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Monday, 30 January 2012

"बुरा मत कहो, बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो, बुरा मत रोको"

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 30th  January 2012
अफ़ीफ़ अहसन
हमारा देश जब किसी की नक़ल करता है तो अंधी और जब विरोध करने पर आता है तो सभी बंदिशें फलाँग जाता है. जब ट्वीटर और फेसबुक शुरू हुए तो हमने उन्हें हाथों हाथ लपक लिया. मगर धीरे-धीरे इसमें भी अश्लीलता, साम्प्रदायिकता, जाती आधारित अनुचित सामग्री घर कर गई. ऐसा नहीं है के इन सामग्रियों को एक धर्म विशेश के खिलाफ पाया गया. हर धर्म और हर राष्ट्रीयता के लोगों का मजाक उड़ाया गया. इसमें सबसे आसान लक्ष्य तो प्राकृतिक रूप से राजनेता ही थे. कुछ सामग्री तो ऐसी हैं के जिन्हें देखकर अच्छे से अच्छे व्यक्ति को भी चक्कर आजाए. इस पर गजब यह कि अगर आपने इनमें से किसी भी चीज़ पर कोई कमेन्ट लिख दिया तो यह आपके सभी दोस्तों तक पहुंच जाएगा. अब चाहे यह कमेन्ट इस सामग्री के पक्ष में न भी हो. चाहे आप इस सामग्री के विरोधी ही हों. मगर विरोध करके भी आप जाने अनजाने इस अनुचित सामग्री को अपने हजारों मित्रों को पहुंचाने का काम कर बैठते हैं. इस तरह जो चीज़ आपके लिए सही नहीं थी उसका आपने विरोध किया उसके बाद वह सामग्री हजारों अन्य लोगों तक पहुंच गयी और यह सिलसिला इसी तरह चलता रहा तो यह सामग्री लाखों करोड़ों लोगों तक पहुंच जाती है और इससे करोड़ों लोगों का दिल दुखता है. ऐसी ही गलती मुझसे भी हुई. जिससे मेरे दोस्तों को भी मानसिक दुख पहुंचा. मेरे एक दोस्त ने मुझसे बजा सवाल किया कि क्या यह आवश्यक है कि ऐसी सामग्री डाली ही जाये या उन पर कमेन्ट किया जाये. मगर मैं कहूंगा कि हम कब तक ऐसी सामग्री की अनदेखी करके आगे बढ़ेंगी. बुरा मत देखो, बुरा मत कहो, बुरा मत सुनो शब्द तो हम सुनते आए थे अब इसमें एक और शब्द शामिल हो गया है और वह है बुरा मत रोको.
कुछ समय पहले जब केंद्रीय टेलीकॉम मंत्री कपिल सिब्बल ने सोशल नेटवर्किंग साइटों पर लगाम कसने के बारे में बयान दिया तो इससे बवाल मचा. कपिल सिब्बल ने इन साइटों पर डाली गई चीजों पर निगरानी रखने की बात कही थी और सोशल नेटवर्किंग साइटों से इस प्रकार की सामग्री हटाने के लिए बैठक भी की थी. कपिल सिब्बल ने कहा था कि उन्होंने फेसबुक और गूगल से आपत्तिजनक सामग्री को ब्लॉक करने के लिए कहा है, खासकर ऐसी चीजें जो भारतीय लोगों की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचा सकती हैं.
इन सामाजिक नेटवर्किंग साइटों के साथ हमारे देश के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया ने भी उसका खुलकर विरोध किया और कुछ लोगों ने यह आरोप लगाया कि ऐसा सिब्बल साहब सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को बचाने के लिए कर रहे हैं क्योंकि उनके खिलाफ बहुत ही भदी टिप्पणी और फोटोग्राफ इन सोशल नेटवर्किंग साइटों पर भरे पड़े हैं. सिब्बल पर यह भी आरोप लगा कि वह आन्ना हजारे को सामाजिक नेटवर्किंग साइटों पर मिले असाधारण समर्थन को दबाना चाहते हैं. ऐसे किसी भी प्रतिबंध या सेंसर का विरोध करने वालों ने अभिव्यक्त की स्वतंत्रता के आधार पर भी इसका विरोध किया. आलोचकों का कहना था कि इन दिनों इंटरनेट पर लोग मनोरंजक की बातचीत और तस्वीरों के लेनदेन से अधिक राजनीतिक विचारधारा पर बहस कर रहे हैं इसलिए ही हिंदुस्तान सरकार सामाजिक मीडिया पर निगरानी की बात कर रही है. टेलीकॉम मंत्री के बयान को इंटरनेट की स्वतंत्रता की राह में रुकावट डालने वाला मानकर इसकी कड़ी आलोचना हो रही थी लेकिन उन्होंने कहा कि वह केवल इंटरनेट पर मौजूद सामग्री पर नज़र रखने की बात कर रहे हैं.
दूसरी तरफ अमेरिका ने भी इस पर चिंता व्यक्त की. बोलने की आज़ादी का मतलब इंटरनेट पर बोलने की स्वतंत्रता है, मानने वाले अमेरिका ने हिंदुस्तान सरकार से इंटरनेट के लिए नियम बनाने पर बात शुरू कर दी. अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मार्क टोनर ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, हम मानते हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वास्तविक दुनिया की तरह ही इंटरनेट पर भी समान रूप से लागू होती है. मार्क टोनर ने कहा, इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को रोकने की कोशिश की हमें चिंता है.
हिंदुस्तान में हालांकि टीवी, फिल्म और मीडिया पर तो किसी ना किसी तरह की पाबंदी है, लेकिन इंटरनेट पर कोई प्रतिबंध नहीं है. सवाल यह पैदा होता है कि जो सामग्री टीवी चैनल दिखा नहीं सकते, समाचार पत्र छाप नहीं सकते अगर उसे इंटरनेट से भी हटा दिया जाए तो अभिव्यक्त की स्वतंत्रता बीच में कहां आ गई. मैं तो उस पर प्रतिबंध का विरोध करने वालों से यह भी कहूँगा कि अगर वह यह समझते हैं कि ऐसी सामग्री इंटरनेट पर दिखाना ठीक है तो क्यों नहीं वह खुद ऐसी सामग्री अपने समाचार पत्रों में छापते और दिखाते. कानून तो अपनी जगह है लेकिन कोई भी बा-ज़मीर व्यक्ति ऐसे सामग्री को किसी भी रूप में उपयोग करना नहीं चाहेगा.
इस ‍सिलसिले में दायर एक मामले की सुनवाई करते हुए हिंदुस्तान में चल रही 22 सामाजिक नेटवर्किंग साइटों को दिल्ली की अदालत ने उनकी वेबसाइट से धर्म विरोधी या समाज विरोधी चीजों को हटाने के लिए कहा है. इन वेबसाइट को चलाने वाली कंपनियों को 6 फरवरी तक फैसले पर अमल करने का आदेश मिला है. कोर्ट ने जिन वेबसाइटों को आदेश दिया है उनमें फेसबुक, गूगल, याहू और माइक्रोसॉफ्ट सहित 22 सोशल नेटवर्किंग साइट शामिल हैं. कोर्ट के अतिरिक्त सिविल जज मुकेश कुमार ने सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों को सम्मन जारी किया. इन कंपनियों को आदेश पूरा करने के लिए डेढ़ महीने का समय दिया गया. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, अगर प्रतिवादी को सोशल नेटवर्किंग साइटों से आपत्तिजनक चीजें हटाने के लिए नहीं कहा जाएगा तो न केवल शिकायत करने वाले बल्कि हर उस व्यक्ति जिस की धार्मिक भावनाओं उनसे जुड़ी हैं, को भरपाई ना की जा सकने वाली चोट पहुंचेगी.
बाद में सम्मन को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई. इस पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक और सर्च इंजन गूगल को चेतावनी दी थी कि अगर यह वेबसाइट आपत्तिजनक सामग्री पर काबू पाने और उन्हें हटाने की व्यवस्था नहीं करतीं तो चीन की तरह हिंदुस्तान में उन पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है. अदालत के माननीय जज जस्टिस सुरेश केत ने कहा कि अगर यह सामग्री न हटायी गयी तो चीन की तरह ऐसी सभी वेबसाइट को ब्लॉक कर देंगे.
उन्होंने फेसबुक और गूगल इंडिया की तरफ से पेश होने वाले वकीलों से कहा था कि वह ऐसी प्रणाली प्रस्तुत करें जिससे आपत्तिजनक सामग्री पर नियंत्रण पाया जा सके और उसे हटाया जा सके. गूगल इंडिया के वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि वेबसाइट पर अश्लील और आपत्तिजनक सामग्री को रोका नहीं जा सकता और न ही उसकी निगरानी हो सकती है. उन्होंने कहा, इस मामले में किसी भी व्यक्ति का दखल संभव नहीं है. ऐसे सामग्री नियंत्रण करना संभव नहीं. पूरी दुनिया के अरबों लोग अपने लेख वेबसाइट पर प्रकाशित करते हैं, वह आपत्तिजनक या अश्लील हो सकते हैं, लेकिन उन पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता.
सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सालिसिटर जनरल एस चंडयोक ने गूगल इंडिया के तर्क पर आपत्ति जताई और कहा कि अमेरिका में स्थापित गूगल इंक के पास यह सुविधा है कि वह जान सकता है कि कौन आपत्तिजनक सामग्री प्रकाशित कर रहा है.
बाद को हुई कार्रवाई में गूगल इंडिया ने दिल्ली हाई कोर्ट से कहा है कि चूंकि हिंदुस्तान एक लोकतांत्रिक देश है इसलिए वेबसाइट पर ऐसी पाबंदी नहीं लगायी जा सकती कि उसे बंद कर दिया जाए. गूगल द्वारा जवाब देते हुए कंपनी के वकील एन के कोल ने अदालत से कहा कि हिंदुस्तान लोकतांत्रिक देश है और चीन की तरह यहां तानाशाही नहीं है. उनका कहना था कि ये विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में एक संवैधानिक समस्या है और उसे दबाना असंभव है क्योंकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हिंदुस्तान को चीन जैसे तानाशाह से अलग करती है. कोल ने अदालत से कहा कि इंटरनेट एक ऐसी ग्लोबल प्रणाली है जिसे करोड़ों लोग, बहुत सी कंपनियां और सरकारें भी इस्तेमाल करती हैं. अब इस मामले में आगे की सुनवाई दो फरवरी को होनी हे.
इस संबंध में ट्वीटर की घोषणा से उम्मीद की किरन नज़र आई है. अपने ब्लॉग पोस्ट में ट्वीटर ने दावा किया है कि उसके पास ऐसी तकनीक है जिससे वह अलग-अलग देशों के कहने पर उस देश विशेश के बारे में सामग्री या ट्वीट को उसी देश में ब्लॉक कर सकता है. इसका मतलब यह हुआ कि अगर ट्वीटर चाहे तो किसी भी पोस्ट को भारतीय में ब्लॉक कर दे जबकी बाकी दुनिया में वह दिखाई देती रहे. उसका मानना ​​है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब अलग-अलग देशों में अलग-अलग लगाया जाता है इसलिए वे अलग-अलग देशों में उनके हसाब से फिल्टर लगा सकता है.
ट्वीटर के इस कदम से गूगल के इस दावे की हवा निकल गई है कि वेबसाइट पर अश्लील और आपत्तिजनक सामग्री को रोका नहीं जा सकता और न ही उसकी निगरानी हो सकती है तथा यह कि इस मामले में किसी भी व्यक्ति का दखल संभव नहीं है.
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” برامت کہو، برامت سنو، برامت دیکھو، برا مت روکو“

