے اپنے ہی لوگوں کا اتنی سفاکی سے قتل عام کردیا اور اپنے ملک کی ایک پوری لیڈرشپ کو ختم کرنے کی کوشش کی۔ نفرت کے بیج بونے کایہی انجام ہوتا ہے۔

Monday, 18 July 2011

अगर पूर्व के हमलों से सबक सीखा होता


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 18th July 2011
अफ़ीफ़ अहसन
जब भी देश में कहीं भी कोई आतंकवादी घटना होती है तो उस पर पूरे देश में बहुत हो हल्ला मचता हे और राजनीतिक दल मरने वालों की ‍चिता की आग में अपने हाथ तापने में लग जाते हैं. यही नहीं राजनेता भी आग में हाथ तापने से नहीं चूकते. वह अपनी विरोधी पार्टी के खिलाफ तरह तरह के बयान देने में लग जाते हैं. यही नहीं वह अपने साथियों के खिलाफ भी बयान देने से नहीं चूकते और एक दूसरे पर इलज़ाम लगाने, आतंकवादियों की पीछे से शरण देने, एक विशेष रविश अपनाने, आतंकवाद के खिलाफ कोई व्यापक नीति तैयार न करने और एक दूसरे को कोसने के अलावा ओर कोई ठोस काम नहीं करते.
सरकार से बाहर बैठे कुछ राजनीतिज्ञों की बातों से लगता है कि अगर वह सत्ता में होते तो आतंकवाद को चुटकी बजाकर खतम कर देते और आतंकवादियों को पकड़ने और उन्हें सज़ा दिलाने में जरा भी समय बर्बाद नहीं करते. गर्ज़ यह कि हर राजनीतिज्ञ ऐसी घटना के बाद खाली शोर-शराबा बरपा करने के अलावा ओर कोई ठोस काम नहीं करता. यही नहीं हर हमले के बाद दिए जाने वाले बयान इतने घिसे पिटे होते हैं की कोइ नागरिक इन पर सरसरी नज़र डालना भी गवारा नहीं करता.
बहुत ले-दे के बाद एक समिति बना दी जाती है और यह कहा जाता है कि यह समिति इस बात की जांच करेगी के कया इस हमले में प्रशासन द्वारा कोई कोताही हुई है ओर ऐसे हमलों को रोकने के लिए देरपा उसूल बनाएगी और सुरक्षा को मजबूत करने के लिए अपने सुझाउ देगी.
जब 26 नवंबर 2008 को मुंबई पर पाकिस्तानी आतंकवादियों ने हमला किया था तब उस के बाद भारतीय जनता में बहुत जबर्दस्त गुस्सा रोष फैल गया था उस के बाद केंद्र सरकार ने और राजय सरकार ने आतंकवादियों से निपटने के लिए कई घोषणाऐं की. महाराष्ट्र सरकार ने एक पूर्व गवर्नर और पुर्व यूनियन होम सचिव राम प्रधान की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया, जिसमें पूर्व आईपीएस अधिकारी वी बालाचन्दरन भी थे, जिसका काम था की वह यह पता लगाए कि पुलिस और प्रशासन की प्रतिक्रिया में कहां कोताही हुई.
समिति ने दो हिस्सों में अपनी रिपोर्ट पेश की. मगर इस रिपोर्ट को बहुत ही संवेदनशील बताकर महाराष्ट्र सरकार ने उसे सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया. पर उसने यह वादा किया कि इस रिपोर्ट पर पूरी तरह से अमल किया जाएगा.
मगर अब फिर भारत के आर्थिक केंद्र मुंबई में बुधवार की शाम लगातार तीन बम धमाके हुए जिनमें अब तक 19 लोग मारे गए हैं और 100 से अधिक लोग घायल हो गए. यह विस्फोट आतंकवादी थे. लेकिन उनकी जिम्मेदारी किसी समूह पर नहीं डाला गयी है. न ही किसी गुट ने इन धमाकों की ज़िम्मेदारी ली है. दो विस्फोट दक्षिण मुंबई में प्रसिद्ध ओपरा हाउस और ज़ावेरी बाज़ार जबकि तीसरा इस तटीय शहर के मध्य क्षेत्र दादर में हुआ. तीनों स्थान का शुमार मुंबई के गुंजान आबादी वाले क्षेत्रों में होता है.
इन धमाकों के बाद जब सरकार पर यह आरोप लगा कि उसने प्रधान समिति की रिपोर्ट पर एक चौथाई भी अमल नहीं किया है तो इसके जवाब में सरकार ने बहुत जोर शोर से कहा कि तीन चौथाई काम हो चुका है. मगर अब राम प्रधान ने खुद ही इस बारे में सरकार की आलस्य की पोल खोल दी है. 26/11 की जांच पैनल के प्रमुख राम प्रधान ने सरकार पर हमला करते हुए एक साक्षात्कार में बताया कि पिछले दो वर्षों में सरकार ने उनसे संपर्क स्थापित करने की एक भी कोशिश नहीं की. उन्होंने 13 जुलाई के आतंकवादी हमलों के बाद कहा कि सरकार ने 26/11 के बाद बनी समिति की सिफारिशों को गंभीरता से एक आँख भी नहीं देखा.
प्रधान ने कहा कि उन्हें रिपोर्ट पेश किए एक साल हो गया है, लेकिन राज्य सरकार की ओर से कोई भी व्यक्ति उनसे नहीं मिला है. न ही रिपोर्ट पर बहस के लिए ओर न ही उन्हें बताने कि लिए कि कैसे इस रिपोर्ट में की गई सिफारिशों को लागू कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि लोग जवाब चाहते हैं, और उन्हें एहसास है कि वे व्यस्त हैं, लेकिन क्या यह महत्वपूर्ण नहीं है. प्रधान ने कहा कि ग्रह विभाग को कागजी कार्रवाई से आगे कुछ करने की जरूरत है, उन्हें अधिक काम और कम बात करने की जरूरत है, सुरक्षा अपरेटस के ओवरहाल की जरूरत है.
एक सवाल के जवाब में कि क्या मुंबई पुलिस ने 26/11 से कोई सबक सीखा है, प्रधान ने कहा कि नहीं.
प्रधान ने कहा कि लोगों की सुरक्षा पुलिस विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी है, मगर वह यह बुनियादी कर्तव्य अंजाम देने के योग्य नहीं है क्योंकि यहां कर्मचारियों की कमी है और अधिक और लंबे घंटे काम करना पड़ता है. अगर पुलिस विभाग को मजबूत किया जाता है तब इन सभी चूकों से रोका जा सकेगा, लेकिन कोई वास्तव में पुलिस व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए काम नहीं करता.
राम प्रधान ने दावा किया है कि उन्होंने सरकार को चेतावनी दी थी कि आतंकवादी पुणे के कोरेगांव पार्क में हमला कर सकते हैं. यह वही क्षेत्र है जहां फरवरी 2010 में जर्मन बेकरी में बमबारी हुई थी.
प्रधान ने कहा कि हालांकि 26/11 आयोग की रिपोर्ट की तैयारी से पहले उन्होंने पुणे का दौरा किया था और इस रिपोर्ट में उन आशंकाओं को व्यक्त किया था कि कोरेगांव पार्क को आतंकवादियों द्वारा निशाना बनाया जा सकता है. उन्होंने सरकार को बताया था कि यह क्षेत्र कमज़ोर हे क्योंकि यह पर्यटकों का केन्द्र है.
हालांकि राज्य सरकार ने समिति की रिपोर्ट गोपनीय रखी है मगर फ़िर भी इंटरनेट पर उपलब्ध है और उसका अध्ययन करने से यह पता चलता है कि पुलिस प्रशासन में क्या खामियां हैं. और शायद उन्ह‍ीं कमियों का लाभ उठाकर 13 जुलाई को मुंबई के कई महत्वपूर्ण स्थानों पर हमले किए गए और पुलिस और राज्य सरकार इन हमलों को रोकने के लिए कुछ भी नहीं कर सकी.
हम समिति तो बना देता है मगर उसकी रिपोर्ट दबा देते हैं और आम आदमी तक नहीं पहुंचने देते के कहीं वह लगातार इसमें दी गई कमयों को पूरा करने की मांग न करते रहे, और फिर अपनी सुविधा और आसानी के साथ और आराम आराम से इस पर अमल करते हैं. क्या ही अच्छा होता अगर सरकार ने समिति की रिपोर्ट आने के बाद एक हाई पावर कमेटी का गठन किया होती जो पूरी तरह से प्रधान कमेटी रिपोर्ट पर अमल कराने के लिए ज़िम्मेदार होती और जिस को इस बात का पूर्ण अधिकार होता कि वह रिपोर्ट में बताई गई कमयों को निर्धारित समय में पूरा करवाए और दिए गए सुझावों पर अमल करवाए. अगर सरकार को अपनी ही चाल चलना है तो फिर समितियों का बनाया जाना और उनकी ओर से दी जाने वाली रिपोर्ट बेमानी है और उन पर इतना रुपया और इतनी मेहनत बर्बाद करने का क्या फायदा. किया ही अच्छा होता अगर तमाम राजनीतिक दल एक दूसरे पर कीचड़ उछालने की बजाय मिल जुल कर इस समस्या का हल निकालते ओर उस पर अपनी देख रेख में अमल करवाते.
