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Monday, 22 August 2011

अन्ना के आंदोलन पर मुसलमान असमंजस का शिकार

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 22nd August 2011
अफ़ीफ़ अहसन
जब प्रत्येक हिन्दुस्तानी अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में भाग ले रहा था तो अंग्रेजों पर बहुत भारी दबाव पड़ने लगा और उन्होंने एक बहुत ही भयानक चाल चली वह चाल थी “बांटो और राज करो”. इसके सहारे उन्होंने कुछ अधिक वर्षों तक हिन्दुस्तान पर अपना शिकंजा बनाए रखा मगर जाते-जाते वह देश के दो टुकड़े करते गए. हिन्दुस्तान के दो टकड़े कभी न होते अगर नफ़रत का वह बीज जो अंग्रेजों ने हिंदुओं और मुसलमानों के दिलों में बोया था न बोया गया होता. यह उसी घृणा का कारण था कि कुछ लोगों को यह लगने लगा कि मुसलमानों को अंग्रेजों के जाने के बाद उनका उचित अधिकार नहीं मिलेगा और इसके चलते कुछ लोगों ने मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग रख दी, जिसकी वजह से देश की स्वतंत्रता में और अधिक समय लगा और देश को आजाद कराने के बजाय हमारे नेता देश के बंटवारे के काम पर लग गए जिसमें अंग्रेज एक कब्जा करने वाले के बजाय एक मध्यस्थ के रूप में शामिल हो गया, जबकि होना तो यह चाहिए था कि हम अंग्रेजों से यह कहते कि तुम अपना बोरिया बिस्तर गोल करो और हिन्दुस्तान छोड़ो और बंटवारे होना है या नहीं होना इसको तुम हिन्दुस्तान के लोगों पर छोड़ दो. वह खुद ही एक स्वतंत्र देश में रहते हुए उसका निर्णय कर लेंगे, लेकिन हुआ इसका उलटा और अंग्रेज डुगडुगी बजाते रहे और हमारे तत्कालीन नेता उस पर नाचते रहे.
यही हाल अन्ना हज़ारे के आंदोलन का भी हुआ है, जिसे लोग स्वतंत्रता की दूसरी लड़ाई से ताबीर कर रहे हैं. कांग्रेस ने एक साजिश के तहत पहले तो यह बात उड़ाई के अन्ना हज़ारे के आंदोलन के पीछे आरएसएस और भाजपा का हाथ है. अन्ना द्वारा मोदी की प्रशंसा किए जाने को भी खूब उछाला गया और यह कहा गया कि मोदी की प्रशंसा करके अन्ना ने अपनी मानसिकता का सबूत दे दिया है. ऐसा नहीं है कि आरएसएस अन्ना के आंदोलन का समर्थन नहीं करता आरएसएस खुल कर अन्ना के आंदोलन का समर्थन करता है, वैसे ही जैसे कम्युनिस्ट करते हैं, वैसे ही जैसे अन्य सेकुलर पार्टयाँ करती है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि अन्ना का आंदोलन कम्यूनल है हर अच्छे काम के लिए सभी तरह के लोग और विभिन्न विचारों के लोग एक साथ आ सकते हैं लेकिन वे केवल एक विशेष मुद्दे के लिए एक साथ आ जाते हैं और इसका अर्थ कदापि नहीं होता कि वह बाकी मामलों में भी एक दूसरे से सहमत हों.
भ्रष्टाचार एक एसा मसला है जिसके खिलाफ अभियान को कोई भी व्यक्ति आसानी से अनदेखी नहीं कर सकता. भ्रष्टाचार पूरे देश के लिए एक महामारी का रूप रखती है, और हर हिन्दुस्तानी बराबर प्रभावित रहा है. भ्रष्टाचार का कोई रंग नहीं होता, कोई भी भ्रष्ट या रिश्वतखोर पैसे का एक ही रंग पहचानता है और वह है नीला रंग यानी नोट का रंग. वह यह नहीं देखता के पैसे देने वाला कौन से धर्म से संबंध रखता है, या यह कि वह कौन से रंग में रंगा हुआ है उसे तो दिखता है मिलने वाले नोटों का रंग.
कांग्रेस द्वारा नियंत्रित किए जाने वाले अधिकतर उर्दू अखबारों की नकारात्मक भूमिका इस अभियान को इसलाम दुश्मन बनाकर पेश करने में रही है. वह लगातार इस अभियान को मुस्लिम विरोधी बनाने में लगे हुए हैं और उसको हिन्दु-मुस‍लिम रंग देने में लगे हुए हैं. कुछ अख़बारों ने मुसलमानों को अन्ना हजारे की तथाकथित अभियान में शामिल होने के विरुध चेतावनी भी दी है. कुछ अखबारों ने यह सवाल उठाया है कि अन्ना क्यों नहीं भाजपा सरकार वाले मध्य प्रदेश में हुई शहला हैदर की सफ़ाकाना हत्या की निंदा करते. कुछ का कहना है कि भ्रष्टाचार से बड़ी समस्या तो साम्प्रदायिकता है जो हिन्दुस्तानी समाज और राजनीति के लिए अधिक हानिकारक है और जिसके खिलाफ जलद लड़ाई लड़ी जाना चाहिए.
एक और दृष्टिकोण के अनुसार अगर अन्ना एक मुसलमान होते और धार्मिक नाबराबरी को समाप्त करने के लिए बिल बनाने के लिए एक के बाद दूसरे अनशन की धमकी देते तो उन लोगों का क्या रवैया होता जो आज समाज में संतुलन और पारदर्शिता के लिए मरे जा रहे हैं.
मगर कुछ मुस्लिम वर्ग के बीच एक सकारात्मक और अलग दृष्टिकोण से भी देखा जा रहा है. जो उसका ऊपरी चेहरा है जिसके अनुसार इस अभियान में कोई विवाद नहीं है, जिस मुद्दे के लिए यह अभियान चलाया जा रहा है इसमें दो राय नहीं, उसके खिलाफ हर कोई एकजुट है और एकजुट रह सकता है. इसके प्रथम पंक्ति के नेता यह दावा करते हैं कि उनका एजेंडा सरल और स्पष्ट है. वह किसी भी राजनीतिक दल से संबंध नहीं रखते और न ही उनका कोई निजी राजनीतिक एजेंडा है. इस वर्ग का कहना है कि अगर ऐसा है तो क्या फिर हिन्दुस्तानी मुसलमान इन प्रचारित बातों का उपयोग नहीं कर सकते और अपना पूरा जोर इस अभियान को सफल बनाने में नहीं लगा सकते? और यह कि लोकपाल के साथ ही धार्मिक बराबरी और संतुलन को भी इसमें शामिल करें ताकि इस से मन अनुकूल परिणाम पा सकें. उनका मानना ​​है कि अगर मुसलमानों ने अपने को इस अभियान से काट कर अलग थलग कर लिया तो फिर फ़ासिस्ट शक्तियों को उसे अपहरण करने में आसानी होगी और मुसलमान अकेला रह जाएगा इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि वह एक जुट होकर इस अभियान में भाग लें.
टीम अन्ना के बारे में यह कहा जा रहा है कि इस अभियान की पहली पंक्ति में कोई मुसलमान नेता शामिल नहीं है, लेकिन किसी डेमोक्रेसी में प्रत्येक व्यक्ति को आगे आने और अपनी बात कहने का अधिकार होता है और जो भी किसी अभियान की शुरुआत करता है वह ही आगे आगे रहता है. ऐसा नहीं है कि इस अभियान को शुरू करने में कोई भी मुसलमान नहीं है, इस अभियान को शुरू करने वालों में महमूद मदनी, सैयद रिजवी, मुफ्ती शिमऊन कासमी, सैयद शाह फज़लुर्रहमान वाइज़ी जैसे लोगों के नाम शामिल हैं. मजबूरी यह है कि क्योंकि अभी रमज़ान का मुबारक महीना चल रहा है जिसमें हर मुसलमान अपना समय अल्लाह की इबादत में गुज़ारता है, इसलिए वह पूरी तरह से आंदोलन में अपनी भागीदारी दर्ज नहीं करा सकता है. और अगर इस महीने में यात्रा की जाये तो रोज़ा नहीं रखा जा सकता है इसलिए भी इस आन्दोलन में दिल्ली से बाहर के मुसलमानों की कम ही भागीदारी रही है.
शायद इस बात को टीम अन्ना ने भी भांप लिया है इसलिए अब मुसलमानों के लिए राम लीला ग्राउंड में इफ़्तार और नमाज़ का प्रबंध भी किया गया है. हालांकि राम लीला मैदान के साथ ही एक बड़ी मस्जिद स्थित है और वहां भी इफ़्तार और नमाज़ का आयोजन होता हे और अधिकतर मुसलमान राम लीला मैदान से इफ़्तार के लिए और बाजमाअत नमाज़ के लिए वहां चले जाते हैं, लेकिन फिर भी टीम अन्ना का राम लीला ग्राउंड में ही ऐसा आयोजन करने के बहुत ही सकारात्मक और दूर गामी परिणाम होंगे और इस अभियान को मजबूती मिलेगी और आपसी भाईचारा और सद्भाव में इज़ाफा होगा.
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اننا کے آندولن پر مسلمان تذبذب کا شکار


