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Monday, 21 February 2011

प्रधानमंत्री संवाददाता सम्मेलन घोटाला


प्रकाशित: 21 फरवरी 2011

अफीफ अहसन

बुधवार को मनमोहन सरकार ने एक और घोटाला कर दिया। यह घोटाला संवाददाता सम्मेलन का था। मनमोहन सिंह ने एक प्रेस कांपेंस बुलाई। इस संबंध में पक्षपात से काम लेते हुए केवल चुने हुऐ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बड़े बड़े संपादकों को ही बुलाया गया। प्रिंट मीडिया को इससे दूर रखा गया। एक बात समझ में नहीं आती कि पारम्परिक मीडिया को इस संवाददाता सम्मेलन से अलग क्यों रखा गया?

ऐसा लगता है कि यह प्रेस कांपेंस एक नाटक से ज्यादा कुछ नहीं थी, जिसका क्रिप्ट पहले से तैयार था। क्योंकि एक नाटक में वीज़ोअल का बहुत अधिक महत्व होता है शायद इसी लिए केवल वीज़ोअल मीडिया (टीवी वालों) को बुलाया गया था। मनमोहन सिंह ने कुछ तो रटे रटाए उत्तर दिए ओर कुछ लंबे चौड़े उत्तर उन्होंने पढ़कर सुनाए, इस सब से साफ पता चलता है कि उन्हें पहले से पता था कि कौन क्या सवाल करेगा, या यह भी हो सकता है संवाद पहले ही लिखे जा चुके थे और केवल पात्रों को उन्हें मात्र अदा करना था।

अपने टीवी कार्पामों के विपरीत हर व्यक्ति बहुत ही धैर्य का प्रदर्शन कर रहा था और प्रश्न ऐसे पूछ रहा था जेसे कि मरहम पट्टी से पहले घाव को पोछा जाता है। टीवी चैनलों के कार्पाम में आम तौर पर दिखाई जाने वाली बेमतलब की चीख पुकार ओर गरमा गरमी का दूर दूर तक कोई पता नहीं था। मगर जब देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के विचार और उत्तर सुने तो बहुत दुख हुआ। एक उत्तर में मनमोहन सिंह ने बहुत मासूमियत से कहा कि हां मुझसे कुछ गलतियां हुई है लेकिन में कोई गुनाहगार या अपराधी नहीं। मैं भी एक इंसान हूँ, इसलिए त्रुटियाँ मुझसे हो सकती हैं, और मैं तो मान ही रहा हूं कि हां मैंने गलती की है। उन्होंने कहा कि गठबंधन सरकार चलाने की कुछ कीमत तो अदा करनी ही पड़ती है जो उन्होंने भी अदा की है। मगर क्या 176,000 करोड़ रूप्य कुछ जयादा मूल्य अदा नही किया गया? अगर उन्होंने राजा की तरह पहले आओ पहले पाओ फार्मूला अपनाकर इतनी भारी कीमत चुकाने के बजाय एक ओपन टेंडर (चुनाव) किया होता कि जनता ही बताए कि इस गठबंधन को बनाए रखने के लिए देश क्या भुगतान करने को तैयार है तो वह कहीं अधिक लाभ में रहते। हालांकि जयललिता ने बहुत पहले यह आ़फर दे दिया था कि राजा के खिलाफ किसी कार्रवाई की स्थिति में अगर डीएमके उनका साथ छोड़ दे तो वह सरकार का साथ देने के लिए तैयार हैं, मगर न जाने और क्या मजबूरी थी कि राजा के खिलाफ कार्रवाई टाली जाती रही।

मनमोहन सिंह के अनुसार उन्होंने देश की जनता पर कई एहसान किए हैं। एक एहसान यह किया है कि देश को मध्यवधी चुनाव से छुटकारा दिलाया इस तरह उन्होंने देश के कुछ सौ करोड़ रुपए बचालिये हैं मगर इस राशि को बचाने में उनको भ्रष्टाचार से जो समझौता करना पड़ा उसके बदले देश का कई लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

यह बयान उनके और उनकी पार्टी के सात साल पहले दिए गए बयान और मैऩीफेस्टो से बिल्कुल अलग है जिसमें बड़े ज़ोर शोर से यह दावा किया गया था कि यह आम आदमी की सरकार होगी और उसके लाभ के लिए काम करेगी। राज करने के लिए सरकार नहीं होगी बल्कि आम आदमी के दुख दूर करने के लिए हकूमत  की जाएगी।