Daily Pratap, Indias Oldest Urdu Daily
Published on 30th January 2012
عفیف احسن
ہمارا ملک جب بھی کسی کی تقلید کرتا ہے تو اندھی کرتا ہے اور جب مخالفت کرنے پر آتا ہے تو سبھی بندشیں پھلانگ جاتا ہے۔ جب ٹوئٹر اور فیس بک شروع ہوئے تو ہم نے ان کو ہاتھوں ہاتھ لپک لیا۔ مگر دھیرے دھیرے اس میں بھی فحاشی، مذہبی منافرت، ذات پات پر مبنی غیر موزوں مواد کی بھرمار ہوگئی۔ ایسا نہیں ہے کے ان مواد کو صرف ایک مذہب کے خلاف پایا گیا۔ ہر مذہب اور ہر قومیت کے لوگوں کا مذاق اڑایا گیا۔ اس میں سب سے آسان ٹارگیٹ تو قدرتی طورپر سیاست داں ہی تھے۔ کچھ مواد تو ایسے ہیں کے جنہیں دیکھ کر اچھے سے اچھے شخص کوبھی غش آجائے۔ اس پہ غضب یہ کہ اگر آپ نے ان میں سے کسی بھی چیز پر کوئی کمینٹ لکھ دیا تو یہ آپ کے سبھی دوستوں تک پہنچ جائے گا۔ اب چاہے یہ کمینٹ اس مواد کے حق میں نہ بھی ہو۔ چاہے آپ نے اس مواد کی مخالفت ہی کی ہو۔ مگر مخالفت کرکے بھی آپ جانے انجانے اس غیر موزوں مواد کواپنے ہزاروں دوستوں کو پہنچانے کا کام کر بیٹھتے ہیں۔ اس طرح جو چیز آپ کے لئے درست نہیں تھی اس کی آپ نے مخالفت کی اس کے بعد وہ مواد ہزاروں دوسرے لوگوں تک پہنچ گیا اور یہ سلسلہ اسی طرح چلتا رہا تو یہ موادلاکھوں کروڑوں لوگوں تک پہنچ جاتا ہے اور اس سے کروڑوں لوگوں کی دل آزاری ہوتی ہے۔ ایسا ہی غلطی مجھ سے بھی سرزد ہوئی۔ جس سے میرے دوستوں کو بھی دماغی دکھ پہنچا۔ میرے ایک دوست نے مجھ سے بجا سوال کیا کہ کیا یہ ضروری ہے کے ایسا مواد ڈالا ہی جائے یا ان پر کمینٹ کیا جائے۔ مگر میں کہوں گا کہ ہم کب تک ایسے مواد کو نظر انداز کرکے آگے بڑھ جائیں گے۔” برامت دیکھو، برامت کہو، برامت سنو “کی اصطلاح تو ہم سنتے آئے تھے اب اس میں ایک اور اصطلاح شامل ہوگئی ہے اور وہ ہے” برا مت روکو“۔
کچھ عرسہ پہلے جب ٹیلی کام کے مرکزی وزیر کپل سبّل نے سوشل نیٹ ورکنگ سائٹس پر لگام کسنے کے بارے میں بیان دیا تواس سے خوب شور شرابا مچا۔ کپل سبل نے ان سائٹس پر ڈالی گئی چیزوں پر نگرانی رکھنے کی بات کہی تھی اور سوشل نیٹ ورکنگ سائٹس سے اس قسم کے مواد ہٹانے کے لئے میٹنگ بھی کی تھی۔ کپل سبل نے کہا تھاکہ انہوں نے فیس بک اور گوگل سے قابل اعتراض مواد کو بلاک کرنے کے لئے کہا ہے ، خاص طور سے ایسی چیزیں جو ہندوستانی لوگوں کے مذہبی جذبات کو چوٹ پہنچا سکتی ہیں ۔
ان سوشل نیٹ ورکنگ سائٹس کے ساتھ ساتھ ہمارے ملک کے الیکٹرانک میڈیا اور پرنٹ میڈیا نے بھی اس کی کھل کر مخالفت کی اورکچھ لوگوں نے یہ الزام لگایا کہ ایسا سبل صاحب سونیا گاندھی اور منموہن سنگھ کو بچانے کے لئے کررہے ہیں کیونکہ ان کے خلاف بہت ہی بھدّے ریمارکس اور فوٹو گراف ان سوشل نیٹ ورکنگ سائٹس پر بھرے پڑے ہیں۔ سبل پر یہ بھی الزام لگا کہ وہ انّا ہزارے کو ان سوشل نیٹ ورکنگ سائٹس پرملی غیر معمولی حمایت کو دبانا چاہتے ہیں۔ ایسی کسی بھی پابندی یا سینسر کی مخالفت کرنے والوں نے اظہار رائے کی آزادی کی بنیاد پر بھی اس کی مخالفت کی۔ ناقدین کا کہنا تھاکہ ان دنوں انٹرنیٹ پر لوگ دل لگی کی بات چیت اور تصویروں کے لین دین سے زیادہ سیاسی نظریات پر بحث کر رہے ہیں اس لئے ہی ہندوستان کی حکومت سوشل میڈیا پر نگرانی کی بات کر رہی ہے۔ ٹیلی کام وزیر کے بیان کو انٹرنیٹ کی آزادی کی راہ میں رکاوٹ ڈالنے والا مان کر اس کی سخت نکتہ چینی ہو رہی ہے تاہم انہوں نے کہا ہے کہ وہ صرف انٹرنیٹ پر موجود مواد پر نگاہ رکھنے کی بات کر رہے ہیں۔
دوسری طرف امریکہ نے بھی اس پر تشویش ظاہر کی۔ ”بولنے کی آزادی کا مطلب انٹرنیٹ پر بولنے کی آزادی بھی ہے“ ماننے والے امریکہ نے ہندوستان کی حکومت سے انٹرنیٹ کے لئے قواعد بنانے پر بات شروع کر دی۔ امریکی محکمہ خارجہ کے ترجمان مارک ٹونر نے صحافیوں سے بات چیت میں کہا، ”ہم مانتے ہیں کہ اظہار کی آزادی اصلی دنیا کی طرح ہی انٹرنیٹ پر بھی یکساں طور پر لاگو ہوتی ہے“۔ مارک ٹونر نے کہا، ”انٹرنیٹ پر اظہار کی آزادی کو روکنے کی کوشش کی ہمیں فکر ہے“۔
ہندوستان میں حالانکہ ٹیل ویژن، فلم اور اخبارات پر تو کسی نہ کسی طرح کی پابندی ہے لیکن انٹرنیٹ پر کسی قسم کی کوئی پابندی نہیں ہے۔
 سوال یہ پیدا ہوتا ہے کہ جو مواد ٹی وی چینل دکھا نہیں سکتے، اخبارات چھاپ نہیں سکتے اگر اسے انڑنیٹ سے بھی ہٹادیا جائے تو اظہار رائے کی آزادی بیچ میں کہا ں آگئی۔ میں تو اس پر پابندی کی مخالفت کرنے والوں سے یہ بھی کہوں گا کہ اگر وہ یہ سمجھتے ہیں کہ ایسامواد انٹرنیٹ پر دکھاناٹھیک ہے تو کیوں نہیں وہ خود ایسا مواد اپنے اخبارات میں چھاپتے اور دکھاتے۔ قانون تو اپنی جگہ ہے لیکن کوئی بھی باضمیر شخص ایسے مواد کوکسی بھی شکل میں استعمال کرنا نہیں چاہے گا۔
 اس سلسے میں دائر ایک مقدمے کی سنوائی کرتے ہوئے ہندوستان میں چل رہی 22 سوشل نیٹ ورکنگ سائٹس کو دہلی کی عدالت نے ان کی ویب سائٹ سے مذہب مخالف یا سماج مخالف چیزوں کو ہٹانے کے لئے کہا ہے۔ان ویب سائٹ کوچلانے والی کمپنیوں کو 6 فروری تک فیصلے پر عمل کرنے کا حکم ملا ہے۔
کورٹ نے جن ویب سائٹس کو حکم دیا ہے ان میں فیس بک، گوگل، یاہو اور مائیکروسافٹ سمیت 22 سوشل نیٹ ورکنگ سائٹ شامل ہیں۔ دہلی کورٹ کے ایڈیشنل سول جج مکیش کمار نے سوشل نیٹ ورکنگ سائٹس کو سمن جاری کیا۔ ان کمپنیوں کو حکم پورا کرنے کے لیے ڈیڑھ ماہ کا وقت دیا گیا۔ کورٹ نے اپنے حکم میں کہا، اگر مدعا علیہ کو سوشل نیٹ ورکنگ سائٹس میں سے قابل اعتراض چیزیں ہٹانے کے لئے نہیں کہا جائے گا تو نہ صرف شکایت کرنے والے بلکہ ہر اس شخص کو جس کی مذہبی جذبات ان سے وابستہ ہیں، ناقابل تلافی چوٹ پہنچے گی۔
بعد میں اس سمن کو ہائی کورٹ میں چیلنج کیا گیا۔ اس پر سنوائی کرتے ہوئے دہلی ہائی کورٹ نے سوشل نیٹ ورکنگ سائٹ فیس بک اور سرچ انجن گوگل کو خبردار کیا تھاکہ اگر یہ ویب سائٹس قابل اعتراض مواد پر قابو پانے اور انہیں ہٹانے کا انتظام نہیں کرتیں تو چین کی طرح بھارت میں ان پر پابندی لگائی جا سکتی ہے۔عدالت کے قابل جج جسٹس سریش کیت نے کہا کہ اگر یہ مواد نہ ہٹایا گیا تو ’چین کی طرح ایسی تمام ویب سائٹ کو بلاک کر دیں گے“۔
انہوں نے فیس بک اور گوگل انڈیا کی طرف سے پیش ہونے والے وکلاء سے کہا تھاکہ وہ ایسا نظام پیش کریں جس سے قابل اعتراض مواد پر قابو پایا جا سکے اور اسے ہٹایا جا سکے۔ گوگل انڈیا کے وکیل مکل روہتگی نے کہا کہ ویب سائٹ پر فحش اور قابلِ اعتراض مواد کو روکا نہیں جا سکتا اور نہ ہی اس کی نگرانی ہو سکتی ہے۔انہوں نے کہا، ’اس معاملے میں کسی بھی شخص کا دخل ممکن نہیں ہے۔ ایسے مواد پر کنٹرول کرنا ممکن نہیں۔ پوری دنیا کے اربوں لوگ اپنے مضمون ویب سائٹ پر شائع کرتے ہیں، وہ قابل اعتراض یا فحش ہو سکتے ہیں، لیکن ان پر قابو نہیں کیا جا سکتا‘۔
حکومت کی جانب سے پیش ہوئے ایڈیشنل سالسٹر جنرل ایس چنڈیوک نے گوگل انڈیا کے دلائل پر اعتراض کیا اور کہا کہ امریکہ میں قائم گوگل انکارپوریٹڈ کے پاس یہ سہولت ہے کہ وہ جان سکتا ہے کہ کون قابل اعتراض مواد شائع کر رہا ہے۔
بعد کو ہوئی کارروائی میں گوگل انڈیا نے دلی ہائی کورٹ سے کہا ہے کہ چونکہ بھارت ایک جمہوری ملک ہے اس لیے ویب سائٹ پر ایسی پابندی عائد نہیں کی جا سکتی کہ اسے بند کر دیا جائے۔ گوگل کی جانب سے جواب دیتے ہوئے کمپنی کے وکیل این کے کول نے عدالت سے کہا کہ بھارت جمہوری ملک ہے اور چین کی طرح یہاں آمریت کا راج نہیں ہے۔
ان کا کہنا تھا ’یہ خیالات و اظہار رائے کی آزادی سے متعلق ایک آئینی مسئلہ ہے اور اسے دبانا غیر ممکن ہے کیونکہ اظہار رائے کی آزادی بھارت کو چین جیسی آمریت سے الگ کرتی ہے۔‘مسٹر کول نے عدالت سے کہا کہ انٹرنیٹ ایک ایسا گلوبل نظام ہے جسے کروڑوں افراد، بہت سی کمپنیاں اور حکومتیں بھی استعمال کرتی ہیں۔ اب اس معاملے میں آگے کی سنوائی دو فروری کو ہوگی۔
اس سلسلے میں ٹوٹر کے اعلان سے امید کی کرنظر آئی ہے۔ اپنے بلاگ پوسٹ میں ٹوٹر نے یہ دعویٰ کیا ہے کے اس کے پاس ایسی تکنیک ہے جس سے وہ الگ الگ ممالک کے کہنے پر اس ملک سے متعلق مواد یا ٹویٹ کوصرف اسی ملک میں ہی بلاک کرسکتا ہے۔ اس کا مطلب یہ ہوا کہ اگر ٹوٹر چاہے تو کسی بھی پوسٹ کو ہندوستان میں بلاک کردے جبکہ باقی دنیا میں و ہ دکھائی دیتی رہے۔ اس کا ماننا ہے کے اظہار رائے کی آزادی کا مطلب الگ الگ ملکوں میں الگ الگ لگایا جاتا ہے اس لئے وہ الگ الگ ملکوں میں ان کے حصاب سے فلٹر لگا سکتا ہے۔
ٹوٹر کے اس اقدام سے گوگل کے اس دعوے کی ہواہی نکل گئی ہے کہ ان ویب سائٹ پر فحش اور قابلِ اعتراض مواد کو روکا نہیں جا سکتا اور نہ ہی اس کی نگرانی ہو سکتی ہے نیز یہ کہ اس معاملے میں کسی بھی شخص کا دخل ممکن نہیں ہے۔ 
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Monday, 23 January 2012