Daily Pratap, Indias Oldest Urdu Daily
Published on 22nd August 2011
عفیف احسن
جب ہر ایک ہندوستانی انگریزوں کے خلاف جنگ آزادی میں حصہ لے رہا تھا تواس سے انگریزوں پر بہت زبردست دباؤ پڑنے لگا اور انہوں نے ایک بہت ہی بھیانک چال چلی وہ چال تھی’’ بانٹو اور راج کرو‘‘۔ اس کے سہارے انہوں نے کچھ مزید برسوں تک ہندوستان پر اپنا شکنجا قائم رکھا اور جاتے جاتے وہ دیش کے دو ٹکڑے کرتے گئے۔ ہندوستان کے دوٹکڑے ہرگز نہ ہوتے اگر نفرت کا وہ بیج جو انگریزوں نے ہندوؤں اور مسلمانوں کے دلوں میں بویاتھا نہ بویاہوتا۔ یہ اسی نفرت کا سبب تھا کہ کچھ لوگوں کو یہ لگنے لگا کہ مسلمانوں کو انگریزوں کے جانے کے بعد ان کا جائز حق نہیں ملے گا اور اس کے چلتے کچھ لوگوں نے مسلمانوں کے لئے علاحدہ ملک کی مانگ رکھ دی، جس کی وجہ سے دیش کی آزادی میں اور زیادہ وقت لگا اور دیش کو آزاد کرانے کے بجائے ہمارے قائدین دیش کے بنٹوارے کے کام پر لگ گئے جس میں انگریز ایک غاصب کے بجائے ایک ثالث کی حیثیت سے شامل ہوگیا،جبکہ ہونا تو یہ چاہئے تھا کہ ہم انگریزوں سے یہ کہتے کہ تم اپنا بوریا بستر گول کرواور ہندوستان چھوڑو اور بنٹوارا ہونا ہے یا نہیں ہونااس کو تم ہندوستان کے لوگوں پر چھوڑ دو۔ وہ خود ہی ایک آزاد ملک میں رہتے ہوئے اس کا فیصلہ کرلیں گے، مگر ہوا اس کا الٹا اور انگریز ڈگڈگی بجاتے رہے اور ہمارے اس وقت کے قائدین اس پر ناچتے رہے۔
یہی حال اننا ہزارے کے آندولن کا بھی ہوا ہے، جسے لوگ آزادی کی دوسری لڑائی سے تعبیر کررہے ہیں۔ کانگریس نے ایک سازش کے تحت پہلے تو یہ بات اڑائی کے اننا ہزارے کے آندولن کی پشت پر آر ایس ایس اور بی جے پی کار فرما ہے۔ اننا کے ذریعہ مودی کی تعریف کئے جانے کو بھی خوب اچھالا گیا اور یہ کہا گیا کہ مودی کی تعریف کرکے اننا نے اپنی ذہنیت کا ثبوت دے دیا ہے۔ ایسا نہیں ہے کہ آرایس ایس اننا کے آندولن کی تائید نہیں کرتا آرایس ایس کھل کر اننا کے آندولن کی تائید کرتا ہے، ویسے ہی جیسے کمیونسٹ کرتے ہیں، ویسے ہی جیسے دوسری سیکولرپارٹیاں کرتی ہے، مگر اس کا مطلب یہ ہرگز نہیں کہ اننا کا آندولن کمیونل ہے ہر اچھے کام کے لئے سبھی طرح کے لوگ اور مختلف خیالات کے لوگ ایک ساتھ آسکتے ہیں لیکن وہ لوگ صرف ایک مخصوص کاز کے لئے ایک ساتھ آجاتے ہیں اور اس کا یہ مطلب ہرگز نہیں ہوتا کہ وہ باقی معاملات میں بھی ایک دوسرے سے متفق ہوں۔
بدعنوانی ایک ایسامسئلہ ہے جس کے خلاف مہم کو کوئی بھی شخص آسانی سے نظر انداز نہیں کر سکتا۔ بدعنوانی پورے دیش کے لئے ایک وباء کی حیثیت رکھتی ہے، اور اس سے ہر ہندوستانی برابر متائثر ہورہا ہے۔ بدعنوانی کا کوئی رنگ نہیں ہوتا، کوئی بھی بدعنوان یا رشوت خور پیسے کا ایک ہی رنگ پہچانتا ہے اور وہ ہے نیلا رنگ یعنی کے نوٹ کا رنگ۔ وہ یہ نہیں دیکھتا کے پیسے دینے والا کون سے مذہب سے تعلق رکھتا ہے، یا یہ کہ وہ کون سے رنگ میں رنگا ہواہے اسے تو نظر آتا ہے ملنے والے نوٹوں کا رنگ۔
کانگریس کے ذریعہ کنٹرول کئے جانے والے زیادہ تر اردو اخبارات کا منفی رول اس مہم کواسلام دشمن بناکر پیش کرنے میں رہا ہے۔ وہ لگاتار اس مہم کو مسلم مخالف بنانے میں لگے ہوئے ہیں اور اس کو ہندومسلم رنگ دینے میں لگے ہوئے ہیں۔ کچھ ایسے ہی اخباروں نے مسلمانوں کواننا ہزارے کی اس نام نہاد مہم میں شامل ہونے سے متنبہ کیا ہے۔ کچھ اخباروں نے یہ سوال اٹھایا ہے کہ اننا کیوں نہیں بی جے پی حکومت والے مدھیہ پردیش میں ہوئے شہلاحیدر کے سفاکانہ قتل کی مذمت کرتے۔کچھ کا کہنا ہے کہ بدعنوانی سے بڑا مسئلہ تو مذہبی منافرت ہے جو ہندوستانی سماج اور سیاست کے لئے زیادہ نقصان دہ ہے اور جس کے خلاف لڑائی اشد ضروری ہے۔ایک اور نظریہ کے مطابق اگراننا ایک مسلمان ہوتے اور وہ مذہبی نابرابری کو ختم کرنے کے لئے ایک بل بنانے کے لئے ایک کے بعد دوسرے انشن کی دھمکی دیتے تو ان لوگوں کا کیا رویہ ہوتا جو آج سماج میں عدل اور شفافیت کے لئے مرے جارہے ہیں۔
مگرکچھ مسلم طبقوں کے درمیان اس کو ایک مثبت اورالگ زاویہ سے بھی دیکھا جارہا ہے۔جوکہ اس کا ظاہری چہرا ہے جس کے مطابق اس مہم میں کوئی تنازعہ نہیں ہے،جس کاز کے لئے یہ مہم چلائی جارہی ہے اس میں کو دو رائے نہیں ،اس کے خلاف ہر کوئی متحد ہے اورمتحد رہ سکتا ہے۔اس کے صف اول کے رہنما یہ دعویٰ کرتے ہیں کے انکا ایجنڈا سادہ اور واضح ہے۔ وہ کسی بھی سیاسی جماعت سے تعلق نہیں رکھتے اور نہ ہی انکاکوئی ذاتی سیاسی ایجنڈا ہے۔ اس طبقہ کا کہنا ہے کہ اگر ایسا ہے تو کیا پھر ہندوستانی مسلمان ان مشتہر پوائنٹس کا استعمال نہیں کرسکتے اور اپناپورا زور اس مہم کو کامیاب بنانے میں نہیں لگاسکتے تاکہ وہ لوک پال کے ساتھ ہی ساتھ مذہبی برابری اور عدل کو بھی اس میں شامل کروائیں تاکہ اس سے من موافق نتائج برآمد ہوسکیں۔ان کا ماننا ہے کے اگرمسلمانوں نے اپنے آپ کو اس مہم سے کاٹ کر الگ تھلگ کرلیا تو پھرفاسسٹ طاقتوں کو اسے ہائی جیک کرنے میں مزید آسانی ہو گی او ر مسلمان اکیلا رہ جائے گا اس لئے مسلمانوں کو چاہئے کہ وہ ایک جٹ ہوکر اس مہم میں حصہ لیں۔
ٹیم اننا کے بارے میں یہ کہا جارہا ہے کہ اس مہم کی صف اول میں کوئی مسلمان قائد شامل نہیں ہے، مگر کسی ڈیموکریسی میں ہر ایک شخص کو آگے آنے اور اپنی بات کہنے کا حق حاصل ہوتا ہے اور جو بھی کسی مہم کی شروعات کرتا ہے وہ ہی آگے آگے رہتا ہے۔ ایسا نہیں ہے کہ اس مہم کو شروع کرنے والوں میں کوئی بھی مسلمان نہیں ہے، اس مہم کو شروع کرنے والوں میں محمود مدنی، سید رضوی، مفتی شعمون قاسمی،سید شاہ فضل الرحمٰن واعظی جیسے لوگوں کے نام شامل ہیں۔ مجبوری یہ ہے کہ کیونکہ ابھی رمضان کامبارک مہینہ چل رہا ہے جس میں ہر مسلمان اپنا وقت روزے رکھنے اوراللہ کی عبادت میں گزارتا ہے اس لئے وہ پوری طرح سے اس آندولن میں اپنی شرکت درج نہیں کراسکتا ہے۔ اوراگراس ماہ میں سفر کیا جائے تو روزہ نہیں رکھا جاسکتا ہے اس لئے بھی دہلی سے باہر کے مسلمانوں کی اس میں کم ہی شرکت ہورہی ہے۔
شاید اس بات کو ٹیم اننا نے بھی بھانپ لیا ہے اسی لئے اب مسلمانوں کے لئے رام لیلا گراؤنڈ میں افطاری اورنماز کا انتظا م بھی کیا گیاہے۔ حالانکہ رام لیلا گراؤنڈ کے ساتھ ہی ایک بڑی مسجد واقع ہے اور وہاں بھی افطار اور نماز کا اہتمام ہے اورزیادہ تر مسلمان رام لیلا گراؤنڈ سے افطار کے لئے اور باجماعت نماز کے لئے وہا ں چلے جاتے ہیں، مگر پھر بھی ٹیم اننا کا رام لیلا گراؤنڈمیں ہی ایسا اہتمام کرنے کے بہت ہی مثبت اور دور پا نتائج برآمد ہوں گے اور اس مہم کو تقویت ملے گی اور آپسی بھائی چارہ اور ہم آہنگی میں اضافہ ہوگا۔
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Monday, 15 August 2011

