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Monday, 7 February 2011

मिस्र में लोकतंत्र की इच्छा



प्रकाशित: 07 फरवरी 2011

अफीफ अहसन

मिस्र में यूं तो कहने को लोकतंत्र है मगर उसका लोकतंत्र से दूर दूर तक कोई वासता नहीं है।  मिस्र में एक तानाशाह की सरकार है जिसका पूरा नाम मोहम्मद हुसनी सैयद मुबारक है जो मिस्र के चौथे और वर्तमान राष्ट्रपति हैं।  उन्होंने अनवर सादात पर हुए जानलेवा हमले के बाद 14 अत्तूबर 1981 को राष्ट्रपति का पद अपने हाथ में ले लिया था।  1949 में उन्होंने अपना करियर एक सैनिक की तरह शुरू किया।

अपने लंबे सैनिक करियर में उन्होंने कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया और 1973 में उन को उन की सेवा को देखते हुय मुख्य वायू सेनाधयक्ष   बना दिया गया।  मुबारक के धन का अनुमान है कि उनके पास लगभग 70 अरब डॉलर की सम्पत्ति है और ऐसा माना जाता है कि यह रकम उन्होंने सेना में रहते हुए किए गए सोदों से कमाई थी।  1975 में सादात ने उन्हें अपना उपराष्ट्रपति बना दिया और 1981 में सादात पर जानलेवा हमले के बाद मुबारक मिस्र के राष्ट्रपति और नेशनल डेमोकेटिक पार्टी के अध्यक्ष बन गए।  राष्ट्रपति मुबारक को 1987, 1993, 1999 में फिर से चार अवसर पर पेदरपे जनमत संग्रह में बहुमत वोटों से चुना गया।  जनमत संग्रह और परिणाम पर सवाल उठना सही है क्योंकि मिस्र के संविधान के अनुसार राष्ट्रपति के खिलाफ कोई भी व्यक्ति चुनाव में हिस्सा नहीं ले सकता क्योंकि वहां की पीपुल्स असेम्बली प्रजातंत्र के राष्ट्रपति के चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।  इस तरह मिस्र के अध्यक्ष के रूप में उन्हें 29 साल का समय हो चुका है।

मिस्र में लोकतांत्रिक सुधार के लिए जबर्दस्त राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दबाव के बाद मुबारक ने 26 फरवरी, 2005 को मुख्य रूप से रबर स्टाम्प संसद से सितम्बर 2005 से अधिक उम्मीदवारों के राष्ट्रपति चुनाव में शामिल होने की अनुमति देने के लिए संविधान में संशोधन करने को कहा।  इस पहले मुबारक खुद को पार्लयामेंट द्वारा नामित कराकर किसी अपोज़ीशन के बिना एक जनमत संग्रह में इस की पुष्टि कराकर यह स्थान प्राप्त करते थे।

सितम्बर 2005 के मतदान में अधिक उम्मीदवारो के बीच चुनाव था, बजाय एक जनमत संग्रह के, लेकिन चुनाव सुरक्षा संस्थाओं और राष्ट्रपति के अधीन हुआ था।  सरकारी मीडिया, तीन सरकारी अख़बारों और सरकारी टीवी सहित सभी ने मुबारक द्वारा ली गई सरकारी लाइन के अनुसार एक जैसे विचार व्यक्त किये।  लेकिन हाल के साल में वहाँ स्वतंत्र मीडिया, विशेष रूप से स्वतंत्र समाचार पत्रों में जो कभी कभी राष्ट्रपति और उनके परिवार की तीखी आलोचना करते हैं, लगातार वृद्धि होती गई।

