प्रकाशित: 31 जनवरी 2011
अफीफ अहसन
अव्यवस्था और भ्रष्टाचार की खबरें हमारे राजनीतिक दृश्य का अनिवार्य हिस्सा बन गई हैं। लेकिन अपने लालची नेताओं से अलग हटकर यदि देखा जाए तो शक्तिशाली लोग कानून को जिस तरीके से तुच्छ समझते हैं और इस का मज़ाक बनाते हैं वह हमारी सरकार और समाज के अन्दर पनपती अधिक गंभीर बीमारी की ओर संकेत करता है। शासकों और शासित के बीच की यह खाई अधिक भयभीत करने वाली है।
आदर्श हाउसिंग सोसाइटी दरअसल कारगिल युद्ध के हीरो और विधवाओं को बसाने के लिए एक छह मंजिला इमारत होनी चाहिए थी, लेकिन उसकी जगह पर 31 मंजिला टावर बनाया जारहा है। कोलाबा नौसेना के क्षेत्र में 6450 वर्ग मीटर पर बनाई गई इस ऊंची इमारत को बनाने की अनुमति इसलिए दी गई क्योंकि इसमें कारगिल युद्ध के पूर्व सैनिकों और शहीदों की विधवाओं को बसाना था। लेकिन सोसायटी में वरिष्ठ सैन्य कमांडरों, पूर्व पर्यावरण मंत्री, विधायक और ब्यरोकेटों को घर अलाट किए गए।
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चौहान की मरहूम सास मनोहर लाल शर्मा का नाम भी आदर्श कोआपरेटिव हाउसिंग सोसायटी के सदस्यों के बीच है। जैसे ही यह राज़ खुला, चौहान ने अपने नाम को छुपाने के लिए कोशिश की। उन्होंने कहा कि वह एक दूर की रिश्तेदार थी और उनके आवास से बहुत दूर रहती थीं ओर वह नहीं जानते कि उन को सोसाइटी में घर आवंटित किया गया था। हालांकि, शर्मा का गत वर्ष जुलाई में उनके सरकारी आवास पर देहांत हो गया था। इस बात के मंजरेआम पर आने के बाद अशोक चवान ने सोनिया गांधी के कहने पर इस्तीफा देना पड़ा था।
अलाटयों में पूर्व मुख्य सचिव डीके संकरी के बेटे सन्जोए और सेना के पूर्व प्रमुख जनरल एनसी विज्ज़ और दीपक कपूर, नौसेना के पूर्व प्रमुख एडमिरल माधवेन्द्र सिंह, पूर्व आर्मी वायस मुख्य लेफ़्टिनेंट जनरल शांतनू चौधरी जैसे लोगों के नाम भी शामिल हैं।
आदर्श सोसाइटी में फ्लैटों की अलाटमेंट से कांग्रेस पार्टी को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा था। इस मामले की जांच को सीबीआई के सुपुर्द किया गया था जो अपनी विशिष्ट गति से जांच कर रही थी मगर जब मुंबई उच्च न्यायालय ने पिछले सप्ताह इस मामले की धीमी जांच पर उस की कड़ी आलोचना की और एफ़आईआर दर्ज न करने पर फटकार लगाई तो मजबूरी में सीबीआई ने शनिवार को महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चौहान, कुछ रिटायर्ड सैन्य अधिकारियों और नौकरशाहों के विरुध मामला दर्ज किया। एफआईआर दर्ज करने के बाद सीबीआई ने रविवार को तीन मुख्य आरोपियों के महाराष्ट्र और बिहार स्थित घरों और अन्य स्थानों पर छापे मारे। तीनों आरोपियों के नाम एफ़आईआर में हैं।
आदर्श का अर्थ मिसाली है और यह घोटाला देश में पनप रही भ्रष्टाचार की संस्कृति की एक बेहतरीन मिसाल है। इन भ्रष्टाचारों में नीचे से लेकर ऊपर तक प्रत्येक व्यक्ति शामिल है जो कोई ना कोई महत्व रखता है। भारत में भ्रष्टाचार के चरम सीमा और मात्रा को देख कर रूह कांप जाती है। ब़ोफोर्स घोटाला, स्टांप घोटाला, सत्यम घोटाला, चारा घोटाला, सुकना लैंड घोटाला, पीएफ़ घोटाला, 2जी घोटाला, खन्न घोटाला, येदियुरप्पा घोटाला, सीडब्ल्यूजी घोटाला, हरियाणा ज़मीन घोटाला, सीवीसी की नियुक्ति में घोटाला, सिटी बैंक घोटाला, स्विस बैंक में जमा भारतीयों की काली कमाई पर सरकार की अबूझ ख़ामोशी का मामला और ऐसे कई अन्य मामले हैं जिनसे देश को शर्मिन्दा होना पड़ रहा है। इसके अलावा न जाने कितने और घोटाले हैं जो लोग भूल चुके हैं या फिर मंज़रे आम पर नहीं आ सके हैं, या फिर दबा दिये गये हैं।