’’رباہن کی کریے‘‘

Daily Pratap, Indias Oldest Urdu Daily
Published on 15th August 2011
عفیف احسن
آج سے ٹھیک 64سال پہلے یعنی کہ 15اگست 1947کو ہندوستان توآزاد ہوگیا مگر آزادی سے ٹھیک ایک روز قبل یعنی کے 14اگست1947کو اس کے دو بڑے بڑے حصہ کاٹ کر ایک الگ ملک بنادیا گیا جس کا نام پاکستان رکھا گیا۔ ہم آج کے دن دیش کو آزاد کرانے کی کوشش میں اپنی جان دینے والے شہیدوں کو یاد کرتے ہیں اور ان کو خراج عقیدت پیش کرتے ہیں۔ مگر ہم ان لا تعداد انسانوں کو یکسر بھول جاتے ہیں جنہوں نے آزادی ملنے کے بعد اپنی جانیں گوائیں۔ کوئی یہ کہتا ہے کہ تقسیم کے نتیجے میں ہزاروں مسلمان ہلاک ہوئے، کوئی یہ کہتا ہے کہ تقسیم کے سبب ہزاروں ہندو مارے گئے اور کوئی یہ کہتا ہے کہ تقسیم نے ہزاروں سکھوں کی بلی لے لی، مگر کوئی بھی یہ نہیں کہتا کہ اس بنٹوارے نے لاکھوں انسانوں کی بلی لی تھی۔ ایک اندازے کے مطابق جتنے لوگ 1857سے لیکر1947کے 90سال کی جنگ آزادی میں شہید ہوئے اس سے کئی گنا زیادہ لوگ تو آزادی حاصل ہونے کے چند دنوں بعد ہی برصغیر ہندوستان میں شہید ہوگئے۔ مگر ان لوگوں کوشہید نہیں مانا جاتا بلکہ ان کاشمارتو محض مہلوکین میں ہوتا ہے۔
ایک بڑا سوال یہ پیدا ہوتا ہے کہ جب مرنے والے ہندو، مسلم اور سکھ سبھی تھے تو پھر ان کو مارنے والوں کا مذہب کیا تھا؟ سرحد کے دونوں طرف رفیوجی اپنی اندوہناک کہانیاں سناتے نہیں تھکتے تھے۔ انہوں نے جس قیامت خیز ی کو جھیلا وہ وہی محسوس کرسکتے ہیں اور جو اس سے بچے رہے وہ شاید ان لوگوں کی تکالیف کا صحیح اندازہ بھی نہیں لگا پائیں۔ وہ درد ، وہ کرب ، وہ غم اور وہ غصہ شاید ایک عام آدمی کی سمجھ میں نہ آئے جو کہ ان حالات سے نہ گزرا ہو۔
مگر ان لوگوں کا کیا جنہوں نے برصغیر ہندوستان میں دونوں جانب قتل اور غارت گردی کی، زنا کیااور لوٹ مار مچائی ، انہیں ہم نے بڑی آسانی سے فراموش کردیا اور وہ بہت آرام سے ہمارے درمیا ن رہتے رہے اورہم ہمیشہ دوسری جانب کو الزام دیتے رہے۔ کیا انکا ضمیر ملامت نہیں کرتا ؟
’’رباہن کی کریے ؟ ‘‘ ایک ایسی ہی ڈاکیومینٹری فلم ہے جوبات چیت کے ذریعہ یادداشت کی گلیوں کا سفر کراتی ہے،ان گلیوں کا جن کے بارے میں سوچ کر ہی بدن کے رونگٹے کھڑے ہوجائیں، جس سبجیکٹ پر کچھ کہنا، لکھنا اور فلم بنانے پر ابھی تک خود ساختہ حکم امتنائی تھا۔
تقسیم کی نسل کے لوگوں نے تشدد کاجو مشاہدہ کیا ، محسوس کیا اور اس پر عمل بھی کیاجو کہ 1947 میں ہندوستان کی تقسیم نے ان پر تھونپا تھا۔ 60 سال گزرنے کے بعد بھی واقعات کے بارے میں ان لوگوں کی یاد اشت بہت تیز ہے ، جیسے کے یہ ابھی کل ہی کا واقعہ ہو۔ انہیں اب بھی بہت اچھی طرح سے اپنے مسلمان پڑوسیوں، ان کے ہم جماعتوں ، بچپن کے دوستوں کے نام یاد ہیں، جن کے ساتھ اچھا وقت گزارا۔ اس کے بعد انہیں افسوس کے ساتھ یاد آتا ہے کہ کس طرح ان پڑوسیوں کو اپنا گھر بارچھوڑنا پڑا، کتنی صفاکی سے ان کا قتل کر دیاگیا اوروہ بھی ضمیر پر کوئی بوجھ ڈالے بغیر۔
اس کے علاوہ، وہ یہ بھی بیان کرتے ہیں کہ کس طرح ان کی برادری کے مجرموں کا ان کی اپنی زندگی میں ہی برا حال ہوا، ان کے غلط کاموں اور تشدد کی وجہ سے جو کہ انہوں نے تقسیم کے وقت انجام دئے تھے۔
دیہی مشرقی پنجاب کے لوگوں کی یہ غیر رسمی کہانیاں، پرانے قصہ کہانیوں کی طرح پنجاب کے دیہی علاقوں میں بکھری پڑی ہیں۔ گاؤں میں، نسلوں تک ہر کوئی ایک دوسرے کوجانتا ہے اور کچھ بھی پوشیدہ نہیں رکھا جا سکتا ہے۔ اس لئے 1947ء میں کس نے کیا کیا اور کس طرح اور کس وجہ سے کیا یہ زبان عام پر ہے۔ تقسیم کی نسل اس یاد کی گواہ ہے، مگر اب یہ بہت تیزی سے مٹتی جارہی ہے۔ تقسیم کے بیانات میں یہ کہانیاں ایک اہم کڑی کی حیثیت رکھتی ہیں۔ اس کے علاوہ، تقسیم کی نسل کا فیصلہ اس نسل کشی کی تاریخ کے ساتھ ساتھ معاشرے کے لیے بھی بہت اہم ہے۔
اس ڈاکیومینٹری کے فلم سازاجے بھاردواج ایک دستاویزی فلم ساز ہیں۔ انہوں نے جواہرلال نہرو یونیورسٹی سے سیاسی اسٹڈیز میں دوہری ماسٹر ڈگری حاصل کی ہے اور ایم سی آر سی، جامعہ ملیہ اسلامیہ سے ماس کمیونیکیشن کیا ہے۔ وہ1997 سے دستاویزی فلمیں بنارہے ہیں۔ تقسیم کے یادوں پر مشتمل انکی فلم، ’’ربا ہن کی کریے ‘‘(اس طرح ہمارے پڑوسی روانہ ہوئے)، جو کہ 1947 میں پھٹ پڑے تشدد، جس نے مشترکہ طرززندگی کوبہت زیادہ نقصان پہنچایا پر مبنی ہے، ان کی فلم کی ہندوستا ن میں اور بیرون ملک مختلف فلم فیسٹول میں نمائش کی گئی ہے۔
’’میری جڑیں دیہی پنجاب کے اس حصے کے ساتھ جڑی ہیں جو دیش کے ساتھ رہا۔ اس لئے جنہیں اس حصہ کو چھوڑنا پڑا وہ مسلمان تھے جبکہ زیادہ تر وہ کہانیاں ہم کو سننے کو ملتی ہیں جو ہندوؤں اور سکھوں نے سنائی جن کو اس پنجاب کو چھوڑنا پڑا جو پاکستان بن گیا اور پناہ گزین کے طور پر یہاں آئے۔  میرے ذریعہ تقسیم کو ایک بالکل ہی مختلف نقطہ نظر سے دیکھاگیا کیونکہ میں کہیں اور موجود ہو ں۔‘‘ اجے بھاردواج کہتے ہیں۔
اگرچہ دو قومی نظریہ کچھ لوگوں کے مفادات کے لیے موزوں تھا لیکن یہ کثرت الوجود اور بقائے باہم کے نظریہ کی مکمل نفی تھا۔ 11اگست 1947کی جناح کی تقریر ہی ان کی 11اکتوبر1947 اور 21فروری 1949 کی تقاریر کی بنیاد ہے جس میں اسلامی شناخت کو ہی ایک ملک کے قیام کے پیچھے کار فرما جذبہ قرار دیا گیا۔
دوسری بات یہ ہے کہ اگر ہندو، مسلمان، سکھ اور عیسائی برابر تھے تو پھر مسلمانوں کے لیے ایک علیحدہ ملک کے قیام کا مقصد کیا تھا؟ 1935کے گورنمنٹ آف انڈیا کے ایکٹ اور بعد میں ہندوستان کے آئین میں مسلمانوں اور دیگر گروپوں کے لیے ایک جیسی آئینی ضمانتیں موجود تھیں۔ اس کا ایک نتیجہ فرقہ پرستی کی صورت میں نکلا اور جس کے نتیجے میں برصغیر میں ہندوؤں، مسلمانوں اور سکھوں کا قتل عام ہوا۔ یہ وہی خطہ تھا جہاں مختلف ثقافتی اور مذہبی پس منظر کے کروڑوں لوگ رواداری اور مکمل ہم آہنگی کے ساتھ مل جل کر رہتے آئے تھے۔

बंटवारे के समय मारे गए लोगों को शहीद का दर्जा क्यों नहीं मिलता ?