ऐसा लगता है कि शायद काँग्रेस जनों का यह बयान राजा रंति के भागवतपुराण में अदा किए इन शब्दों से ही प्रभावित था जिसमें उन्हें कहते हुए कहा गया हैः

त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम्।
कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्।।

अर्थात तो मुझे राज्य, न स्वर्ग और न ही मुक्ति की इच्छा है, मैं तो केवल दुःख से संतप्त प्राणियों के कष्टों का नाश चाहता हूँ।

मगर सत्ता प्राप्ति के बाद कांग्रेस की कथनी और करनी में स्पष्ट अंतर पैदा हो गया। इसमें मनमोहन सिंह की कोई गलती नहीं है और वह इस सबसे बड़ी आसानी से बच सकते हैं। लोग जरूर सवाल करें गे कि वह कैसे बच सकते हैं तो इसका जवाब यह है कि वह कलयुग में जी रहे हैं और उन का कोई दायित्व नहीं बनता कि वह स्वयं अकेले कलयुग में जीते हुए सतयुग की बातें करें।

लोग अक्सर यह सवाल करते हैं कि कलयुग क्या है तो उनकी जानकारी के लिए कलयुग की परिभाषा यहाँ पर पेश की जा रही है। भागवतपुराण में कलयुग का बयान कुछ इस तरह किया गया है बुराई कलयुग की विशेषता है। माल लोगों के लिए सब कुछ है और पवित्र जीवन का कोई मूल्य नहीं है। ताकत ही सही है। कारोबार का मतलब धोखा है। न्यायालयों में गरीब को न्याय नहीं कमलता। लोग लंबे बाल रखेंगे। भेदभाव और भ्रष्टाचार हावी होंगे। राजा चोर और लुटेरे हैं।

उन्होंने जिस यूपीए गठबंधन सरकार की नींव डाली थी, वह सात साल से सिर्प शासन कर रही है। गौरतलब है कि जब से यूपीए सत्ता में आई है तब से देश में भ्रष्टाचार का बोल बाला है, आदर्श सोसाइटी घोटाला, राष्ट्रमंडल खेल घोटाला और 2 जी घोटाला आप सब के सामने हैं, बढ़ती महंगाई ने जीवन अस्त व्यस्त और बर्बाद कर दिया है।

इन सब बातों पर सफाई देने के लिए इतने दिनों तक मनमोहन सिंह ने कोई प्रेस कॉन्पेंस नहीं की। मगर जब मामला उनके कार्यालय का आया तो उन्हें सफाई देने की जरूरत पेश आई। मामला है देवास-इसरो डील का। इस डील में उनके कार्यालय पर उंगलियां उठ रही थीं और एक चैनल उनके खिलाफ पूरा अभियान चलाए हुए था। इस चैनल के एडीटर को उन्होंने संवाददाता सम्मेलन में सवाल पूछने का पूरा अवसर दिया और उनके प्रश्न का उत्तर मनमोहन सिंह ने पहले से तैयार लिखित उत्तर से पढ़ कर दिया।

जब राष्ट्रमंडल खेलों में हुए घोटाले के जिम्मेदार अधिकारियों को जमानत मिलने की बात पूछी गई तो उन्होंने कहा कि इस देश का एक कानून है और उसके अनुसार कार्य चलता है। उन्होंने यह सफाई पेश नहीं की कि सीबीआई ने क्यों समय रहते आरोप पत्र दाखिल नहीं किया और इस तरह परदे के पीछे से आरोपियों की मदद की और इस कारण आरोप पत्र दाखिल न होने के चलते उनहैं जमानत मिल गई।

जब उनसे यह पूछा गया कि वह अपनी सरकार को दस में से कितने नंबर देते हैं तो उन्होंने अपनी सरकार को सात नंबर दिए। हो सकता है कि उन्होंने यह समझा हो कि उनसे उनकी सरकार की उम्र पूछी जा रही है और यह भी हो सकता है कि उन्होंने हर साल के लिए अपनी सरकार को दस में से एक नंबर दिया हो और उसे जोड कर इस तरह सात वर्षीय कार्यकाल में यह संख्या जमा कर ली हो क्योंकि संख्या के खेल में तो वह विशेषज्ञ हैं ही। अगर जनता से पूछा जाता तो वह उनकी सरकार को दस में से एक नंबर भी नहीं देती।