आम विचार यह है कि भ्रष्टाचार एक वायरस की तरह है लेकिन मैं सोचता हूं कि कहीं यह हमारी जीन्स में तो शामिल नहीं हो गया है। जीन्स का परवाह माता पिता से बच्चों में जानकारी वितरण करता है जबकि वायरस का पर्वाह यह काम क्षैतिज करता है। शायद यही कारण है कि भारतीयों में भ्रष्टाचार के जीन्स ने अपनी जड़ें इतनी गहरी कर ली हैं।
यह भ्रष्टाचार भारतीय समाज में दीमक की तरह घर कर गया है जिसे छिपाने की न कोई जरूरत समझी जाती है और न ही कोई कोशिश करता है। एक समय वह था जब भ्रष्टाचार को शैतानी क्रिया समझा जाता था और छिपाया जाता था। अब यह शान की बात है। एक तरह की स्वीकृति, काम निकालने की प्रथा।
एक समय वह था कि जब लोग इसके बारे में कानाफूसी करते थे और रिश्वतखोरों और बेईमानों से किनारा कर लेते थे। मेरे स्वर्गीय पिता सिविल सेवा में घूसख़ोरी की शिकायत करते हुए क्रोध में आ जाते थे और कहते थे कि ये लोग दोनों हाथों से लूटते हैं। लेकिन अब वह दिन नहीं रहे। भारतीयों के जीवन में धन से अधिक सत्ता और हवस हैं जो इन को पूरी तरह से भ्रष्ट बना रहे हैं। कुछ लोगों के लिए यह जीन्स विचारधारा की ऩकल का पहलू है और कुछ के लिए यह असतित्व का मामला है। मिस्ल प्रसिद्ध है कि अगर तुम दुश्मन को हरा नहीं सकते तो उसकी पंकती में शामिल हो जाओ। उसका कुछ हिस्सा वह रोल मॉडल लोग हैं जो हमारी सोसायटी हमें प्रदान करती है। सरकार बहुत विशिष्ठ तीनों शाखाओं, नौकरशाही, कानूनसाज़ और न्याय पालिका में भ्रष्टाचार का बाजार गर्म है। कुछ ताकतवर राजनीतिज्ञ हैं जो भारत को तबाह कर रहे हैं और गुलाम बना रहे हैं भ्रष्टाचार की अपनी घिनौनी हरकतों में दूसरों से बाज़ी मार लेजाने की कोशिश कर रहे हैं।
भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए सदनों द्वारा कड़ी नजर रखे जाने की आवश्यकता है, और कारगर न्यायपालिका, स्वतंत्र और नियमित गतिशील और भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसियों, कानून के सख्ती से लागू करने, सरकारी बजटों, माल और सरकारी सहायता के आम आदमी तक वितरण में खुले पन और स्वतंत्र मीडिया और जानदार सिविल सोसाइटी की आवश्यकता है। मगर आज के भारत में इन चीज़ों की बात करना चांद तारों की तमन्ना है।
तो फिर क्या सभी उम्मीदें खत्म हो गईं और हम भ्रष्टाचार के आदी हो गए हैं? जब विभिन्न विचार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्थानांतरित होते हैं तो वह या तो मेज़बान के असतित्व को बढ़ा देते हैं या घटा देते हैं या खुद विचारों का असतित्व प्रभावित होते हैं। इसमें एक खुशी की बात यह है कि हम सब भारतीय भ्रष्टाचार के जीन्स का शिकार नहीं हैं मगर क्या कुछ अच्छे लोग डूबते राष्ट्र को बचालेंगे?
