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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 2nd January 2012
अफ़ीफ़ अहसन
इस से पहले के में कुछ अर्ज़ करों में प्रताप और वीर अर्जुन के तमाम पढ़ने वालों को और उन पाठकों को भी जिन तक ये कालम इंटरनैट के ज़रीया पहुंच रहा है नए साल की मुबारकबाद देता हूँ। मैं ये उम्मीद भी करता हूँ कि नया साल आप सब के लिए ख़ुशीयां, ख़ुशहाली और अमन चैन लेकर आए। सेहतयाब रहें और परेशानियां आप से कोसों दूर रहें, मतलब यह कि नया साल कम से कम ऐसा तो ना हो जैसा कि पिछला साल था।पिछला साल हम ने जिया नहीं बल्कि गुज़ारा है। बहुत से अपने हम से बिछूड़ गए और बहुत से अन्य भी इस साल को पूरा नहीं कर पाए और इस दुनिया और इस के तत्वों को त्याग कर रचयता (ख़ालिक़ हक़ीक़ी) से जा मिले। किसी अपने के चले जाने की कसक तो हर एक दिल में पैदा होती है, और हमेशा होती रहेगी, मगर जो चीज़ हमें तसल्ली देती है और देती रहेगी वो उन के आख़िरी दिनों के कहे शब्द हें या यूं कहिए कि उन के रुख़्सती कलमात। चाहे उन्हों ने सारी उम्र आप की डांट डंपट की हो, आप से शिकायत की हो, चाहे ये कहा हो कि आप उनका पूरा ख़्याल नहीं रखते मगर उन्होंने जाते जाते ये बात ज़रूर क़बूल की कि आप ने उन की बहुत ख़िदमत की है। यही आप के लिए काफ़ी है। क्योंकि आप को इस बात का एहसास है कि आप से जो बन पड़ता था आप ने अपने बुज़ुर्गों के लिए किया। मौत और ज़िंदगी तो ऊपर वाले के हाथ है, जब तक उस ने चाहा आप के सर पर बुज़ुर्गों का साया क़ायम रखा और जब चाहा उन की दुनिया की ज़िम्मेदारीयां आप को हसतांतरित कर दीं, और उन की मुश्किल आसान करदी।
इस साल पूरी दुनिया ने गिरावट देखी। इन्क़िलाब देखे। ये देखा कि कैसे बड़ी बड़ी ताक़तें बोनी नज़र आने लगीं। जो कल तक अभेदीय (नाक़ाबिल-ए-तसख़ीर) थे वो ज़मीन पर आ गए। जो फ़रश पर थे वो अर्श पर नज़र आने लगे। ये साल पूरी दुनिया में अवामी मुहिम के नाम रहा। मिस्र से लेकर लीबिया तक। बहरीन, सीरिया, यूनान, स्पेन, जर्मनी और ब्रीटेन तक।
अमरीका भी इस से बचा नहीं रह सका। पहले से ही मंदी की मार झेल रहे अमरीका को और ज़्यादा मंदी का सामना करना पड़ा। जिस के लिए इस को अधिक कर्जे़ लेने के लिए जद्द-ओ-जहद करनी पड़ी। इस की फ़ौजों ने इराक़ ख़ाली कर दिया और क्रिसमिस मनाने के लिए अपने घरों की तरफ़ कूच कर गईं। फ़ौजी तो इराक़ से चले गए मगर जाते जाते वो अपनी कंपनीयों को इराक़ी तेल का मालिक बनाने में कामयाब रहे।
ओसामा बिन लादेन का ख़ातमा भी इसी साल ने देखा। जिस के बाद अमरीका और पाकिस्तान के रिश्तों में तल्ख़ी आई और यही नहीं पाकिस्तानी फ़ौज और पाकिस्तानी हुकूमत के दरमयान भी तल्ख़ीयां पैदा हुईं। कहा तो ये भी जा रहा है कि पाकिस्तानी फ़ौज बग़ावत पर आमादा थी और मुल़्क की हुक्मरानी अपने हाथ में लेने वाली थी मगर इस साल तो ऐसा न हो सका। बाद में गिलानी साहिब फ़ौजी इदारों को गीदड़ भपकयां देते देखे गए। जिस से ये लगता था कि शायद उन के सर से ख़तरा टल चुका है।