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اگرماضی کے حملوں سے سبق سیکھا ہوتا

Daily Pratap, Indias Oldest Urdu Daily
Published on 18th July 2011
عفیف احسن
جب بھی ملک میں کہیں بھی کوئی دہشت گردانہ واردات ہوتی ہے تو اس پر پورے ملک میں بہت ہو ہلہ ہوتاہے اور سیاسی جماعتیں مرنے والوں کی چتا کی آگ میں اپنے ہاتھ تاپنے میں لگ جاتی ہیں۔یہی نہیں سیاست داں بھی اس آگ میں ہاتھ تاپنے سے نہیں چوکتے۔ وہ اپنی مخالف پارٹی کے خلاف طرح طرح کے بیانات دینے میں لگ جاتے ہیں۔یہی نہیں وہ اپنے ساتھیوں کے خلاف بھی بیانات دینے سے نہیں چوکتے اور ایک دوسرے کو موردالزام ٹھہرانے، دہشت گردوں کی پشت پناہی کرنے، ایک خاص روش اپنانے ،دہشت گردی کے خلاف کوئی جامع پالیسی وضع نہ کرنے اور ایک دوسرے کو کوسنے کے علاوہ اور کوئی ٹھوس کام نہیں کرتے۔
حکومت سے باہر بیٹھے کچھ سیاست دانوں کی باتوں سے لگتا ہے کہ اگروہ اقتدار میں ہوتے تو دہشت گردی کو چٹکی بجاکرختم کردیتے اور دہشت گردوں کوپکڑنے اور ان کو کیفر کردار تک پہنچانے میں ذرا بھی وقت ضائع نہ کرتے۔غرض یہ کہ ہرسیاست داں ایسی واردات کے بعدخالی شوروشغب برپا کرنے کے علاوہ کو ئی ٹھوس کام نہیں کرتا۔ یہی نہیں ہر حملہ کے بعد دئے جانے والے بیانات اتنے گھسے پٹے ہوتے ہیں کے ایک عام شہری ان پرسرسری نظر ڈالنا بھی گوارا نہیں کرتاہے۔
بہت لے دے کے بعد ایک کمیٹی بنادی جاتی ہے اور یہ کہا جاتا ہے کہ یہ کمیٹی اس بات کی جانچ کرے گی کے کیااس حملہ میں انتظامیہ کی طرف سے کوئی کوتاہی ہوئی ہے اورایسے حملوں کو روکنے کے لئے دیرپااصول مرتب کرے گی اور سیکورٹی کو مضبوط کرنے کے لئے اپنے سجھاؤ دے گی۔
جب 26نومبر2008کو ممبئی پر پاکستانی دہشت گردوں نے حملہ کیا تھاتواس کے بعد ہندوستانی عوام میں بہت زبردست غصہ پھیل گیا تھااس کے بعد مرکزی سرکار نے اور صوبائی سرکار نے دہشت گردوں سے نپٹنے کے لئے کئی اعلانات کئے۔ مہاراشڑسرکار نے ایک سابق گورنر اورسابق یونین ہوم سیکریٹری رام پرھان کی صدارت میں ایک کمیٹی تشکیل دی،جس میں سابق آئی پی ایس آفیسروی بالاچندرن بھی تھے ،جس کا کام یہ تھا کے وہ یہ پتا لگائے کہ پولیس اور انتظامیہ کے ردعمل میں کہاں کوتاہی ہوئی۔
کمیٹی نے دو حصوں میں اپنی رپورٹ پیش کی۔مگر اس رپورٹ کو بہت ہی حساس نوعیت کی بتا کر مہاراشٹر سرکار نے اسے عام کرنے سے انکار کردیا۔مگر اس نے یہ وعدہ کیا کہ اس رپورٹ پر پوری طرح سے عمل کیا جائے گا۔
مگراب پھرہندوستان کے اقتصادی مرکز ممبئی میں بدھ کی شام یکے بعد دیگرے تین بم دھماکے ہوئے جن میں اب تک19 افراد ہلاک ہوچکے ہیں اور 100 سے زیادہ لوگ زخمی ہوئے ہیں۔یہ دھماکے دہشت گرد تھے۔ لیکن انکی ذمہ داری کسی گروپ پر نہیں ڈالی گئی ہے۔ نہ ہی کسی گروپ نے ان دھماکوں کی ذمہ داری قبول کی ہے۔ دو دھماکے جنوبی ممبئی میں معروف اوپرا ہاؤس اور زاویری بازار جب کہ تیسرا اس ساحلی شہر کے وسطی علاقے دادر میں ہوا ہے۔ تینوں مقاما ت کا شمار ممبئی کے گنجان آباد علاقوں میں ہوتا ہے۔
ان دھماکوں کے بعد جب سرکار پر یہ الزام لگا کہ اس نے اس پردھان کمیٹی کی رپورٹ پر ایک چوتھائی بھی عمل نہیں کیا ہے تو اس کے جواب میں سرکار نے بہت زو رشور سے کہا کہ اس پر تین چوتھائی عمل ہوچکا ہے۔ مگر اب رام پردھان نے خود ہی اس بارے میں حکومت کی کاہلی کی قلعی کھول دی ہے۔26/11 کی تحقیقات کے پینل کے سربراہ رام پردھان نے حکومت پر حملہ کرتے ہوئے ایک انٹرویو میں یہ بتایا کہ پچھلے دو برسوں میں حکومت نے ان سے رابتہ قائم کرنے کی ایک بھی کوشش نہیں کی۔انہوں نے 13 جولائی کے دہشت گرد انہ حملوں کے بعد کہا کہ حکومت نے 26/11 کے بعد بنی کمیٹی کی سفارشات کو سنجیدگی سے ایک آنکھ بھی نہیں دیکھا ۔
پردھان نے کہا کہ انہیں رپورٹ پیش کئے ایک سال ہوگیا ہے، لیکن ریاستی حکومت کی طرف سے کوئی بھی شخص ان سے نہیں ملا ہے۔ نہ ہی رپورٹ پر بحث کے لئے او ر نہ ہی انہیں بتانے کہ لئے کہ وہ کس طرح اس رپورٹ میں کی گئی سفارشات کو لاگو کر رہے ہیں۔انہوں نے کہا کہ لوگ جواب کے مستحق ہیں ،اور انہیں احساس ہے کہ وہ لوگ مصروف ہیں، لیکن کیا یہ اہم نہیں ہے۔ پردھان نے مزید کہا کہ محکمہ داخلہ کو کاغذی کارروائی سے آگے کچھ کرنے کی ضرورت ہے،انہیں زیادہ ایکٹ کرنے اور کم بات کرنے کی ضرورت ہے، سیکورٹی اپریٹس کے اوورہال کی ضرورت ہے۔
ایک سوال کے جواب میں،کہ کیا ممبئی پولیس 26/11 سے کوئی سبق سیکھا ہے، پردھان نے کہا کہ’نہیں۔‘
پردھان نے کہا کہ لوگوں کی حفاظت پولیس محکمہ کی بنیادی ذمہ داری ہے،مگر وہ یہ بنیادی فرض انجام دینے کے قابل نہیں ہے کیونکہ اس کو عملہ کی کمی ہے اور زیادہ اور طویل گھنٹے کام کرنا پڑتا ہے۔ اگر محکمہ پولیس کو مضبوط کیا جاتاہے توان تمام چوکوں سے روکا جاسکے گا، لیکن کوئی حقیقت میں پولیس نظام کو مضبوط بنانے کے لئے کام نہیں کرتا۔
رام پردھان نے یہ بھی دعوی کیا ہے کہ انہوں نے حکومت کو خبردار کیا تھاکہ دہشت گردپونے کے کورے گاؤ پارک میں حملہ کر سکتے ہیں۔ یہ وہی علاقہ ہے جہاں فروری 2010 ء جرمن بیکری میں بمباری ہوئی تھی۔
پردھان نے کہا کہ ’اگرچہ 26/11کمیشن کی رپورٹ کی تیاری سے پہلے انہوں نے پونے کا دورہ کیا تھا اور اس رپورٹ میں ان خدشات کا اظہار کیا تھا کہ کورے گاؤں پارک کو دہشت گردوں کی طرف سے ہدف بنایا جاسکتاہے۔انہوں نے حکومت کو بتایا تھا کہ یہ علاقے کمزورہے کیونکہ یہ سیاحوں کا مرکز ہے۔
حالانکہ ریاستی حکومت نے کمیٹی کی رپورٹ خفیہ رکھی ہے مگرپھر بھی یہ انٹرنیٹ پر دستیاب ہے اور اس کا مطالعہ کرنے سے یہ پتا چلتا ہے کہ پولیس انتطامیہ میں کیا کیا خامیاں ہیں۔ اور شاید انہیں خامیوں کا فائدہ اتھاکر 13جولائی کو ممبئی کی کئی اہم جگہوں پر حملے کئے گئے اور پولیس اور ریاستی سرکار ان حملوں کو روکنے کے لئے کچھ بھی نہیں کر سکی۔