मनमोहन सिंह का कहना है कि मीडिया हर समय उन्हें गुनाहगार की तरह पेश करता है, जो गलत है, मैं सबके सामने पूरे देश की जनता से वादा करता हों की दोषियों को अवश्य सजा मिलेगी। जिन्होंने जो गलत किया है इसका दंड उन्हें भुगतना ही होगा लेकिन मेरी भी कुछ मजबूरियां है, हम एक गठबंधन सरकार चला रहे हैं।

ऐसा लगता है कि मनमोहन सिंह इस बात को स्वीकार करके कि उन्होंने सत्ता में बने रहने के लिए मूल्यों के साथ समझौता किया है यह दलील पेश करना चाहते हैं के जवाबदेही की जिम्मेदारी सरकार में बने रहने की आवश्यकता पर निर्भर करती है। मनमोहन सिंह के संवाददाता सम्मेलन का लब्बोलबाब यह रहा कि वह नहीं दबते तो देश को चुनाव का सामना करना पड़ता जो भ्रष्टाचार से अधिक विनाशकारी होता।

Monday, 14 February 2011

अगर सोनिया गांधी की नसीहत पर अमल किया होता


प्रकाशित: 14 फरवरी 2011

अफीफ अहसन

अगर कृष्णा ने सोनिया गांधी की नसीहत पर अमल किया होता उन की ऐसी किरकिरी नहीं होती जैसी पिछले दिनों संयुक्त संघ में हुआ। ये उनकी उम्र का तकाज़ा कहा जाय या लापरवाही कि उन्होंने अपने भाषण के बजाए पुर्तगाल के मंत्री का भाषण पढ़ डाला।

थोड़ी सी लापरवाही विदेश मंत्री एस एम कृष्णा की संयुक्त राष्ट्र में चल रही जी -4 की बैठक में किरकिरी का सबब बन गई। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कृष्णा ने अपने भाषण के बदले पुर्तगाल के मंत्री के भाषण पढ़ना शुरू कर दिया। बाद में भारतीय राजदूत हरदीप सिंह ने उन्हें गलती का एहसास दिलाया और उनके भाषण की प्रति दी। इससे पहले कृष्णा 3 मिनट तक पुर्तगाली प्रधानमंत्री का भाषण पढ़ चुके थे। आश्चर्य तो यह है कि बाद में उन्होंने यह भी पढ़ दिया कि आज यहां पुर्तगाली बोलने वाले दो देश पुर्तगाल और ब्राजील एक साथ हैं। मुझे इस बात पर बेहद संतोष है और उसे प्रगट करने की अनुमति दी जाए। खास बात यह है कि पुर्तगाली के मंत्री पहले ही यह भाषण पढ़ चुके थे। विदेश मंत्री एस एम कृष्णा को समझ ही नहीं आया कि वह क्या कह रहे हैं। उनके भाषण में कहीं भी भारत का उल्लेख नहीं था। बातें पुर्तगाल की हो रही थीं लेकिन कृष्णा को कुछ अजीब नहीं लगा। उन्होंने कागज उठाकर बस पढ़ना शुरू किया तो तीन मिनट तक पढ़ते ही चले गए। जब भारतीय अधिकारी ने कृष्णा को उनकी गलती का एहसास कराया तो कृष्णा ने सही कागज लेकर भाषण पढ़ना शुरू किया।

