जब भी देश में कहीं भी कोई आतंकवादी घटना होती है तो उस पर पूरे देश में बहुत हो हल्ला मचता हे और राजनीतिक दल मरने वालों की चिता की आग में अपने हाथ तापने में लग जाते हैं. यही नहीं राजनेता भी आग में हाथ तापने से नहीं चूकते. वह अपनी विरोधी पार्टी के खिलाफ तरह तरह के बयान देने में लग जाते हैं. यही नहीं वह अपने साथियों के खिलाफ भी बयान देने से नहीं चूकते और एक दूसरे पर इलज़ाम लगाने, आतंकवादियों की पीछे से शरण देने, एक विशेष रविश अपनाने, आतंकवाद के खिलाफ कोई व्यापक नीति तैयार न करने और एक दूसरे को कोसने के अलावा ओर कोई ठोस काम नहीं करते.
सरकार से बाहर बैठे कुछ राजनीतिज्ञों की बातों से लगता है कि अगर वह सत्ता में होते तो आतंकवाद को चुटकी बजाकर खतम कर देते और आतंकवादियों को पकड़ने और उन्हें सज़ा दिलाने में जरा भी समय बर्बाद नहीं करते. गर्ज़ यह कि हर राजनीतिज्ञ ऐसी घटना के बाद खाली शोर-शराबा बरपा करने के अलावा ओर कोई ठोस काम नहीं करता. यही नहीं हर हमले के बाद दिए जाने वाले बयान इतने घिसे पिटे होते हैं की कोइ नागरिक इन पर सरसरी नज़र डालना भी गवारा नहीं करता.
बहुत ले-दे के बाद एक समिति बना दी जाती है और यह कहा जाता है कि यह समिति इस बात की जांच करेगी के कया इस हमले में प्रशासन द्वारा कोई कोताही हुई है ओर ऐसे हमलों को रोकने के लिए देरपा उसूल बनाएगी और सुरक्षा को मजबूत करने के लिए अपने सुझाउ देगी.
जब 26 नवंबर 2008 को मुंबई पर पाकिस्तानी आतंकवादियों ने हमला किया था तब उस के बाद भारतीय जनता में बहुत जबर्दस्त गुस्सा रोष फैल गया था उस के बाद केंद्र सरकार ने और राजय सरकार ने आतंकवादियों से निपटने के लिए कई घोषणाऐं की. महाराष्ट्र सरकार ने एक पूर्व गवर्नर और पुर्व यूनियन होम सचिव राम प्रधान की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया, जिसमें पूर्व आईपीएस अधिकारी वी बालाचन्दरन भी थे, जिसका काम था की वह यह पता लगाए कि पुलिस और प्रशासन की प्रतिक्रिया में कहां कोताही हुई.
समिति ने दो हिस्सों में अपनी रिपोर्ट पेश की. मगर इस रिपोर्ट को बहुत ही संवेदनशील बताकर महाराष्ट्र सरकार ने उसे सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया. पर उसने यह वादा किया कि इस रिपोर्ट पर पूरी तरह से अमल किया जाएगा.
मगर अब फिर भारत के आर्थिक केंद्र मुंबई में बुधवार की शाम लगातार तीन बम धमाके हुए जिनमें अब तक 19 लोग मारे गए हैं और 100 से अधिक लोग घायल हो गए. यह विस्फोट आतंकवादी थे. लेकिन उनकी जिम्मेदारी किसी समूह पर नहीं डाला गयी है. न ही किसी गुट ने इन धमाकों की ज़िम्मेदारी ली है. दो विस्फोट दक्षिण मुंबई में प्रसिद्ध ओपरा हाउस और ज़ावेरी बाज़ार जबकि तीसरा इस तटीय शहर के मध्य क्षेत्र दादर में हुआ. तीनों स्थान का शुमार मुंबई के गुंजान आबादी वाले क्षेत्रों में होता है.