ہم کمیٹی تو بنادیتے ہیں مگر اس کی رپورٹ کو دبادیتے ہیں اور عام آدمی تک نہیں پہنچنے دیتے کے کہیں وہ مسلسل اس میں دی گئی کمیوں کو پورا کرنے کااصرار نہ کرتارہے،اورپھر اپنی سہولت اور آسانی کے ساتھ اور آرام آرام سے اس پر عمل کرتے ہیں۔کیا ہی اچھا ہوتا اگرسرکار نے اس کمیٹی کی رپورٹ آنے کے بعد ایک ایسی ہائی پاور کمیٹییک تشکیل دی ہوتی جو پوری طرح سے پردھان کمیٹی رپورٹ پر عمل درآمد کرانے کی ذمہ دار ہوتی اور جس کو اس بات کامکمل اختیار ہوتا کہ وہ رپورٹ میں بتائی گئی کمیوں کو ایک طے شدہ وقت میں پورا کروائے اور دئے گئے سجھاوؤں پر عمل درآمد کروائے۔
اگر حکومت کو اپنی ہی چال چلنا ہے تو پھر کمیٹیوں کا بنا یا جانا اور ان کی طرف سے دی جانے والی رپورٹ بے معنیٰ ہے اور پھر ان پر اتنا روپیہ اور اتنی محنت ضائع کرنے کا کیا فائدہ۔کیا ہی اچھا ہوتا تمام سیاسی پارٹیاں اس مسئلہ کا مل جل کر حل نکالتیں اور اس پراپنی دیکھ ریکھ میں عمل درآمد کرواتیں۔
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Monday, 11 July 2011

سری لنکا میں نسل کشی کی بھیانک داستان


Daily Pratap, Indias Oldest Urdu Daily
Published on 11th July 2011
عفیف احسن
برطانیہ کے ٹیلیویژن چینل 4نے ایک رپورٹ دکھائی ہے جس میں دکھایا گیاہے کہ سری لنکا کی لبریشن ٹائیگرفورتمل ایلم کے ساتھ جنگ میں اس کی فوجوں نے کتنی بھیا نک بربرتا کامظاہرا کیا تھا۔
سری لنکاکے صحافیوں کے ایک ادارے جرنلسٹ فور ڈیموکریسی ان سری لنکا، جس نے ٹیلویژن پر دکھایا گیا یہ مواد حاصل کیا، کا کہنا ہے کہ یہ ویڈیو اس دوران ریکارڈ کی گئی تھیں جب کہ جنوری 2009میں سری لنکائی سرکار نے بین الاقوامی صحافی برادری کو اس جنگ کی کوریج سے باہر رکھا ہوا تھا۔ ایسی ویڈیو کے ہونے کی چہ مہ گوئیاں کافی عرسہ سے ہورہی تھیں مگر انہیں چینل فور نیوز کے دکھائے جانے سے صرف دو روزقبل ہی سری لنکا سے اسمگل کرکے چینل فور کے حوالے کیا گیا تھا۔اس رپورٹ میں دکھایا گیا ہے کہ کیسے بے کس اور معصوم ، نہتے اوربے یارو مددگار،اور زخموں سے چورتمل باشندوں پرسری لنکائی افواج نے انسانیت سوز مظالم ڈھائے اور جنگی جرائم کی مرکوب ہوئی۔
اس ویڈیو میں دکھایا گیا ہے کہ جب سری لنکا نے کلی نوچی پر حملہ کیاتو کیسے اس میں لاکھوں معصوم شہری پھنس گئے اور40000سے زیادہ مارے گئے اور ہزاروں زخمی ہوگئے۔ یہ ایک نابرابری کی جنگ تھی اور اس میں سری لنکا کا پلڑا بھاری تھا کیونکہ اس جنگ میں اس کودنیا کی زیادہ تر ممالک کی حمایت حاصل تھی، چین اور دوسرے ممالک سری لنکا کی بھاری توپ خانہ اوردوسرے جنگی سازوسامان سے مدد کررہے تھے اور اسرائیل کے کیفرایف 21 فائٹر ہوائی جہاز وں کا ایک پورا بیڑاسری لنکا ائر فورس کی مدد کے لئے لگا ہوا تھا۔جس کو رہائشی علاقوں، عارضی اسپتلالوں، اور یہاں تک کے نو فائر زون میں ہوائی بمباری کے لئے استعمال کیا جاتا رہا۔
ایک تمل خاتون وینی کمار جو اپنے عزیزوں سے ملنے لندن سے سری لنکا آئی ہوئی تھی نے اپنے آپ کو چاروں طرف سے جنگ میں گھراہوا پایا۔جنگ کے دوران انہوں نے اپنا کچھ وقت جنگ کی وجہ سے بے گھر اور بے آسرا ہوئے تمل لوگوں کے بیچ گزارا۔ انہوں نے بتایا کہ کس طرح چارو ں طرف بم گر رہے تھے اور چیخ اور پکار مچی ہوئی تھی۔لوگوں کے پاس کوئی راستہ نہیں تھا، کسی کی سمجھ میں یہ نہیں آرہا تھا کہ وہ کہاں جائے سوائے اس کے کہ اسے وہ جگہ خالی کرنی تھی ۔ اس لئے جس کو جدھر سمجھ میں آتا تھا وہ ادھر نکل جاتا تھا۔
کلی نوچی پر قبضہ ہوجانے کے تین ہفتہ بعد سری لنکا سرکار نے ایک کلومیٹر کے رقبہ میں ایک نو فائر زون بنایا۔سری لنکا سرکار کا دعویٰ تھا کہ ایسا انہوں نے زیرو شہری ہلاکت کے مدنظر کیا ہے تاکہ کوئی بھی شہری ہلاک نہ ہوسکے۔سری لنکا سرکار کے اس وعدے کو دیکھتے ہوئے ہزاروں لوگ اس زون میں آنے لگے ،ان میں ڈاکڑ، نرسیں اوردوسرا عملہ بھی تھا اور وہ مریض اور زخمی بھی تھے جن کے اسپتال اس لڑائی میں تباہ ہوچکے تھے۔اس نوفائر زون میں ایک خالی پڑے پرائمری اسکول میں ایک عارضی اسپتال قائم کیا گیا اور اسکی چھت پر ریڈ کراس بنادئے گئے تاکہ یہنشان دہی کی جاسکے کے یہ ایک اسپتال ہے اوراس کو بین الاقوامی قانون کے تحت تحفظ حاصل ہے،جنگ کے دوران کسی بھی اسپتال پر حملہ نہیں کیاجاسکتا تاوقتیکہ اس بات کے پختہ ثبوت ہوں کے اس اسپتال کا استعمال فوجی مقاصد کے لئے کیا جارہا ہے۔کسی بھی صورت میں کوئی ہسپتال ایک فوجی ہدف نہیں ہوسکتا۔مگر سرکاری فوجوں نے اس اسپتال پر بھی حملہ کردیاایک عینی شاہد نے اس حملہ اور اس کے بعد کا بہت ہی بھیانک نظارہ بیان کیا ہے ۔ اس نے بتایاکہ اس حملہ کے بعد چاروں طرف تباہ شدہ عمارتیں تھیں، جہاں تہاں لاشیں بکھری پڑی تھیں، جسمانی ٹکڑے بکھرے پڑے تھے اور چاروں طرف خون ہی خون تھا۔
یو این کی ایک رپورٹ میں یہ بتایا گیا ہے کہ کیسے گورنمنٹ فورسز نے نو فائر زون پر بھاری گولا باری کی ۔ اب تک سیٹیلائیٹ اور ڈرون فوٹیج سے یو این اور دوسری بڑی طاقتوں کو یہ علم ہوچکا تھا کہ نو فائر زون میں کیا مظالم ڈھائے جارہے تھے، جس میں اب تک تین سے چار لاکھ شہری پناہ لئے ہوئے تھے۔کولمبو کے اپنے آفس میں یواین اس سب پر نظر رکھے ہوئے تھاکہ نو فائر زون میں سری لنکا سرکار کے ذریعہ کتنی زبردست بمباری کی جارہی تھی۔اس اپریل میں شائع ایک یواین رپورٹ میں اس بات کا خلاصہ ہوا ہے کہ کس طرح سری لنکا سرکار نو فائر زون پر بھاری گولا باری کررہی تھی۔جبکہ سری لنکا سرکار اس بات پر مصر رہی کہ وہ لوگوں کو بچانے میں لگی ہوئی ہے تاکہ شہریوں کی صفر ہلاکت کو یقینی بنایا جاسکے۔مگر کچھ ہفتوں بعد جب یہ راز کھلا توایک بہت ہی بھیانک سچائی سامنے آئی ۔