कृष्णा ने अपना भाषण कुछ यूं शुरू किया। सम्मान महासचिव, मेरे प्रिय साथयों और सभी देशों से आए प्रतिनिधियों। इस अवसर पर सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष के रूप में ब्राजील के नेता नतानीव पेट्रोटा की सराहना करना चाहता हूँ। उन्होंने समय रहते छोटे देशों को विभिन्न कार्यों के लिए फंड देने के लिए नई बहस छेड़ी। मैं उन्हें बधाई देना चाहता हूँ। छोटा मुँह बड़ी बात होगी लेकिन मेरी खुश नसीब है कि यहां पर पुर्तगाली बोलने वाले देशों की समिति के सदस्य हैं। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र में तैनात भारतीय राजदूत ने कृष्णा को रोका और सही कागज से भाषण पढ़ने को कहा। कृष्णा ने रुककर फिर भारत का भाषण पढ़ा जिसमें उन्होंने फिर ग़लती कर दी और कहने लगे। श्री राष्ट्रपति हमारे राष्ट्रपति महात्मा गांधी ने कहा था। पिछले दिनों हरियाणा के दिवंगत सवतंत्रता सेनानी और हुड्डा के पिता की याद में स्मृति टिकट जारी करते हुए सोनिया गांधी ने पार्टी के बुजुर्ग नेताओं को सत्ता ओर राजनीति से बोरिया बिस्तर स्वयं बांध लेने का बेबाक संकेत कर दिया था। कांग्रेस अध्यक्ष के इस इशारे को संगठन और सत्ता में नई पीढ़ी का रास्ता खोलने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा था।  सरकार और संगठन की कुर्सी पर लंबे समय से काबिज पार्टी के बड़े नेताओं को सोनिया गांधी ने खुद ही संन्यास लेने की यह नसीहत मंगलवार को आजादी के सिपाही चौधरी रणबीर सिंह की याद में डाक टिकट जारी करते हुए दी थी। हाई कमान का संकेत विशेष रूप पर उनके लिए था जो 70-80 साल की उम्र पार करने के बावजूद कुर्सी नहीं छोड़ना चाहते। रणबीर सिंह के 64 साल की उम्र में राजनीति से सन्यास लेने का उदाहरण देते हुए सोनिया ने कहा कि सबको यह सोचना चाहिए कि हम नई पीढ़ी के लिए क्या उदाहरण पेश कर रहे हैं। अगर सोनिया गांधी की नसीहत पर अमल करते हुए कृष्णा ने अपने पद से सवंय सन्यास धारण कर लिया होता तो आज उनकी और देश की इतनी फज़ीहत नहीं होती। मगर क्या कहें देश के सबसे बुज़ुर्ग राजनीतिक दल में बुज़ुर्गों का ही बोलबाला है, जिस की वजह से नई पीढ़ी के राजनीतिज्ञ आगे नहीं आपाते। कुछ नेता तो ऐसे हैं जिनके बारे में यह कहा जा सकता है कि मुंह में दांत नहीं, और पेट में आंत नहीं मगर इनहें सत्ता से चिपके रहने में ही मज़ा आता है।

जहां एक ओर विश्व के सभी प्रमुख देशों में कम उमर लोग सत्ता धारी हैं वहीं भारत की सरकार में आधे से अधिक मंत्री अपनी आयु की 60 से अधिक बहारें देख चुके हैं। श्री कृष्णा मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल के सबसे बुजुर्ग मंत्री हैं वे 77 साल के हैं। प्रणब  मुखर्जी की उम्र 75 साल है, वीरभद्र  सिंह बीके हांडीक की 76 साल, मुरली देवड़ा 74 साल, फारूक अब्दुल्ला वयालार रवि की उम्र 73 साल, शरद पवार, वीरप्पा मोइली ओर ऐ के एंटनी की उम्र 70 साल, स्शील कुमार शिंदे और जयपाल रेड्डी की उम्र 69 साल, अम्बिका सोनी और मलिक अर्जुन खडगे की उम्र 68 वर्ष है।  जिस देश की आबादी की औसत उम्र 26 साल हो उस देश की सरकार की औसत उम्र 60 साल है जो आने वाली पीढ़ी के लिए प्लानिंग और उस पर अमल के लिए जिम्मेदार है। यही नहीं प्लानिंग कमीशन में भी बड़ी उम्र के लोगों का बोलबाला है। खुद मोंटेक सिंह अहलूवालिया की उम्र 67 साल है और उसके सदस्यों का तो कहना ही क्या। दरअसल बड़ी उम्र के यही लोग नई उम्र के नेताउाsं की राह का रोडा हैं। क्योंकि ये लोग सत्ता में रहने की अपनी इच्छा को नहीं दबा पाते ओर मंत्री बनने का लालच नहीं छोड़ते इसलिए नई पीढ़ी के लोगों के लिए मंत्रिमंडल में जगह नहीं बचती। जब यूपीए एक का मंत्रिमंडल बना था तब यह सोचा जा रहा था कि मनमोहन सिंह नई पीढ़ी के लोगों को और कम उम्र के लोगों को मंत्रिमंडल में दिल खोलकर जगह देंगे और नई पीढ़ी को पार्टी ओर सरकार के साथ जोड़ने के लिए एक सकारात्मक संकेत देंगे मगर ऐसा नहीं हुआ। और यूपीए दो में भी कम जयादा उन्हीं पुराने लोगों को जगह दी गई। यही नहीं नए लोगों को सत्ता के लिए तैयार करने के लिए भी कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया गया है। हाला की राहुल गांधी देश भर में घूम कर नई पीढ़ी को कांग्रेस से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं मगर ऐसा लगता है कि इस अभियान में वह अकेले ही हैं सरकार द्वारा इस संबंध में कोई व्यापक नीति नहीं अपनाई गई है। 47 साल की उम्र में ओबामा अमेरिका के पांचवें कम उम्र राष्ट्रपति बन गए, रोजवेलट के बाद जो केवल 42 साल की उम्र में ही अमेरिका के राष्ट्रपति बन गए थे। टोनी बलेयर 44 साल की उम्र में बर्तानिया के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री बन गए थे।