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

Published on 15th August 2011
अफ़ीफ़ अहसन
आज से ठीक 64 साल पहले यानी कि 15 अगस्त 1947 को हिन्दुस्तान तो आज़ाद होगया मगर आज़ादी से ठीक एक दिन पहले यानी के 14 अगस्त 1947 को उसके दो बड़े-बड़े टुकडे काट कर एक अलग देश बना दिया गया जिसका नाम पाकिस्तान रखा गया. हम इस दिन देश को आजाद कराने की कोशिश में अपनी जान देने वाले शहीदों को याद करते हैं और उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं. मगर हम उन असंख्य इंसानों को यक्सर भूल जाते हैं जिन्होंने स्वतंत्रता मिलने के बाद अपनी जानें गवाईं. कोई यह कहता है कि तक़सीम के परिणाम में हजारों मुसलमान मारे गए, कोई यह कहता है कि विभाजन में हज़ारों हिंदू मारे गए और कोई यह कहता है कि बंटवारे ने हजारों सिखों की बलि ले ली, लेकिन कोई भी यह नहीं कहता कि बंटवारे ने बेगुनाह इंसानों की बलि ली थी. एक अनुमान के अनुसार जितने लोग 1857 से लेकर 1947 के 90 साल के स्वतंत्रता संग्राम में शहीद हुए उस से कई गुना अधिक लोग स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद कुछ दिनों में ही उपमहाद्वीप हि‍न्दुस्तान में शहीद हो गए. मगर उन लोगों को शहीद नहीं माना जाता बल्कि उन की गिनती तो केवल मारे गये लोगों में होती है.
एक बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि जब मरने वाले हिन्दू, मुस्लिम और सिख सभी थे तो उन्हें मारने वालों का धर्म क्या था? सीमा के दोनों ओर रिफ्यूजी अपनी भयानक कहानियाँ सुनाते नहीं थकते थे. उन्होंने जिस कयामत का सामना किया और उनहें जिन हालात को झेलना पडा वह वही महसूस कर सकते हैं और जो बचे रहे वह शायद उन लोगों के जोख़िम का सही आंकलन भी नहीं लगा पाएं. वह दर्द, वह करब, वह गम और गुस्सा शायद एक आम आदमी की समझ में न आए जो इन हालात से न गुज़रा हो.
लेकिन उन लोगों का क्या जिन्होंने उपमहाद्वीप हि‍न्दुस्तान में दोनों ओर हत्या, बलात्कार किया और लूटमार मचाई, उन्हें हमने बड़ी आसानी से भुला दिया और वह बहुत आराम से हमारे बीच रहते रहे और हम हमेशा दूसरी तरफ को दोष देते रहे. क्या उनका ज़मीर मलामत नहीं करता?
''रबा हुन की करिये?'' एक ऐसी ही डाक्यूमेंटरी फिल्म है जो बातचीत द्वारा याददाश्त की गलियों की यात्रा कराती है, उन गलियों की जिनके बारे में सोचकर ही शरीर के रोन्गटे खड़े होजाते हें, एसा सब्जेक्ट जिस पर कुछ कहना, लिखना और फिल्म बनाने पर अभी तक खुद साखता प्रतिबंध था.
तकसीम की पीढ़ी के लोगों ने हिंसा का जो अनुभव किया, खुद महसूस किया और उस पर अमल भी किया जो कि 1947 में भारतीय विभाजन ने उन पर थोंपा था. 60 साल गुजरने के बाद भी घटनाओं के बारे में उन लोगों की यादाशत बहुत तेज है, जैसे यह अभी कल ही की घटना हो. उन्हें अब भी बहुत अच्छी तरह से अपने पड़ोसियों, उनके हम जमातियों, बचपन के दोस्तों के नाम याद हैं, जिनके साथ अच्छा समय गुजारा. इसके बाद उन्होंने अफसोस के साथ याद आता है कि कैसे इन पड़ोसियों को अपना घर बार छोड़ना पड़ा, कितनी सफ़ाकी से उनकी हत्या कर दी गयी वह भी ज़मीर पर कोई बोझ डाले बिना.
इसके अलावा, वह यह भी बताते हैं कि कैसे उनकी बिरादरी के लोगों का उनके अपने जीवन में ही बुरा हाल हुआ, उनके गलत कामों और हिंसा के कारण जो उन्होंने विभाजन के समय अंजाम दिए थे.
ग्रामीण पूर्वी पंजाब के लोगों की यह अनौपचारिक कहानियाँ, पुराने किस्से कहानियों की तरह पंजाब के ग्रामीण क्षेत्रों में बिखरी पड़ी हैं. गांव में पीढ़ियों तक हर कोई एक दूसरे को जानता है और कुछ भी गुप्त नहीं रखा जा सकता है. इसलिए 1947 में किसने क्या किया और कैसे और किस वजह से यह जबाने आम है. तकसीम की पीढ़ी इस याद की गवाह है, लेकिन अब यह बहुत तेजी से मिटती जा रही है. विभाजन के बयानों में यह कहानियां एक मुख्य भूमिका रखती हैं. इसके अलावा, तकसीम की पीढ़ी का फैसला इस नरसंहार के इतिहास के साथ समाज के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है.
इस डाक्यूमेंट्री फिल्म के निर्देशक अजय भारद्वाज एक वृत्तचित्र निर्माता है. उन्होंने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में दोहरी मास्टर डिग्री हासिल की है और एमसीआरसी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया से मास कम्यूनिकेशन किया है. वह 1997 से वृत्तचित्र बना रहे हैं. विभाजन की यादों पर उनकी फिल्म, “रब्बा हुण की करिये” (इस तरह हमारे पड़ोसी रवाना हुए), जिसमें 1947 में फट पड़ी हिंसा, जिसने मिली-जुली जीवन शेली को बहुत अधिक नुकसान पहुंचाया पर आधारित है, उनकी फिल्म हिदुस्तान और विदेशों में फिल्म‍ी मेलों में प्रदर्शित की गई है.
“मेरी जड़ें ग्रामीण पंजाब के उस भाग के साथ जुड़ी हैं जो देश के साथ रहा. इसलिए जिन्हें इस भाग को छोड़ना पड़ा वे मुसलमान थे जबकि अधिकांश वे कहानियाँ हमें सुनने को मिलती हैं जो हिंदुओं और सिखों ने सुनाई जिन को उस पंजाब को छोड़ना पड़ा जो पाकिस्तान बन गया और वह शरणार्थी के रूप में यहाँ आए. मेरे द्वारा विभाजन एक बिल्कुल ही अलग दृष्टिकोण से देखा गया क्यों की हम कहीं ओर हें.” अजय भारद्वाज कहते हैं.
हालांकि दो राष्ट्रीय दृष्टिकोण जिस की बुनियाद पर तकसीम हुई कुछ लोगों के हितों के लिए उपयुक्त था लेकिन यह आपसी भाई चारा और साथ साथ रहने की विचारधारा के पूरी तरह खिलाफ था. 11 अगस्त 1947 का जिन्ना का भाषण ही उनकी 11 अक्टूबर 1947 और 21 फरवरी 1949 के भाषणों का आधार है जिसमें इस्लामी पहचान को ही एक देश की स्थापना के पीछे कार्यरित भावना बताया गया था.
दूसरी बात यह है कि अगर जिन्ना के 11 अगस्त 1947 के भाषण के अनुसार हिंदू, मुसलमान, सिख और ईसाई बराबर थे तो मुसलमानों के लिए एक अलग देश की स्थापना का उद्देश्य क्या था? 1935 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया अधिनियम और बाद में भारतीय संविधान में मुसलमानों और अन्य समूहों के लिए एक जैसी संवैधानिक ज़मानतें मौजूद थीं. इसका एक परिणाम सांप्रदायिकता के रूप में निकला और जिसके परिणामस्वरूप उपमहाद्वीप में हिंदुओं, मुसलमानों और सिखों की सार्वजनिक हत्या हुई. यह वही क्षेत्र था जहाँ अब तक विभिन्न सांस्कृतिक और धार्मिक पृष्ठभूमि के करोड़ों लोग सहिष्णुता और पूर्ण समन्वय के साथ मिलजुल कर रहते आए थे.(Revised)
Afif Ahsen, Daily Pratap, Partition, Vir Arjun