خوفزدہ شہریوں کو ایسا لگ رہا تھا کہ حکومت ہلاکت کی تعدا کو بڑھانا چاہتا ہے، کیونکہ جب ایک بار بمباری ہوجاتی تھی تو لوگ زخمیوں کو بچانے کے لئے جمع ہوجاتے تھے اور پہلے حملے کے دس منٹ بعد وہیں پر دوسرا حملہ کردیا جاتا تھا جس سے کے بچاؤ کے لئے جمع لوگ بھی اس کے چپیٹ میں آجائیں۔ جب شہریوں کی سمجھ میں یہ بات آئی تو انہوں نے پہلے حملے کے آدھے گھنٹے بعد بچاؤ کا کام کرنا شروع کیا مگر اس وقت تک زیادہ تر زخمی جان بحق ہوچکے ہوتے تھے اس سے ہلاک ہونے والے شہریوں کو تعداد بہت زیادہ بڑھ گئی۔اور زخمیوں کے رشتے داروں کے پاس اس کے علاوہ اورکوئی چارہ نہیں ہوتا تھا کہ وہ دور بنکروں میں سے اپنے عزیزوں کو تڑپ تڑپ کر جان دیتے ہوئے دیکھتے رہیں اور ان کی مدد نہ کرسکنے پر دل خراش چیخیں نکالتے رہیں اور آہ وزاریاں کرتے رہیں۔
ویڈیو دیکھنے سے پتا چلتا ہے کہ کیسے سری لنکاسرکارخود ہی نو فائرزون بناتی رہی اورخود ہی اس کی خلاف ورزی کرتی رہی اس سے یہ سوال پیدا ہوتا ہے کے کہیں سری لنکا سرکار نوفائر زون صرف اسی لئے تو نہیں بناتی رہی کے تمل باشندوں کو ایک جگہ جمع کرکے آسانی سے ان کا صفایاکرسکے۔
ایک اورویڈیو میں ایک عارضی اسپتال کے ایڈمنسٹریٹر کو حالات کی ستمضریفی پر بولتے دکھایا گیا ہے جوخود چار دن بعداسپتال پر ہوئی فوجی بم باری میں ہلاک ہوگیااور اس کے اہل خاندان اس کی لاش پر رورہے ہیں۔ایک اور واقع میں کئی بچے ہلاک ہوگئے اور کئی دوسرے مارے گئے جب کہ وہ کھانے کی لائن میں لگے ہوئے تھے اور ان پر سرکاری فوج نے بمباری کی۔ایک بچہ کی ایک ٹانگ کاٹنی پڑی اور وہ بھی بغیر کسی لوکل اینستھیسیا کے، کسی نے اس کی ٹانگیں پکڑیں ، کسی نے اس کے ہاتھ اور کسی نے اس کا منہ پکڑا اور پھر پورے ہوش و حواس میں اس کی ٹانگ ڈاکٹرنے دھڑ سے جدا کردی، جبکہ بچہ درد سے چلاتا رہاایسا اسلئے کیاگیا کیونکہ اس میک شفٹ اسپتال میں ضروری دواؤں کا کوئی انتظام نہیں تھااور ایسا نہیں کیاجاتا تو وہ بچہ تڑپ تڑپ کے مر جاتا۔
اس بات کا اندازہ لگانا مشکل ہے کہ اس دوران کتنے معصوم لوگ اپنی جان سے ہاتھ دھو بیٹھے مگرایک اندازے کے مطابق مرنے والوں کی تعدا د 40000 سے، جس کا اندازہ اقوام متحدہ نے لگایا ہے کہیں زیادہ ہوسکتی ہے ۔ ا س سب کے باوجود سری لنکا سرکار اس بات کے بڑے بڑے دعوے کرتے ہوئے نہیں تھکتی تھی کے کیسے عام شہری محفوظ ہیں۔
ایک اور ویڈیو میں سری لنکائی فوجوں کو ننگے اور بندھے ہوئے قیدیوں کو گولیوں سے اڑاتے ہوئے دکھایا گیا ہے۔یہ ویڈیو موبائل فون پر سری لنکائی فوجیوں نے خود ہی ریکارڈ کی ہیں۔ جب پچھلے سال یہ ویڈیو چینل 4نے دکھائیں تھی تو سری لنکا سرکار نے ان کو بوگس بتاتے ہوئے مسترد کردیاتھا، مگر اب جبکہ اقوام متحدہ نے ان کے صحیح ہونے کی تصدیق کردی ہیپھربھی سری لنکا سرکاران کو ماننے کو تیار نہیں ہے۔ اب ایک تازہ ویڈیو چینل 4کو حاصل ہوئی ہے جس میں سری لنکائی فوجیوں کو بندھے ہوئے مبینہ تامل ٹائیگروں کو گولی سے اڑاتے ہوئے دکھایا گیا ہے۔ جنگی قیدیوں کا اس طرح سے قتل بین الاقوامی جنگی قوانین کی کھلی خلاف ورزی ہے۔ایک اور ویڈیو میں ایک مبینہ ٹائیگر کو ناریل کے درخت سے باندھ کر مارتے ہوئے اور پھر دوسری جگہ پر اس کی لاش کو دکھایا گیا ہے۔ یہ ویڈیو بھی سری لنکائی فوجیوں نے ہی بنائے تھے۔ ایک بزرگ خاتون نے بتایا کے کیسے فوجیوں نے انکے اور دوسری لڑکیوں کے کپڑے اتروائے اورنوجوان لڑکیوں کو کچھ دور لے جاکران کے ساتھ زناکیا اور ان کو گولیوں سے اڑا دیا۔
ایک اور ویڈیو میں جو کہ فوجیوں نے خود ہی بنائی تھی ننگی عورتوں کی نعش دکھائی گئی ہیں، دیکھنے سے ایسا محصوص ہوتا ہے کہ ان عورتوں کے ساتھ پہلے زنا کیا گیا ہے یا جنسی بدفعلی کی گئی ہے اور اس کے بعد ان کو گولی ماری گئی ہے۔ان نعشوں میں تامل ٹی وی چینل کی خبریں پیش کرنے والی ایک خاتون اسئی پریا کی عریاں لاش بھی ہے، جس کے ساتھ بھی قتل سے پہلے زنا کیا گیا لگتا ہے۔ایک ویڈیو میں فوجیوں کو ننگی لاشوں کو ہٹاتے ہوئے دکھایا گیا ہے اور ان کو لاش کے ساتھ ویڈیو بنواتے دکھایا گیاہے۔ایک اور ویڈیو مین فوجی ایک ٹریلر میں ننگی لاشوں کو لاد رہے ہیں اور ان میں ایک عورت کے کراہنے کی آواز بھی ہے جو ابھی تک زندہ ہے اور لاشوں کی بے ہرمتی کی جارہی ہے ان کو ٹھوکریں ماری جارہی ہیں۔ان تمام ویڈیو سے منصوبہ بند طریقہ پر قتل، زنا اور جنسی حملوں کا پتا چلتا ہے جو کہ سری لنکائی فوج کے ذریعہ کھلے عام انجام دئے گئے۔انٹرنیشنل ہیومن رائٹ واچ نے چینل 4کے ذریعہ دکھائی گئی ویڈیو کی ایک لمبی فلم دوسرے ذرائع سے حاصل کرلی ہے جس سے پتا چلتا ہے کہ کس طرح بغیر کسی سنوائی کے قیدیوں کو سرکاری فوجیوں نے قتل کردیا۔
چینل 4کی اس رپورٹ نے سری لنکا کی سرکار کی ان گھناؤنی حرکتوں پر سے پردا اٹھا دیا ہے، اور ضرورت اس بات کی ہے کہ سری لنکا سرکار کے خلاف جنگی جرائم کے لئے ایک بین الاقوامی انکو ائری شروع کی جائے اور خاطیوں کوسخت سے سخت سزا دی جائے۔
اس سلسلے میں ہمارے اپنے ملک کی خاموشی اور کوتاہی بہت ہی افسوس ناک ہے اورایک پڑوسی ملک میں ہمارے اپنوں پراتنا ظلم ہوتا رہا اور ہم آنکھ بند کئے بیٹھے رہے، یا صرف زبانی جمع خرچ کرتے رہے۔
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श्रीलंका में नरसंहार की भयानक कहानी


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 11th July 2011
अफ़ीफ़ अहसन
ब्रिटेन के टेलीविजन चैनल 4 ने एक रिपोर्ट दिखाई है जिसमें दिखाया गया है कि श्रीलंका की लिट्टे के साथ युद्ध में उसकी सेनाओं ने कितनी भयानक बरबरता का पर्दशन किया था.
