Search

Monday, 27 February 2012

कुडनकुलम में पेशेवर एनजीओ का आंदोलन


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 28th February 2012
अफ़ीफ़ अहसन
जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक विज्ञान पत्रिका को दिए गए अपने एक साक्षात्कार में कहा कि देश में परमाणु परियोजनाओं और जीएम फूड के विरोध को कुछ विदेशी एनजीओ हवा दे रही हैं, तो उसके बाद देश में काफी हो हल्ला मचा और भाजपा ने इसे एक महत्वपूर्ण मामला बताते हुए प्रधानमंत्री से बयान पर ज्यादा रोशनी डालने की मांग कर डाली. 
हालांकि कुडनकुलम परमाणु बिजली घर का विरोध करने वाली सबसे बड़ी एनजीओ पीएमएएनई ने प्रधानमंत्री के इस दावे पर कड़ी प्रतिक्रया जताई है और इसमें किसी साजिश का शक जाहिर किया है लेकिन पीएमओ में राज्य मंत्री वी नारायण स्वामी ने गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि तीन एनजीओ को बाहरी देशों से दान में मिले अपने धन का कुडनकुलम परमाणु बिजलीघर के विरोध को भड़काने के लिए दुरुपयोग करते हुए पाया गया था जिसके बाद उनका लाइसेंस रद्द कर दिया गया. 
स्वामी ने बताया कि शिकायत के बाद की यह एनजीओ कल्याण कार्यों के लिए दान में मिली रकम को बिजलीघर के विरोध को भड़काने में इस्तेमाल कर रही हैं, यह पाया गया कि एनजीओ अमेरिका व स्कैंडीनिव्यन देशों से मिली बडी रकमों का विरोध को हवा देने के लिए बेजा दुरुपयोग कर रही थीं. हालांकि इन एनजीओ को रकम अपा‍हिजों के कल्याण और कोढ़ की समाप्ती के लिए मिली थीं. 
स्वामी ने दावा किया की तीन महीने से जारी आंदोलन के लिए लोगों को ट्रकों में भर के दूरदराज के विभिन्न गांवों से लाया जाता है. उन्हें खाना खिलाया जाता है. इन एनजीओ ने प्राप्त रकम दूसरे मद में खर्च करके विदेश कनटरीब्यूशन (नियमन) अधिनियम 2010 के राहनुमा सिद्धांतों का उल्लंघन किया है. उन्होंने साफ किया कि प्रधानमंत्री का बयान इसी जांच के आधार पर था. 
इस परियोजना में साझेदार रूस ने इसके बाद कहा कि उसे ऐसा शक तो बहुत पहले से ही था. रूस के राजदूत अलेगज़ैंडर कदाकन ने कहा हम यह बात पहले ही कह रहे थे, क्योंकि यह बहुत ही आश्चर्यजनक है. जापान के फुकोशीमा संयंत्र में हुई ट्रैजडी के छह महीने बीतने के बाद संयंत्र के खिलाफ आंदोलन शुरू हुआ. छह महीने तक यह लोग सोते रहे और फिर अचानक एक बेहतरीन और दुनिया में सबसे सुरक्षित स्टेशन के खिलाफ आवाज बुलंद हुई. पहले तो हम असमंजस का शिकार थे मगर अब हमारे दृष्टिकोण की पुष्टि हो गई है. रूसी राजदूत ने कहा. 
अमेरिका के पहले चार्ज डी अफयरस पीटर बरलैह ने कहा कि वह कोई प्रतिक्रिया करने से पहले तथ्यों की जांच करना चाहेंगे. उन्होंने कहा कि सैद्धांतिक तौर पर अमेरिका को भारतीय परमाणु परियोजनाओं पर काम करने से कोई समस्या नहीं है. उन्होंने कहा कि भारत में अमेरिकी फरमें भी परमाणु परियोजनाओं की संभावित साझेदारी पर काम कर रही हैं. भारत और अमेरिका के संबंधों हर स्तर पर आगे बढ़ रहे हैं. हम अमेरिकी कंपनियों की यहां मौजूदगी चाहते हैं. 
ऐसा लगता है कि जो बात स्वामी और रूसी राजदूत कहने से रुक गए वह यह है कि उन्हें संदेह है कि अमेरिका और पश्चिमी देश इस संयंत्र की राह में रोड़े अटका रहे हैं क्योंकि आंध्र प्रदेश और गुजरात में इसी तरह के दूसरे संयंत्र जो अमेरिकी साझेदारी में बन रहे हैं, पर अभी तक काम नहीं हो सका है जबकि रूस की साझेदारी में बनने वाले संयंत्र के दो यूनिट चालू होने वाले हैं. 