प्रतिबंधित किताब पढ़े जाने पर त्वरित कार्रवाई


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 23th January 2012
अफ़ीफ़ अहसन
1988 में जब कुख्यात सलमान रुशदी ने अपना विवादास्पद उपन्यास सेटेनिक वरसेज़ प्रकाशित किया था तो इसके बाद दुनिया भर में एक रिकॉर्ड विवाद फट पड़ा था। आयोजित मार्च और प्रदर्शनों के द्वारा इस पुस्तक की सामग्री का विरोध किया गया। इस किताब ने लोगों की भावनाओं को इतनी गहराई तक आहत किया था कि इसकी वजह से उनमें से कुछ प्रदर्शनों में ना चाहते हुवे भी हिंसा फट पड़ी और कई लोग घायल या मारे गए।
एक तरफ तो दुनिया भर के मुसलमान देशों ने इस प्रकाशन की निंदा की और ईरान के आयतुल्ला खुमैनी ने इसके खिलाफ फतवा जारी किया, जबकि दूसरी ओर पश्चिमी देशों ने इसका समर्थन की भी हद कर दी और खुलकर इस प्रकाशन का बचाव किया। पश्चिम देशों का यह बचाव ब्रिटेन, जहां किताब पहली बार प्रकाशित की गई थी की प्रतिक्रिया की तकलीद था जिस में ब्रिटिश स्टेबलिश्मेंट ने दावा किया था कि वह उसके खिलाफ कुछ भी नहीं कर सकते क्योंकि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की सुरक्षा के खिलाफ था. ऐसा करके ब्रिटेन ने जासूस पकड़ने के मामले में अपनी हार को आसानी से दबा दिया और ब्रिटेन में सरकार द्वारा अश्लील टीवी चैनलों के प्रसारण पर सफल प्रतिबंध लगाए जाने से लोगों का ध्याना हटा दिया. जहां तक ​​ब्रिटेन का संबंध था तो ऐसा लगता था कि हवाई तरंगों पर गैर सभ्य भाषा के प्रसारण से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की पवित्र कसम का उल्लंघन होती था लेकिन प्रतिष्ठित लोगों के खिलाफ गैर सभ्य भाषा का प्रकाशन और पाक कलाम के खिलाफ अवांछित शब्दों द्वारा उसके लाखों लोगों और दुनिया भर के मुसलमानों को पहुंचाई गई चोट और दर्द के खिलाफ कुछ नहीं किया जा सकता था.
जैसे कि इतना काफी नहीं था, इसलिए इसके बाद इस किताब की एक साहित्यिक सहीफे के रूप में तारीफ और ताज़ीम की गई और किताब को बुक्र पुरस्कार के लिए भी नामित किया गया. यही नहीं लेखक के साथ एक हीरो जेसा व्यवहार किया गया और उसकी कुख्यात किताब को सार्वजनिक रूप से पढ़ा गया.
ब मुसलमानों ने इसका विरोध किया, तो उन्हें तंग विचार और प्राचीन सोच वाला करार दिया गया. ब्रैडफोर्ड शहर में सार्वजनिक रूप से सलमान रुशदी की किताब की एक प्रति जलाए जाने के बाद उसकी फुटेज को लगातार पश्चिमी मीडिया पर दिखाया जाता रहा. इस घटना ने पश्चिम मुस्लिम जनता को जो कई दशकों से कानून को मानती और शांति से रहती आयी थी और अधिक गुस्से से भर दिया और उसके व्यवहार में उग्रवाद पसंदी घर कर आई.
इसी दौरान जब ब्रिटेन के मुसलमानों ने अदालतों में न्याय खोजने की कोशिश की तो उनकी कोशिशों को शुरुआत में ही जबर्दस्त धक्का लगा क्योंकी ब्रिटेन जैसे एक बहुल धार्मिक समाज में अपमान के नियम केवल ईसाई धर्म के अपमान तक ही सीमित थे, अन्य धर्मों की अवमानना के लिए कोई रोक टोक नहीं थी और इस्लाम की तो कतई नहीं.
इस पर हिदुस्तान में भी सड़क से लेकर संसद तक बहुत ज़बरदस्त प्रतिक्रिया हुई. भारतीय तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी ने दूर अंदेशी का सबूत देते हुए किताब पर तुरंत पूरे देश में प्रतिबंध लगा दिया और उसका प्रकाशन और पढ़ना अवैध करार दे दिया गया.
लेकिन फिर भी इस विवादास्पद और प्रतिबंधित पुस्तक जयपुर ‍लिटरेरी फ़ेस्टीवल में खुलेआम प्रदर्शन किया गया. यही नहीं इस किताब को सार्वजनिक रूप से पढ़ा गया. ऐसा किया जाना भारतीय कानून का खुला उल्लंघन है और भारतीय कानून के खिलाफ अविश्वास का खुल्लम खुल्ला प्रदर्शन है. हालांकि लेखक समुदाय सलमान रुशदी के भारत आने से रोके जाने का पुरजोर विरोध कर रही थी लेकिन लिटररी फ़ेस्टोल में प्रतिबंधित पुस्तक के अंश पढ़े जाने के बाद लेखक समुदाय बंट गया. यही नहीं इन अंश के पढ़े जाने के बाद आयोजकों ने अपनी जान बचाने के लिए इन चारों लेखकों को फ़ेस्टीवल छोड़कर चले जाने के लिए कह दिया. उनसे कहा गया है कि किसी भी समय गिरफ्तारी हो सकती है. एक एसएमएस भी सरकूलेट किया गया है जिसमें सेटेनिक वरसेज़ पढ़ते पाए जाने पर गिरफतार होने की बात कही गई है. अब वही आरगनाईज़र्स जो की सलमान रुशदी के फ़ेस्टीवल में न आने दिए जाने को मुद्दा बनाए हुए थे, उन्होंने ही चार अन्य ऐसे लेखक को फ़ेस्टीवल से चले जाने के लिए कह दिया है जिन्होंने यह किताब खुलेआम पढ़ी थी. आरगनाईज़र्स के इस दोहरे माप दंड से उनकी नियत खुलकर सामने आ गई है. अब उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दलील का क्या हुआ?
लेखक चेतन भगत ने लेखक समुदाय से अपील की है कि प्रतिबंधित लोगों को हीरो बनाने की कोशिश न की जाए. उन्होंने कहा कि अगर किसी का लिखा कुछ लोगों को बुरा लगा है तो उन्हें विरोध करने का अधिकार है. क़ानून को अपने हाथ में लेना ठीक नहीं है.
जाने माने मलियालम लेखक के सचिदानंद का मानना ​​है कि अनावश्यक विवादों से बचने के लिए सावधानी बरतने की आवश्यकता है. और रुशदी को लेकर आयोजकों को किसी मुश्किल में नहीं डाला जाना चाहिए.
रुशदी ने यह कहकर फ़ेस्टीवल में आने से मना कर दिया था कि उन्हें भाड़े के माफिया की ओर से जान से मार ‍दिये जाने का खतरा है. हालांकि राज्य सरकारों ने उनके इस बयान को अकारण बताया और इस बात से इनकार किया है कि उनके द्वारा ऐसी कोई जानकारी सलमान रुशदी को दी गई है.
सलमान रुशदी का तनाज़ात से चोली दामन का साथ रहा है. या यूं कहा जाए की वह लोगों की दिल आज़ारी के सबसे बड़े ठेकेदार हैं और ऐसा वह अपने आकाओं को खुश करने के लिए करते हैं.
मुंबई में पैदा हुए सलमान रुशदी अपने को कश्मीरी नसल का बताते हैं ने एक और नाविल शालीमार दी कलाउन भी लिखा था जो 2005 में प्रकाशित हुआ. इस उपन्यास में उन्होंने भारतीय सेना की बहुत ही ग़लत ढंग की छवि पेश की है. और कश्मीर के भीतरर फैले हुए गांवों पर सेना के हमलों के बारे में बढ़ा चढ़ा कर लिखा है.
सेना द्वारा इस्तेमाल होने वाले वाक्य क्रेक डाउन को उन्होंने बड़े पैमाने पर तबाही, बलात्कार और वहशी पन वाला एक खुश कलाम कहा है. जो हर समय होता है और अब भी हो रहा है. एक इंरटरव्यू में उन्होंने इस को तमाम कश्मीरियों के इलाज के लिए एक होलोकासट से ताबीर किया है जैसे कि वह सब आतंकवादी हैं.
उनका कहना है इस उपन्यास के द्वारा यह बताना चाहते हैं कि कश्मीर में जिहाद की ओर झुकाव भारतीय सेना की कारगुज़ारयों के कारण ही पैदा हुआ है. उनका कहना है कि कश्मीर के बारे में सबसे स्पष्ट तथ्य सैनिक साजो सामान की एक बहुत बड़ी मात्रा है जो वहाँ हर जगह मौजूद है. टैंक, ट्रक, होविटज़र, बज़ूका, भारी हथियार ‍‍िडपो, हथियारों के बड़े बड़े कनवाये जो संकरे पहाड़ी रास्तों पर एक सिरे से दूसरे तक छः छः घंटे तक चलते रहते हैं. और ईश्वर आपकी मदद करे यदि आप इस के पीछे फंस गए हैं, क्योंकि वहां से आगे निकलने का कोई तरीका नहीं होता. रुशदी ने कहा.
अपनी इस किताब के द्वारा रुशदी ने भारतीय सेना की छवि को जिस तरह क्षतिग्रस्त करने की कोशिश की है उस पर कभी कोई आवाज़ नही उठी और उनके खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं हुआ. ऐसा शायद इसलिए हुआ होगा क्योंकि भारतीय जनता की नज़रों में उनकी खुद की छवि इतनी क्षतिग्रस्त है कोई भी उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लेता और उनकी बातों को एक दीवाने की बक-बक से अधिक कुछ भी नहीं समझा जाता.
अब देखना यह है कि सलमान रुशदी की प्रतिबंधित पुस्तक सेटेनिक वर्सेज़ के खुलेआम प्रदर्शन और इससे अंश पढ़ने वाले चारों लेखकों और आरगनाईज़र्स के खिलाफ कोई कार्रवाई होगी भी या नहीं. या कि भारतीय कानून की धज्जियां उड़ाने की भी आज़ादी है.
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ممنوعہ کتاب پڑھے جانے پر فوری کارروائی ہو

Daily Pratap, Indias Oldest Urdu Daily
Published on 23th January 2012
عفیف احسن
1988میں جب بدنام زمانہ سلمان رشدی نے اپنا متنازعہ ناول’’سیٹینک ورسز‘‘ شائع کیاتھاتو اس کے بعد دنیا بھر میں ایک ریکارڈ تنازعہ پھٹ پڑا تھا۔ منظم مارچ اور مظاہروں کے ذریعہ اس کتاب کے مندرجات کے خلاف احتجاج کیا گیا۔ اس کتاب نے لوگوں کے جذبات کو اتنی گہرائی تک مجروہ کیا تھا کہ اس کی وجہ سے ان میں سے کچھ مظاہروں میں لامحالہ تشدد پھٹ پڑا اور کئی لوگ زخمی یا ہلاک ہو گئے۔
ایک طرف تو دنیا بھر کے مسلمان ممالک نے اس اشاعت کی مذمت کی اور ایران کے آیت اللہ خمینی نے اس کے خلاف فتویٰ جاری کیا، جبکہ دوسری طرف مغربی ممالک نے اس کی حمایت کی انتہائی کردی اور کھل کر اس اشاعت کا دفاع کیا۔ مغربی ممالک کا یہ دفاع برطانیہ، جہاں کتاب پہلی بار شائع کی گئی تھی کے رد عمل کی تقلید تھاجس میں برطانوی اسٹیبلشمنٹ نے دعوی کیا تھا کہ وہ اس کے خلاف کچھ بھی نہیں کرسکتے کیونکہ یہ اظہار رائے کی آزادی کے حق کے تحفظ کے منافی تھا۔ ایسا کرکے برطانیہ نے ’’جاسوس پکڑنے‘‘ کے معاملہ میں اپنی شکست کو آسانی سے دبادیا اور برطانیہ میں حکومت کے ذریعہ فحش ٹی وی چینلز کے ٹرانسمیشن پر کامیاب پابندی لگائے جانے سے لوگوں کا دھیا ن ہٹادیا۔ جہاں تک برطانیہ کا تعلق تھا تو ایسا لگتا تھا کہ ہوائی ترنگوں پر غیر مہذب زبان کی نشریات سے تقریر کی آزادی کی مقدس قسم کی خلاف ورزی ہوتی تھی لیکن معزز افراد کے خلاف غیر مہذب زبان کی اشاعت اورپاک کلام کے خلاف نازیبہ الفاظ کے ذریعہ اس کے لاکھوں شہریوں اور دنیا بھر کے مسلمانوں کو پہنچائی گئی تکلیف اور درد کے خلاف کچھ نہیں کیا جاسکتا تھا۔
گویا کہ اتنا کافی نہیں تھا، اس لئے بعد ازاں اس کتاب کی ایک ادبی صحیفہ کے طور پرتعریف اورتعضیم کی گئی اوراس کتاب کو بکر انعام کے لئے بھی نامزد کیا گیا۔ یہی نہیں مصنف کے ساتھ ایک ہیروجیسا برتاؤ کیا گیا اور اس کی بدنام زمانہ کتاب کو عوامی طور پرپڑھا گیا۔
جب مسلمانوں نے اس کے خلاف احتجاج کیا، تو ان کو تنگ خیال اور قدیم سوچ والا قرار دیا گیا۔ بریڈفورڈ کے شہر میں عوامی طور پر سلمان رشدی کی کتاب کی ایک کاپی جلائے جانے کے بعد اس کی فوٹیج کولگاتار مغربی میڈیا پر دکھایا جاتا رہا۔ اس واقعہ نے مغربی مسلم عوام کو جو کہ کئی دہائیوں سے قانون کو مانتا اور امن سے رہتا آیا تھا اور بھی زیادہ غصے سے بھر دیا اوراس کے رویے میں عسکریت پسند ی در کر آئی ۔
اسی دوران جب برطانیہ کے مسلمانوں نے عدالتوں میں انصاف تلاش کرنے کی کوشش کی تو ان کی کوششوں کو شروعات میں ہی زبردست دھکا لگاکیونکہ برطانیہ جیسے ایک کثیر مذہبی معاشرے میں توہین کے قوانین صرف عیسائی مذہب کی توہین تک ہی محدود تھے ، دیگر عقائد کی توہین کے لئے کوئی روک ٹوک نہیں تھی اور اسلام کی تو قطعی نہیں۔
اس پر ہندوستان میں بھی سڑک سے لیکر سنسد تک بہت زبردست ردعمل ہوا۔ ہندوستان کے اس وقت کے وزیر اعظم آنجہانی راجیوگاندھی نے دور اندیشی کا ثبوت دیتے ہوئے اس کتاب پر فوری طور پرپورے ملک میں پابندی عائد کردی اور اس کی اشاعت اور پڑھنا غیر قانونی قراردے دپا۔
لیکن پھر بھی اس متنازعہ اور ممنوعہ کتاب کی جے پور لٹریری فیسٹول میں کھلے عام نمائش کی گئی۔ یہی نہیں اس کتاب کو عوامی طور پر پڑھا گیا۔ ایسا کیا جانا ہندوستان کے قانون کی کھلی خلاف ورزی ہے اور ہندوستانی قانون کے خلاف عدم اعتماد کا کھلم کھلا مظاہرہ ہے۔ حالانکہ مصنف برادری سلمان رشدی کے ہندوستان آنے سے روکے جانے کی پرزور مخالفت کررہی تھی لیکن لڑیری فیسٹول میں اس ممنوعہ کتاب کے اقتباسات پڑھے جانے کے بعد مصنف برادری بنٹ گئی ۔ یہی نہیں ان اقتباسات کے پڑھے جانے کے بعد آرگنائزر س نے اپنی جان بچانے کے لئے ان چاروں مصنفین کو فیسٹول چھوڑ کر چلے جانے کے لئے کہہ دیاہے ۔ ان سے کہا گیا ہے کہ ان کی کسی بھی وقت گرفتاری ہوسکتی ہے۔ ایک ایس ایم ایس بھی سرکولیٹ کیا گیا ہے جس میں ’’سیٹینک ورسز‘‘ پڑھتے پائے جانے پرگرفتار ہونے کی بات کہی گئی ہے۔ اب وہی آرگنائزرس جو کے سلمان رشدی کے اس فیسٹول میں نہ آنے دئے جانے کو ایک مدعہ بنائے ہوئے تھے، انہوں نے ہی چار دوسرے ایسے مصنفین کو فیسٹول سے چلے جانے کے لئے کہہ دیا ہے جنہوں نے یہ کتاب کھلے عام پڑھی تھی۔ آرگنائزرس کی اس دوہرے ماپ دنڈ سے ان کی نیت کھل کر سامنے آگئی ہے۔ اب ان کی اظہار رائے کی آزادی کی دلیل کا کیا ہوا۔
مصنف چیتن بھگت نے مصنف برادری سے اپیل کی ہے کہ ممنوعہ لوگوں کو ہیرو بنانے کی کوشش نہ کی جائے۔ انہوں نے کہا کہ اگر کسی کا لکھا کچھ لوگوں کو برا لگا ہے تو انہیں احتجاج کرنے کا حق حاصل ہے۔ قانون کو اپنے ہاتھ میں لینا ٹھیک نہیں ہے۔
جانے مانے ملیالم مصنف کے سچدانند کا ماننا ہے کہ غیر ضروری تنازعات سے بچنے کے لئے احتیاط برتنا ضروری ہے۔ اور رشدی کو لیکر آرگنائزر س کو کسی مشکل میں نہیں ڈالا جانا چاہئے۔
رشدی نے یہ کہہ کر فیسٹول میں آنے سے منع کردیا تھا کہ انہیں بھاڑے کے مافیا کی طرف سے جان سے ماردئے جانے کاخطرا لاحق ہے۔ حالانکہ ریاستی حکومتوں نے ان کے اس بیان کو بلاوجہ بتایا ہے اور اس بات سے انکار کیا ہے کہ ان کی طرف سے ایسی کوئی جانکاری سلمان رشدی کو دی گئی ہے۔
سلمان رشدی کاتنازعات سے چولی دامن کا ساتھ رہاہے۔ یا یوں کہا جائے کے وہ لوگوں کی دل آزاری کے سب سے بڑے ٹھیکیدار ہیں اور ایسا وہ اپنے آقائوں کو خوش کرنے کے لئے کرتے رہتے ہیں۔
ممبئی میں پیدا ہوئے سلمان رشدی جو اپنے آپ کو کشمیری نسل کا بتاتے ہیں نے ایک اورناول ’’شالیمار دی کلائون ‘‘بھی لکھا تھا جو 2005میں شائع ہوا ۔ اس ناول میں انہوں نے ہندوستانی افواج کی بہت ہی غلط انداز میں تصویر کشی کی ہے۔ اور کشمیر کے طول العرض میں پھیلے ہوئے گائوں پر فوج کے حملوں کے بارے میں بڑھا چڑھا کر لکھا ہے۔
فوج کے ذریعہ استعمال ہونے والے جملے ’’کریک ڈاؤن‘‘ کو انہوں نے بڑے پیمانے پر تباہی، عصمت دری اور وحشی پن والا ایک خوش کلام کہا ہے۔ جو کہ ہر وقت ہوتا ہے اور اب بھی ہو رہا ہے۔ ایک انڑویو میں انہوں نے اس کوتمام کشمیریوں کا علاج کرنے کے لئے ایک ’’ہولوکاسٹ‘‘ سے تعبیر کیا ہے جیسے کہ وہ سب دہشت گرد ہوں۔
ان کا کہنا ہے کے اس ناول کے ذریعہ وہ یہ بتانا چاہتے ہیں کہ کشمیر میں جہاد کی طرف جھکائو ہندوستانی افواج کی کارگزاریوں کی وجہ سے ہی پیدا ہوا ہے۔ ان کا کہنا ہے کہ کشمیر کے بارے میں سب سے واضح حقائق فوجی ساز وسامان کی ایک بہت بڑی مقدار ہے جوکہ وہاں ہر جگہ موجود ہے ۔ ٹینک، ٹرک،ہاوٹزر، بزوکا، بھاری ہتھیار ڈپو، ہتھیاروں کے بڑے بڑے کنوائے جو ان سنکرے پہاڑی راستوں پر ایک سرے سے دوسرے تک چھ چھ گھنٹے تک چلتے رہتے ہیں۔ اور خدا آپ کی مدد کرے اگر آپ اس کے پیچھے پھنس گئے ہیں، کیونکہ وہاں اس سے آگے نکلنے کا کوئی طریقہ نہیں ہوتاہے۔ رشدی نے کہا۔
اپنی اس کتاب کے ذریعہ رشدی نے ہندوستانی فوج کی شبیہ کو جس طرح مسخ کرنے کی کوشش کی ہے اس پر کبھی بھی کوئی آواز نہی اٹھی اور ان کے خلاف کوئی معاملہ درج نہیں ہوا۔ ایسا شاید اس لئے ہوا ہوگا کیونکہ ہندوستانی عوام کی نظرو ں میں ان کی خود کی شبیہ اتنی مسخ ہے کے کوئی بھی ان کی باتوں کو سنجیدگی سے نہیں لیتا اور ان کی باتوں کو ایک دیوانے کی بک بک سے زیادہ کچھ بھی نہیں سمجھا جاتاہے۔
اب دیکھنا یہ ہے کہ سلمان رشدی کی ممنوعہ کتاب ’’سیٹنک ورسز‘‘ کی کھلے عام نمائش اور اس سے اقتباسات پڑھنے والے چار وں مصنفین اور اس کے آرگنائزرس کے خلاف کوئی کارروائی ہوگی بھی کہ نہیں۔ یا کہ ہندوستانی قانون کی دھجیاں اڑانے کی بھی آزادی ہے۔
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Monday, 16 January 2012