श्रीलंका के पत्रकारों के एक संगठन पत्रकार फोर डेमोक्रेसी इन श्रीलंका, जिसने टीलवीज़न पर दिखायी गयी यह सामग्री हासिल की, का कहना है कि यह वीडियो उस दौरान की हे जब जनवरी 2009 में श्रीलंकाई सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार बिरादरी को युद्ध की कवरेज से बाहर रखा हुआ था. ऐसी वीडियो के होने की सुगबुगाहट हालांकि काफी समय से हो रही थी मगर उन्हें चैनल 4 समाचार पर दिखाए जाने से दो रोज़ पहले ही श्रीलंका से इस्मगल करके चैनल 4 के हवाले किया गया था. इस रिपोर्ट में दिखाया गया है कि कैसे बेकस और मासूम, निहत्थे बे यारो मददगार और घावों से चूर तमिल निवासियों पर श्रीलंकाई सेना ने मानवता के विरूध बर्ताव किया और युद्ध अपराध किए.
इस वीडियो में दिखाया गया है कि जब श्रीलंका ने किलीनोची पर हमला किया तो कैसे इस में लाखों मासूम नागरिक फंस गए और 40000 से अधिक मारे गए और हजारों घायल हो गए. यह एक नाबराबरी की जंग थी और इस में श्रीलंका का पलड़ा भारी था क्योंकि इस युद्ध में श्रीलंका को अधिकांश देशों का समर्थन हासिल था, चीन और अन्य देश श्रीलंका की भारी तोप खाना व अन्य युद्ध उपकरण से सहायता कर रहे थे और इज़राइल के कीफ़र एफ 21 फ़ाइटर विमानों का एक पूरा बेड़ा श्रीलंका एयर फोर्स की मदद के लिए लगा हुआ था. जिसको आवासीय क्षेत्रों, अस्थायी अस्पतालों, और यहाँ तक के नौ फायर क्षेत्र में हवाई बमबारी के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा.
एक तमिल महिला वेणी कुमार जो अपने परिजनों से मिलने लंदन से श्रीलंका आई थी अपने आप को चारों ओर से युद्ध में ‍घिरा हुवा पाया. युद्ध के दौरान उन्होंने अपना कुछ समय युद्ध की वजह से बेघर और बेआसरा हुए तमिल लोगों के बीच गुज़ारा. उन्होंने बताया कि किस तरह चारों ओर बम गिर रहे थे और चीख पुकार मची हुई थी. लोगों के पास कोई रास्ता नहीं था, किसी की समझ में यह नहीं आ रहा था कि वह कहां जाए सिवाय इसके कि उसे जगह खाली करनी थी. इसलिए जिसे जिधर समझ में आता था वह उधर निकल जाता था.
किलीनोची पर कब्जा हो जाने के तीन सप्ताह बाद श्रीलंका सरकार ने एक किलोमीटर क्षेत्रफल में नो-फायर क्षेत्र बनाया. श्रीलंका सरकार का दावा था कि ऐसा उन्होंने जीरो नागरिक मौत के मद्देनज़र किया है ताकि कोई भी नागरिक मारा न जा सके. श्रीलंका सरकार के वादे को देखते हुए हजारों लोग इस क्षेत्र में आने लगे, उनमें डॉकटर, नर्स भी थे और वह रोगी और घायल भी थे जिनके अस्पताल इस लड़ाई में तबाह हो चुके थे. इस नो-फ़ाइर क्षेत्र में एक खाली पड़े प्राथमिक स्कूल में एक अस्थायी अस्पताल की स्थापना की गई और उसकी छत पर रेडक्रॉस बना ‍दिये गए ताकि यह निशानदेही की जा सके की यह एक अस्पताल है और इसको अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत संरक्षण प्राप्त है, युद्ध के दौरान किसी भी अस्पताल पर हमला नहीं किया जा सकता जब तक की इस बात का पुख़्ता सबूत हो की इस अस्पताल का सैन्य उद्देश्यों के लिए उप्योग किया जा रहा है. किसी भी सूरत में कोई अस्पताल सेना लक्ष्य नहीं हो सकता. लेकिन सरकारी सेनाओं ने अस्पताल पर हमला कर दिया एक प्रत्यक्शदर्शी ने इस हमले और उसके बाद का बहुत ही भयानक दृश्य ब्यान किया है. उसने बताया कि इस हमले के बाद चारों ओर तबाह हुई इमारतें थीं, जहाँ तहाँ लाशें बिखरी पड़ी थीं, शरीर के टुकड़े बिखरे पड़े थे और चारों ओर खून ही खून था.
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में यह बताया गया है कि कैसे श्रीलंका सरकारी बलों ने नौ फायर क्षेत्र पर भारी गोला बारी की. सेटेलाईट और ड्रोन फुटेज से संयुक्त राष्ट्र और दूसरी बड़ी शक्तियों को यह ज्ञान हो चुका था कि नौ फायर क्षेत्र में आघात किए जा रहे थे, जिसमें अब तक तीन से चार लाख नागरिक शरण लिए हुए थे. कोलंबो के अपने ऑफिस में संयुक्त राष्ट्र इस सब पर नजर रखे हुए था कि नो-फायर क्षेत्र में श्रीलंका सरकार द्वारा कितनी जबरदस्त बमबारी की जा रही थी. अप्रैल में प्रकाशित एक संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि किस तरह श्रीलंका सरकार नौ फायर क्षेत्र पर भारी गोला बारी कर रही थी. जबकि श्रीलंका सरकार यह कह रही थी कि वह लोगों को बचाने में लगी हुई है ताकि नागरिकों की शून्य मौत को सुनिश्चित कर सके. मगर कुछ सप्ताह बाद जब यह राज़ खुला तो एक बहुत ही भयानक सच्चाई सामने आई.
भयभीत नागरिकों को ऐसा लग रहा था कि सरकार मौत की संख्या को बढ़ाना चाहता है, क्योंकि जब एक बार बमबारी हो जाती थी तो लोग घायलों को बचाने के लिए जमा हो जाते थे और पहले हमले के दस मिनट बाद वहीं पर दूसरा हमला कर दिया जाता था जिससे के बचाव के लिए जमा लोग भी इसके चपेट में आजाते थे. जब नागरिकों की समझ में यह बात आई तो उन्होंने पहले हमले के आधे घंटे बाद बचाव का काम करना शुरू किया लेकिन तब तक अधिकतर घायल जान से गंवा चुके होते थे उससे मारे गए नागरिकों की संख़्या बहुत अधिक बढ़ गई. और घायलों के रिश्तेदारों के पास इसके अलावा और कोई चारा नहीं होता था कि वह दूर बुनकरों से अपने परिजनों को तड़प तड़प कर जान देते हुए देखते रहते और उनकी मदद न कर सकने पर दिल खराश चीखें निकालते रहें और आह व ज़ारयाँ करते रहें.
वीडियो देखने से पता चलता है कि कैसे श्रीलंका सरकार खुद ही नो-फ़ाइर ज़ोन बनाती रही और खुद ही उसका उल्लंघन भी करती रही इससे यह सवाल पैदा होता है के कहीं श्रीलंका सरकार कहीं नो-फ़ाइर क्षेत्र केवल इसलिए नहीं बनाती रही के तमिल लोगों को एक जगह जमा करके आसानी से उनका सफ़ाया कर सके.
एक और वीडियु में एक अस्थायी अस्पताल के व्यवस्थापक को हालात की भयावत्ता पर बोलते दिखाया गया है जो खुद चार दिन बाद अस्पताल पर हुई सैनिक बमबारी में मारा गया और उसके परिवार वाले उसकी लाश पर रोरहे हैं. एक जगह कई बच्चे मारे गए और कई अन्य घायल हो गए जबकि वह खाने की लाइन में लगे हुए थे और उन पर सरकारी सेना ने बमबारी की. एक बच्चे की एक टांग काटनी पड़ी और वह भी बिना किसी लोकस एनसथीसया के, किसी ने उसकी टाँगें पकड़ें, किसी ने उसके हाथ और किसी ने उसका मुँह पकड़ा और फिर पूरे होश में उसकी टांग डॉक्टर ने धड़ से अलग कर दी, जबकि बच्चा दर्द से चिल्लाता रहा ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि मैकशिफ़्ट अस्पताल में आवश्यक दवाओं की कोई व्यवस्था नहीं था और ऐसा नहीं किया जाता तो वह बच्चा तड़प तड़प के मर जाता.