Monday, 8 August 2011

आ अनदलीब मिल के करें आह वो ज़ारियाँ

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 8th August 2011
अफ़ीफ़ अहसन
आजकल हर दिन किसी न किसी भ्रष्टाचार, योजना या नियम के उल्लंघन पर से पर्दा उठ रहा है. ऐसा नहीं है कि इसमें केवल एक ही पार्टी शामिल है बल्कि हर पार्टी जहां जहां भी वह सत्तारूढ़ है वह वहां वहां इसमें लिप्त नज़र आ रही है. बस फ़र्क इतना सा हे कि जो जितनी अधिक अच्छी स्थिति में है उसके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों उतने ही गंभीर हैं. जो पार्टी जिस राज्य में भी सत्ता में है वहां पर इसके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं. और जो पार्टी केंद्र में सत्तारूढ़ है उस पर वहां भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं. कोई भी नेता चाहे वह किसी भी पार्टी का हो अपने दिल पर हाथ रख कर यह नहीं कह सकता कि उसकी पार्टी में कोई भी भ्रष्ट नहीं है.
हमारे देश में रूलेट का एक खेल चल रहा है. जिसमें एक दायरे में चारों ओर बिना भेदभाव सभी राजनीतिज्ञों और पार्टियों के नाम लिखे हुए हैं. इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि कोई भी व्यक्ति अपना नाम आने से बच सकता है. क्यों की जब एक बार पहया घुमाया जाता है तो सुंई किसी एक के नाम पर आकर ठहर जाती है और जब फिर यह पहया घुमाया जाता है तो सुंई किसी दूसरे के नाम पर आकर ठहर जाती है. इस तरह हर बार किसी ना किसी का नाम भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता है. कोई यह नहीं कह सकता कि कब भ्रष्टाचार की सुंई किसके नाम पर आकर ठहर जाए और कब उसके विरोधी भूखे गिद्धों की तरह उस पर टूट पड़ें.
इसके बाद आरोपों और जवाबी आरोपों का एक नया सिलसिला शुरू हो जाता है और पहले वाले भ्रष्ट को लोग भूल कर नए भ्रष्ट के पीछे हो लेते हैं. ऐसा लगता है कि कोई भी पार्टी यह नहीं कह रही है कि वह और उसके लोग भ्रष्ट नहीं हैं बल्कि वह यह कहते नज़र आते हैं के तुम भी तो भ्रष्ट हो और यह कि भला मेरा भ्रष्टाचार उसके भ्रष्टाचार से बड़ा कैसे.
अब भ्रष्टाचार की यह सुंई घूमते घूमते शीला दीक्षित के नाम पर आकर रुक गई है. सीएजी की रिपोर्ट जो कि शुक्रवार को संसद में पेश की गई में यह खुलासा किया गया है कि कैसे शीला दीक्षित सरकार ने राष्ट्रमंडल खेल से संबंधित परियोजनाओं में व्यर्थ ख़रचा किया है. 23 अबवाब वाली 743 पन्नों की इस रिपोर्ट में कॉमनवेल्थ खेलों में भ्रष्टाचार के लिए एक तरफ जहां आयोजन समिति को जिम्मेदार ठहराया गया है वहीं दूसरी ओर दिल्ली सरकार के साथ ही पीएमओ को भी इस विवाद में खींचा गया है.
रिपोर्ट मिलने के बाद भाजपा ने मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से तुरंत इस्तीफा देने की मांग की. इस रिपोर्ट के बाद खेल मंत्री अजय माकन के इन प्रयासों को भी ज़बरदस्त धक्का लगा जिनमें वह कलमाडी की नियुक्ति का सारा आरोप एनडीए के सिर थोपने में लगे हुए थे. क्योंकि संसद में और उससे बाहर वह ताल ठोंक कर कह रहे थे कि एनडीए ही कलमाडी की नियुक्ति के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार है. अब इस रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि “संगीन आपत्तियाँ” के बावजूद पीएमओ के कहने पर कलमाडी को आयोजन समिति का सरबराह बनाया गया.
सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में सरकार पर यह आरोप लगाया है कि उसने राष्ट्रमंडल खेलों के लिए एक प्रणाली बनायी जिसमें किसी भी प्रकार की जवाबदेही का अभाव था और किसी निगरानी के बिना कमान की यूनिट को छोड़ दिया गया. रिपोर्ट मैं इस बात पर भी ‍िटप्पणी की गई है कि इतना बडा सरकारी पेसा गैर सरकारी अधिकारियों के हाथों में बिना निगरानी और जवाबदेही के छोड़ दिया गया. रिपोर्ट में यह भी खुलासा किया गया है ‍कि आवश्यक निर्णय लेने में असाधारण देरी की गई जिसकी किसी तरह से भी व्याख्या नहीं की जा सकती और देरी के चलते अंतिम समय में एक कृत्रिम तत्काल आवश्यकता का माहौल जानबूझकर पैदा किया गया और उसके चलते टैंडर देने में कानून की अनदेखी और नियमों का उल्लंघन किया गया और मूल से कई गुना अधिक राशि के ठेके दिए गए या वर्क आर्डर दिए गए. और जिन चीजों के लिए ठेके दिए गए उनका स्तर वही था या नहीं इसका निर्धारण नहीं किया गया.
राष्ट्रमंडल के ठेकों में गड़बड़ी और धन की बर्बादी में सीएजी ने पीडबलयूडी, डीडीए, एनडीएमसी और एमसीडी को समान साझीदार बताया है. इसलिए यह कहना ग़लत होगा कि भाजपा का इस मामले से कोई लेना देना नहीं है, क्योंकि भाजपा निगम में सत्ता में है, इसलिए इसका शामिल होना भी इसमें साबित होता है चाहे यह कम या अधिक हो.
दूसरी ओर पीएमओ को भी फंसता हुवा देख कर कांग्रेस हाई कमांड शीला दीक्षित के बचाव में खड़ी हो गई है. सोनिया गांधी की अनुपस्थिति में लिए गए पहले बड़े फैसले में “ग्रुप ऑफ फोर” (जिस में राहुल गांधी मौजूद नहीं थे क्योंकि वह अपनी मां की देखभाल के लिए उनके साथ हैं) और अन्य बड़े नेताओं ने शीला दीक्षित के समर्थन का फैसला किया. शीला दीक्षित का खुलकर समर्थन करते हुए पार्टी ने कहा कि शीला की तुलना यदीयुरप्पा से नहीं की जासकती.
कांग्रेस का यह दोहरा मापदंड उसके गले की हड्डी बन सकता है. क्योंकि अब भाजपा ने कांग्रेस पर दोहरा मापदंड अपनाने का आरोप लगाते हुए हल्ला बोल दिया है. और भाजपा इस मामले को सोमवार को संसद में जोर शोर से उठाने के लिए कमर कस रही है और दूसरी विपक्षी पार्टियां भी यह मौका हाथ से जाने देने के लिए कतई तैयार नहीं हैं और इसे भुनाने की कोशिशों में लगी हैं.
कांग्रेस का कहना है कि वह केवल सीएजी की रिपोर्ट के आधार पर कोई कार्रवाई करने को तैयार नहीं है, यह तो रूटीन की आडिट आबजकशन है और इसका जवाब पीएसी में दिया जाएगा. यदि इसके बाद शीला दीक्षित के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई की जाती है तब ही उनहें इस्तीफा देने के लिए कहा जाएगा. कांग्रेस का कहना है कि सीएजी रिपोर्ट को शीला दीक्षित के खिलाफ सबूत नहीं माना जासकता.
आपको याद होगा कि पिछले अक्टूबर में कलमाडी ने शीला दीक्षित सरकार पर खेल ठेकों में भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे. यह तब हुआ जब दीक्षित ने कलमाडी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया तो अपना रदेअमल जताते हुए कलमाडी ने कहा था कि “संगठन समिति राष्ट्रमंडल खेल 2010 दिल्ली में भ्रष्टाचार पर दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित के आरोप बहुत अधिक निराशाजनक और अनुचित हैं. दूसरों पर उंगलियां उठाना और इशारा करना उचित नहीं, जबकि उन्हें अपने महकमों में भ्रष्टाचार पर खुद नजर डालनी चाहिए.” इस विस्फोटक बयान के बाद जो शीला दीक्षित के संगठन समिति पर कथित भ्रष्टाचार के लिए उंगली उठाए जाने के एक दिन बाद दिया गया था, कलमाडी ने कहा था कि चुप्पी को कमज़ोरी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, और न ही सबर को अपराध स्वीकार चिह्न के रूप में देखा जाना चाहिए.
उस समय दीक्षित ने कहा कि राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार का “संदेह” संगठन समिति जिसके अध्यक्ष सुरेश कलमाडी हैं पर है और उनहोंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा “तुरंत” जांच का आदेश दिए जाने का स्वागत किया था और कहा था कि इससे मकड़जाल साफ हो जाएगा.
मगर अब ऐसा लगता है कि शीला दीक्षित खुद ही अपने बने हुए जाल में फंस गई हैं देर या बदीर उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ सकता है और क्या जाने उनको भी कलमाडी के वर्तमान पते पर स्थानांतरित कर दिया जाए. और दोनों मिलकर यह शेर गुनगुनाते दिखाई दें. . . . . .
आ अनदलीब मिल के करें आह वो ज़ारियाँ
में हाय गुल पुकारूँ, तो चिल्लाए हाय दिल