 इससे पहले 1812 में लार्ड लीवरिपूल ब्रिटेन के कम उम्र प्रधानमंत्री बने थे। स्वर्गीय राजीव गांधी 40 साल की उम्र में भारत के प्रधानमंत्री बने थे और उनकी सरकार में भी काफी संख्या में युवा मंत्री शामिल थे। इसके विपरीत मनमोहन सिंह मंत्रालय में बुजुर्गों की भरमार है। एक कहावत है कि `जस राजा तस प्रजा' पर यहां तो यह कहना पड़ेगा कि `जस राजा तस मंत्री'।

Monday, 7 February 2011

मिस्र में लोकतंत्र की इच्छा



प्रकाशित: 07 फरवरी 2011

अफीफ अहसन

मिस्र में यूं तो कहने को लोकतंत्र है मगर उसका लोकतंत्र से दूर दूर तक कोई वासता नहीं है।  मिस्र में एक तानाशाह की सरकार है जिसका पूरा नाम मोहम्मद हुसनी सैयद मुबारक है जो मिस्र के चौथे और वर्तमान राष्ट्रपति हैं।  उन्होंने अनवर सादात पर हुए जानलेवा हमले के बाद 14 अत्तूबर 1981 को राष्ट्रपति का पद अपने हाथ में ले लिया था।  1949 में उन्होंने अपना करियर एक सैनिक की तरह शुरू किया।

अपने लंबे सैनिक करियर में उन्होंने कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया और 1973 में उन को उन की सेवा को देखते हुय मुख्य वायू सेनाधयक्ष   बना दिया गया।  मुबारक के धन का अनुमान है कि उनके पास लगभग 70 अरब डॉलर की सम्पत्ति है और ऐसा माना जाता है कि यह रकम उन्होंने सेना में रहते हुए किए गए सोदों से कमाई थी।  1975 में सादात ने उन्हें अपना उपराष्ट्रपति बना दिया और 1981 में सादात पर जानलेवा हमले के बाद मुबारक मिस्र के राष्ट्रपति और नेशनल डेमोकेटिक पार्टी के अध्यक्ष बन गए।  राष्ट्रपति मुबारक को 1987, 1993, 1999 में फिर से चार अवसर पर पेदरपे जनमत संग्रह में बहुमत वोटों से चुना गया।  जनमत संग्रह और परिणाम पर सवाल उठना सही है क्योंकि मिस्र के संविधान के अनुसार राष्ट्रपति के खिलाफ कोई भी व्यक्ति चुनाव में हिस्सा नहीं ले सकता क्योंकि वहां की पीपुल्स असेम्बली प्रजातंत्र के राष्ट्रपति के चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।  इस तरह मिस्र के अध्यक्ष के रूप में उन्हें 29 साल का समय हो चुका है।

मिस्र में लोकतांत्रिक सुधार के लिए जबर्दस्त राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दबाव के बाद मुबारक ने 26 फरवरी, 2005 को मुख्य रूप से रबर स्टाम्प संसद से सितम्बर 2005 से अधिक उम्मीदवारों के राष्ट्रपति चुनाव में शामिल होने की अनुमति देने के लिए संविधान में संशोधन करने को कहा।  इस पहले मुबारक खुद को पार्लयामेंट द्वारा नामित कराकर किसी अपोज़ीशन के बिना एक जनमत संग्रह में इस की पुष्टि कराकर यह स्थान प्राप्त करते थे।