ईरान ने अपनी तकनीक की बुनियाद पर एक अमरीकी ड्रोन को जो कि उसके अंदरूनी इलाक़ों की जासूसी कर रहा था नीचे उतार कर एक बहुत बड़ा कारनामा अंजाम दिया। कहा जाता है कि उन्होंने इस ड्रोन का संपर्क अमरीकी बेस स्टेशन से काट कर उसे अपने कम्पयूटरों से कंट्रोल कर लिया और किसी नुक़्सान के बगै़र ज़मीन पर उतार लिया। अगर अमरीका के बेस स्टेशन से इस का संपर्क कटा ना होता तो कभी भी अमरीका किसी ख़तरे की हालत में इस को सवंय को तबाह करने का हुक्म दे सकता था, मगर उसे किसी दुश्मन के हाथ नहीं जाने देता।
मिस्र में उसी फ़ौज ने जिस ने निहत्थे मिस्री अवाम पर गोलीयां चलाने और किसी भी किस्म की कार्रवाई करने से मना कर दिया था, ख़ुद निहत्थे अवाम पर अपनी गोलीयों का मुंह खोल दिया और इस में काफ़ी मासूम लोगों को अपनी जान से हाथ गंवाना पड़ा।
लीबिया में मुअम्मर क़द्दाफी को बेदरदी से क़तल करदिया गया। वहां एक कठपुतली हुकूमत का क़याम अमल में आया। एक सफ़्फ़ाक तानाशाह का ऐसी सफ़्फ़ाकी से क़तल हुआ के दुनिया हाय-हाय कर उठी। ये उन लोगों की करतूत थी जो इस्लाम के मानने वाले हैं वही इस्लाम जो आत्मसमर्पण करने वालों और क़ैदीयों के क़तल की सख़्त मनाही करता है।
दूसरी तरफ़ हिंदूस्तान को दोहरी मार झेलनी पड़ी। एक तो विदेशों की मंदी के चलते अपने मुल्क में मंदी का दौर। वो हिंदूस्तान जो दो साल पहले की मंदी से उभ्र गया था अब इस से बचा नहीं रह सका। हिंदूस्तान के औद्योगिक उत्पादन में कमी आई। पूरे साल महंगाई बढ़ती रही हालाँकि साल के ख़तम होते होते खाने पीने की चीज़ों के दाम में पर्याप्त कमी आई लेकिन इस के बावजूद ये चीज़ें आम आदमी की पहुंच से बाहर ही रहीं, क्योंकि, तब तक, महंगाई के चलते लोग अपनी ख़रीदने की शक्ति से हाथ धो चुके थे।
इस पर हमारे मुल्क में करप्शन को लेकर चलाए गए टीम अन्ना के आंदोलन ने आग पर घी का काम किया। लोग ये समझ बैठे के हर बीमारी का ईलाज लोकपाल बिल है और इस के आते ही उन की तमाम परेशानीयों का हल होजाएगा। मगर साल के ख़तम होते होते टीम अन्ना से लोगों का मोह भंग होगया और उन की समझ में आगया के जो वायदे टीम अन्ना ने उन से किए थे वो बेबुनियाद हैं और ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा जैसा कि उन से वायदा किया जा रहा था और बड़े बड़े सपने दिखाए जा रहे थे। टीम अन्ना ने अपना सारा दबाव कांग्रेस पार्टी पर डाले रखा। वो कांग्रेस पार्टी जिस को छोटे छोटे क़दम उठाने के लिए बैसाखीयों का सहारा लेना पड़ता है, और तमाम छोटे छोटे दलों की मिन्नतें करनी पडती हैं। टीम अना ने कभी ये नहीं सोचा कि वो हर एक पार्टी से लोकपाल बिल के लिए अलग अलग लिखित समर्थन हासिल करे। इस लिए सारी ज़िम्मेदारी कांग्रेस पर आगई कि वो लोकपाल बिल पास कराए। लोक सभा में बिल पेश किया गया। इस पर बहस हुई और जलदबाज़ी में कांग्रेस ने लोकपाल बिल लोकसभा से पास करा लिया। क्योंकि विपक्ष का काम मुख़ालिफ़त करना है इस लिए उन्होंने लोकपाल बिल की हर एक दफ़ा की