2 जी घोटाला और साम्प्रदायिकता

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 16th  January 2012
अफ़ीफ़ अहसन
आप सवाल करेंगे की 2 जी घोटाले का साम्प्रदायिकता से किया लेना देना हे। मगर ये सच्च है कि सियासत दां अपने बचाव के लिये किसी भी मुद्दे को बीच में घसीट लेते हैं। काफ़ी दिन से सुब्रामणियम स्वामी को ये ख़ौफ़ सता रहा था कि कहीं चिदम्बरम उन को गिरफ़्तार ना करवादें। उन का ये ख़ौफ़ बेबुनियाद भी नहीं था। उन की गिरफ़्तारी किसी भी वकत हो सकती थी क्योंकि उन्होंने काम ही ऐसा विवादास्पद किया था।
दिल्ली पुलिस की क्राईम ब्रांच ने पिछले साल अक्तूबर में स्वामी के ख़िलाफ़ एक एफ़आईआर दर्ज की थी। ये एफ़आईआर जुलाई में एक अंग्रेज़ी देनिक डीएनए में प्रकाशित सुब्रामणियम स्वामी के एक कालम के बाद दर्ज की गई थी जिस में उन्होंने मुस्लमानों के सम्बंध में बेहूदा और भद्दी बातें लिखें थीं और नफरत फैलाने का काम किया था।
स्वामी ने अपने कालम में साम्प्रदायिकता का प्रदर्शन करते हुए फ़रमाया था कि हिंदूस्तान में सिर्फ उन्ही मुस्लमानों को वोट का हक़ मिलना चाहीए जो इस बात को स्वीकार करें कि उनके पूर्वज हिन्दू थे। स्वामी ने हिंदूस्तान की सैंकड़ों मसजिदों को ढाने की भी वकालत की थी।
अपनी एफ़आईआर में पुलिस का ये कहना है कि उन का यह लेख साम्प्रदायों के बीच दुश्मनी और नफ़रत फैलाने वाला है।
स्वामी ने अपनी गिरफ़्तारी के डर से दिल्ली हाईकोर्ट में गुरूवार को अपने वकील महीन प्रधान के द्वारा अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी दाख़िल की। स्वामी की तरफ़ से सीनीयर वकील केटीऐस तुलसी ने बहस की और ये दलील पेश की कि क्योंकि 2 जी इसपेकट्रम मामले में चिदम्बरम के रोल को लेकर स्वामी ने अदालत में उन के ख़िलाफ़ सबूत पेश किये थे, चिदम्बरम की तरफ से मेमो, सीआईटी और ग्रह मंत्री और पुर्व संचार मंत्री ए राजा के बीच हुए पत्र-व्यवहार की कापी कोर्ट को सौंपी थी, 2 जी घोटाले में चिदम्बरम को मुल्ज़िम बनाए जाने की मांग की है और ये इल्ज़ाम लगाया है कि घोटाले को राजा और चिदम़्बरम ने मिल कर सामूहिक रूप से अंजाम दिया है। और ये भी इल्ज़ाम लगाया है कि ग्रह मंत्री चिदम्बरम ने देश की सुरक्षा को भी ख़तरे में डाल दिया है। इसलिए चिदम़्बरम ने बदले की नीयत से उनके ख़िलाफ़ ये केस दर्ज कराया है और वह उनको गिरफ़्तार करवाना चाहते हैं ताकि वो आगे गवाही ना दे सकें। स्वामी के वकील ने कहा कि स्वामी का लेख उन की एक छः साल पुरानी किताब पर आधारित है और इस किताब के छपने के बाद कोई अप्रिय घटना नहीं घटी थी।
दिल्ली हाई कोर्ट के माननीय जज जस्टिस ऐमऐल मेहता ने स्वामी की अग्रिम ज़मानत अर्ज़ी के मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि हम धर्मनिरपेक्ष देश हैं और हमें इस प्रणाली का सम्मान करना चाहिए। अदालत ने कहा कि हिंदुस्तान कोई ब्रिटेन या यूरोपियन देश जैसा नहीं है बल्कि हमारी गंगा जमुनी संस्कृति है जिस पर हमें गर्व होना चाहिए। अदालत ने स्वामी से कहा कि अगर वो ये क़ौल दें कि उकत किताब से सम्बंदधित आगे कुछ नहीं लिखेंगे तो उनको राहत दी जा सकती है। इस के बाद स्वामी ने कोर्ट को ये आशवासन दिलाया कि व भविष्य में ऐसा कोई लेख नहीं लिखेंगे जिस से भावनायें आहत हों। बाद में जस्टिस ऐमऐल मेहता ने स्वामी को उन के विवादास्पद भड़काऊ लेख के मामले में संभावित गिरफ्तारी से 30 जनवरी तक अंतरिम राहत दे दी। अदालत ने दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी करते हुए जवाब भी मांगा है।
इस से पहले स्वामी को तब बहुत ज़बरदस्त झटका लगा था जब दिसंबर में 375 साल पुरानी हारवर्ड यूनीवर्सिटी (कैंब्रिज, अमरीका) ने सुब्रामणियम स्वामी को अपने सम्मानित शैक्षणिक संस्थान से बाहर कर दिया था। इसी के साथ उनके दवारा पढ़ाए जा रहे दो पाठयक्रम भी यूनीवर्सिटी से हटा दिए गए जिस की शिक्षा के लिए स्वामी जी यूनीवर्सिटी में बतोर प्रोफ़ैसर नियुक्त रहे थे।
यह उल्लेखनीय हे कि स्वामी के विवादास्पद लेख पर एतराज़ात के बावजूद यूनीवर्सिटी ने अभिTop of Form
व्यक्त की स्वतंत्रता का लाभ देते हुए डॉक्टर साहब को शिक्षण के लिए आमंत्रित करना चाहा था मगर 400 से अधिक छात्रों ने प्रोफेसर स्वामी को हटाए जाने की अनुरोध याचिका दायर की। विश्वविद्यालय फ़ेकलटीज़ ने बैठक में बहस के बाद तय किया कि स्वामी का लेख एक धार्मिक समुदाय के खिलाफ नकारात्मक प्रचार और पवित्र स्थलों के खिलाफ हिंसा की घोषणा करता है। इसलिए हारवर्ड यूनीवर्सिटी की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह खुद को ऐसे व्यक्ति के साथ न जोडे जो किसी अल्पसंख्यक वर्ग के खिलाफ घृणा का भाव दर्शाता है।
अब सुनिए उन साहब का हाल जिनकी ओर से स्वामी की गिरफ्तारी का खतरा बताया जा रहा है यानी के पी चिदंबरम। वह भी बहाने बाजी में स्वामी से कम नहीं हैं। 2 जी घोटाले में अपने आप को फंसता देखकर उन्होंने भी इसी प्रकार का बहाना बनाया और आरोप लगाए। पिछले साल जुलाई में एक संवाददाता सम्मेलन करके उन्होंने यह आरोप लगाया कि दक्षिण पंथी आतंकवादी दलों के खिलाफ आतंकवाद के नौ मामले दर्ज हैं जिनमें बम बनाने और लोगों की हत्या के मामले हैं, इसलिए भारतीय जनता पार्टी, यूपीए के चु‍निन्दा मंत्रियों के खिलाफ आरोप लगा रही है क्योंकि यूपीए सरकार उनकी जांच में तेजी लाई है। चिदंबरम ने यह भी आरोप लगाया कि भाजपा द्वारा हमले किए जाने का एक कारण यह भी हो सकता है कि अयोध्या मामलों में सरकार अदालत को लगातार सुनवाई करने के लिए राजी करने में कामयाब रही है। उन्होंने यह बात उस सवाल के जवाब में कही कि भाजपा उनको 2 जी मामले से क्यों लिंक कर रही है।
चिदंबरम ने कहा था कि वह किसी दूसरी वजह के बारे में सोच भी नहीं सकते। मैं सोचता हूँ कि कारण यह है कि उन्हें लगता है कि यह सरकार गंभीरता से बम धमाके के मामलों की जांच कर रही है जिनमें दक्षिण पंथी बुनियाद परस्त तत्व शामिल हैं। उनहोंने कहा था की स्पष्ट रूप से दक्षिण पंथी बुनियाद परस्त तत्वों में से कई आरएसएस से जुड़े हैं।
गृहमंत्री पी चिदम्बरम द्वारा बम हमलों के लिए इन गुटों पर आरोप लगाए जाने पर मज़बूत टिप्पणी करते हुए भाजपा ने कहा था कि उनका यह बयान पाकिस्तान द्वारा 26/11 हमलों के दोषियों के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई न करने के पक्ष को मजबूत करेगा।
भाजपा के प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि मुझे लगता है कि एक शिष्ट वकील, जैसे की चिदंबरम हैं, ने अपने बचाव में कुछ बहतर तर्क ईजाद किये होते। अब जबकी उनकी पूरी गर्दन गहराई तक 2 जी स्कैंडल में फंसी है, जिसकी वजह से करदाताओं के लाखों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ और जो ‍दिनों दिन तेजी से जाहिर हो रहा है।
यह वही चिदंबरम साहब हैं जो ताल ठोंक कर कह रहे थे के बटला हाउस एनकाउन्टर सही था और उसकी जाँच की कोई आवश्यकता नहीं है। अब फिर उन्होंने अपने इस मत को दोहराया है। जब उनका पक्ष यहां भाजपा के पक्ष से बिल्कुल मेल खाता है तो फिर वह कैसे भाजपा को अपना दुश्मन बताते हैं।
चिदंबरम और स्वामी में इतना अंतर है कि जब चिदंबरम को लगा कि वह 2 जी घोटाले में फंस रहे हैं तो उन्होंने दक्षिण पंथी सोच रखने वालों के खिलाफ लिए गए एक्शन को अपनी ढाल के रूप में इस्तेमाल किया जबकि दूसरी तरफ जब स्वामी को लगा की वह अपनी दक्षिण पंथी सोच के कारण फंस रहे हैं तो उन्होंने 2 जी को अपनी ढाल के रूप में इस्तेमाल किया़।
हमारे देश में काफी बुद्धिमानी और सहनशील लोग रहते हें और एसी अनर्गल और बेकार बातों पर तुरंत प्रतीक्रया नहीं करते मगर एसी बातों से धीरे-धीरे, अन्दर ही अन्दर नफरत का जवालामुखी सुलगता रहता हे और वह कभी भी फट सकता हे।
दिल्ली हाईकोर्ट के माननीय जज जस्टिस एमएल मेहता की जितनी तारीफ की जाए कम है उन्होंने यह बात साफ कर दी है कि गंगा जमुनी संस्कृति वाले देश हिन्दुस्तान में इस तरह की घृणा फैलाने की कोई जगह नहीं है। उन्होंने स्वामी से करार भी ले ली है कि अब वह आगे इस प्रकार के लेख नहीं लिखेंगे।
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ٹوجی گھوٹالہ اور فرقہ پرستی