नशे का आदी रोगी तभी ठीक हो सकता है जब वह गर्दन तक इसमें डूब जाता है और उसके भीतर खुद ठीक होने की इच्छा पैदा होती है। भारतीयों को यह महसूस करना होगा कि वह गर्दन तक भ्रष्टाचार में डूब चुके हैं। हमें भ्रष्टाचार को निजी स्तर पर समाप्त करना होगा ताकि वहां से यह सिलसिला राष्ट्रीय स्तर तक जाए।
आदर्श हाउसिंग सोसाइटी दरअसल कारगिल युद्ध के हीरो और विधवाओं को बसाने के लिए एक छह मंजिला इमारत होनी चाहिए थी, लेकिन उसकी जगह पर 31 मंजिला टावर बनाया जारहा है। कोलाबा नौसेना के क्षेत्र में 6450 वर्ग मीटर पर बनाई गई इस ऊंची इमारत को बनाने की अनुमति इसलिए दी गई क्योंकि इसमें कारगिल युद्ध के पूर्व सैनिकों और शहीदों की विधवाओं को बसाना था। लेकिन सोसायटी में वरिष्ठ सैन्य कमांडरों, पूर्व पर्यावरण मंत्री, विधायक और ब्यरोकेटों को घर अलाट किए गए।
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चौहान की मरहूम सास मनोहर लाल शर्मा का नाम भी आदर्श कोआपरेटिव हाउसिंग सोसायटी के सदस्यों के बीच है। जैसे ही यह राज़ खुला, चौहान ने अपने नाम को छुपाने के लिए कोशिश की। उन्होंने कहा कि वह एक दूर की रिश्तेदार थी और उनके आवास से बहुत दूर रहती थीं ओर वह नहीं जानते कि उन को सोसाइटी में घर आवंटित किया गया था। हालांकि, शर्मा का गत वर्ष जुलाई में उनके सरकारी आवास पर देहांत हो गया था। इस बात के मंजरेआम पर आने के बाद अशोक चवान ने सोनिया गांधी के कहने पर इस्तीफा देना पड़ा था।
अलाटयों में पूर्व मुख्य सचिव डीके संकरी के बेटे सन्जोए और सेना के पूर्व प्रमुख जनरल एनसी विज्ज़ और दीपक कपूर, नौसेना के पूर्व प्रमुख एडमिरल माधवेन्द्र सिंह, पूर्व आर्मी वायस मुख्य लेफ़्टिनेंट जनरल शांतनू चौधरी जैसे लोगों के नाम भी शामिल हैं।
आदर्श सोसाइटी में फ्लैटों की अलाटमेंट से कांग्रेस पार्टी को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा था। इस मामले की जांच को सीबीआई के सुपुर्द किया गया था जो अपनी विशिष्ट गति से जांच कर रही थी मगर जब मुंबई उच्च न्यायालय ने पिछले सप्ताह इस मामले की धीमी जांच पर उस की कड़ी आलोचना की और एफ़आईआर दर्ज न करने पर फटकार लगाई तो मजबूरी में सीबीआई ने शनिवार को महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चौहान, कुछ रिटायर्ड सैन्य अधिकारियों और नौकरशाहों के विरुध मामला दर्ज किया। एफआईआर दर्ज करने के बाद सीबीआई ने रविवार को तीन मुख्य आरोपियों के महाराष्ट्र और बिहार स्थित घरों और अन्य स्थानों पर छापे मारे। तीनों आरोपियों के नाम एफ़आईआर में हैं।
आदर्श का अर्थ मिसाली है और यह घोटाला देश में पनप रही भ्रष्टाचार की संस्कृति की एक बेहतरीन मिसाल है। इन भ्रष्टाचारों में नीचे से लेकर ऊपर तक प्रत्येक व्यक्ति शामिल है जो कोई ना कोई महत्व रखता है। भारत में भ्रष्टाचार के चरम सीमा और मात्रा को देख कर रूह कांप जाती है। ब़ोफोर्स घोटाला, स्टांप घोटाला, सत्यम घोटाला, चारा घोटाला, सुकना लैंड घोटाला, पीएफ़ घोटाला, 2जी घोटाला, खन्न घोटाला, येदियुरप्पा घोटाला, सीडब्ल्यूजी घोटाला, हरियाणा ज़मीन घोटाला, सीवीसी की नियुक्ति में घोटाला, सिटी बैंक घोटाला, स्विस बैंक में जमा भारतीयों की काली कमाई पर सरकार की अबूझ ख़ामोशी का मामला और ऐसे कई अन्य मामले हैं जिनसे देश को शर्मिन्दा होना पड़ रहा है। इसके अलावा न जाने कितने और घोटाले हैं जो लोग भूल चुके हैं या फिर मंज़रे आम पर नहीं आ सके हैं, या फिर दबा दिये गये हैं।