آ عندلیب مل کے کریں آہ وزاریاں

Daily Pratap, Indias Oldest Urdu Daily
Published on 8th August 2011
عفیف احسن
ہرروز کسی نہ کسی بدعنوانی، اسکیم یا قوانین کی خلاف ورزی پر سے پردہ اٹھ رہا ہے۔ ایسا نہیں ہے کہ اس میں صرف ایک ہی پارٹی ملوث ہے بلکہ ہر جماعت جہاں جہاں بھی وہ برسر اقتدار ہے وہ وہاں وہاں اس میں ملوث نظر آرہی ہے۔ بس فرق صرف اتنا ساہے کہ جو زیادہ اچھی پوزیشن میں ہے اس کے خلاف بدعنوانی کے الزامات اتنی ہی زیادہ شدید ہیں۔جو پارٹی جس ریاست میں بھی اقتدار میں ہے وہاں پر اس کے خلاف بدعنوانی کے الزامات لگ رہے ہیں۔ اور جوپارٹی مرکز میں برسر اقتدار ہے اس پر وہاں بد عنوانی کے الزامات لگ رہے ہیں۔ کوئی بھی قائد چاہے وہ کسی بھی پارٹی کا ہو اپنے دل پر ہاتھ رکھ کر یہ نہیں کہہ سکتا کہ اس کی پارٹی میں کوئی بھی بدعنوان نہیں ہے۔
ہمارے ملک میں رولیٹ کا ایک کھیل چل رہا ہے۔جس میں ایک دائرے میں چاروں طرف بلا تفریق تمام سیاست دانوں اور پارٹیوں کے نام لکھے ہوئے ہیں۔ اس لئے یہ نہیں کہا جاسکتا کہ کوئی بھی شخص اپنا نام آنے سے بچ سکتا ہے۔ کیوں کہ جب ایک بار پہیا گھمایا جاتا ہے تو سوئیں کسی ایک کے نام پر آکر ٹھر جاتی ہے اور جب دوبارہ یہ پہیا گھمایا جاتا ہے تو سوئیں کسی دوسرے کے نام پر آکر ٹھہرجاتی ہے۔ اس طرح ہربار کسی نا کسی کانام بدعنوانی میں ملوث پایا جاتاہے۔کوئی یہ نہیں کہ سکتا کہ کب بدعنوانی کی سوئیں کس کے نام پر آکر ٹھہر جائے اور کب اس کے مخالف بھوکے گدھوں کی طرح اس پر ٹوٹ پڑیں۔
اس کے بعد الزامات اور جوابی الزامات کا ایک نیا سلسلہ شروع ہوجاتا ہے اور پہلے والے بدعنوان کو لوگ بھول کر نئے بدعنوان کے پیچھے ہولیتے ہیں۔ایسا لگتا ہے کہ کوئی بھی پارٹی یہ نہیں کہہ رہی ہے کہ وہ اور اس کے لوگ بدعنوان نہیں ہیں بلکہ وہ یہ کہتے نظر آتے ہیں کے تم بھی تو بدعنوان ہو اور یہ کہ بھلا میری بدعنوانی اسکی بدعنوانی سے بڑی کیسے۔
اب بدعنوانی کی یہ سوئیں گھومتے گھومتے شیلا دکشت کے نام پر آکر رک گئی ہے۔سی اے جی کی حالیہ رپورٹ جوکہجمعہ کو پارلیمینٹ میں پیش کی گئی ،میں یہ خلاصہ کیا گیا ہے کہ کیسے شیلادکشت حکومت نے دولت مشترکہ کھیل سے متعلق پروجیکٹوں میں فضول خرچی کی ہے۔23ابواب پر مشتمل 743صفحات کی اس رپورٹ میں دولت مشترکہ کھیلوں میں بدعنوانی کے لئے ایک طرف جہاں آرگنائزنگ کمیٹی کو ذمہ دار ٹھہرایا گیا ہے وہیں دوسری طرف دہلی حکومت کے ساتھ ہی ساتھ پی ایم او کوبھی اس تنازعے میں کھینچا گیاہے۔
رپورٹ ملنے کے بعد بی جے پی نے وزیر اعلیٰ شیلا دکشت سے فوراً استعفی دینے کا مطالبہ کیا۔ اس رپورٹ کے بعدوزیر کھیل اجے ماکن کی ان کوششوں کو بھی ذبردست دھکا لگا جن میں وہ کلماڈی کی تقرری کا سارا الزام این ڈی اے کے سر تھوپنے میں لگے ہوئے تھے۔کیونکہ پارلیمنٹ میں اور اس سے باہر وہ تال ٹھونک کر کہہ رہے تھے کہ این ڈی اے ہی کلماڈی کی تقرری کے لئے پوری طرح سے ذمہ دار ہے۔اب اس رپورٹ میں واضح طور پر کہا گیا ہے کہ ’’سنگیں اعتراضات‘‘ کے باوجودپی ایم او کے ایما ء پر کلماڈی کو آرگنائزنگ کمیٹی کاسربراہ بنایاگیا۔
سی اے جی نے اپنی رپورٹ میں حکومت پر یہ الزام لگایا ہے کہ اس نے دولت مشترکہ کھیلوں کے لئے ایک ایسا نظام بنایا جس میں کسی بھی قسم کی جواب دہی کا فقدان تھا اور کسی نگرانی کے بغیر کمانڈ کی یونٹ کو چھوڑ دیا گیا ۔رپورٹ میں اس بات پر بھی سرزنش کی گئی ہے کہ اتناخطیر سرکاری سرمایا غیر سرکاری افسروں کے ہاتھوں میں بنا کسی نگرانی اور جواب دہی کے چھوڑدیا۔ رپورٹ میں اس بات کا بھی خلاصہ کیا گیا ہے کے ضروری فیصلے کرنے میں غیر معمولی تاخیر کی گئی جس کی کسی طرح سے بھی وضاحت نہیں کی جاسکتی اور اس دیری کے چلتے آخری وقت میں ایک مصنوعی فوری ضرورت کا ماحول جان بوجھ کر پیدا کیاگیا اور اس کے چلتے ٹینڈر دینے میں قانون کی اندیکھی اور ضابطوں کی خلاف ورزی کی گئی اور اصل سے کئی گنا زیادہ رقم کے ٹھیکے دئے گئے یا ورک آرڈر دئے گئے۔اور جن چیزوں کے لئے ٹھیکے دئے گئے ان کا معیار وہی تھایا نہیں اس کا تعین بھی نہیں کیاگیا۔
دولت مشترکہ کے ٹھیکوں میں گڑبڑی اور رقم کی بربادی میں سی اے جی نے پی ڈبلیوڈی، ڈی دی اے ، این ڈی ایم سی، اور ایم سی ڈی کو برابر کا شریک کار بتایا ہے۔اس لئے یہ کہنا غلط ہوگا کہ بی جے پی کا اس معاملے سے کوئی لینا دینا نہیں ہے ، کیونکہ بی جے پی کارپوریشن میں برسراقتدار ہے اس لئے اس کا ملوث ہونا بھی اس میں ثابت ہوتا ہے چاہے یہ کم یا زیادہ ہو۔
دوسری طرف پی ایم او کو بھی پھنستا ہوادیکھ کر کانگریس ہائی کمانڈشیلا دکشت کے دفاع میں کھڑی ہوگئی ہے۔سونیا گاندھی کی غیر موجودگی میں لئے گئے پہلے بڑے فیصلے میں’’ گروپ آف فور ‘‘(جس میں راہل گاندھی موجود نہیں تھے کیوں کہ وہ اپنی والدہ کی دیکھ بھال کے لئے ان کے ساتھ ہیں)اور دوسرے بڑے لیڈروں نے شیلا دکشت کی مکمل حمایت کا فیصلہ کیا۔ شیلا دکشت کی کھل کر حمایت کرتے ہوئے پارٹی نے کہا کہ شیلا کا موازنہ یدیورپہ سے نہیں کیاجاسکتا۔
کانگریس کا یہ دوہرا معیا ر اس کے گلے کی ہڈی بن سکتا ہے۔کیونکہ اب بی جے پی نے کانگریس پر دوہرا معیار اپنانے کا الزام لگاتے ہوئے ہلا بول دیا ہے۔اور بی جے پی اس معاملے کو پیر کو پارلیمنٹ میں زور شور سے اٹھانے کے لئے کمر کس رہی ہے اور دوسری اپوزیشن پارٹیاں بھی یہ موقع ہاتھ سے جانے دینے کے لئے قطعی تیار نہیں ہیں اور اس کو بھنانے کی کوششوں میں لگی ہیں۔
کانگریس کا کہنا ہے کہ وہ صرف سی اے جی کی رپورٹ کی بنیاد پر کوئی کارروائی کرنے کو تیار نہیں ہے، یہ تو روٹین کی آڈٹ آبجکشن ہے اور اس کا جواب پی اے سی میں دیا جائے گا۔ اگر اس کے بعد شیلا دکشت کے خلاف کوئی قانونی کارروائی کی جاتی ہے تب ہی ان سے استعفیٰ دینے کے لئے کہاجائے گا۔ کانگریس کا کہنا ہے کہ سی اے جی رپورٹ کو شیلادکشت کے خلاف ثبوت نہیں ماناجاسکتا۔
آپ کو یاد ہوگا کہ گزشتہ اکتوبر میں کلماڈی نے شیلادکشت حکومت پر کھیل میں بدعنوانی کے الزامات لگائے تھے ۔یہ اس وقت ہوا جب دکشت نے کلماڈی پر بدعنوانی کا الزام لگایا تو اس پراپنا ردعمل ظاہر کرتے ہوئے کلماڈی نے کہا تھا کہ ’’تنظیمی کمیٹی دولت مشترکہ کھیل 2010 دہلی میں کرپشن پر دہلی کی وزیر اعلی محترمہ شیلا دیکشیت کے الزامات بہت زیادہ مایوس کن اور غیر موزوں ہیں۔ دوسروں پر انگلیاں اٹھانے اور اشارہ کرنا موزوں نہیں، جب کہ ان کو اپنے محکموں میں کرپشن پر خود نظر ڈالنی چاہئے۔ ‘‘ اس دھماکہ خیز بیان کے بعد جو کہ شیلا دکشت کے تنظیمی کمیٹی پر مبینہ کرپشن کے لئے انگلی اٹھائے جانے کے ایک دن بعد دیا گیا تھا، کلماڈی نے یہ بھی کہا تھاکہ خاموشی کوکمزوری کی علامت کے طور پر نہیں دیکھا جاناچاہئے، اور نہ ہی صبر قبول جرم کی علامت کے طور پر دیکھا جانا چاہیئے۔
اس وقت دکشت نے کہا تھا کہ دولت مشترکہ کھیلوں میں کرپشن کا’’شک‘‘ تنظیمی کمیٹی جس کے سربراہ سریش کلماڈی ہیں پر ہے اورانہوں نے وزیر اعظم منموہن سنگھ کی طرف سے’’فوری‘‘ تحقیقات کا حکم دئے جانے کا خیر مقدم کیا تھا اور یہ بھی کہا تھا کہ اس سے مکڑجال صاف ہوجائے گا۔
مگر اب ایسا لگتا ہے کہ شیلا دکشت خود ہی اپنے بنے ہوئے جال میں پھنس گئی ہیں دیر یا بدیر ان کو اپنے عہدے سے استعفیٰ دینا پڑ سکتا ہے اور کیا جانے ان کو بھی کلماڈی کے موجودہ پتے پر منتقل کردیا جائے ۔اور دونوں مل کر یہ شعرگنگناتے نظر آئیں۔
آ عندلیب مل کے کریں آہ وزاریاں
میں ہائے گل پکاروں ، تو چلائے ہائے دل