इन धमाकों के बाद जब सरकार पर यह आरोप लगा कि उसने प्रधान समिति की रिपोर्ट पर एक चौथाई भी अमल नहीं किया है तो इसके जवाब में सरकार ने बहुत जोर शोर से कहा कि तीन चौथाई काम हो चुका है. मगर अब राम प्रधान ने खुद ही इस बारे में सरकार की आलस्य की पोल खोल दी है. 26/11 की जांच पैनल के प्रमुख राम प्रधान ने सरकार पर हमला करते हुए एक साक्षात्कार में बताया कि पिछले दो वर्षों में सरकार ने उनसे संपर्क स्थापित करने की एक भी कोशिश नहीं की. उन्होंने 13 जुलाई के आतंकवादी हमलों के बाद कहा कि सरकार ने 26/11 के बाद बनी समिति की सिफारिशों को गंभीरता से एक आँख भी नहीं देखा.
प्रधान ने कहा कि उन्हें रिपोर्ट पेश किए एक साल हो गया है, लेकिन राज्य सरकार की ओर से कोई भी व्यक्ति उनसे नहीं मिला है. न ही रिपोर्ट पर बहस के लिए ओर न ही उन्हें बताने कि लिए कि कैसे इस रिपोर्ट में की गई सिफारिशों को लागू कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि लोग जवाब चाहते हैं, और उन्हें एहसास है कि वे व्यस्त हैं, लेकिन क्या यह महत्वपूर्ण नहीं है. प्रधान ने कहा कि ग्रह विभाग को कागजी कार्रवाई से आगे कुछ करने की जरूरत है, उन्हें अधिक काम और कम बात करने की जरूरत है, सुरक्षा अपरेटस के ओवरहाल की जरूरत है.
एक सवाल के जवाब में कि क्या मुंबई पुलिस ने 26/11 से कोई सबक सीखा है, प्रधान ने कहा कि नहीं.
प्रधान ने कहा कि लोगों की सुरक्षा पुलिस विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी है, मगर वह यह बुनियादी कर्तव्य अंजाम देने के योग्य नहीं है क्योंकि यहां कर्मचारियों की कमी है और अधिक और लंबे घंटे काम करना पड़ता है. अगर पुलिस विभाग को मजबूत किया जाता है तब इन सभी चूकों से रोका जा सकेगा, लेकिन कोई वास्तव में पुलिस व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए काम नहीं करता.
राम प्रधान ने दावा किया है कि उन्होंने सरकार को चेतावनी दी थी कि आतंकवादी पुणे के कोरेगांव पार्क में हमला कर सकते हैं. यह वही क्षेत्र है जहां फरवरी 2010 में जर्मन बेकरी में बमबारी हुई थी.
प्रधान ने कहा कि हालांकि 26/11 आयोग की रिपोर्ट की तैयारी से पहले उन्होंने पुणे का दौरा किया था और इस रिपोर्ट में उन आशंकाओं को व्यक्त किया था कि कोरेगांव पार्क को आतंकवादियों द्वारा निशाना बनाया जा सकता है. उन्होंने सरकार को बताया था कि यह क्षेत्र कमज़ोर हे क्योंकि यह पर्यटकों का केन्द्र है.
हालांकि राज्य सरकार ने समिति की रिपोर्ट गोपनीय रखी है मगर फ़िर भी इंटरनेट पर उपलब्ध है और उसका अध्ययन करने से यह पता चलता है कि पुलिस प्रशासन में क्या खामियां हैं. और शायद उन्हीं कमियों का लाभ उठाकर 13 जुलाई को मुंबई के कई महत्वपूर्ण स्थानों पर हमले किए गए और पुलिस और राज्य सरकार इन हमलों को रोकने के लिए कुछ भी नहीं कर सकी.
हम समिति तो बना देता है मगर उसकी रिपोर्ट दबा देते हैं और आम आदमी तक नहीं पहुंचने देते के कहीं वह लगातार इसमें दी गई कमयों को पूरा करने की मांग न करते रहे, और फिर अपनी सुविधा और आसानी के साथ और आराम आराम से इस पर अमल करते हैं. क्या ही अच्छा होता अगर सरकार ने समिति की रिपोर्ट आने के बाद एक हाई पावर कमेटी का गठन किया होती जो पूरी तरह से प्रधान कमेटी रिपोर्ट पर अमल कराने के लिए ज़िम्मेदार होती और जिस को इस बात का पूर्ण अधिकार होता कि वह रिपोर्ट में बताई गई कमयों को निर्धारित समय में पूरा करवाए और दिए गए सुझावों पर अमल करवाए. अगर सरकार को अपनी ही चाल चलना है तो फिर समितियों का बनाया जाना और उनकी ओर से दी जाने वाली रिपोर्ट बेमानी है और उन पर इतना रुपया और इतनी मेहनत बर्बाद करने का क्या फायदा. किया ही अच्छा होता अगर तमाम राजनीतिक दल एक दूसरे पर कीचड़ उछालने की बजाय मिल जुल कर इस समस्या का हल निकालते ओर उस पर अपनी देख रेख में अमल करवाते.