मुख़ालिफ़त करना अपना फ़र्ज़ समझा और उन दफ़ाओं के ख़िलाफ़ भी वोट दिया जो के लोकपाल बिल को एक मज़बूत लोकपाल बना सकती थीं। ऐसी ही ऐक दफ़ा थी लोकपाल को संवेधानिक दर्जा दिया जाना। कांग्रेस ने लोकपाल बिल को लोकसभा में जल्दबाज़ी में पास तो करा लिया मगर राज्यसभा में उसे पास कराने में उसको दाँतों तले पसीना आगया। उसके अलाईज़ जो अभी तक किसी ना किसी तरह उसका साथ दे रहे थे, ने ही राज्यसभा में उसका साथ देने से इनकार कर दिया। इस बिल पर राज्यसभा में 187 बदलाव के प्रसताव पेश हुवे। ऐसा संसदीय इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। अब अगर उसे ये बिल पास कराना था तो उसको कम से कम अपने अलाईज़ की मांगों को या तो मानना था या फिर उन के शक व शुबहों को ख़तम करना था। एक तरफ़ राज्यसभा की कार्रवाई चल रही थी, दूसरी तरफ़ कांग्रेस के दिग्गज अलाईज़ को मनाने में लगे हुए थे। मगर उन को नहीं मानना था और उन्होंने नहीं माना। थक हार कर कांग्रेस के पास कोई और रास्ता नहीं बचा और उस को यही ठीक लगा कि राज्यसभा की कार्रवाई तय वक़्त से आगे ना बढ़ाई जाय और हामिद अंसारी साहिब ने राज्य सभा का शीत सत्र जिस को तीन दिन के लिए बढ़ाया गया था रात के बारह बजे ख़तम कर दिया। इस तरह लोक पाल बिल बच गया और सरकार भी प्रशानी झेलने से बच गई। जो लोग अभी तक पूरी ताक़त लगा रहे थे के ये बिल किसी भी क़ीमत पर पास न होना चाहीये, वही लोग कांग्रेस को कोसने में लग गए के वो बिल क्यों पास नहीं करा सकी।
सब से ज़्यादा नुक़्सान टीम अन्ना को हुआ, वो इस कमज़ोर बिल की मुख़ालिफ़त कर रही थी इस लिए इस के लोक सभा में पास होने पर जीत का जश्न नहीं मना सकी, हालाँकि अक़ल का तक़ाज़ा तो ये था कि इस के पास होने पर टीम अन्ना इस का क्रेडिट तो ले लेती, की इस की कोशिशों से एक बिल तो पास होगया है चाहे कमज़ोर ही सही और फिर आगे उस को और मज़बूत करने के लिए अधिक लड़ाई लड़ने का ऐलान करदेती। मगर हुआ वही जो कांग्रेस चाहती थी, ये लोकपाल कांग्रेसी लोकपाल बन कर रह गया और कोई भी इस का क्रेडिट नहीं ले सका सिवाए कांग्रेस के क्योंकि आख़िर में उस के सिवाए सभी लोकपाल बिल की मुख़ालिफ़त में खड़े हुए नज़र आए।
आख़िर में दिल्ली पुलिस को नए साल का जश्न मनाने वालों को क़ाबू में रखने में कामयाबी हासिल करने के लिए मुबारकबाद देता हूँ। चाहे ऐसा उन्होंने कई सड़कों, मेट्रो के स्टेशन, इंडिया गेट, कनॉट प्लेस और दूसरी आम जगहों को पब्लिक के लिए बंद करके क्या हो। चाहे ऐसा उन्होंने रैस्टोरैंट, ढाबों और खाने पीने के और दूसरे आम मुक़ामात को जल्द बंद करवाकर क्या हो। क्योंकि अगर पब्लिक जमा ही नहीं होगी तो हुड़दंग भी नहीं मचेगा और ला ऐण्ड आडर का मसला भी नहीं पैदा होगा। मगर उन्होंने ये कारनामा अंजाम दिया है, ओर इस के लिए वो मुबारकबाद के हक़दार हैं।
आख़िर में किसी शायर का ये मशहूर शेअर पेश है:
नयी सुबह है और नया साल है।
दिसंबर में पूछेंगे क्या हाल है।।

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