Monday, 1 August 2011

کفر ٹوٹا خدا خدا کرکے


Daily Pratap, Indias Oldest Urdu Daily
Published on 1st August 2011
عفیف احسن
آخر کار یدیورپا نے استعفیٰ دے ہی دیا۔کرناٹک وزیر اعلیٰ یدورپا نے ایتوار بعد دوپہر راج بھون جاکر گورنر ہنس راج بھاردواج کو استعفیٰ سونپ دیا۔ اس موقع پر یدورپاکے ساتھ تقریبا 70 ایم ایل اے موجود تھے۔حالانکہ انہیں ایسا بہت پہلے ہی کردینا چاہئے تھا مگر وہ اپنی ضد پر اڑے رہے اور استعفیٰ دینے میں حیل حجت کرتے رہے ۔
لوک آیکت کی رپورٹ میں یدو رپا پر الزام تھا کہ انہوں نے سرکاری زمین اپنے داماد ، بیٹوں اور رشتہ داروں کو کوڑیوں کے مول خریدوائی تھی جسے انہوں نے کئی گنا داموں پر کان کنی مافیا کو فروخت کر دیا تھا۔ جس کی جانچ ہوئی اور لوک آیکت نے اپنی رپورٹ ریاستی چیف سکریٹری کو سونپ دی جس میں یدورپا کو قصور وار بتایا گیا ہے۔لوک آیکت کی جانب سے قصور وار قرار دئے جانے کے بعد ریاستی وزیر اعلیٰ بی ایس یدورپا نے بی جے پی صدر گڈکری کے کہنے کے باوجود استعفیٰ انہیں دیا اور چپ چاپ فلائٹ پکڑ کر بنگلورو روانہ ہوگئے۔ہر چند کہ بی جے پی کے بڑے لیڈروں کی جانب سے انہیں مستعفی ہو جانے کی ہدایت کی گئی تھی لیکن یدو رپا اس کے لئے تیار نہیں ہوئے۔ مجبوراً بی جے پی کے پارلیمانی بورڈ کو ان کومستعفی ہوجانے کی ہدایت دینی پڑی۔ پارلیمانی بورڈ کی میٹنگ میں شرکت کرنے والے لیڈروں میں لال کشن آڈوانی، سشما سوراج، ارون جیٹلی، راجناتھ سنگھ اور وینکیا نائیڈو بھی شامل تھے۔ اس کے بعد متبادل قائد کی تلاش کے لئے پارٹی کے دو سینیر لیڈر ارون جیٹلی اور راجناتھ سنگھ کوجمعہ کو بنگلور بھیج دیا گیا تھا۔
اس سب کے باوجودکرناٹک کی سیاست میں اچھا دخل عمل رکھنے والے یدورپاعہدہ نہیں چھوڑنے کی ضد پر اڑے رہے اور دھمکی دیتے رہے کہ وہ پارٹی کے لئے پریشانیاں کھڑی کر دیں گے ۔
دہلی سے واپس آتے ہی یدورپا نے اپنی رہائش گاہ پر ممبران اسمبلی کی میٹنگ طلب کی اور یہ بھی اعلان کیا کہ وہ پروگرام کے مطابق اپنی کابینہ کا اجلاس بھی بلائیں گے۔ ریاستی بی جے پی صدر کے ایس ایشورپا نے جو خود بھی دہلی میں تھے ممبران اسمبلی کو اس میٹنگ میں شرکت کے خلاف انتباہ کیا۔مگر میٹنگ ہوئی اور اس میں کافی تعداد میں ممبران اسمبلی اوروزیروں نے شرکت کی لیکن پارٹی ذرائع کا کہنا تھا کہ وہ لوگ صرف اخلاقی طور پر ملاقات کرنے گئے تھے اور جیسے ہی متبادل قائد کے نام کا اعلان کر دیا جائے گا تمام ممبران اسمبلی پارٹی کے ساتھ ہوجائیں گے۔
اس میٹنگ کے بعد یدورپا نے استعفیٰ دینے سے یہ کہتے ہوئے انکار کردیا کہ چونکہ شبھ مہورت نہیں ہے اس لئے وہ ابھی استعفیٰ نہیں دینگے بلکہ ایتوار کو شبھ مہورت میں ہی اپنا استعفیٰ دینگے اس لئے کہ ایسا کرنا ان کے کریر کے لئے اشُبھ ہوگا اور ان کے کریر کو نقصا ن ہوگا۔ ابھی تک تو یہ سنّے میں آیا تھا کہ کسی وزیر اعلیٰ نے شبھ مہورت میں شپتھ لی شبھ مہورت میں استعفیٰ کی نظیر اب سے پہلے کہیں نہیں ملتی۔ دراصل یدورپا کاارادہ یہ تھا کہ وہ ہائی کمان کو اس بات کے لئے مجبور کردیں کے وہ ان کے کسی قریبی کو ہی وزیراعلیٰ بنائے اور انہیں ریاستی بی جے پی کا صدر بنایا جائے۔ کہا جا رہا ہے کہ یدورپانے استعفی سونپنے سے پہلے پارٹی کے سامنے یہ شرط رکھی تھی کہ وہ نئے سی ایم کے نام کا اعلان پہلے ہی کردے اس کے بعد وہ اپنا استعفیٰ سونپیں گے۔
بی جے پی کے اعلیٰ قیادت اور یدورپاکے درمیان ان کے استعفیٰ کے حوالے سے تلخ صورتحال پیدا ہو گئی تھی۔ مگرپارٹی کی جانب سے یہ یقین دہانی کرائی گئی کہ اگلے وزیر اعلی کے انتخاب میں ان کی رائے لی جائے گی ، اس کے بعد یدورپاعہدہ چھوڑنے کے لئے راضی ہوئے۔یدورپاکے بعد ریاست کے اگلے وزیر اعلی کے عہدے کے لئے ممبر پارلیمنٹ سدانند گوڑا اور ریاست کے دو وزراء وی ایس اچاریہ اور سریش کمار کا نام چل رہا ہے۔
اگر بی جے پی یدیورپا سے استعفیٰ نہ دلواتی تو بدعنوانی کے خلاف اس کی مہم کو زبردست دھکّا پہنچتا اور وہ کس منہ سے کانگریس کی بدعنوانی کے خلاف مہم چلاسکتی تھی۔
؁ٗٗحالانکہ ابھی سب کا دھیان یدیورپا کی بدعنوانی کی طرف ہی ہے مگر جب ان کے استعفیٰ کی گرد چھنٹے گی اور کرناٹک کے لوک آیکت سنتوش ہیگڑے کی رپورٹ کا باریکی سے مطالعہ کیا جائے گا تو اس میں کانگریس اور جنتا دل ایس بھی برابر پھنستی ہوئی نظر آئے گی۔ اپنی رپورٹ میں لوک آیکت نے کہا ہے کہ ریاست میں کان کنی کے علاقے میں 16 ہزار 85 کروڑ کا گھوٹالہ ہوا ہے جس میں سے 30 کروڑ روپے وزیر اعلی یدیورپااور ان کے خاندان کو دیا گیا ہے۔ لیکن اس رپورٹ میں ایک چونکانے والا خلاصہ یہ ہے کہ جس ساؤتھ ویسٹ مائننگ کمپنی نے یدیورپا کے خاندان کو یہ تیس کروڑ روپے دیے ہیں وہ مائننگ کمپنی کانگریسی ممبر پارلیمنٹ نوین جندل کے بھائی سجن جندل کی ہے۔ پورا ملک جانتا ہے کہ جندل خاندان پکّاکانگریسی ہے۔ سجن جندل کے والد اوپی جندل ہریانہ میں کانگریس کے وزیر تھے ، تو ان کی ماں ساوتری جندل آج بھی ہریانہ حکومت میں وزیر ہیں۔
حالانکہ اس رپورٹ میں ریڈی برادران کا بھی ذکر ہے جو کہ بی جے پی کی ریاستی حکومت میں وزیر ہیں اور ان کے بارے میں کہا گیا ہے کہ ریاستی حکومت کے بھروسے کے بعد بھی ریڈی برادران نے غیر قانونی کان کنی جاری رکھی۔ لیکن نوین جندل کے بھائی سجن جندل کے جے ایس ڈبلو کی سبسیڈری کمپنی ساؤتھ ویسٹ مائننگ پر بڑا سوال اٹھایا گیا ہے۔ لوک آیکت سنتوش ہیگڑے کا کہنا ہے کہ سجن جندل کی اس کمپنی نے دس کروڑ روپے یدورپا کے خاندان کے ٹرسٹ کو دیئے اور بیس کروڑ روپے میں یدورپا کے خاندان سے ایک ایسی زمین خریدی جس کی مارکیٹ میں قیمت محض 1.4 کروڑ تھی۔
سجن جندل ملک کے بڑے سٹیل کے تاجر ہیں اور ان کی کمپنی جندل اسٹیل ورکس کا سالانہ کاروبار 23 ہزار کروڑ ہے۔ یہ جندل اسٹیل ورکس اوپی جندل گروپ کا حصہ ہے جس کی ایک دیگر کمپنی جے ایس ڈبلو انرجی میں یہی سجن جندل چیرمین ہیں اور کانگریس کے ممبر پارلیمنٹ نوین جندل وائس چیرمین ہیں۔ ظاہر ہے جب کرناٹک میں کانوں کوکھودکر خزانہ بھرنے کی دوڑ لگی ہو تو سجن جندل بھلا کیوں پیچھے رہتے۔ سجن جندل نے فوری طور پر ایک عارضی کمپنی بنائی اور اس کے نام پر کرناٹک میں لوہا کھودنے پہنچ گئے۔ لوک آیکت سنتوش ہیگڑے نے اپنی رپورٹ میں سوال اٹھایا ہے کہ’’جو کمپنی مالی طور پر مستحکم نہیں ہے ، اس کے ذریعے غیر معمولی ادائیگی کئے جانے کے بارے میں مجھے یہ سمجھنے میں بہت مشکل ہو رہی ہے کہ کیا کوئی ادھار لے کر عطیہ دے گا‘‘ رپورٹ میں کہا گیا ہے کہ، ’’اس کے چلتے ، کچھ فائلوں کو مرکز کو کارروائی کے لیے بھیجا جانا تھا ، جو کہ نہیں بھیجا گیا۔ یہ بدعنوانی قانون کے دائرے میں آ سکتا ہے اور وزیر اعلی کے خلاف کارروائی کی جا سکتی ہے‘‘۔
اس رپورٹ کے مطابق غیر قانونی کان کنی کی کالی کمائی میں یدورپا کے علاوہ ریاستی حکومت کے چار وزراء اور 600 کے قریب افسران بھی ملوث تھے۔صرف 2006سے 2010 کے درمیان 16,085کروڑ کے گھوٹالے کا دعویٰ کر رہی یہ رپورٹ اس بات کی عکاسی کرتی ہے کہ وزیروں ، افسروں اور کان کنی مافیا کے مضبوط نیٹ ورک نے خزانے کوکس قدر لوٹا ہے۔ اس کے علاوہ کانگریس کے ایک لیڈر اور جنتا دل ایس کے سابق وزیر اعلیٰ ایچ ڈی کمارسوامی کا نام بھی اس رپورٹ میں شامل ہے۔
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कुफर टूटा ख़ुदा ख़ुदा करके