मिस्र की ओर से प्रसारित उपग्रह चैनल जैसे आरबिट उपग्रह टीवी और रेडियो नेटवर्प भी विशेष रूप से खुले पन को प्रदर्शित करते थे जो कि उनके फ्लैगशिप कार्यक्रम अलकाहरा अलयोम से उजागर होता है।  लेकिन पिछले चन्द साल में इन चीजों में बदलाव लाने में प्रधानमंत्री अहमद नाज़ीफ के नेतृत्व में सरकार कुछ हद तक सफल रही थी। 28 जुलाई, 2005 को जैसे बड़े पैमाने पर उम्मीद की जा रही थी मुबारक ने अपनी नामांकन की घोषणा की, चुनाव में जो 7 सितम्बर, 2005 को हुए सिविल संगठनों के चुनाव पर्यवेक्षण में पाया के बड़े पैमाने पर धांदली हुई।  रिपोर्ट से जाहिर है कि मुबारक पार्टी सरकार के वाहन सरकारी कर्मचारियों को वोट देने के लिए लेजाने में उपयोग किये गय।  मज़ाफात और ग्रामीण इलाकों में गरीबों का वोट मुबारक के लिए खरीदा गया।  यह भी साबित हुआ है कि अवैध रूप से हजारों लोगों को जिन का वोट डालने का पंजीकरण न था मुबारक ने वोट देने की अनुमति दी।  8 सितम्बर 2005 को अयमन नूर अलग़ाद पार्टी (कल पार्टी) के विरोधी उम्मीदवार ने चुनाव परिणाम को झूठा ठहराया और चुनाव की समीक्षा की मांग की।

बड़े पैमाने पर राजनीतिक अत्याचार व सितम के रूप में देखे जाने वाले 24 दिसम्बर 2005 के फैसले में जो नूर को जालसाज़ी के लिए चलाए गए एक मामले में सुनाया गया, उन्हें पांच साल की बामशक्कत सजा सुनाई गई।  उस दिन व्हाइट हाउस के प्रेस सचिव नें एक निंदा बयान जारी कर हिरासत से श्री नूर की रिहाई की मांग की। सरकार में बने रहने के लिए मुबारक प्रशासन में गृह मंत्रालय कार्यालय में राजनीतिक भ्रष्टाचार में नाटकीय वृद्धि हुई, जिसमें उनके राज को लंबे समय तक सुरक्षित करने के लिए शक्ति के इस्तेमाल में भारी वृद्धि हुई।  इसमें भ्रष्टाचार के मामलों के बिना राजनीतिक व्यक्ति और युवा कार्यकर्ताओं की कैद, अवैध बिना लिखा पढ़ी के गुप्त कारावास की सुविधाओं के कारण, और विश्वविद्यालयों, मस्जिदों, अखबार के स्टाफ के सदस्यों की राजनीतिक इच्छाओं के आधार पर खारिज किया जाता।

आपातकालीन कानून के कारण हर अधिकारी को उसके क्षेत्र में किसी भी व्यक्ति को बिना कारण गिरफतारी का उपयोग कर क्षेत्र में नागरिकों की गोपनीयता का उल्लंघन करने की अनुमति है।

 मिस्र, आपातकालीन कानून (1958 के कानून नंबर 162) के तहत एक अर्ध राष्ट्रपति प्रजातंत्र है और 1967 के बाद से 1980 में एक 18 महीने की छूट जो सादात की हत्या के साथ समाप्त हुई यह अभी तक जारी है।  इस कानून के तहत पुलिस को व्यापक विकल्प दिए गए हैं।

 संवैधानिक अधिकार निलंबित हैं और सेनसर जायज है।  कानून के अनुसार तेजी से किसी भी गैर सरकारी राजनीतिक गतिविधियों को रोका जास्कता है।

 जैसे सड़क प्रदर्शन, अस्वीकृत राजनीतिक संगठनों और गैर पंजीकृत वित्तीय दान पर औपचारिक रूप से प्रतिबंध लगा दिया गया है।  लगभग 17,000 लोगों को कानून के तहत हिरासत में लिया गया है और राजनीतिक कैदियों का अनुमान 30,000 से अधिक पार कर चुका है।  इमरजेंसी के राज्य के तहत, सरकार को किसी भी समय तक किसी भी व्यक्ति को कैद करने का अधिकार है, और वास्तव में बिना किसी कारण के इसी तरह किसी भी समय तक मामले के बिना उन्हें जेलों में रखा जा सकता है।