कुडनकुलम परमाणु संयंत्र का तेरह अरब रुपये की लागत से निर्माण हो रहा है और कहा जा रहा है कि इससे पैदा होने वाली बिजली से तमिलनाडु राज्य बिजली क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो जाएगा. इस संयंत्र के छह में से दो यूनिट तैयार हैं चार जल्द ही तैयार हो जाऐंगे और फ्रांस और अमेरिका के संयंत्र के चालू होने तक यह संयंत्र देश का सबसे बड़ा परमाणु बिजली घर होगा. फ्रांस के परमाणु संयंत्र स्थल पर सिविल सोसाइटी ने कब्जा कर लिया है जबकि अमेरिकी परमाणु संयंत्र का काम एक ऐसे भारतीय कानून के कारण अटका हुआ है जो संचालक और इकविपमेंट सप्लायर को किसी भी दुर्घटना की स्थिति में जिम्मेवार ठहराता है.
रूसी परमाणु बिजली घर इस अर्थ में अलग है कि इसे उस समय बनाने का सोचा गया था जब पश्चिमी देश भारत को परमाणु तकनीक देने का सख्ती से विरोध कर रहे थे. 
हालांकि एनजीओ को बाहरी देशों से मदद मिलना कोई नई बात नहीं है लेकिन प्रधानमंत्री ने जिस समस्या की ओर इशारा किया है, वह देश के लिए एक चिंतन का विषय है. ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि के बिना भारत लगातार विकास नहीं कर सकता. क्योंकि तेज विकास की राह में सबसे बड़ी बाधा ऊर्जा की कमी है. 
इसके साथ ही देश के सामने कार्बन का उत्सर्जन कम करने जैसी बड़ी चुनौती भी मुंह बाहे खड़ी है. भारत पावर प्लांट चलाने के लिए इस्तेमाल होने वाले कोयले का सबसे बड़ा आयातक है, यह कोयले से चलने वाले संयंत्र अधिक प्रदूषण फैलाते हैं और पूरी दुनिया उनसे छुटकारा पाना चाह रही है. देश ने पिछले कुछ समय में कई जल बिजली संयंत्र भी स्थापित किये हैं, लेकिन यह भी पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं. इसलिए बड़े पैमाने पर बिजली उत्पादन का एक ही तरीका बच जाता है कि परमाणु बिजली को अपनाया जाए. यह तरीका पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाला नहीं है और लंबे समय तक हमारी आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है. 
इसी तरह की स्थिति का सामना भारत को खाद्य मोर्चे पर भी है, जिसे एक बड़ी आबादी का पेट भरना पड़ता है. देश अभी तक भुखमरी और कुपोषण जैसी समस्याओं से त्रस्त है. खाद्य उत्पादन बढ़ाना और बर्बाद होने से बचाना ऐसे लक्ष्य हैं, जिनके लिए हमें नई तकनीक की जरूरत है. जीएम फूड भी ऐसी ही एक तकनीक है. यह ठीक है कि ऐसी प्रौद्योगिकी में लोगों की सुरक्षा और स्वास्थ्य का पूरा ख्याल रखा जाना चाहिए. इसके लिए मजबूत नियम बनाए जाने और उनका सख्ती से पालन करने पर जोर दिया जाना चाहिए. लेकिन यह विरोध मजबूत नियम बनाने के लिए नहीं हो रहा है. बल्कि यह तो योजनाओं को पूरी तरह से बंद करने के लिए हो रही है. इसके लिए पश्चिम की वह एनजीओ सक्रिय हो गई हैं, जो हर जगह इस तरह की परियोजनाओं का विरोध करती हैं. 
निश्चय ही यह विरोध हमारे विकास के रास्ते को रोक रहा है. लेकिन हम जिस दुनिया व जिस लोकतंत्र में रह रहे हैं, वहां ऐसा विरोध कोई नई बात नहीं. ऐसा विरोध दुनिया भर में होता है और इसके बावजूद वहां ऐसी योजना पूरी होती हैं. विरोध के बावजूद योजनाओं की सफलता को आमतौर पर राजनीतिक प्रतिबद्धता का मामला माना जाता है. लेकिन हमारे देश में समस्या कुछ अन्य रूप में सामने आते हैं. हम महत्वपूर्ण योजना शुरू करते हैं और उन्हें नौकरशाहों के हवाले कर देते हैं. स्थानीय स्तर पर योजनाओं के खिलाफ जो छोटा-मोटा आंदोलन खड़ा होता है, कई बार उनसे जुड़े लोगों की समस्यायें काफी वाजिब होती हैं, लेकिन उनसे प्रशासनिक स्तर पर नहीं निपटा जाता, जिससे ऐसा आंदोलन अक्सर बेवजह बढ़ जाता है और उनका नेतृत्व पेशेवर एनजीओ के हाथों में पहुंच जाता है. यह एनजीओ देसी हो सकती हैं और विदेशी भी. 
इसलिए ऐसी योजना शुरू करने से पहले यह जरूरी है कि सरकार पूरे देश और खास तौर पर स्थानीय लोगों को साथ लेकर चले, उनकी समस्याओं को सहानुभूति से सलझाए क्योंकि अगर ऐसा नहीं हुआ तो स्वाभाविक रूप से नेतृत्व पेशेवर एनजीओ के हाथों में चला जाएगा.
Afif Ahsen, Daily Pratap, Vir Arjun, Kudankulam, Atomic Energy, Tamilnadu, Manmohan Singh, 