सरकार से बाहर बैठे कुछ राजनीतिज्ञों की बातों से लगता है कि अगर वह सत्ता में होते तो आतंकवाद को चुटकी बजाकर खतम कर देते और आतंकवादियों को पकड़ने और उन्हें सज़ा दिलाने में जरा भी समय बर्बाद नहीं करते. गर्ज़ यह कि हर राजनीतिज्ञ ऐसी घटना के बाद खाली शोर-शराबा बरपा करने के अलावा ओर कोई ठोस काम नहीं करता. यही नहीं हर हमले के बाद दिए जाने वाले बयान इतने घिसे पिटे होते हैं की कोइ नागरिक इन पर सरसरी नज़र डालना भी गवारा नहीं करता.
बहुत ले-दे के बाद एक समिति बना दी जाती है और यह कहा जाता है कि यह समिति इस बात की जांच करेगी के कया इस हमले में प्रशासन द्वारा कोई कोताही हुई है ओर ऐसे हमलों को रोकने के लिए देरपा उसूल बनाएगी और सुरक्षा को मजबूत करने के लिए अपने सुझाउ देगी.
जब 26 नवंबर 2008 को मुंबई पर पाकिस्तानी आतंकवादियों ने हमला किया था तब उस के बाद भारतीय जनता में बहुत जबर्दस्त गुस्सा रोष फैल गया था उस के बाद केंद्र सरकार ने और राजय सरकार ने आतंकवादियों से निपटने के लिए कई घोषणाऐं की. महाराष्ट्र सरकार ने एक पूर्व गवर्नर और पुर्व यूनियन होम सचिव राम प्रधान की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया, जिसमें पूर्व आईपीएस अधिकारी वी बालाचन्दरन भी थे, जिसका काम था की वह यह पता लगाए कि पुलिस और प्रशासन की प्रतिक्रिया में कहां कोताही हुई.
समिति ने दो हिस्सों में अपनी रिपोर्ट पेश की. मगर इस रिपोर्ट को बहुत ही संवेदनशील बताकर महाराष्ट्र सरकार ने उसे सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया. पर उसने यह वादा किया कि इस रिपोर्ट पर पूरी तरह से अमल किया जाएगा.
मगर अब फिर भारत के आर्थिक केंद्र मुंबई में बुधवार की शाम लगातार तीन बम धमाके हुए जिनमें अब तक 19 लोग मारे गए हैं और 100 से अधिक लोग घायल हो गए. यह विस्फोट आतंकवादी थे. लेकिन उनकी जिम्मेदारी किसी समूह पर नहीं डाला गयी है. न ही किसी गुट ने इन धमाकों की ज़िम्मेदारी ली है. दो विस्फोट दक्षिण मुंबई में प्रसिद्ध ओपरा हाउस और ज़ावेरी बाज़ार जबकि तीसरा इस तटीय शहर के मध्य क्षेत्र दादर में हुआ. तीनों स्थान का शुमार मुंबई के गुंजान आबादी वाले क्षेत्रों में होता है.
इन धमाकों के बाद जब सरकार पर यह आरोप लगा कि उसने प्रधान समिति की रिपोर्ट पर एक चौथाई भी अमल नहीं किया है तो इसके जवाब में सरकार ने बहुत जोर शोर से कहा कि तीन चौथाई काम हो चुका है. मगर अब राम प्रधान ने खुद ही इस बारे में सरकार की आलस्य की पोल खोल दी है. 26/11 की जांच पैनल के प्रमुख राम प्रधान ने सरकार पर हमला करते हुए एक साक्षात्कार में बताया कि पिछले दो वर्षों में सरकार ने उनसे संपर्क स्थापित करने की एक भी कोशिश नहीं की. उन्होंने 13 जुलाई के आतंकवादी हमलों के बाद कहा कि सरकार ने 26/11 के बाद बनी समिति की सिफारिशों को गंभीरता से एक आँख भी नहीं देखा.