Daily Pratap, Indias Oldest Urdu Daily
Published on 16th January 2012
عفیف احسن
آپ سوال کریں گے کے ٹوجی گھوٹالے کا فرقہ پرستی سے کیا تعلق ہے۔ مگریہ سچ ہے کہ سیاست داں اپنے دفاع میں کسی بھی معاملے کو بیچ میں گھسیٹ لیتے ہیں۔ کافی دن سے سبرامنیم سوامی کو یہ خوف ستا رہا تھا کہ کہیں چدمبرم ان کو گرفتار نہ کروادیں۔ ان کا یہ خوف بے بنیاد بھی نہیں ہے۔ ان کی گرفتاری عمل میں لائی جاسکتی تھی کیونکہ انہوں نے کام ہی ایسامتنازعہ کیا تھا۔
دہلی پولیس کی کرائم برانچ نے پچھلے سال اکتوبر میں سوامی کے خلاف ایک ایف آئی آر درج کی تھی۔یہ ایف آئی آر جولائی میں ایک انگریزی روزنامہ ڈی این اے میں شائع سبرامنیم سوامی کے ایک کالم کے بعد درج کی گئی تھی جس میں انہوں نے مسلمانوں کے تعلق سے بے ہودہ اور لغو باتیں لکھیں تھیں اورمنافرت پھیلانے کا کام کیا تھا۔
سوامی نے اپنے کالم میں مذہبی تعصب کا مظاہرہ کرتے ہوئے فرمایا تھا کہ ہندوستان میں صرف انہی مسلمانوں کو ووٹ کا حق ملنا چاہئے جو اس بات کا اعتراف کریں کہ ان کے آبا و اجداد ہندو تھے۔ نیزسوامی نے ہندوستان کی سینکڑوں مساجد کو ڈھانے کی بھی وکالت کی تھی۔ اپنی ایف آئی آر میں پولیس کا یہ کہنا ہے کہ ان کایہ مضمون فرقوں کے درمیان دشمنی اور منافرت پھیلانے والا ہے۔
سوامی نے اپنی گرفتاری کے خدشہ کے پیش نظر دہلی ہائی کورٹ میں جمعرات کو اپنے وکیل مہین پردھان کے ذریعہ پیشگی ضمانت کی عرضی داخل کی ۔ سوامی کی طرف سے سینیئروکیل کے ٹی ایس تلسی نے بحث کی اور یہ دلیل پیش کی کہ کیونکہ ٹوجی اسپیکٹرم معاملے میں چدمبرم کے رول کو لے کر سوامی نے عدالت میں ان کے خلاف ثبوت سونپے تھے،چدمبرم کی جانب سے میمو، سی آئی ٹی اور وزیر داخلہ اور سابق وزیر مواصلات اے راجا کے درمیان ہوئے ترسیل کی کاپی کورٹ کو سونپی تھی،ٹوجی گھوٹالے میں چدمبرم کو ملزم بنائے جانے کا مطالبہ کیا ہے اور یہ الزام لگایا ہے کہ گھوٹالے کو راجا اور چدمبرم نے مل کر مشترکہ طور پر انجام دیا ہے۔ اور یہ بھی الزام لگایا ہے کہ وزیر داخلہ چدمبرم نے ملک کے تحفظ کو بھی خطرے میں ڈال دیا ہے۔اس لئے چدمبرم نے بدلے کی نیت سے ان کے خلاف یہ کیس درج کرایا ہے اوروہ ان کو گرفتار کروانا چاہتے ہیں تاکہ وہ آگے گواہی نہ دے سکیں۔سوامی کے وکیل نے کہا کہ ان کا مضمون ان کی ایک چھ سال پرانی کتاب پر مبنیٰ ہے اور اس کتاب کے چھپنے کے بعد کوئی ناخوشگوار واقعہ رونما نہیں ہواتھا۔
معززجج جسٹس ایم ایل مہتہ نے سوامی کی پیشگی ضمانت عرضی کے معاملے میں سماعت کرتے ہوئے کہا کہ ہم سیکولر ملک ہیں اور ہمیں اس نظام کا احترام کرنا چاہئے۔ عدالت نے کہا کہ ہندوستان کوئی برطانیہ یا یوروپین ملک جیسا نہیں ہے بلکہ ہماری گنگا جمنی تہذیب ہے جس پر ہمیں فخر ہونا چاہئے۔
عدالت نے سوامی سے کہا کہ اگر وہ یہ قول دیں کہ مذکورہ کتاب کے متعلق آگے کچھ نہیں لکھیں گے تو ان کو راحت دی جاسکتی ہے۔اس کے بعد سوامی نے کورٹ کو یہ یقین دہانی کرائی کہ وہ مستقبل میں ایسی کوئی تحریر نہیں لکھیں گے جس سے جذبات مجروح ہوں۔ بعد ازاں معززجج جسٹس ایم ایل مہتہ نے سوامی کوان کی متنازع اشتعال انگیز تحریر کے معاملے میں ممکنہ گرفتاری سے30 جنوری تک عبوری راحت دے دی۔ عدالت نے دہلی پولیس کو نوٹس جاری کرتے ہوئے جواب مانگا ہے۔
اس سے قبل سوامی کو تب بہت زبردست جھٹکا لگا تھا جب دسمبرمیں375 سالہ قدیم ہارورڈ یونیورسٹی (کیمبرج ، امریکہ) نے سبرامنیم سوامی کو اپنے موقر تعلیمی ادارے سے خارج کر دیا تھا۔ اسی کے ساتھ ان کے ذریعہ پڑھائے جارہے دو نصاب بھی یونیورسٹی سے خارج کر دئے گئے جس کی تعلیم کے لئے سوامی صاحب یونیورسٹی میں بحیثیت پروفیسر فائز رہے تھے ۔
واضح رہے کہ سوامی کے متذکرہ متنازعہ مضمون پر اعتراضات کے باوجود یونیورسٹی نے اظہار رائے کی آزادی کا فائدہ دیتے ہوئے ڈاکٹر صاحب کو درس کیلئے مدعو کرنا چاہا تھا مگر 400 سے زائد طلبا نے پروفیسر سوامی کو ہٹائے جانے کی درخواست دائر کی۔ یونیورسٹی فیکلٹیز نے اجلاس میں بحث کے بعد فیصلہ کیا کہ ڈاکٹر سوامی کا مضمون ایک مذہبی فرقے کے خلاف منفی تشہیر اور مقدس مقامات کے خلاف تشدد کا اعلان کرتا ہے۔ لہذا ہارورڈ یونیورسٹی کی اخلاقی ذمہ داری بنتی ہے کہ وہ خود کو ایسے شخص کے ساتھ وابستہ نہ کرے جو کسی اقلیتی طبقے کے خلاف نفرت کا احساس ظاہر کرتا ہے۔
اب سنئے ان صاحب کا حال جن کی طرف سے سوامی کو گرفتاری کا خطرہ بتایا جارہا ہے، یعنی کے پی چدمبرم ۔ وہ بھی بہانے بازی میں سوامی سے کم نہیں ہیں۔ٹو جی اسکیم میں اپنے آپ کو پھنستا دیکھ کر انہوں نے بھی اسی قسم کا بہانہ بنایااور الزام لگائے۔پچھلے سال جولائی میں ایک پریس کانفرنس کرکے انہوں نے یہ الزام لگایا کہ دائیں بازو کی دہشت گرد جماعتوں کے خلاف دہشت گردی کے نو کیس درج ہیں جن میں بم بنانے اور لوگوں کی جان لینے کے کیس ہیں اس لئے بی جے پی، یوپی اے کے چنندہ وزیروں کے خلاف الزامات لگارہی ہے کیونکہ یوپی اے حکومت ان کی تفتیش میں تیزی لائی ہے۔ چدمبرم نے یہ بھی الزام لگایا کہ بی جے پی کے ذریعہ حملہ کیے جانے کی وجہ یہ بھی ہو سکتی ہے کہ ایودھیہ کیسوں میں سرکارعدالت کو متواتر سنوائی کرنے کے لئے راضی کرنے میں میاب رہی ہے۔انہوں یہ بات اس سوال کے جواب میں کہی کہ بی جے پی ان کو ٹوجی معاملے سے کیوں لنک کررہی ہے۔
چدمبرم نے کہاتھا کہ وہ کسی دوسری وجہ کے بارے میں سوچ بھی نہیں سکتے۔’’میں سوچتا ہوں کہ وجہ یہ ہے کہ انہیں لگتا ہے کہ یہ حکومت سنجیدگی سے ان بم دھماکہ کے کیسوں کی تحقیقات کررہی ہے جن میں دائیں بازو کے بنیاد پرست عناصر شامل ہیں۔واضح طور پر ان دائیں بازو کے بنیاد پرست عناصر میں سے کئی آر ایس ایس سے منسلک ہیں۔‘‘
وزیر داخلہ پی چدمبرم کے ذریعہ بم حملوں کے لئے ان گروہوں پر الزام لگا ئے جانے پر مضبوط تبصرہ کرتے ہوئے بی جے پی نے کہا تھا کہ ان کا یہ بیان پاکستان کے ذریعہ26/11 حملوں کے قصورواروں کے خلاف کوئی کٹھور کارروائی نہ کرنے کے اس کے موقف کو مزید تقویت دے گا۔
بی جے پی کے ترجمان روی شنکر پرساد نے کہاتھا کہ ’’مجھے لگتا ہے کہ ایک دلکش وکیل، جیسے کہ چدمبرم ہیں، نے اپنے دفاع میں کچھ بہتر منطق ایجاد کی ہوتی ۔اب جبکہ ان کی پوری گردن گہرائی تک 2G سکینڈل میں پھنسی ہوئی ہے،جس کی وجہ سے ٹیکس ادا کرنے والوں کا لاکھوں کروڑ روپے کا نقصان ہوا،اور جودن بدن تیزی سے عیاں ہورہا ہے۔‘‘
یہ وہی چدمبرم صاحب ہیں جو تال ٹھونک کر یہ کہہ رہے تھے کے بٹلا ہاؤس انکاؤنٹر بالکل درست تھا اور اس کی جانچ کی کوئی ضرورت نہیں۔ ابھی پھر انہوں نے اپنے اس موقف کو دوہرایا ہے۔جب انکا موقف یہاں پر بی جے پی کے موقف سے بالکل میل کھاتا ہے تو پھروہ کیسے بی جے پی کو اپنا دشمن بتا تے ہیں۔
چدمبرم اور سوامی میں صرف اتنا فرق ہے کہ جب چدمبرم کو لگا کہ وہ ٹوجی گھوٹالے میں پھنس رہے ہیں تو انہوں نے دائیں بازو کی سوچ رکھنے والوں کے خلاف لئے گئے ایکشن کو اپنی ڈھال کے طور پر استعمال کیا جبکہ دوسری طرف جب سوامی کو لگا کہ وہ دائیں بازو کی اپنی روش کی وجہ سے پھنس رہے ہیں تو انہوں نے ٹوجی کو اپنی ڈھال کے طور پر استعمال کیا۔
ہمارے ملک میں کافی عقلمنداورقوی قوت برداشت والے لوگ رہتے ہیں اور ایسی بے بنیاد اور بیکار باتوں پر فوراً ردعمل نہیں ظاہرکرتے مگر ایسی باتوں سے دھیرے دھیرے، اندرہی اندر نفرت کا جوالامکھی سلگتا رہتا ہے اور وہ کبھی بھی پھٹ سکتا ہے۔
دہلی ہائی کورٹ کے معزز جج جسٹس ایم ایل مہتہ کی جتنی تعریف کی جائے کم ہے انہوں نے یہ بات صاف کردی ہے کہ گنگا جمنی تہذیب والے ملک ہندوستان میں اس طرح کی منافرت پھیلانے کی کوئی جگہ نہیں ہے۔ انہوں نے سوامی سے یہ قرار بھی لے لی ہے کہ اب وہ آگے اس قسم کے آرٹیکل نہیں لکھیں گے۔
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Monday, 9 January 2012