کڈن کلم میں پیشہ وارانہ این جی او زکی تحریک


Daily Pratap, Indias Oldest Urdu Daily

Published on 27th February 2012
عفیف احسن

جب وزیر اعظم منموہن سنگھ نے ایک سائنس میگزین کو دئے گئے اپنے ایک انٹرویو میں یہ کہا کہ ملک میں ایٹمی منصوبوں اور جی ایم فوڈ کے مخالفت کو کچھ غیر ملکی این جی اوز ہوا دے رہے ہیں، تو اس کے بعد دیش میں کافی ہو ہلا مچا اور بی جے پی نے اسے ایک اہم معاملہ بتاتے ہوئے وزیر اعظم سے اپنے بیان پر مزید روشنی ڈالنے کی مانگ کرڈالی۔
حالانکہ کڈن کلم ایٹمی بجلی گھر کی مخالفت کرنے والی سب سے بڑی این جی اورپی ایم اے این ای نے وزیر اعظم کے اس دعویٰ پر سخت برہمی کا اظہار کیا ہے،اور اس میں کسی سازش کا شک ظاہر کیا ہے لیکن پی ایم او میں ریاستی وزیر وی نارائن سوامی نے وزارت داخلہ کی ایک رپورٹ کا حوالہ دیتے ہوئے بتایا کہ تین این جی او کو باہری ملکوں سے دان میں ملے اپنے فنڈ کا کڈن کلم ایٹمی بجلی گھر کی مخالفت کو بھڑکانے کے لئے ناجائز استعمال کرتے ہوئے پایا گیا تھا جس کے بعد ان کا لائسنس رد کردیا گیا۔ 
سوامی نے بتایا کہ ایک شکایت کے بعد کے یہ این جی اور فلاحی کاموں کے لئے دان میں ملی رقومات کو بجلی گھر کی مخالفت کو بھڑکانے میں استعمال کررہی ہیں،یہ پایاگیاکہ این جی او امریکہ اور اسکینڈینیوین ممالک سے ملی خطیر رقومات کامخالفت کو ہوا دینے کے لئے بیجااور غلط استعمال کررہی تھیں۔ حالانکہ ان این جی او کو یہ رقومات اپاہجوں کی فلاح اور بہبودی اور کوڑھ کے خاتمے کے لئے ملی تھیں ۔
سوامی نے دعویٰ کیا کے تین مہینے سے جاری تحریک کے لئے لوگوں کو ٹرکوں میں بھر کے دور دراز کے مختلف گاؤں سے لایا جاتا ہے۔ان کو کھانا کھلایا جاتا ہے۔ ان این جی اوز نے موصول رقومات کو دوسرے مد میں خرچ کرکے فارن کنٹریبیوشن (ریگولیشن)ایکٹ 2010 کے راہ نما اصولوں کی خلاف ورزی کی ہے۔انہوں نے صاف کیا کہ وزیر اعظم کا بیان اسی انکوئری کی بنیاد پرتھا۔