प्रधान ने कहा कि उन्हें रिपोर्ट पेश किए एक साल हो गया है, लेकिन राज्य सरकार की ओर से कोई भी व्यक्ति उनसे नहीं मिला है. न ही रिपोर्ट पर बहस के लिए ओर न ही उन्हें बताने कि लिए कि कैसे इस रिपोर्ट में की गई सिफारिशों को लागू कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि लोग जवाब चाहते हैं, और उन्हें एहसास है कि वे व्यस्त हैं, लेकिन क्या यह महत्वपूर्ण नहीं है. प्रधान ने कहा कि ग्रह विभाग को कागजी कार्रवाई से आगे कुछ करने की जरूरत है, उन्हें अधिक काम और कम बात करने की जरूरत है, सुरक्षा अपरेटस के ओवरहाल की जरूरत है.
एक सवाल के जवाब में कि क्या मुंबई पुलिस ने 26/11 से कोई सबक सीखा है, प्रधान ने कहा कि नहीं.
प्रधान ने कहा कि लोगों की सुरक्षा पुलिस विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी है, मगर वह यह बुनियादी कर्तव्य अंजाम देने के योग्य नहीं है क्योंकि यहां कर्मचारियों की कमी है और अधिक और लंबे घंटे काम करना पड़ता है. अगर पुलिस विभाग को मजबूत किया जाता है तब इन सभी चूकों से रोका जा सकेगा, लेकिन कोई वास्तव में पुलिस व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए काम नहीं करता.
राम प्रधान ने दावा किया है कि उन्होंने सरकार को चेतावनी दी थी कि आतंकवादी पुणे के कोरेगांव पार्क में हमला कर सकते हैं. यह वही क्षेत्र है जहां फरवरी 2010 में जर्मन बेकरी में बमबारी हुई थी.
प्रधान ने कहा कि हालांकि 26/11 आयोग की रिपोर्ट की तैयारी से पहले उन्होंने पुणे का दौरा किया था और इस रिपोर्ट में उन आशंकाओं को व्यक्त किया था कि कोरेगांव पार्क को आतंकवादियों द्वारा निशाना बनाया जा सकता है. उन्होंने सरकार को बताया था कि यह क्षेत्र कमज़ोर हे क्योंकि यह पर्यटकों का केन्द्र है.
हालांकि राज्य सरकार ने समिति की रिपोर्ट गोपनीय रखी है मगर फ़िर भी इंटरनेट पर उपलब्ध है और उसका अध्ययन करने से यह पता चलता है कि पुलिस प्रशासन में क्या खामियां हैं. और शायद उन्हीं कमियों का लाभ उठाकर 13 जुलाई को मुंबई के कई महत्वपूर्ण स्थानों पर हमले किए गए और पुलिस और राज्य सरकार इन हमलों को रोकने के लिए कुछ भी नहीं कर सकी.
हम समिति तो बना देता है मगर उसकी रिपोर्ट दबा देते हैं और आम आदमी तक नहीं पहुंचने देते के कहीं वह लगातार इसमें दी गई कमयों को पूरा करने की मांग न करते रहे, और फिर अपनी सुविधा और आसानी के साथ और आराम आराम से इस पर अमल करते हैं. क्या ही अच्छा होता अगर सरकार ने समिति की रिपोर्ट आने के बाद एक हाई पावर कमेटी का गठन किया होती जो पूरी तरह से प्रधान कमेटी रिपोर्ट पर अमल कराने के लिए ज़िम्मेदार होती और जिस को इस बात का पूर्ण अधिकार होता कि वह रिपोर्ट में बताई गई कमयों को निर्धारित समय में पूरा करवाए और दिए गए सुझावों पर अमल करवाए. अगर सरकार को अपनी ही चाल चलना है तो फिर समितियों का बनाया जाना और उनकी ओर से दी जाने वाली रिपोर्ट बेमानी है और उन पर इतना रुपया और इतनी मेहनत बर्बाद करने का क्या फायदा. किया ही अच्छा होता अगर तमाम राजनीतिक दल एक दूसरे पर कीचड़ उछालने की बजाय मिल जुल कर इस समस्या का हल निकालते ओर उस पर अपनी देख रेख में अमल करवाते.
Tags: Afif Ahsen, Bomb Blast, Daily Pratap, Maharashtra, Mumbai, Pune, Terrorism, Vir Arjun

No comments:
Post a Comment