सितम्बर 2005 के मतदान में अधिक उम्मीदवारो के बीच चुनाव था, बजाय एक जनमत संग्रह के, लेकिन चुनाव सुरक्षा संस्थाओं और राष्ट्रपति के अधीन हुआ था।  सरकारी मीडिया, तीन सरकारी अख़बारों और सरकारी टीवी सहित सभी ने मुबारक द्वारा ली गई सरकारी लाइन के अनुसार एक जैसे विचार व्यक्त किये।  लेकिन हाल के साल में वहाँ स्वतंत्र मीडिया, विशेष रूप से स्वतंत्र समाचार पत्रों में जो कभी कभी राष्ट्रपति और उनके परिवार की तीखी आलोचना करते हैं, लगातार वृद्धि होती गई।

मिस्र की ओर से प्रसारित उपग्रह चैनल जैसे आरबिट उपग्रह टीवी और रेडियो नेटवर्प भी विशेष रूप से खुले पन को प्रदर्शित करते थे जो कि उनके फ्लैगशिप कार्यक्रम अलकाहरा अलयोम से उजागर होता है।  लेकिन पिछले चन्द साल में इन चीजों में बदलाव लाने में प्रधानमंत्री अहमद नाज़ीफ के नेतृत्व में सरकार कुछ हद तक सफल रही थी। 28 जुलाई, 2005 को जैसे बड़े पैमाने पर उम्मीद की जा रही थी मुबारक ने अपनी नामांकन की घोषणा की, चुनाव में जो 7 सितम्बर, 2005 को हुए सिविल संगठनों के चुनाव पर्यवेक्षण में पाया के बड़े पैमाने पर धांदली हुई।  रिपोर्ट से जाहिर है कि मुबारक पार्टी सरकार के वाहन सरकारी कर्मचारियों को वोट देने के लिए लेजाने में उपयोग किये गय।  मज़ाफात और ग्रामीण इलाकों में गरीबों का वोट मुबारक के लिए खरीदा गया।  यह भी साबित हुआ है कि अवैध रूप से हजारों लोगों को जिन का वोट डालने का पंजीकरण न था मुबारक ने वोट देने की अनुमति दी।  8 सितम्बर 2005 को अयमन नूर अलग़ाद पार्टी (कल पार्टी) के विरोधी उम्मीदवार ने चुनाव परिणाम को झूठा ठहराया और चुनाव की समीक्षा की मांग की।

बड़े पैमाने पर राजनीतिक अत्याचार व सितम के रूप में देखे जाने वाले 24 दिसम्बर 2005 के फैसले में जो नूर को जालसाज़ी के लिए चलाए गए एक मामले में सुनाया गया, उन्हें पांच साल की बामशक्कत सजा सुनाई गई।  उस दिन व्हाइट हाउस के प्रेस सचिव नें एक निंदा बयान जारी कर हिरासत से श्री नूर की रिहाई की मांग की। सरकार में बने रहने के लिए मुबारक प्रशासन में गृह मंत्रालय कार्यालय में राजनीतिक भ्रष्टाचार में नाटकीय वृद्धि हुई, जिसमें उनके राज को लंबे समय तक सुरक्षित करने के लिए शक्ति के इस्तेमाल में भारी वृद्धि हुई।  इसमें भ्रष्टाचार के मामलों के बिना राजनीतिक व्यक्ति और युवा कार्यकर्ताओं की कैद, अवैध बिना लिखा पढ़ी के गुप्त कारावास की सुविधाओं के कारण, और विश्वविद्यालयों, मस्जिदों, अखबार के स्टाफ के सदस्यों की राजनीतिक इच्छाओं के आधार पर खारिज किया जाता।

आपातकालीन कानून के कारण हर अधिकारी को उसके क्षेत्र में किसी भी व्यक्ति को बिना कारण गिरफतारी का उपयोग कर क्षेत्र में नागरिकों की गोपनीयता का उल्लंघन करने की अनुमति है।

 मिस्र, आपातकालीन कानून (1958 के कानून नंबर 162) के तहत एक अर्ध राष्ट्रपति प्रजातंत्र है और 1967 के बाद से 1980 में एक 18 महीने की छूट जो सादात की हत्या के साथ समाप्त हुई यह अभी तक जारी है।  इस कानून के तहत पुलिस को व्यापक विकल्प दिए गए हैं।

 संवैधानिक अधिकार निलंबित हैं और सेनसर जायज है।  कानून के अनुसार तेजी से किसी भी गैर सरकारी राजनीतिक गतिविधियों को रोका जास्कता है।