بھلا اُسکی قمیض میری قمیض سے سفید کیسے؟

Daily Pratap, Indias Oldest Urdu Daily
Published on 9th January 2012
عفیف احسن
  این آر ایچ ایم میں 3700کروڑ کاگھوٹالا۔سی ایم اوڈاکٹرونود آریہ کا قتل ۔سی ایم اوڈاکٹر بی پی سنگھ کا قتل۔ ڈپٹی سی ایم اوڈاکٹر سچان کاجیل میں قتل یا خودکشی۔سی بی آئی جانچ اور چھاپے۔
اگر اوپر دی ہوئی فہرست میں ایک سرخی شامل نہ کی جائے تو کہانی ادھوری رہ جاتی ہے اور وہ ہے، بابو سنگھ کشواہاکا گھوٹالوں کو لیکر مایاوتی کے ذریعہ وزیر کے عہدے سے ہٹایا جانا۔
یہاں تک تو ٹھیک تھا۔ مگر جس دن مایاوتی نے ان کو بی ایس پی سے نکالا اس کے اگلے ہی دن ان کو بی جے پی نے گلے لگا لیا۔ جس پر بی جے پی کے مخالفوںکو اس پر حملہ کرنے کا ایک نادر موقعہ ہاتھ آگیا اور ابھی تک چاروں طرف سے کرپشن کے الزامات سے گھری کانگریس میں پھر سے جان پڑگئی۔ بی جے پی کے اعلیٰ قائدین کو تو منہ چھپانے کے لئے جگہ ملنامشکل ہوگئی اور وہ کونے ڈھونڈتے ہوئے نظر آئے۔ جو لیڈر ٹی وی والوں کو فون کرکر کے ہر مدعے پر اپنا بیان دینے سے نہیں چوکتے تھے ان کی بولتی ہی بند ہوگئی۔ ٹی وی والوں کو ملے بھی تو صرف مختار عباس نقوی حالانکہ وہ کوئی چھوٹے موٹے قائد نہیں ہیں مگر جب آپ کو پارٹی کی تمام غلط باتوں کا بچائو کرنے کے لئے ہمیشہ آگے کردیا جائے تو اسی سے پتا چل جاتا ہے کہ آپ کس پایہ کے قائد ہیں۔
جو سمجھدارقائد تھے انہوں نے تو یہی بہتر سمجھا کہ اس معاملے میں چپ رہنا ہی بہتر ہے۔جب پارٹی کے بڑے بڑے قائدوں نے راشٹر پتی بھون تک مارچ نکالااور صدر کو انہوں نے ایک میمورینڈم پیش کیا جس میں انہوں نے کانگریس کے ذریعہ مضبوط لوک پال بل پاس نہ کرائے جانے اور راجیہ سبھا کی کارروائی ملتوی کردینے کے خلاف اپنی ناراضگی ظاہر کی اور سیشن دوبارہ بلائے جانے کی مانگ کی تھی، تب بھی ان کی اس دوغلی پالیسی کا سب ہی جگہ مزاق اڑایا گیا اور ہر رپورٹر ان سے کشواہا معاملے پر ہی سوالات کرتا رہا جس کا جواب کوئی بھی دینے کو تیار نہیں تھا۔
ایسا اس لئے ہوا کیونکہ کوئی بھی بڑا لیڈر اس معاملے پر حق گوئی کی حالت میں نہیں تھا۔ کیونکہ کشواہا کو پارٹی کے سب سے بڑے لیڈر یعنی کے پارٹی صدر گڈکری نے بذات خود پارٹی میں شامل کرنے کی منظوری دی تھی۔ اور پارٹی صدر کو ناراض کرنے کا خطرہ کوئی بھی مول نہیں لے سکتا۔ خاص کر ایسے صدر کو ناراض کرنا جس کو آرایس ایس نے بی جے پی پر مسلط کیا ہو۔ مگر جب آر ایس ایس نے ہی اس معاملے پر اپنی ناراضگی ظاہر کی تو یوپی کے بی جے پی قائدین نے بھی اس فیصلے کے خلاف محاظ کھول دیا ۔امابھارتی نے کیمپین کرنے سے منا کردیا۔ یوگی آدتیہ ناتھ نے کھل کر بولا، مینکا گاندھی بھی خوب بولیںان کو چھوڑ کرباقی یوپی کے قائدین اس معاملے میں یا تو کشواہا کی شمولیت کی حمایت کرتے نظر آئے یا پھر چپی سادھے رہے۔ مگر کشواہا کی شمولیت کے خلاف بولنے والوں کابھی اپنا اپنا نجی ایجنڈا تھا۔
اما بھارتی اس لئے ناراض تھیں کے ان کو دھکے کھانے پڑ رہے ہیں اور کیمپین کے لئے ان کو ضروری سازو سامان مہیّا نہیں کرایا جارہا ہے۔نا ہی ان کو کوئی وقعت دی جارہی ہے۔بعد میں پارٹی ہائی کمانڈ نے ان کو ایڈوانی جی کا رتھ دینے کا وعدہ کرکے بہلا لیا۔ یہ وہی رتھ ہے جس پر ایڈوانی جی سوار ہوکر پورے دیش میں بدعنوانی کے خلاف یاترا پر گئے تھے۔ یہ وہی رتھ یاترا ہے جس کے بارے میں کانگریس کے راشد علوی کہہ رہے ہیں کہ ایڈوانی جی رتھ پر سوار ہوکر بدعنوانی کے خلاف مہم پر نہیں گئے تھے بلکہ ایسے بدعنوان لوگوں کی تلاش میں گئے تھے جن کو پارٹی میں شامل کیاجاسکے۔گڈکری جی کے اس ایک غلط فیصلے نے ایڈوانی جی کی یاترا پر پانی پھیرنے کا کام کیااور ان کے مخالفوں کو بولنے کا موقعہ دیا۔ ایسا نہیں ہے کہ ایڈوانی جی کی یاتراپر پانی پھیرنے کی یہ پہلی کوشش ہے۔ یاترا شروع ہونے سے پہلے انہیں آرایس ایس کو صفائی پیش کرنی پڑی، بعد میں مودی کو ان کی یاترا کا مخالف بتایا گیا اور پارٹی کے دوسرے قائدین کے بارے میں بھی یہ کہا گیا کہ وہ اس یاترا سے خوش نہیں ہیں۔
حالانکہ یوگی آدتیہ ناتھ نے کھل کر اس شمولیت کی مخالفت کی ہے لیکن ان کا بھی اپنا ایک ایجنڈا ہے۔ وہ یہ چاہتے ہیں کے پوروانچل میں ان کے چاہنے والوں کو تیس سیٹیں دی جائیں۔پچھلے اسمبلی الیکشن میںبھی سیٹ کے بنٹوارے کو لیکر انہوں نے پارٹی کی مخالفت کی تھی اورپارٹی چھوڑنے تک کی دھمکی دے ڈالی تھی، مگر بعد میں ان سے سمجھوتہ ہوگیا تھا اور ان کے چہیتوں کو زیادہ سے زیادہ سیٹیں ملی تھیں۔ اس لئے انہیں تو مخالفت کرنی ہی تھی یہی موقعہ سہی۔ لیکن اب جب کے کشواہا نے اپنے آپ کو پارٹی سے سسپینڈ کرلیا ہے تو یوگی کیا کریں گے۔ ان کا ایک بارگیننگ پوائنٹ تو چلا گیا ، اور پارٹی لیڈرشپ کی ناراضگی مول لی وہ الگ۔مگر یوگی ہار ماننے والے نہیں ہیں وہ جلد ہی دوبارہ پارٹی کی مخالفت میں کھڑے نظر آئیںگے۔
مینکا گاندھی کافی وقت سے اپنے آپ کو الگ تھلگ محسوس کررہی تھیں۔ اور ان کے علاقے میں سیٹوں کے بنٹوارے میں بھی ان کی نہیں چل رہی ہے۔اس لئے انہوں نے بھی موقع دیکھ کر پارٹی میں کشواہا کی شمولیت کے خلاف بیان دے دیا۔
کشواہا کی شمولیت کے حق میں جو بھی بی جے پی قائدین ہیں ان کا یہ کہنا ہے کہ کیونکہ کشواہا ذات کے ووٹوں کی تعداد یوپی کے کل ووٹوں کاچارفیصد ہے اس لئے پارٹی کو ان کی شمولیت سے فائدہ ملے گا اور کشواہا برادری کا سارا ووٹ بی جے پی کو ملے گا۔
بی جے پی کے قومی نائب صدر ونے کٹیا ر نے کانگریس کو چیلنج کرتے ہوئے کہا کہ اگر کانگریس میں ذرا بھی اخلاقیات ہے تو وہ اعلان کریں کہ پارلیمنٹ میں سماج وادی پارٹی، بی ایس پی کے اراکین کی حمایت نہیںلیں گے۔بابو سنگھ کشواہا کو پارٹی میں شامل کرنے کے جھٹکے سے نکلنے کے لیےانہوں نے اعلان کیا کہ پارٹی بدعنوانی کو جڑ سے نیست و نابود کرنے کے لئے مہم چھےڑےگی اور اسی لئے بابو سنگھ کشواہا کو پارٹی میں لیا ہے۔ کشواہا کے آنے سے مایاوتی کی بدعنوانی کا پردہ فاش ہو سکے گا۔پارٹی نے بابو سنگھ کشواہا کو مایاوتی حکومت کی بدعنوانی کی ساری سچائی کو سی بی آئی کو بتانے کو کہا ہے۔ انہوں نے سی بی آئی سے اےن آراےچ اےم گھوٹالے کی جانچ میں اور تیزی لائے جانے کا مطالبہ کیا اور معاملہ کی تہہ تک جانے کو کہا۔انہوں نے کہا کہ شک ہے کہ اس گھپلے کا تار مایا کی رانی مایاوتی کے دروازے پر جاکر ختم ہوتا ہے اس لیے سی بی آئی جلد سے جلد اس معاملے سے متعلق تمام دستاویزات اپنے قبضے میں لے کیونکہ آدرش گھوٹالے کی طرز پر اس معاملے سے جڑے اہم دستاویزات کو بھی جلانے اور ختم کرنے کی مسلسل کوشش کی جا رہی ہے۔
سونے پہ سہاگا یہ کہ بابو سنگھ کشواہا کے بی جے پی میں شامل ہوتے ہی سی بی آئی ان کے گھر چھاپا مارنے پہنچ گئی۔اس پرمختار عبّاس نقوی  نے الزام لگایا کہ کانگریس کی قیادت والا یو پی اے اور اتر پردیش کی بی ایس پی حکومت میں ملی بھگت ہے اور وہ سیاسی ارادوں کو پورا کرنے کے لئے مرکزی جانچ بیورو کا غلط استعمال کر رہے ہیں۔ نقوی نے حکومت سے جاننا چاہا کہ اچانک سی بی آئی کشواہا کے معاملے میں اتنی فعال کیسے ہوگئی۔شاید نقوی صاحب کا یہ ماننا ہے کہ بی جے پی میں شامل ہونے والا شخص گنگا نہا لیتا ہے اور اس کے تمام گناہ دھل جاتے ہیں۔
کشواہا کولیکرٹیم انابھی میڈیا کے گھیرے میں آگئی۔ کانگریس نے یہ الزام لگایا کہ ٹیم انا کو کشواہااور بی جے پی تو نظر نہیں آتے جبکہ وہ کانگریس کو کوسنے کا کوئی بھی موقعہ ہاتھ سے نہیں جانے دیتی۔ ٹیم اناکو یہ سمجھنے میں چوک ہوگئی کہ بدعنوانی کا کوئی ایک مخصوص نام اورپتہ نہیں ہوتا۔ آپ جب چاہیں اسے جاکر پکڑ لیں اور اس کے کان مروڑنے لگ جائیں۔ملک میںبد عنوانی ہر جگہ اور ہر وقت موجود ہے۔
حالانکہ کشواہا نے ایک خط لکھ کر خود کو بی جے پی سے سسپینڈ کرلیا ہے مگرحالیہ واقعات سے تو اب یہ ثابت ہوگیاہے کہ بدعنوانی اپنانام اور پتہ بھی بدل سکتی ہے۔
Afif Ahsen, Bahujan Samaj Party, BJP, Daily Pratap, Gadkari, Kushwaha, Mayawati, Mukhtar Abbas Naqvi, NRHM, Uma Bharti, Uttar Pradesh, Vinay katiar, Vir Arjun, 

भला उसकी क़मीज़ मेरी क़मीज़ से सफ़ैद कैसे?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 9th  January 2012
अफ़ीफ़ अहसन
 एनआरऐचऐम में 3700 करोड़ का घोटाला। सीऐमओ डाकटर विनोद आर्या का क़तल। सीऐमओ डाकटर बीपी सिंह का क़तल। डिप्टी सीऐमओ डाकटर सचान का जेल में क़तल या ख़ुदकुशी। सीबीआई जांच और छापे।
अगर ऊपर दी हुई सूची में एक सुर्ख़ी शामिल ना की जाय तो कहानी अधूरी रह जाती है और वो है, बाबू सिंह कुशवाहा का घोटालों को लेकर मायावती के ज़रीया मंत्री के ओहदे से हटाया जाना।
यहां तक तो ठीक था। मगर जिस दिन मायावती ने इन को बीएसपी से निकाला उस के अगले ही दिन उन को बीजेपी ने गले लगा लिया। जिस पर बीजेपी के मुख़ालिफ़ों को उस पर हमला करने का एक दुर्लभ अवसर हाथ लग गया और अभी तक चारों तरफ़ से करप्शन के इल्ज़ामात से घिरी कांग्रेस में फिर से जान पड़ गई। बीजेपी के बड़े नेताओं को तो मुँह छिपाने के लिए जगह मिलना मुश्किल होगई और वो कोने ढूंडते हुए नज़र आए। जो नेता टीवी वालों को फ़ोन कर-कर के हर मुद्दे पर अपना ब्यान देने से नहीं चूकते थे उन की बोलती ही बंद होगई। टीवी वालों को मिले भी तो सिर्फ मुख़तार अब्बास नक़वी हालाँकि वो कोई छोटे मोटे नेता नहीं हैं मगर जब आप को पार्टी की तमाम ग़लत बातों का बचाओ करने के लिए हमेशा आगे कर दिया जाय तो इसी से पता चल जाता है कि आप किस पाये के नेता हैं।
जो समझदार नेता थे उन्होंने तो यही बेहतर समझा कि इस मामले में चुप रहना ही बेहतर है। जब पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं ने राष्ट्रपति भवन तक मार्च निकाला और राष्ट्रपति को उन्हों ने एक मेमोरेंडम पेश किया जिस में उन्होंने कांग्रेस द्वारा मज़बूत लोक पाल बिल पास ना कराए जाने और राज्यसभा की कार्रवाई स्थगित करदेने के ख़िलाफ़ अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की और सत्र दुबारा बुलाए जाने की मांग की थी, तब भी उन की इस दोगली पालिसी का सब ही जगह मज़ाक़ उड़ाया गया और हर रिपोर्टर उन से कुशवाहा मामले पर ही सवालात करता रहा जिस का जवाब कोई भी देने को तैय्यार नहीं था।
ऐसा इस लिए हुआ क्योंकि कोई भी बड़ा लीडर इस मामले पर सच बोलने की हालत में नहीं था। क्योंकि कुशवाहा को पार्टी के सब से बड़े लीडर यानी के पार्टी अध्यक्ष गडकरी ने स्वंय पार्टी में शामिल करने की मंज़ूरी दी थी और पार्टी प्रमुख को नाराज़ करने का ख़तरा कोई भी मोल नहीं ले सकता। ख़ासकर ऐसे अध्यक्ष को नाराज़ करना जिस को आरएसएस ने बीजेपी पर थोंपा हो। मगर जब आरएसएस ने ही इस मामले पर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की तो यूपी के बीजेपी नेताओं ने भी इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया। उमा भारती ने कैंपेन करने से मना कर दिया। योगी आदित्यनाथ ने खुल कर बोला, मेनका गांधी भी ख़ूब बोलीं उन को छोड़ कर बाक़ी यूपी के नेता इस मामले में या तो कुशवाहा को शामिल करने का समर्थन करते नज़र आए या फिर चुप्पी साधे रहे। मगर कुशवाहा को शामिल करने के ख़िलाफ़ बोलने वालों का भी अपना अपना निजी एजंडा था।
उमा भारती इस लिए नाराज़ थीं के उन को धक्के खाने पड़ रहे हैं और कैंपेन के लिए उन को ज़रूरी साज़ो सामान की आपूर्ती नहीं करायी जा रहा है। ना ही उन को कोई मान दिया जा रहा है। बाद में पार्टी हाई कमांड ने उन को अडवानी जी का रथ देने का वादा करके बहला लिया। ये वही रथ है जिस पर अडवानी जी सवार होकर पूरे देश में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ यात्रा पर गए थे। ये वही रथ यात्रा है जिस के बारे में कांग्रेस के राशिद अलवी कह रहे हैं कि अडवानी जी रथ पर सवार होकर भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ मुहिम पर नहीं गए थे बल्कि ऐसे भ्रष्टाचारियों की तलाश में गए थे जिन को पार्टी में शामिल किया जा सके। गडकरी जी के इस एक ग़लत फ़ैसले ने अडवानी जी की यात्रा पर पानी फेरने का काम किया और उन के मुख़ालिफ़ों को बोलने का मौक़ा दिया। ऐसा नहीं है कि अडवानी जी की यात्रा पर पानी फेरने की ये पहली कोशिश है। यात्रा शुरू होने से पहले उन्हें आरएसएस को सफ़ाई पेश करनी पड़ी, बाद में मोदी को उन की यात्रा का मुख़ालिफ़ बताया गया और पार्टी के दूसरे नेताओं के बारे में भी ये कहा गया कि वो इस यात्रा से ख़ुश नहीं हैं।
हालाँकि योगी आदित्यनाथ ने खुल कर इस की मुख़ालिफ़त की है लेकिन उन का भी अपना एक एजंडा है। वो ये चाहते हैं के पूर्वांचल में उन के चाहने वालों को तीस सीटें दी जाएं। पिछले असैंबली इलैक्शन में भी सीट के बंटवारे को लेकर उन्होंने पार्टी की मुख़ालिफ़त की थी और पार्टी छोड़ने तक की धमकी दे डाली थी, मगर बाद में उन से समझौता होगया था और उन के चहेतों को ज़्यादा से ज़्यादा सीटें मिली थीं। इस लिए उन्हें तो मुख़ालिफ़त करनी ही थी यही मौक़ा सही। लेकिन अब जब के कुशवाहा ने अपने आप को पार्टी से सस्पेंड कर लिया है तो योगी क्या करेंगे। उन का एक बारगेनिंग प्वाईंट तो चला गया, और पार्टी लीडरशिप की नाराज़गी मोल ली सो अलग। मगर योगी हार मानने वाले नहीं हैं वो जल्द ही दुबारा पार्टी की मुख़ालिफ़त में खड़े नज़र आयेंगे।
मेनका गांधी काफ़ी वक़्त से अपने आप को अलग थलग महसूस कर रही थीं। और उन के इलाक़े में सीटों के बंटवारे में भी उन की नहीं चल रही है। इस लिए उन्होंने भी मौक़ा देख कर पार्टी में कुशवाहा की शा‍मिल किये जाने के ख़िलाफ़ ब्यान दे दिया।
कुशवाहा की शा‍मिल किये जाने के हक़ में जो भी बीजेपी नेता हैं उन का ये कहना है कि क्योंकि कुशवाहा ज़ात के वोटों की तादाद यूपी के कुल वोटों का चार फ़ीसद है इस लिए पार्टी को उन की शा‍मिल किये जाने से फ़ायदा मिलेगा और कुशवाहा बिरादरी का सारा वोट बीजेपी को मिलेगा।
बीजेपी के राष्ट्रीय उपाधयक्ष विनय कटियार ने कांग्रेस को चैलेंज करते हुए कहा कि अगर कांग्रेस में ज़रा भी नैतिकता है तो वो ऐलान करें कि पार्लीमैंट में समाजवादी पार्टी, बीएसपी के सदस्यों का समर्थन नहीं लेंगे। बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल करने के झटके से निकलने के लिए उन्होंने ऐलान किया कि पार्टी भ्रष्टाचार को जड़ से उखाडने के लिए मुहिम छेड़ेगी और इसी लिए बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में लिया है। कुशवाहा के आने से मायावती के भ्रष्टाचार का पर्दा फ़ाश हो सकेगा। पार्टी ने बाबू सिंह कुशवाहा को मायावती हुकूमत के भ्रष्टाचार की सारी सच्चाई को सीबीआई को बताने को कहा है। उन्हों ने सीबीआई से एनआरएचएम घोटाले की जांच में और तेज़ी लाए जाने की मांग की और मामला की तह तक जाने को कहा। उन्होंने कहा कि शक है कि इस घपले का तार माया की रानी मायावती के दरवाज़े पर जाकर ख़तम होता है इस लिए सीबीआई जल्द से जल्द इस मामले से सम्बंधित तमाम दस्तावेज़ात अपने क़बज़े में ले क्योंकि आदर्श घोटाले की तर्ज़ पर इस मामले से जुड़े अहम दस्तावेज़ात को भी जलाने और ख़तम करने की लगातार कोशिश की जा रही है।
सोने पे सुहागा ये कि बाबू सिंह कुशवाहा के बीजेपी में शामिल होते ही सीबीआई उन के घर छापा मारने पहुंच गई। इस पर मुख़तार अब्बास नक़वी ने इल्ज़ाम लगाया कि कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए और उत्तरप्रदेश की बीएसपी सरकार में मिली भगत है और वो राजनीतिक इरादों को पूरा करने के लिए सीबीआई का ग़लत इस्तिमाल कर रहे हैं। नक़वी ने सरकार से जानना चाहा कि अचानक सीबीआई कुशवाहा के मामले में इतनी सक्रीय कैसे होगई। शायद नक़वी साहिब का ये मानना है कि बीजेपी में शामिल होने वाला व्यक्ति गंगा नहा लेता है और उस के तमाम पाप धुल जाते हैं।
कुशवाहा को लेकर टीम अन्ना भी मीडीया के घेरे में आगई। कांग्रेस ने ये इल्ज़ाम लगाया कि टीम अन्ना को कुशवाहा और बीजेपी तो नज़र नहीं आते जबकि वो कांग्रेस को कोसने का कोई भी मौक़ा हाथ से नहीं जाने देती। टीम अन्ना को ये समझने में चूक होगई कि भ्रष्टाचार का कोई एक विशेष नाम और पता नहीं होता। आप जब चाहें उसे जाकर पकड़ लें और इस के कान मरोड़ने लग जाएं। देश में भ्रष्टाचार हर जगह और हर वक़त मौजूद है।
हालाँकि कुशवाहा ने एक ख़त लिख कर ख़ुद को बीजेपी से सस्पेंड करलिया है मगर हालिया घटनाओं से तो अब ये साबित हो गया है कि भ्रष्टाचार अपना नाम और पता भी बदल सकती है।
Afif Ahsen, Bahujan Samaj Party, BJP, Daily Pratap, Gadkari, Kushwaha, Mayawati, Mukhtar Abbas Naqvi, NRHM, Uma Bharti, Uttar Pradesh, Vinay katiar, Vir Arjun,