इस बात का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि इस दौरान कितने मासूम लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे मगर एक अनुमान के अनुसार मरने वालों की संख्या 40000 से, जिसका अनुमान संयुक्त राष्ट्र ने लगाया है, कहीं अधिक हो सकती है. इस सबके बावजूद श्रीलंका सरकार इस बात के बड़े बड़े दावे करते हुए नहीं थकता थी के कैसे नागरिक सुरक्षित हैं.
एक और वीडियो में श्रीलंकाई सेनाओं को नंगे बंधे हुए कैदियों को गोलियों से उड़ाते हुए दिखाया गया है. यह वीडियो मोबाइल फ़ोन पर श्रीलंकाई सैनिकों ने खुद ही रिकॉर्ड की हैं. जब पिछले साल यह वीडियो चैनल 4 ने दिखाइ थीं तो श्रीलंका सरकार ने इन को बोगस बताते हुए खारिज कर दिया था, मगर अब जब संयुक्त राष्ट्र ने उनके सही होने की पुष्टि कर दी हे तब भी श्रीलंका सरकार इन को मानने को तैयार नहीं है. एक ताजा वीडियो चैनल 4 को मिली है जिसमें श्रीलंकाई सैनिकों को बंधे हुए कथित तमिल टाईगरों को गोली से उड़ाते हुए दिखाया गया है. युद्ध कैदियों की इस तरह से हत्या अंतर्राष्ट्रीय युद्ध नियमों का खुली उल्लंघन है. एक और वीडियो में एक संदिग्ध टाइगर को नारियल के पेड़ से बांधकर मारते हुए और फिर दूसरी जगह पर उसकी लाश को दिखाया गया है. यह वीडियो भी श्रीलंकाई सैनिकों ने ही बनाए थे. एक बुजुर्ग महिला ने बताया के कैसे सैनिकों ने उनके और अन्य लड़कियों के कपड़े उतरवाये और नोजवान लड़कियों को कुछ दूर ले जाकर उनके साथ दुर्वयवहार और बलात्कार किया और उन्हें गोलियों से उड़ा दिया.
एक और वीडियो में जो सैनिकों ने खुद ही बनाई थी नंगी महिलाओं की लाशें दिखाई गई हैं, देखने से ऐसा महसूस होता है कि इन महिलाओं के साथ पहले बलात्कार किया गया है या यौन शोशण किया गया है और उसके बाद उन्हें गोली मारी है. इन लाशों में तमिल टीवी चैनल पर समाचार पेश करने वाली एक महिला इसई प्रिया की नग्न लाश भी है, जिसके साथ भी हत्या से पहले बलात्कार किया गया लगता है. एक वीडियो में सैनिकों को नंगी लाशों को हटाते हुए दिखाया गया और उन्हें लाश के साथ वीडियो बनवाते दिखाया गया है. एक और वीडियो में सैनिक एक ट्रेलर में नंगे शव लाद रहे हैं और एक महिला के कराहने की आवाज भी है जो अभी तक जीवित है और लाशें की बेहुरमती की जा रही है उनको ठोकरें मारी जा रही हैं. उन सभी वीडियो से सुनियोजित ढंग से हत्या, बलात्कार और यौन शोशण का पता चलता है जो श्रीलंकाई सेना द्वारा खुलेआम अंजाम दिए गए. इंटरनेशनल ह्यूमन राइट वाच ने चैनल 4 द्वारा दिखाई गई वीडियो की एक लंबी फिल्म अन्य स्रोतों से प्राप्त कर ली है जिससे पता चलता है कि किस तरह बिना किसी सुनवाई के कैदियों की सरकारी सैनिकों ने हत्या कर दी.
चैनल 4 की इस रिपोर्ट ने श्रीलंका की सरकार की इन घिनोनी हरकतों पर से पर्दा उठा दिया है और आवश्यकता इस बात की है कि श्रीलंका सरकार के खिलाफ युद्ध अपराध के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय जांच शुरू की जाए और खातियों को सखत से सख्त सजा दी जाए.
इस संबंध में हमारे अपने देश की चुप्पी और कोताही बहुत अफ़सोसनाक है और एक पड़ोसी देश में हमारे अपनों पर इतना अत्याचार होता रहा और हम आंख बंद किए बैठे रहे, या सिर्फ ज़बानी जमा खर्च ही करते रहे.
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Monday, 4 July 2011

ऊँट के मुँह में ज़ीरा


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 4th July 2011
अफ़ीफ़ अहसन
पिछले गुरुवार को प्रवर्तन निदेशाल्य (ईडी) ने हसन अली और काशी नाथ तापोरिया की संपत्ति जब्त करने की कार्रवाई शुरू कर दी जिसका मूल्य लगभग 50 करोड़ रुपये बताया गया है. ईडी द्वारा इसे एक बड़ी सफलता बताया जा रहा है. हैरानी की बात यह है कि एक ऐसे मामले में जिसमें आयकर विभाग ने कर की 50,000 करोड़ रुपये की डिमांड निकाल रखी हो और अगर इसमें ब्याज की राशि को शामिल किया जाए तो यह रकम बढ़ कर अब तक 80,000 करोड़ रुपये होगई होगी, याद रहे कि सरकार ने पिछले साल राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में यह माना था कि हसन अली पर बकाया कर की राशि ब्याज सहित 70 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा हो गई है जिसके बदले केवल 50 करोड़ की मूल्य की संपत्ति ही जब्त की गई है वह भी इतने वर्षों के बाद.
ईडी हसन अली खान व तारापोरिया के खिलाफ कथित कर चोरी और मनी लांड‍रिंग के मामले की जांच कर रही है. और उसने प्रीवेन्शन ऑफ मनी लांड‍रिंग एक्ट के तहत गुरुवार को एक आदेश जारी कर इन दोनों की संपत्ति की कुरकी की कार्रवाई शुरू कर दी. ईडी अधिकारियों ने खान की पुणे और मुंबई की जाईदादें जब्त की हैं और तापोरिया की दिल्ली की संपत्ति कुरक की है. इसमें खान का दस हजार वर्ग फुट का पुणे का बांग्ला और मुंबई के पेड्रो रोड का आलीशान बंगला और महंगी कारों का एक पूरा बेड़ा और तापोरिया की दिल्ली के पाश इलाके पृथ्वीराज रोड स्थित संपत्ति हैं. हालांकि ईडी ने दावा किया है कि निकट भविष्य में इन दोनों की ओर जायदादों की कुरकी की प्रक्रिया भी की जाएगी.
हसन अली की शुरुआत बहुत ही मामूली थी. उसने 1970 में ऐंटीक का काम बंद करके कार रेन्टल सेवा शुरू की और फिर 1988 में वह यह काम छोड़ कर दुबई चला गया और वहां उसने कबाड़ (मेटल स्क्रैप) का कारोबार शुरू किया. 1990 से 93 तक उसके खिलाफ धोखाधड़ी के 6 मामले दर्ज हुए जिसके बाद इसका नाम ‘चोर हसन’ पड़ गया. 1993 में उसने मुंबई के रेस कोर्स में रेस में पैसा लगाना शुरू किया. 1995 तक उसने घुड़दोड़ का अपना व्यवसाय चेन्नई, पुणे, दिल्ली और बेंगलूरु तक फेला लिया. पता नही ऐसा क्या हुआ कि घोड़ों के इस सौदागर का धन 6 वर्षों में सौ गुना बढ़ गया. केग ने संसद में अपनी रिपोर्ट में बताया था कि हसन अली खान की आय 2001-02 में 528.9 लाख थी जो महज 6 सालों में सौ गुना से भी ज़यादा यानी 54,268.60 करोड़ रुपये तक पहुंच गई. हजारों करोड़ कमाने के बावजूद उसने न तो कोई रिटर्न फ़ाइल की और न ही कोई कर ही अदा किया.