मुबारक सरकार यह दावा करती है कि वर्तमान सरकार ने चुनाव नहीं छोड़ा तो अखवान उलमुसलमून की तरह के विपक्ष के समूह मिस्र में सत्ता में आ सकते हैं, अगर समूह की मुख्य वित्तीय मदद करने वालों का माल जब्त नहीं किया, और समूह के वरिष्ठ लोगों को न बंद किया गया, यह ऐसे कार्य हैं जो आपातकालीन कानून के बिना लगभग असंभव है।  लेकिन यह लोकतंत्र के सिद्धांतों, जो एक नागरिक को एक निष्पक्ष अदालती मामला और उनकी पसंद के उम्मीदवार को चुनने का अधिकार देता है चाहे वह जो भी हो /या किसी भी पार्टी का हो, के खिलाफ जाता है।

अमेरिका को लगता है कि मुबारक के दिन लद गये है और अब उन्हें जाना ही होगा और क्योंकि इस क्षेत्र में मिस्र के लिए बहुत महत्व रखता है इसलिए वह नहीं चाहता कि उसे लोकतंत्र के विरोधियों में शुमार किया जाय और आने वाले शासक उसको नफरत की नजर से देखें और उसके खिलाफ हो जायें।  इसीलिए अमेरिका हर कदम पूंक पूंक कर रख रहा है।

हालांकि अमेरिका ने मुबारक को अपने जमुरे के तरह इस्तेमाल किया है, मगर अब यह इशारा दे रहा है कि मुबारक को जाना ही होगा।  हालांकि अमरीका के पूर्व उपराष्ट्रपति डिक चीनी का कहना है कि अमेरिका को यह नहीं भूलना चाहिए कि मुबारक एक अच्छे दोस्त रहे हैं।

अमेरिका को यह पता है कि अगर मुबारक ने जल्द इस्तीफा नहीं दिया और कोई बीच का रास्ता नहीं निकाला गया तो मुस्लिम ब्रदरहुड जैसी संस्थायें और शक्ति प्राप्त कर सकती है और उन्हें सत्ता में आने से रोकना मुश्किल हो जाएगा।  इसलिए वह चाहता है कि मुबारक इस्त़ीफा दे और एक अंतरिम सरकार की स्थापना हो ओर चुनावों के बाद वह नई सरकार को बागडोर सौंप दे मगर टोनी ब्लेयर के अनुसार मुबारक एक बहुत बहादुर ओर सक्षम व्यक्ति हैं ओर अगर उन को हटाकर चुनाव कराने की जल्दी की गई तो मुस्लिम ब्रदरहुड जैसा संगठन सत्ता में आ सकता है।

एक बात समझ से बाहर है कि अगर आज़ादाना चुनाव कराए जाएं तो किसी लोकतांत्रिक देश में वही सत्ता में आता है जिसके साथ बहुमत है, लोकतंत्र की शर्त भी यही है कि बहुमत किसी को भी चुने, इसलिए यह कहना और सोचना कि सत्ता पर अमुक पार्टी का कबजा हो जाएगा इसलिए चुनाव न कराए जाएं कहां तक सही है।

महात्मा गांधी के यह शब्द मिस्र के मौजूदा हालात पर बिल्कुल सही बैठ रहे हैं।

"मैं जब हताशा होत हूँ तो मैं याद करता हूँ कि सारे इतिहास में सत्य और प्रेम का रास्ता हमेशा जीतता है। इसमें तानाशाह और हत्यारे हुऐ है और एक समय वे अजेय लग रहे थे,पर अंत में उनका पतन हुआ, इसे हमेशा याद रखो"महात्मा गांधी।

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