Monday, 2 January 2012

نئی صبح ہے اورنیا سال ہے


Daily Pratap, Indias Oldest Urdu Daily
Published on 2nd January 2012
عفیف احسن
اس سے پہلے کے میں کچھ عرض کروں میں پرتا پ اور ویر ارجن کے تمام قارئین کو اور ان قارئین کو بھی جن تک یہ کالم انٹرنیٹ کے ذریعہ پہنچ رہا ہے نئے سال کی مبارکباد دیتا ہوں۔ میں یہ امید بھی کرتا ہوں کہ نیا سال آپ سب کے لئے خوشیاں، خوشحالی اور امن چین لے کر آئے۔ صحت یاب رہیں اور پریشانیاں آپ سے کوسوں دوور رہیں، الغرض کہ نیا سال کم از کم ایسا تو نہ ہو جیسا کہ سال گذشتہ تھا۔
گذشتہ سال ہم نے جیا نہیں بلکہ گزارا ہے۔ بہت سے اپنے ہم سے بچھڑ گئے اور بہت سے غیر بھی اس سال کو پورا نہیں کر پائے اور اس دنیا اور ما فیہہکو خیر باد کہہ کر خالق حقیقی سے جاملے۔ کسی اپنے کے چلے جانے کی کسک تو ہر ایک دل میں پیدا ہوتی ہے، اور ہمیشہ ہوتی رہے گی، مگر جو چیزہمیں تسلّی دیتی ہے اور دیتی رہے گی وہ ان کے آخری ایام کے الفاظ ہیںیا یوں کہئے کہ ان کے رْخصتی کلمات۔ چاہے انہوں نے ساری عمر آپ کی سرزنش کی ہو، آپ سے شکایت کی ہو، چاہے یہ کہا ہو کہ آپ انکا پوراخیال نہیں رکھتے مگر انہوں نے جاتے جاتے یہ بات ضرور قبول کی کہ آپ نے ان کی بہت خدمت کی ہے۔ یہی آپ کے لئے کافی ہے۔کیونکہ آپ کواس بات کااحساس ہے کہ آپ سے جو بن پڑتا تھا آپ نے اپنے بزرگوں کے لئے کیا۔ موت اور زندگی تو اوپر والے کے ہاتھ ہے ، جب تک اس نے چاہا آپ کے سر پر بزرگوں کا سایہ قائم رکھا اور جب چاہا ان کی دنیاوی ذمہ داریاں آپ کو منتقل کردیں، اور ان کی مشکل آسان کردی۔
اس سال پوری دنیا نے زوالات دیکھے۔ انقلابات دیکھے۔یہ دیکھا کہ کیسے بڑی بڑی طاقتیں بونی نظر آنے لگیں۔جو کل تک ناقابل تسخیر تھے وہ زمیں بوس ہوگئے۔اور جوفرش پر تھے وہ عرش پر نظر آنے لگے۔یہ سال پوری دنیا میں عوامی مہمات کے نام رہا۔ مصر سے لیکرلیبیا تک۔بحرین،سیریا، یونان ، اسپین، جرمنی اور برطانیہتک۔
امریکہ بھی اس سے بچا نہیں رہ سکا۔ پہلے سے ہی مندی جھیل رہے امریکہ کو اور زیادہ مندی کا سامنا کرنا پڑا۔ جس کے لئے اس کو مزید قرضے لینے کے لئے جدو جہد کرنی پڑی۔اس کی فوجوں نے عراق خالی کردیا اور کرسمس منانے کے لئے اپنے گھروں کی طرف کوچ کر گئے۔ فوجی تو عراق سے چلے گئے مگر جاتے جاتے وہ اپنی کمپنیوں کو عراقی تیل کا مالک بنانے میں کامیاب رہے۔
اوسامہ بن لادن کا خاتمہ بھی اسی سال نے دیکھا۔ جس کے بعد امریکہ اور پاکستان کے رشتوں میں تلخی آئی اور یہی نہیں پاکستانی فوج اورپاکستانی حکومت کے درمیان بھی تلخیاں پیدا ہوئیں۔ کہا تو یہ بھی جارہا ہے کہ پاکستانی فوج بغاوت پر آمادہ تھی اور ملک کی حکمرانی اپنے ہاتھ میں لینے والی تھی مگراس سال تو ایسا نہ ہوسکا۔بعد میں گیلانی صاحب فوجی اداروں کو گیدڑ بھپکیاں دیتے دیکھے گئے ۔جس سے یہ لگتا تھا کہ شاید ان کے سر سے خطرہ ٹل چکا ہے۔
ایران نے اپنی تکنیک کی بنیاد پر ایک امریکی ڈرون کوجو کہ اسکے اندرونی علاقوں کی جاسوسی کررہا تھا نیچے اتار کرایک بہت بڑا کارنامہ انجام دیا۔ کہا جاتا ہے کہ انہوں نے اس ڈرون کا رابتہ امریکی بیس اسٹیشن سے منقطع کرکے اسے اپنے کمپیوٹروں سے کنٹرول کرلیا اور اسے بنا پرکسی نقصان کے بغیر زمین پر اتار لیا۔ اگرامریکہ کے بیس اسٹیشن سے اس کا رابتہ منقطع نہ ہوتا تو کبھی بھی امریکہ کسی خطرے کی حالت میں اس کی خود کار تباہی کا حکم دے سکتا تھا،مگر اسے کسی دشمن کے ہاتھ نہیں جانے دیتا۔
مصر میں اسی فوج نے جس نے نہتھے مصری عوام پر گولیاں چلانے اور کسی بھی قسم کی کاروائی کرنے سے منع کردیا تھا، خود نہتھے عوام پر اپنی گولیوں کا منہ کھول دیا اوراس میں کافی معصوم لوگوں کو اپنی جان سے ہاتھ گنوانہ پڑا۔
لیبیا میں معمر قذافی کو سفّاکی سے قتل کردیا گیا۔اور وہا ں پر ایک کٹھ پتلی حکومت کا قیام عمل میںآیا۔ ایک سفّاک تاناشاہ کا ایسی سفّاکی سے قتل ہوا کے دنیا ہائے ہائے کر اٹھی۔یہ ان لوگوں کی کرتوت تھی جو اسلام کے ماننے والے ہیں وہی اسلام جو خود حوالگی کرنے والوں اور قیدیوں کے قتل کی سخت ممانعت کرتاہے۔
دوسری طرف ہندوستان کو دوہری مار جھیلنی پڑی۔ ایک تو بیرونی ممالک کی مندی کے چلتے اپنے ملک میں مندی کا دور۔ وہ ہندوستان جو دو سال پہلے کی مندی سے ابر گیا تھااب اس سے بچا نہیں رہ سکا۔ ہندوستان کی صنعتی پیداوار میں کمی واقعہ ہوئی۔پورے سال مہنگائی بڑھتی رہی حالانکہ سال کے ختم ہوتے ہوتے کھانے پینے کی چیزوں کے دام میں خاطر خواہ کمی آئی لیکن اس کے باوجود یہ چیزیں عام آدمی کے پہنچ سے باہر ہی رہیں، کیونکہ،تب تک ، مہنگائی کے چلتے لوگ اپنی قوت خرید سے ہاتھ دھو چکے تھے۔
اس پر ہمارے ملک میں کرپشن کو لیکر چلائے گئے ٹیم انا کے آندولن نے آگ پر گھی کا کام کیا۔لوگ یہ سمجھ بیٹھے کے ہر بیماری کا علاج لوک پال بل ہے اور اس کے آتے ہی ان کی تمام پریشانیوں کا حل ہوجائے گیا۔ مگر سال کے ختم ہوتے ہوتے ٹیم انا سے لوگوں کا موہ بھنگ ہوگیا اور ان کی سمجھ میں آگیا کے جو وعدے ٹیم انا نے ان سے کئے تھے وہ بے بنیاد ہیں اور ایسا کچھ نہیں ہونے جارہا جیسا کہ ان سے وعدہ کیا جارہا تھا اور بڑے بڑے سپنے دکھائے جارہے تھے۔ ٹیم انا نے اپنا سارا دباؤ کانگریس پارٹی پر ڈالے رکھا ۔ وہ کانگریس پارٹی جس کو چھوٹے چھوٹیقدم اٹھانے کے لئے بیساکھیوں کا سہارا لینا پڑتاہے، اور تمام چھوٹی چھوٹی جماعتوں کی مرہون منت ہو۔ٹیم انا نے کبھی یہ نہیں سوچا کہ وہ ہر ایک پارٹی سے لوک پال بل کے لئے الگ الگ تحریریحمایت حاصل کرے۔ اس لئے ساری ذمہ داری کانگریس پر آگئی کہ وہ لوک پال بل پاس کرائے۔ لوک سبھا میں بل پیش کیا گیا۔ اس پر بحث ہوئی اور جلدبازی میں کانگریس نے لوک پال بل لوک سبھا سے پاس کرالیا ۔ کیونکہ اپوزیشن کا کام مخالفت کرنا ہے اس لئے انہوں نے لوک پال بل کے ہر ایک دفع کی مخالفت کرنا اپنا فرض عین سمجھا اور ان دفعات کے خلاف بھی ووٹ دیا جو کے لوک پال بل کو ایک مضبوط لوک پال بناسکتی تھیں۔ایسی ہی ایکش دفع تھی لوک پال کو کنسٹی ٹیوشنل درجہ دیا جانا۔ کانگریس نے لوک پال بل کو لوک سبھا میں جلد بازی میں پاس تو کرالیا مگر راجیہ سبھا میں اسے پاس کرانے میں اس کو دانتوں تلے پسینا آگیا۔اسکے الائیز جو ابھی تک کسی نہ کسی طرح اس کا ساتھ دے رہے تھے، نے ہی راجیہ سبھا میں اس کا ساتھ دینے سے انکار کردیا۔ اس بل پر راجیہ سبھا میں 187ترامیم پیش ہوئیں۔ ایسا پارلیمانی تاریخ میں پہلے کبھی نہیں ہوا۔ اب اگر اسے یہ بل پاس کرانا تھا تو اس کوکم از کم اپنے الائیز کی مانگوں کو یا تو ماننا تھا یا پھر ان کے شکوک و شبہات کو ختم کرنا تھا۔ ایک طرف راجیہ سبھاکی کارروائی چل رہی تھی، دوسری طرف کانگریس کے دگّج الائیز کو منانے میں لگے ہوئے تھے۔ مگر ان کو نہیں ماننا تھا اور انہوں نے نہیں مانا۔ تھک ہار کر کانگریس کے پاس کوئی اور راستہ نہیں بچا اور اس کو یہی موزوں لگا کہ راجیہ سبھا کی کارروائی تہ وقت سے آگے نہ بڑھائی جائے اورحامد انصاری صاحب نے راجیہ سبھاکا سرمائی اجلاس جس کو تین دن کے لئے بڑھایا گیا تھا رات کے بارہ بجے ختم کردیا۔ اس طرح لوک پال بل بچ گیا اور سرکار بھی ہزیمت اٹھانے سے بچ گئی۔ جو لوگ ابھی تک پوری طاقت لگارہے تھے کے یہ بل کسی بھی قیمت پر پاس نہ ہونا چاہئے، وہی لوگ کانگریس کو کوسنے میں لگ گئے کے وہ بل کیوں پاس نہیں کراسکی۔
سب سے زیادہ نقصان ٹیم انا کو ہوا، وہ اس کمزور بل کی مخالفت کررہی تھی اس لئے اس کے لوک سبھا میں پاس ہونے پر جیت کا جشن نہیں مناسکی، حالانکہ عقل کاتقاضہ تو یہ تھا کہ اس کے پاس ہونے پر ٹیم انا اس کا کریڈٹ تولے لیتی، کی اس کی کوششوں سے ایک بل تو پاس ہوگیا ہے چاہے کمزور ہی سہی اور پھر آگے اس کواور مضبوط کرنے کے لئے مزید لڑائی لڑنے کا اعلان کردیتی۔مگر ہوا وہی جو کانگریس چاہتی تھی ، یہ لوک پا ل کانگریسی لوک پال بن کر رہ گیا اور کوئی بھی اس کا کریڈٹ نہیں لے سکاسوائے کانگریس کے کیونکہ آخر میں اس کے سوائے سبھی لوک پال بل کی مخالفت میں کھڑے ہوئے نظر آئے۔
آخر میں دہلی پولیس کو نئے سال کا جشن منانے والوں کو قابو میں رکھنے میں کامیابی حاصل کرنے کے لئے مبارکباد دیتا ہوں۔ چاہے ایسا انہوں نے کئی سڑکوں، میٹروکے اسٹیشن، انڈیا گیٹ ، کناٹ پلیس اوردوسری عوامی جگہوں کو پبلک کے لئے بند کرکے کیا ہو۔ چاہے ایسا انہوں نے ریسٹورنٹ، ڈھابوں اور کھانے پینے کے اور دوسرے عوامی مقامات کو جلد بند کرواکر کیا ہو۔ کیونکہ اگر پبلک جمع ہی نہیں ہوگی تو ہڑدنگ بھی نہیں مچے گا اورامن عامہ کا مسئلہ بھی نہیں پیدا ہوگا۔ مگر انہوں نے یہ کارنامہ انجام دیا ہے، او راس کے لئے وہ مبارکباد کے مستحق ہیں۔
آخر میں کسی شاعر کا یہ مشہور شعر پیش ہے:
نئی صبح ہے اور نیا سال ہے
دسمبر میں پوچھیں گے کیا حال ہے
Afif Ahsen, Daily Pratap, Happy New Delhi, Roundup 2011, Vir Arjun,  