खुफिया एजेंसियां ​​हसन अली पर काफी समय से नज़र रखे होवे थीं. इसी बीच खुफिया एजेंसियों ने एक टेलीफोन बातचीत टेप की जिसमें हसन अली यूनियन बैंक ऑफ स्विट्जरलैंड के अपने पोर्टफोलियो प्रबंधक से बात कर रहा था. इस पोर्टफोलियो प्रबंधक से जितनी बड़ी राशि हस्तांतरण की बात सुनी गई, उससे टेलीफोन सुनने वाले चकरा गए. ‍फिर इस टेलीफोन बातचीत को खुफिया एजेंसियों की निगरानी एजेंसी को सौंपा गया. अधिकारियों की समझ में नहीं आ रहा था कि हसन अली पर कैसे हाथ डाला जाए? तब जाकर यह काम आयकर विभाग को सौंपा गया और यह फैसला किया गया कि आयकर विभाग हसन अली के घर छापा मारे. आयकर अधिकारी जब हसन अली के घर पर छापा मारने पहुंचे तो उसके मकान में 8.04 अरब डॉलर (लगभग 38 हजार करोड़ रुपये) यूनियन बैंक ऑफ स्विट्जरलैंड (यूबीएस बैंक) में जमा होने की दस्तावेज मिले. आयकर विभाग ने उनके यहां से भारी मात्रा में नकदी और करोड़ों रुपये के गहने आदी भी बरामद किए. हसन अली खान के लेनदेन में भारतीय बैंकिंग कानून का गंभीर उल्लंघन पाया गया. आयकर विभाग के छापे के बाद पहली बार हसन अली का नाम सुर्खियों में आया.
आयकर कानून कुछ ऐसा है कि छापे के दौरान आयकर विभाग जब कोई काग़ज़ात जब्त करता है तो वह तब तक फ़ाइल बंद नहीं कर सकता जब तक कि संबंधित व्यक्ति खुद यह साबित न कर दे कि उसके यहां से मिले कागज एकदम बेमानी हैं. यदि संबंधित व्यक्ति यह साबित नहीं कर सकता है तो उसके खिलाफ आयकर विभाग कार्रवाई करने का हकदार है. आयकर विभाग ने हसन अली पर आरोप लगाया कि हसन अली विदेशी बैंकों में काला धन जमा करने वाले भारतीयों के लिए एजेंट के रूप में काम करता है. इसके बदले वह ऐसे लोगों से कमीशन प्राप्त करता था.
हसन पर यह आरोप है कि उसने अदनान खशोगी की अवैध राशि के निवेश में मदद की और बड़े पैमाने पर उसके पैसे भारत में निवेश किये. खुफिया एजेंसियों को यह शक भी है कि खान के संबंध दाऊद से भी हैं. सरकारी एजेंसियों के अनुसार हसन के व्यवसायिक कामकाज से यह पता चलता है कि उसका इरादा काली कमाई को विदेश में जमा करने का था. आतंकवादी गतिविधियों और अवैध राशि के बीच किसी संबंध की गहरी जांच की बात भी ईडी ने की थी. ईडी यह भी जांच कर रहा है कि क्या हसन ने अरबों डॉलर का काला धन पार्टसपेटरी नोट द्वारा भारत के शेयर बाज़ारों में लगाया है. और अगर हां, तो वह राशि कितनी है? इतना सब कुछ होने के बावजूद हसन अली स्वतंत्र घूमता रहा और अपने खिलाफ सबूतों को मिटाता रहा.
हसन अली पर बरसों से नज़र रख रही कई सरकारी एजेंसियां ​​यदि उसे गिरफ्तार न कर सकीं तो यह सिर्फ उनकी विफलता नहीं है. इसके पीछे की वजह कुछ और है. हसन को कई बड़े राजनेताओं की शरण मिली हुई थी. एक वीडियो रिकॉर्डिंग जिसको गुप्त रूप से करने और प्रेस को लीक करने का आरोप एक आईपीएस अधिकारी अशोक देशभर पर लगाया जा रहा है में यह रिकॉर्ड है कि जब पुलिस वाले हसन से उसके स्विस बैंक में जमा रुपये के बारे में पूछताछ कर रहे थे तो वह उनसे कहता है कि तुम लोग पासपोर्ट के बारे में पूछो, यूसुफ लकड़ावाला की दो राजनेताओं से बात चल रही है, स्विस बैंक का मामला सेटल हो जाएगा.
केंद्रीय जांच एजेंसियों ने उस पर तभी हाथ डाला जब सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा कि हथियार व्यापार और आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त लोगों से संपर्क रखने के आरोप में हसन अली के खिलाफ पोटा सहित अन्य कड़े क़ानून के तहत मुकदमा क्यों नहीं दर्ज किया गया?
ईडी के सूत्रों ने यह बात लीक की थी कि हसन अली ने जांच के दौरान कई पूर्व मंत्रियों उच्च, बड़े नौकरशाहों और उद्योगपतियों का नाम लिया था जिन के लिए उसने काली कमाई को सफेद किया था. मगर जो चार्जशीट उसने फाइल की है उसमें किसी भी राजनेता, अफसर या बड़े उद्योगपति का नाम नहीं है. और चार्जशीट में जो राशि बताई गई है वह भी कुछ सौ करोड़ रुपये है. जबकि अभी तक उसे बहुत बड़ा मामला बताया जा रहा था. मूल अपराध के बजाय इस चार्जशीट में यह बताया गया है कि टैक्स चोर ने किस तरह निज़ाम के आभूषण को अवैध रूप से बेचने में मदद की.
यह तो होना ही था क्योंकि ईडी के लोग सरकार के मातहत काम करते हैं और उनसे यह अपेक्षा नहीं की जा सकती की वह खुलकर राजनीतिज्ञों के नाम लें. हसन अली के मामले में केवल दो कुछ गैर महत्वपूर्ण राजनीतिज्ञों से पूछताछ की गई है उनमें से एक हैं बिहार कांग्रेस के अमलैंदू पांडे और दोसरे पूडोचेरी के गवर्नर इकबाल सिंह, मगर इन दोनों का नाम भी चार्जशीट से नदारद है.
इन हालात में ऐसा महसूस होता है कि इतने बड़े मामले में अब केवल पचास करोड़ की संपत्ति का ज़ब्त किया जाना भी एक खाना पूरी से अधिक कुछ नहीं है और ऐसा केवल सुप्रीम कोर्ट को खुश करने के लिए किया जा रहा है.
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اونٹ کے منہ میں زیرا


Daily Pratap, Indias Oldest Urdu Daily
Published on 4th July 2011
عفیف احسن
 گزشتہ جمعرات کو انفورسمینٹ ڈائرکٹوریٹ(ای ڈی) نے حسن علی اور کاشی ناتھ تاپوریاکی جائیداد ضبط کرنے کی کارروائی شروع کردی جس کی مالیت تقریباً 50کروڑ روپئے بتائی گئی ہے۔ای ڈی کے ذریعہ اس کو ایک بڑی کامیابی بتایا جارہا ہے۔حیرانی کی بات یہ ہے کہ ایک ایسے معاملے میں جس میں انکم ٹیکس محکمہ نے ٹیکس کی 50,000کروڑ روپئے کی ڈیمانڈ نکال رکھی ہواور اگر اس میں صود کی رقم کو شامل کرلیا جائے تو یہ رقم بڑھ کراب تک 80,000کروڑ روپئیہوگئی ہو گی، یاد رہے کہ حکومت نے گزشتہ سال راجیہ سبھا میں ایک سوال کے جواب میں یہ مانا تھا کہ حسن علی پر واجب الادا ٹیکس کی رقم سود سمیت 70 ہزار کروڑ روپے سے بھی زیادہ ہو گئی ہے جس کے عوض صرف 50کروڑ کی مالیت کی جائداد ہی ضبط کی گئی ہے وہ بھی اتنے برسوں کے بعد۔
ای ڈی حسن علی خان اورتاپوریا کے خلاف مبینہ ٹیکس چوری اور منی لانڈرنگ کے معاملے کی جانچ کررہی ہے۔اوراس نے پریوینشن آف منی لانڈرنگ ایکٹ کے تحت جمعرات کو ایک حکم نامہ جاری کرکے ان دونوں کی جائداد کی قرقی کی کارروائی کو شروع کردیا۔ ای ڈی افسران نے خان کی پونہ اور ممبئی کی جائدادیں ضبط کی ہیں اور تاپوریا کی دہلی کی جائداد قرق کی ہیں۔ اس میں خان کا دس ہزار مربع فٹ کا پونہ کا بنگلہ اور ممبئی کے پیڈر روڈ کا عالیشان بنگلہ اورمہنگی کاروں کا ایک پورا بیڑا اور تاپوریا کی دہلی کے پاش علاقہ پرتھوی راج روڈ پر واقع جائداد شامل ہیں۔حالانکہ ای ڈی نے یہ دعویٰ کیا ہے کہ مستقبل قریب میں ان دونوں کی اور جائدادوں کی قرقی بھی عمل میں آئے گی ۔