 जैसे सड़क प्रदर्शन, अस्वीकृत राजनीतिक संगठनों और गैर पंजीकृत वित्तीय दान पर औपचारिक रूप से प्रतिबंध लगा दिया गया है।  लगभग 17,000 लोगों को कानून के तहत हिरासत में लिया गया है और राजनीतिक कैदियों का अनुमान 30,000 से अधिक पार कर चुका है।  इमरजेंसी के राज्य के तहत, सरकार को किसी भी समय तक किसी भी व्यक्ति को कैद करने का अधिकार है, और वास्तव में बिना किसी कारण के इसी तरह किसी भी समय तक मामले के बिना उन्हें जेलों में रखा जा सकता है।

मुबारक सरकार यह दावा करती है कि वर्तमान सरकार ने चुनाव नहीं छोड़ा तो अखवान उलमुसलमून की तरह के विपक्ष के समूह मिस्र में सत्ता में आ सकते हैं, अगर समूह की मुख्य वित्तीय मदद करने वालों का माल जब्त नहीं किया, और समूह के वरिष्ठ लोगों को न बंद किया गया, यह ऐसे कार्य हैं जो आपातकालीन कानून के बिना लगभग असंभव है।  लेकिन यह लोकतंत्र के सिद्धांतों, जो एक नागरिक को एक निष्पक्ष अदालती मामला और उनकी पसंद के उम्मीदवार को चुनने का अधिकार देता है चाहे वह जो भी हो /या किसी भी पार्टी का हो, के खिलाफ जाता है।

अमेरिका को लगता है कि मुबारक के दिन लद गये है और अब उन्हें जाना ही होगा और क्योंकि इस क्षेत्र में मिस्र के लिए बहुत महत्व रखता है इसलिए वह नहीं चाहता कि उसे लोकतंत्र के विरोधियों में शुमार किया जाय और आने वाले शासक उसको नफरत की नजर से देखें और उसके खिलाफ हो जायें।  इसीलिए अमेरिका हर कदम पूंक पूंक कर रख रहा है।

हालांकि अमेरिका ने मुबारक को अपने जमुरे के तरह इस्तेमाल किया है, मगर अब यह इशारा दे रहा है कि मुबारक को जाना ही होगा।  हालांकि अमरीका के पूर्व उपराष्ट्रपति डिक चीनी का कहना है कि अमेरिका को यह नहीं भूलना चाहिए कि मुबारक एक अच्छे दोस्त रहे हैं।

अमेरिका को यह पता है कि अगर मुबारक ने जल्द इस्तीफा नहीं दिया और कोई बीच का रास्ता नहीं निकाला गया तो मुस्लिम ब्रदरहुड जैसी संस्थायें और शक्ति प्राप्त कर सकती है और उन्हें सत्ता में आने से रोकना मुश्किल हो जाएगा।  इसलिए वह चाहता है कि मुबारक इस्त़ीफा दे और एक अंतरिम सरकार की स्थापना हो ओर चुनावों के बाद वह नई सरकार को बागडोर सौंप दे मगर टोनी ब्लेयर के अनुसार मुबारक एक बहुत बहादुर ओर सक्षम व्यक्ति हैं ओर अगर उन को हटाकर चुनाव कराने की जल्दी की गई तो मुस्लिम ब्रदरहुड जैसा संगठन सत्ता में आ सकता है।

एक बात समझ से बाहर है कि अगर आज़ादाना चुनाव कराए जाएं तो किसी लोकतांत्रिक देश में वही सत्ता में आता है जिसके साथ बहुमत है, लोकतंत्र की शर्त भी यही है कि बहुमत किसी को भी चुने, इसलिए यह कहना और सोचना कि सत्ता पर अमुक पार्टी का कबजा हो जाएगा इसलिए चुनाव न कराए जाएं कहां तक सही है।

महात्मा गांधी के यह शब्द मिस्र के मौजूदा हालात पर बिल्कुल सही बैठ रहे हैं।

"मैं जब हताशा होत हूँ तो मैं याद करता हूँ कि सारे इतिहास में सत्य और प्रेम का रास्ता हमेशा जीतता है। इसमें तानाशाह और हत्यारे हुऐ है और एक समय वे अजेय लग रहे थे,पर अंत में उनका पतन हुआ, इसे हमेशा याद रखो"महात्मा गांधी।