आम विचार यह है कि भ्रष्टाचार एक वायरस की तरह है लेकिन मैं सोचता हूं कि कहीं यह हमारी जीन्स में तो शामिल नहीं हो गया है। जीन्स का परवाह माता पिता से बच्चों में जानकारी वितरण करता है जबकि वायरस का पर्वाह यह काम क्षैतिज करता है। शायद यही कारण है कि भारतीयों में भ्रष्टाचार के जीन्स ने अपनी जड़ें इतनी गहरी कर ली हैं।
यह भ्रष्टाचार भारतीय समाज में दीमक की तरह घर कर गया है जिसे छिपाने की न कोई जरूरत समझी जाती है और न ही कोई कोशिश करता है। एक समय वह था जब भ्रष्टाचार को शैतानी क्रिया समझा जाता था और छिपाया जाता था। अब यह शान की बात है। एक तरह की स्वीकृति, काम निकालने की प्रथा।
एक समय वह था कि जब लोग इसके बारे में कानाफूसी करते थे और रिश्वतखोरों और बेईमानों से किनारा कर लेते थे। मेरे स्वर्गीय पिता सिविल सेवा में घूसख़ोरी की शिकायत करते हुए क्रोध में आ जाते थे और कहते थे कि ये लोग दोनों हाथों से लूटते हैं। लेकिन अब वह दिन नहीं रहे। भारतीयों के जीवन में धन से अधिक सत्ता और हवस हैं जो इन को पूरी तरह से भ्रष्ट बना रहे हैं। कुछ लोगों के लिए यह जीन्स विचारधारा की ऩकल का पहलू है और कुछ के लिए यह असतित्व का मामला है। मिस्ल प्रसिद्ध है कि अगर तुम दुश्मन को हरा नहीं सकते तो उसकी पंकती में शामिल हो जाओ। उसका कुछ हिस्सा वह रोल मॉडल लोग हैं जो हमारी सोसायटी हमें प्रदान करती है। सरकार बहुत विशिष्ठ तीनों शाखाओं, नौकरशाही, कानूनसाज़ और न्याय पालिका में भ्रष्टाचार का बाजार गर्म है। कुछ ताकतवर राजनीतिज्ञ हैं जो भारत को तबाह कर रहे हैं और गुलाम बना रहे हैं भ्रष्टाचार की अपनी घिनौनी हरकतों में दूसरों से बाज़ी मार लेजाने की कोशिश कर रहे हैं।
भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए सदनों द्वारा कड़ी नजर रखे जाने की आवश्यकता है, और कारगर न्यायपालिका, स्वतंत्र और नियमित गतिशील और भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसियों, कानून के सख्ती से लागू करने, सरकारी बजटों, माल और सरकारी सहायता के आम आदमी तक वितरण में खुले पन और स्वतंत्र मीडिया और जानदार सिविल सोसाइटी की आवश्यकता है। मगर आज के भारत में इन चीज़ों की बात करना चांद तारों की तमन्ना है।
तो फिर क्या सभी उम्मीदें खत्म हो गईं और हम भ्रष्टाचार के आदी हो गए हैं? जब विभिन्न विचार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्थानांतरित होते हैं तो वह या तो मेज़बान के असतित्व को बढ़ा देते हैं या घटा देते हैं या खुद विचारों का असतित्व प्रभावित होते हैं। इसमें एक खुशी की बात यह है कि हम सब भारतीय भ्रष्टाचार के जीन्स का शिकार नहीं हैं मगर क्या कुछ अच्छे लोग डूबते राष्ट्र को बचालेंगे?
नशे का आदी रोगी तभी ठीक हो सकता है जब वह गर्दन तक इसमें डूब जाता है और उसके भीतर खुद ठीक होने की इच्छा पैदा होती है। भारतीयों को यह महसूस करना होगा कि वह गर्दन तक भ्रष्टाचार में डूब चुके हैं। हमें भ्रष्टाचार को निजी स्तर पर समाप्त करना होगा ताकि वहां से यह सिलसिला राष्ट्रीय स्तर तक जाए।

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