حسن علی کی شروعات بہت ہی معمولی تھی۔ اس نے 1970 میں اینٹیک کا کام بند کرکے کار رینٹل سروس شروع کی اور پھر 1988 میں وہ یہ کام چھوڑ کر دبئی چلاگیا اور وہاں اس نے کباڑ(میٹل اسکریپ)کا کاروبار شروع کیا۔1990 سے 93 تک اس کے خلاف دھوکہ دہی کے 6 معاملے درج ہوئے جس کے بعد اس کا نام ’چور حسن‘ پڑ گیا۔1993میں اس نے ممبئی کے ریس کورس میں ریس میں پیسہ لگانا شروع کیا۔1995 تک اس نے گھڑدوڑ کا اپنا کاروبار چنئی ، پونہ ، دہلی اور بنگلور تک بڑھا لیا۔پتا نہی ایسا کیا ہوا کہ اس گھوڑوں کے سوداگر کی دولت 6 برسوں میں سو گنا بڑھ گئی ۔کیگ نے پارلیمنٹ میں اپنی رپورٹ میں بتایا تھا کہ حسن علی خان کی آمدنی 2001-02 میں 528.9 ملین تھی جو محض 6 سالوں میں سو گنا سے بھی زیادہیعنی 54268.6 کروڑ روپے تک پہنچ گئی۔ ہزاروں کروڑ کمانے کے باوجود اس نے نہ تو کوئی ریٹرن فائل کی اور نہ ہی کوئی ٹیکس ہی ادا کیاہے۔
خفیہ ایجنسیاں حسن علی پر ایک عرصے سے نظر رکھے ہوئیتھیں۔ اسی دوران خفیہ ایجنسیوں نے ایک ٹیلی فون بات چیت ٹیپ کی جس میں حسن علی یونین بینک آف سوئٹزرلینڈ کے اپنے پورٹ فولیو منیجر سے بات کر رہا تھا۔ اس پورٹ فولیو منیجر سے جتنی بڑی رقم کی منتقلی کی بات سنی گئی، اس سے ٹیلی فون سننے والے چکرا گئے۔ پھراس ٹیلی فون بات چیت کو خفیہ ایجنسیوں کی مانیٹرنگ ایجنسی کو سونپ دیا گیا۔ افسران کی سمجھ میں نہیں آ رہا تھا کہ حسن علی پر کیسے ہاتھ ڈالاجائے؟ تب جاکے یہ کام محکمہ انکم ٹیکس کو سونپا گیااور یہ فیصلہ کیا گیا کہ محکمہ انکم ٹیکس حسن علی کے گھر چھاپا مارے۔ انکم ٹیکس افسران جب حسن علی کے گھر پر چھاپہ مارنے پہنچے تو اس کے مکان میں 8.04 بلین ڈالر (تقریبا 38 ہزار کروڑ روپے) یونین بینک آف سوئٹزرلینڈ (یوبی ایس بینک) میں جمع ہونے کی دستاویزات ملے۔ محکمہ انکم ٹیکس نے ان کے یہاں سے بھاری مقدار میں نقدی اور کروڑوں روپے کے زیور ات بھی برآمد کئے ۔ حسن علی خان کے لین دین میں بھارتی بینکنگ قانون کی شدید خلاف ورزی پائی گئی ۔ محکمہ انکم ٹیکس کے اس چھاپے کے بعد پہلی بار حسن علی کا نام شہ سرخیوں میں آیا۔
انکم ٹیکسقانوں کچھ ایسا ہے کہ چھاپے کے دوران محکمہ انکم ٹیکس جب کوئی کاغذات ضبط کرتا ہے تو وہ اس وقت تک فائل بند نہیں کر سکتا جب تک کہ متعلقہ شخص خود یہ ثابت نہ کر دے کہ اس کے یہاں سے ملے کاغذ ات بے معنیٰ ہیں۔ اگر متعلقہ شخص یہ ثابت نہیں کرسکتا ہے تو اس کے خلاف محکمہ انکم ٹیکس کارروائی کرنے کامجاز ہوتا ہے۔محکمہ انکم ٹیکس نے حسن علی پر الزام لگایا کہ حسن علی غیر ملکی بینکوں میں کالا روپیہ جمع کرنے والے ہندوستانیوں کے لئے ایجنٹ کے طور پر کام کرتا ہے۔ اس کے بدلے وہ ایسے لوگوں سے کمیشن وصول کرتا تھا۔
حسن پریہ الزام بھی ہے کہ اس نے عدنان خشوگی کی غیر قانونی رقم کی سرمایہ کاری میں مدد کی اور بڑے پیمانے پر اس کے رقم کی ہندوستان میں سرمایہ کاری کی۔ خفیہ ایجنسیوں کو یہ شک بھی ہے کہ خان کے تعلقات داؤد سے بھی ہیں۔سرکاری ایجنسیوں کے مطابق حسن کے کاروباری کام کاج سے یہ پتا چلتا ہے کہ اس کا ارادہ کالی کمائی کو بیرونی ممالک میں جمع کرنے کاتھا۔ دہشت گرد سرگرمیوں اور اس غیر قانونی رقم کے درمیان کسی تعلق کی گہری جانچ کی بات بھی ای ڈی نے کی تھی۔ای ڈی اس بات کی بھی تحقیقات کر رہا ہے کہ کیا حسن نے اربوں ڈالر کا کالادھن پارٹسپیٹری نوٹ کے ذریعے ہندوستان کے حصص بازاروں میں لگایا ہے۔ اور اگر ہاں ، تو وہ رقم کتنی ہے؟اتنا سب کچھ ہونے کے باوجود حسن علی آزاد گھومتا رہا اور اپنے خلاف ثبوتوں کو مٹا تا رہا۔
حسن علی پربرسوں سے نظر رکھ رہی کئی سرکاری ایجنسیاں اگر اسے گرفتار نہ کر سکیں تو یہ صرف ان کی ناکامی نہیں ہے۔ اس کے پیچھے کی وجہ کچھ اور ہے۔ حسن کو کئی بڑے قائدین کی پناہ ملی ہوئی تھی۔ ایک ویڈیو ریکارڈنگ جسکو خفیہ طور پر کرنے اور پریس کو لیک کرنے کاالزام ایک آئی پی ایس آفیسر اشوک دیشبھرپر لگایا جارہا ہے جس میں یہ ریکارڈ ہے کہ جب پولیس والے حسن سے اس کے سوئس بینک میں جمع روپے کے بارے میں پوچھ گچھ کر رہے تھے تو وہ ان سے کہتاہے کہ تم لوگ پاسپورٹ کے بارے میں پوچھو، یوسف لکڑوالا کی دو قائدین سے بات چل رہی ہے ، سوئس بینک کا معاملہ سیٹل ہو جائے گا۔
مرکزی تفتیشی ایجنسیوں نے بھی اس پر تبھی ہاتھ ڈالاجب سپریم کورٹ نے کڑا رخ اپنایا۔سپریم کورٹ نے حکومت سے پوچھا کہ ہتھیار کاروباری اور دہشت گردانہ سرگرمیوں میں ملوث لوگوں سے رابطہ رکھنے کے الزام میں حسن علی کے خلاف پوٹا سمیت دیگر سخت قوانین کے تحت مقدمہ کیوں نہیں درج کیاگیا؟
ای ڈی کے ذرائع نے یہ بات لیک کی تھی کہ حسن علی نے تفتیش کے دوران کئی سابقہ وزراء اعلیٰ ،بڑے نوکر شاہوں اور صنعت کاروں کا نام لیا تھاجن کے لئے اس نے کالی کمائی کو سفید کیا تھا۔مگر جو چارج شیٹ اس نے فائل کی ہے اس میں کسی بھی سیاست داں ، افسر یا بڑے صنعت کار کا نام نہیں ہے۔ اور اس چارج شیٹ میں جو رقم بتائی گئی ہے وہ بھی کچھ سو کروڑ روپئے ہے۔جبکہ ابھی تک اسے کو بہت بڑا اسکیم بتایا جارہا تھا۔اصل جرم کے بجائے اس چارج شیٹ میں یہ بتایا گیا ہے کہ اس ٹیکس چور نے کس طرح نظام کے جواہرات کو غیر قانونی طور پر بیچنے میں مدد کی۔
یہ تو ہونا ہی تھا کیونکہ ای ڈی کے لوگ سرکار کے ماتحت کام کرتے ہیں اور ان سے یہ توقع نہیں کی جاسکتی کی وہ کھل کر سیاست دانوں کے نام لیں ۔حسن علی کے کیس میں صرف دوقدر غیر اہم سیاست دانوں سے پوچھ تاچھ کی گئی ہے ان میں سے ایک ہیں بہار کانگریس کے املیندو پانڈے اور دوسے پڈوچیری کے گورنر اقبال سنگھ، مگر ان دونوں کا نام بھی چارج شیٹ ندارد ہے۔
ان حالات میں ایسا محصوص ہوتا ہے کہ اتنے بڑے معاملے میں اب صرف پچاس کروڑ کی جائداد کا ضبط کیا جانا بھی ایک خانہ پُری سے زیادہ کچھ نہیں ہے اور ایسا صرف سپریم کورٹ کوخوش کرنے کے لئے کیا جارہا ہے۔
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