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

Published on 1st August 2011
अफ़ीफ़ अहसन
आखिरकार येदुरप्पा ने इस्तीफा दे ही दिया. कर्नाटक मुख्यमंत्री येदुरप्पा ने ऐतवार दोपहर बाद राजभवन जाकर राज्यपाल हंसराज भारद्वाज को इस्तीफा सौंप दिया. इस अवसर पर येदुरप्पा के साथ लगभग 70 विधायक मौजूद थे. हालांकि उन्हें ऐसा बहुत पहले ही कर देना चाहिए मगर वह अपनी जिद पर उड़े रहे और इस्तीफा देने में हील हुज्जत करते रहे.
लोकायुक्त की रिपोर्ट में येदुरप्पा पर आरोप था कि उन्होंने सरकारी जमीन अपने दामाद, बेटों और रिश्तेदारों को कोड़यों के मोल ख़रीदवाई थी जिसे उन्होंने कई गुना दामों पर खनन माफिया को बेच दिया था. जिसकी जांच हुई और लोकायुक्त ने अपनी रिपोर्ट राज्य के मुख्य सचिव को सौंप दी जिसमें येदुरप्पा को दोषी बताया गया है. लोकायुक्त द्वारा दोषी करार दिए जाने के बाद राज्य के मुख्यमंत्री बीएस येदुरप्पा ने भाजपा अध्यक्ष गडकरी के कहने के बावजूद इस्तीफा उन्हें दिया और चुपचाप जहाज़ पकड़ कर बंगलुरू रवाना हो गए. इसके बावजूद कि भाजपा के बड़े नेताओं की ओर से उन्हें इस्तीफ़ा देने की हिदायत की गई थी लेकिन येदुरप्पा इसके लिए तैयार नहीं हुए. मजबूरन भाजपा के संसदीय बोर्ड को उनको इसतीफा देने का निर्देश देना पड़ा. संसदीय बोर्ड की बैठक में भाग लेने वाले नेताओं में आडवाणी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, राजनाथ सिंह और वेन्कया नायडू भी शामिल थे. इसके बाद वैकल्पिक नेता की तलाश के लिए पार्टी के दो वरिष्ठ नेताओं अरुण जेटली और राजनाथ सिंह को शनिवार को बंगलुरू भेज दिया गया था.
इस सबके बावजूद कर्नाटक की राजनीति में अच्छा दखल अमल रखने वाले येदुरप्पा पद नहीं छोड़ने की जिद पर उड़े रहे और धमकी देते रहे कि वह पार्टी के लिए परेशानी खड़ी कर देंगे.
दिल्ली से वापस आते ही येदुरप्पा ने अपनी आवास पर विधायकों की बैठक बुलाइ और यह भी घोषणा की कि वह कार्यक्रम के अनुसार अपनी कैबिनेट की बैठक भी बुलाएँगे. राज्य भाजपा अध्यक्ष एस इशवरप्पा ने जो खुद भी दिल्ली में थे विधायकों को इस बैठक में भाग लेने के खिलाफ चेतावनी है. मगर बैठक हुई और उसमें पर्याप्त विधायकों और वजीरों ने भाग लिया लेकिन पार्टी सूत्रों का कहना था कि वे केवल नैतिक रूप से मुलाकात करने गए थे और जैसे ही वैकल्पिक नेता के नाम घोषित कर दिया जाएगा सभी विधायकों पार्टी के साथ हो जाएंगे.
इस बैठक के बाद येदुरप्पा ने इस्तीफा देने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि चूंकि शुभ महुरत नहीं है इसलिए वह अभी इस्तीफा नहीं देंगे बल्कि ऐतवार को शुभ महुरत में ही अपना इस्तीफा देंगे क्योंकि ऐसा करना उनके करयर के लिए अशुभ होगा और उनके करयर को नुक़सान होगा. अभी तक तो यह सुनने में आया था कि किसी मुख्यमंत्री ने शुभ महुरत में शपथ ली, शुभ महुरत में त्यागपत्र की मिसाल अब से पहले कहीं नहीं मिलती. दरअसल येदुरप्पा का इरादा था कि हाई कमान को इस बात के लिए मजबूर करें के वह उनके किसी करीबी को मुख्यमंत्री बनाए और उन्हें राज्य भाजपा का अध्यक्ष बनाया जाए. कहा जा रहा है कि येदुरप्पा ने ​​इस्तीफा सौंपने से पहले पार्टी के सामने यह शर्त रखी थी कि वे नए सीएम के नाम की घोषणा पहले ही करे उसके बाद वह अपना इस्तीफा देंगे.
भाजपा का शीर्ष नेतृत्व और येदुरप्पा के बीच उनके इस्तीफे को लेकर तल्ख स्थिति पैदा हो गई थी. मगर पार्टी की ओर से यह भरोसा दिलाया गया कि अगले मुख्यमंत्री के चयन में उनकी राय ली जाएगी, इसके बाद येदुरप्पा अपना छोड़ने के लिए राजी हुए. येदुरप्पा के बाद राज्य के अगले मुख्यमंत्री पद के लिए सांसद सदानंद गोड़ा और राज्य के दो मंत्रियों वी एस आचार्य और सुरेश कुमार का नाम चल रहा है.
अगर भाजपा येदुरप्पा से इस्तीफा नहीं दिलाती तो भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ इसके अभियान को जबर्दस्त धक्का पहुंचता और वे किस मुंह से कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाती.
हालांकि अभी सबका ध्यान येदुरप्पा के भ्रष्टाचार की तरफ ही है लेकिन जब उनके इस्तीफे की धूल छंटेगी और कर्नाटक के लोकायुक्त संतोष हेगड़े की रिपोर्ट का बारीकी से अध्ययन किया जाएगा तो इसमें कांग्रेस और जनता दल (एस) भी बराबर फंसती दिखेगी. अपनी रिपोर्ट में लोकायुक्त ने कहा है कि राज्य में खनन क्षेत्र में 16 हजार 85 करोड़ का घोटाला हुआ है, जिसमें से 30 करोड़ रुपये मुख्यमंत्री येदुरप्पा ओर उनके परिवार को दिया गया है. लेकिन इस रिपोर्ट का चौंकाने वाला सार यह है कि जिस साउथ वेस्ट माइनिंग कंपनी ने येदुरप्पा परिवार को तीस करोड़ रुपये दिए हैं वह माइनिंग कंपनी कांग्रेसी सांसद नवीन जिंदल के भाई सज्जन जिंदल की है. पूरा देश जानता है कि जिंदल परिवार पक्का काँग्रसी है. सज्जन जिंदल के पिता ओपी जिंदल हरियाणा में कांग्रेस के मंत्री थे, तो उनकी मां सावित्री जिंदल आज भी हरियाणा सरकार में मंत्री हैं.
हालांकि इस रिपोर्ट में रेड्डी बंधुओं का भी उल्लेख है जो भाजपा की राज्य सरकार में मंत्री हैं और उनके बारे में कहा गया है कि राज्य सरकार के भरोसे के बाद भी रेड्डी बंधुओं ने अवैध खनन जारी रखी. लेकिन नवीन जिंदल के भाई सज्जन जिंदल के जेएसडबलु‍ की सबसीडरी कंपनी साउथ वेस्ट माइनिंग पर बड़ा सवाल उठाया गया है. लोकायुक्त संतोष हेगड़े का कहना है कि सज्जन जिंदल की कंपनी ने दस करोड़ रुपये येदुरप्पा परिवार के ट्रस्ट को दिए और बीस करोड़ रुपये में येदुरप्पा परिवार की एक ऐसी ज़मीन खरीदी जिसकी बाजार में कीमत महज 1.4 करोड़ थी.
सज्जन जिंदल देश के बड़े स्टील व्यापारी हैं और उनकी कंपनी जिंदल स्टील वर्क्स का वार्षिक कारोबार 23 हजार करोड़ का है. यह जिंदल स्टील वर्क्स ओपी जिंदल समूह का हिस्सा है जिसकी एक अन्य कंपनी जेएसडबलु पावर में यही सज्जन जिंदल अध्यक्ष हैं और कांग्रेस के सांसद नवीन जिंदल सह अध्यक्ष हैं. जाहिर है जब कर्नाटक में खदानों को खोद कर माल भरने की दौड़ लगी हो तो सज्जन जिंदल भला क्यों पीछे रहते. सज्जन जिंदल ने तुरंत एक अस्थायी कंपनी बनाई और उसके नाम पर कर्नाटक में लोह खोदने पहुंच गए. लोकायुक्त संतोष हेगड़े ने अपनी रिपोर्ट में सवाल उठाया है कि ' जो कंपनी वित्तीय रूप से मजबूत नहीं है, इसके द्वारा असाधारण भुगतान किए जाने के बारे में मुझे यह समझने में बहुत मुश्किल हो रही है कि क्या कोई उधार लेकर दान देगा'' रिपोर्ट में कहा गया है कि, ''इसके चलते, कुछ फ़ाइलों को केंद्र को कार्रवाई के लिए भेजा जाना था, जो नहीं भेजा गया. यह भ्रष्टाचार कानून के दायरे में आ सकता है और मुख्यमंत्री के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है.''
इस रिपोर्ट के अनुसार अवैध खनन की काली कमाई में येदुरप्पा के अलावा राज्य सरकार के चार मंत्रियों और 600 के करीब अधिकारी भी शामिल थे. केवल 2006 से 2010 के बीच 16,085 करोड़ के घोटाले का दावा कर रही यह रिपोर्ट इस बात को प्रदर्शित करता है कि मंत्रियों, अधिकारियों और खनन माफिया के मजबूत नेटवर्क ने खजाने को केसे इतना लूटा है. इसके अलावा कांग्रेस के एक नेता और जनता दल (एस) के पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी का नाम भी इस रिपोर्ट में शामिल है.
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