नई सुबह है और नया साल है


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 2nd January 2012
अफ़ीफ़ अहसन
इस से पहले के में कुछ अर्ज़ करों में प्रताप और वीर अर्जुन के तमाम पढ़ने वालों को और उन पाठकों को भी जिन तक ये कालम इंटरनैट के ज़रीया पहुंच रहा है नए साल की मुबारकबाद देता हूँ। मैं ये उम्मीद भी करता हूँ कि नया साल आप सब के लिए ख़ुशीयां, ख़ुशहाली और अमन चैन लेकर आए। सेहतयाब रहें और परेशानियां आप से कोसों दूर रहें, मतलब यह कि नया साल कम से कम ऐसा तो ना हो जैसा कि पिछला साल था।
पिछला साल हम ने जिया नहीं बल्कि गुज़ारा है। बहुत से अपने हम से बिछूड़ गए और बहुत से अन्य भी इस साल को पूरा नहीं कर पाए और इस दुनिया और इस के तत्वों को त्याग कर रचयता (ख़ालिक़ हक़ीक़ी) से जा मिले। किसी अपने के चले जाने की कसक तो हर एक दिल में पैदा होती है, और हमेशा होती रहेगी, मगर जो चीज़ हमें तसल्ली देती है और देती रहेगी वो उन के आख़िरी दिनों के कहे शब्द हें या यूं कहिए कि उन के रुख़्सती कलमात। चाहे उन्हों ने सारी उम्र आप की डांट डंपट की हो, आप से शिकायत की हो, चाहे ये कहा हो कि आप उनका पूरा ख़्याल नहीं रखते मगर उन्होंने जाते जाते ये बात ज़रूर क़बूल की कि आप ने उन की बहुत ख़िदमत की है। यही आप के लिए काफ़ी है। क्योंकि आप को इस बात का एहसास है कि आप से जो बन पड़ता था आप ने अपने बुज़ुर्गों के लिए किया। मौत और ज़िंदगी तो ऊपर वाले के हाथ है, जब तक उस ने चाहा आप के सर पर बुज़ुर्गों का साया क़ायम रखा और जब चाहा उन की दुनिया की ज़िम्मेदारीयां आप को हसतांतरित कर दीं, और उन की मुश्किल आसान करदी।
इस साल पूरी दुनिया ने गिरावट देखी। इन्क़िलाब देखे। ये देखा कि कैसे बड़ी बड़ी ताक़तें बोनी नज़र आने लगीं। जो कल तक अभेदीय (नाक़ाबिल-ए-तसख़ीर) थे वो ज़मीन पर आ गए। जो फ़रश पर थे वो अर्श पर नज़र आने लगे। ये साल पूरी दुनिया में अवामी मुहिम के नाम रहा। मिस्र से लेकर लीबिया तक। बहरीन, सीरिया, यूनान, स्पेन, जर्मनी और ‍ब्रीटेन तक।
अमरीका भी इस से बचा नहीं रह सका। पहले से ही मंदी की मार झेल रहे अमरीका को और ज़्यादा मंदी का सामना करना पड़ा। जिस के लिए इस को अधिक कर्जे़ लेने के लिए जद्द-ओ-जहद करनी पड़ी। इस की फ़ौजों ने इराक़ ख़ाली कर दिया और क्रिसमिस मनाने के लिए अपने घरों की तरफ़ कूच कर गईं। फ़ौजी तो इराक़ से चले गए मगर जाते जाते वो अपनी कंपनीयों को इराक़ी तेल का मालिक बनाने में कामयाब रहे।
ओसामा बिन लादेन का ख़ातमा भी इसी साल ने देखा। जिस के बाद अमरीका और पाकिस्तान के रिश्तों में तल्ख़ी आई और यही नहीं पाकिस्तानी फ़ौज और पाकिस्तानी हुकूमत के दरमयान भी तल्ख़ीयां पैदा हुईं। कहा तो ये भी जा रहा है कि पाकिस्तानी फ़ौज बग़ावत पर आमादा थी और मुल़्क की हुक्मरानी अपने हाथ में लेने वाली थी मगर इस साल तो ऐसा न हो सका। बाद में गिलानी साहिब फ़ौजी इदारों को गीदड़ भपकयां देते देखे गए। जिस से ये लगता था कि शायद उन के सर से ख़तरा टल चुका है।
ईरान ने अपनी तकनीक की बुनियाद पर एक अमरीकी ड्रोन को जो कि उसके अंदरूनी इलाक़ों की जासूसी कर रहा था नीचे उतार कर एक बहुत बड़ा कारनामा अंजाम दिया। कहा जाता है कि उन्होंने इस ड्रोन का संपर्क अमरीकी बेस स्टेशन से काट कर उसे अपने कम्पयूटरों से कंट्रोल कर लिया और किसी नुक़्सान के बगै़र ज़मीन पर उतार लिया। अगर अमरीका के बेस स्टेशन से इस का संपर्क कटा ना होता तो कभी भी अमरीका किसी ख़तरे की हालत में इस को सवंय को तबाह करने का हुक्म दे सकता था, मगर उसे किसी दुश्मन के हाथ नहीं जाने देता।
मिस्र में उसी फ़ौज ने जिस ने निहत्थे मिस्री अवाम पर गोलीयां चलाने और किसी भी किस्म की कार्रवाई करने से मना कर दिया था, ख़ुद निहत्थे अवाम पर अपनी गोलीयों का मुंह खोल दिया और इस में काफ़ी मासूम लोगों को अपनी जान से हाथ गंवाना पड़ा।
लीबिया में मुअम्मर क़द्दाफी को बेदरदी से क़तल करदिया गया। वहां एक कठपुतली हुकूमत का क़याम अमल में आया। एक सफ़्फ़ाक तानाशाह का ऐसी सफ़्फ़ाकी से क़तल हुआ के दुनिया हाय-हाय कर उठी। ये उन लोगों की करतूत थी जो इस्लाम के मानने वाले हैं वही इस्लाम जो आत्मसमर्पण करने वालों और क़ैदीयों के क़तल की सख़्त मनाही करता है।
दूसरी तरफ़ हिंदूस्तान को दोहरी मार झेलनी पड़ी। एक तो विदेशों की मंदी के चलते अपने मुल्क में मंदी का दौर। वो हिंदूस्तान जो दो साल पहले की मंदी से उभ्र गया था अब इस से बचा नहीं रह सका। हिंदूस्तान के औद्योगिक उत्पादन में कमी आई। पूरे साल महंगाई बढ़ती रही हालाँकि साल के ख़तम होते होते खाने पीने की चीज़ों के दाम में पर्याप्त कमी आई लेकिन इस के बावजूद ये चीज़ें आम आदमी की पहुंच से बाहर ही रहीं, क्योंकि, तब तक, महंगाई के चलते लोग अपनी ख़रीदने की शक्ति से हाथ धो चुके थे।
इस पर हमारे मुल्क में करप्शन को लेकर चलाए गए टीम अन्ना के आंदोलन ने आग पर घी का काम किया। लोग ये समझ बैठे के हर बीमारी का ईलाज लोकपाल बिल है और इस के आते ही उन की तमाम परेशानीयों का हल होजाएगा। मगर साल के ख़तम होते होते टीम अन्ना से लोगों का मोह भंग होगया और उन की समझ में आगया के जो वायदे टीम अन्ना ने उन से किए थे वो बेबुनियाद हैं और ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा जैसा कि उन से वायदा किया जा रहा था और बड़े बड़े सपने दिखाए जा रहे थे। टीम अन्ना ने अपना सारा दबाव कांग्रेस पार्टी पर डाले रखा। वो कांग्रेस पार्टी जिस को छोटे छोटे क़दम उठाने के लिए बैसाखीयों का सहारा लेना पड़ता है, और तमाम छोटे छोटे दलों की मिन्नतें करनी पडती हैं। टीम अना ने कभी ये नहीं सोचा कि वो हर एक पार्टी से लोकपाल बिल के लिए अलग अलग लिखित समर्थन हासिल करे। इस लिए सारी ज़िम्मेदारी कांग्रेस पर आगई कि वो लोकपाल बिल पास कराए। लोक सभा में बिल पेश किया गया। इस पर बहस हुई और जलदबाज़ी में कांग्रेस ने लोकपाल बिल लोकसभा से पास करा लिया। क्योंकि विपक्ष का काम मुख़ालिफ़त करना है इस लिए उन्होंने लोकपाल बिल की हर एक दफ़ा की मुख़ालिफ़त करना अपना फ़र्ज़ समझा और उन दफ़ाओं के ख़िलाफ़ भी वोट दिया जो के लोकपाल बिल को एक मज़बूत लोकपाल बना सकती थीं। ऐसी ही ऐक दफ़ा थी लोकपाल को संवेधानिक दर्जा दिया जाना। कांग्रेस ने लोकपाल बिल को लोकसभा में जल्दबाज़ी में पास तो करा लिया मगर राज्यसभा में उसे पास कराने में उसको दाँतों तले पसीना आगया। उसके अलाईज़ जो अभी तक किसी ना किसी तरह उसका साथ दे रहे थे, ने ही राज्यसभा में उसका साथ देने से इनकार कर दिया। इस बिल पर राज्यसभा में 187 बदलाव के प्रसताव पेश हुवे। ऐसा संसदीय इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। अब अगर उसे ये बिल पास कराना था तो उसको कम से कम अपने अलाईज़ की मांगों को या तो मानना था या फिर उन के शक व शुबहों को ख़तम करना था। एक तरफ़ राज्यसभा की कार्रवाई चल रही थी, दूसरी तरफ़ कांग्रेस के दिग्गज अलाईज़ को मनाने में लगे हुए थे। मगर उन को नहीं मानना था और उन्होंने नहीं माना। थक हार कर कांग्रेस के पास कोई और रास्ता नहीं बचा और उस को यही ठीक लगा कि राज्यसभा की कार्रवाई तय वक़्त से आगे ना बढ़ाई जाय और हामिद अंसारी साहिब ने राज्य सभा का शीत सत्र जिस को तीन दिन के लिए बढ़ाया गया था रात के बारह बजे ख़तम कर दिया। इस तरह लोक पाल बिल बच गया और सरकार भी प्रशानी झेलने से बच गई। जो लोग अभी तक पूरी ताक़त लगा रहे थे के ये बिल किसी भी क़ीमत पर पास न होना चाहीये, वही लोग कांग्रेस को कोसने में लग गए के वो बिल क्यों पास नहीं करा सकी।
सब से ज़्यादा नुक़्सान टीम अन्ना को हुआ, वो इस कमज़ोर बिल की मुख़ालिफ़त कर रही थी इस लिए इस के लोक सभा में पास होने पर जीत का जश्न नहीं मना सकी, हालाँकि अक़ल का तक़ाज़ा तो ये था कि इस के पास होने पर टीम अन्ना इस का क्रेडिट तो ले लेती, की इस की कोशिशों से एक बिल तो पास होगया है चाहे कमज़ोर ही सही और फिर आगे उस को और मज़बूत करने के लिए अधिक‍ लड़ाई लड़ने का ऐलान करदेती। मगर हुआ वही जो कांग्रेस चाहती थी, ये लोकपाल कांग्रेसी लोकपाल बन कर रह गया और कोई भी इस का क्रेडिट नहीं ले सका सिवाए कांग्रेस के क्योंकि आख़िर में उस के सिवाए सभी लोकपाल बिल की मुख़ालिफ़त में खड़े हुए नज़र आए।
आख़िर में दिल्ली पुलिस को नए साल का जश्न मनाने वालों को क़ाबू में रखने में कामयाबी हासिल करने के लिए मुबारकबाद देता हूँ। चाहे ऐसा उन्होंने कई सड़कों, मेट्रो के स्टेशन, इंडिया गेट, कनॉट प्लेस और दूसरी आम जगहों को पब्लिक के लिए बंद करके क्या हो। चाहे ऐसा उन्होंने रैस्टोरैंट, ढाबों और खाने पीने के और दूसरे आम मुक़ामात को जल्द बंद करवाकर क्या हो। क्योंकि अगर पब्लिक जमा ही नहीं होगी तो हुड़दंग भी नहीं मचेगा और ला ऐण्ड आडर का मसला भी नहीं पैदा होगा। मगर उन्होंने ये कारनामा अंजाम दिया है, ओर इस के लिए वो मुबारकबाद के हक़दार हैं।
आख़िर में किसी शायर का ये मशहूर शेअर पेश है:
नयी सुबह है और नया साल है।
दिसंबर में पूछेंगे क्या हाल है।।