اس پروجیکٹ میں جوائنٹ وینچر پارٹنر روس نے بھی اس کے بعد کہا کہ اسے ایسا شک تو بہت پہلے سے ہی تھا۔روس کے سفیر الیگزینڈر کداکن نے کہا کے ہم تو یہ بات پہلے ہی کہہ رہے تھے، کیونکہ یہ بہت ہی حیران کن ہے۔ جاپان کے فکوشیما پلانٹ میں ہوئی ٹریجڈی کے چھ مہینے گزرنے کے بعد اس پلانٹ کے خلاف تحریک شروع ہوئی۔چھ مہینے تک یہ لوگ سوتے رہے اور پھر اچانک ایک بہترین اور دنیا میں سب سے محفوظ اسٹیشن کے خلاف آواز بلند ہوئی۔پہلے تو ہم تذبذب کا شکار تھے مگر اب ہمارے موقف کی تصدیق ہوگئی ہے۔روسی سفیر نے کہا۔
امریکہ کے پہلے چارج ڈی افئیرس پیٹر برلیہ نے کہا کہ وہ کوئی ردعمل ظاہر کرنے سے پہلے حقائق کی جانچ کرنا چاہیں گے۔انہوں نے یہ بھی کہا کہ اصولی طور پر امریکہ کو ہندوستان کے سول جوہری منصوبوں پر کام کرنے سے کوئی مسئلہ نہیں ہے۔انہوں نے کہا کہ ہندوستان میں امریکی فرمیں بھی سول جوہری منصوبوں کے ممکنہ اشتراک پر کام کررہی ہیں۔ہندوستان اور امریکہ کے تعلقات ہر سطح پر آگے بڑھ رہے ہیں۔اور ہم امریکی کمپنیوں کی یہاں پر موجودگی چاہتے ہیں۔
ایسا لگتا ہے کہ جو بات سوامی اور روسی صفیر کہنے سے رک گئے وہ یہ ہے کہ انہیں شک ہے کہ امریکہ اور مغربی ممالک اس پلانٹ کی راہ میں روڑے اٹکا رہے ہیں کیونکہ آندھرا پردیش اور گجرات میں اسی طرح کے دوسرے پلانٹ جو کہ امریکہ کے اشتراک سے بن رہے ہیں،پر ابھی تک کام نہیں ہوسکا ہے جبکہ روس کے اشتراک سے بننے والے پلانٹ کے دو یونٹ چالو ہونے والے ہیں۔
کڈن کلم کا جوہری پلانٹ تیرہ ارب روپے کی لاگت سے تعمیر ہورہا ہے اور کہا جا رہا ہے کہ اس سے پیدا ہونے والی توانائی سے ریاست تمل ناڈو بجلی کے شعبے میں خود کفیل ہوجائیگا۔اس پلانٹ کے چھ میں سے دو یونٹ بالکل تیار ہیں اور چار جلد ہی تیار ہوجائیں گے اور فرانس اور امریکہ کے پلانٹ کے چالو ہونے تک یہ پلانٹ ملک کا سب سے بڑا جوہری بجلی گھر ہوگا۔فرانس کے جوہری پلانٹ کی سائٹ پر سول سوسائٹی نے قبضہ کر لیا ہے جبکہ امریکی جوہری پلانٹ کا کام ایک ایسے ہندوستانی قانون کی وجہ سے اٹکا ہوا ہے جو کہ آپریٹر اوراکوپمنٹ سپلائر کو کسی بھی ایکسیڈنٹ کی صورت میں موردالزام ٹھہراتا ہے۔ 
روسی جوہری بجلی گھر اس معنیٰ میں الگ ہے کہ اسے اس وقت بنانے کا سوچا گیا تھا جب کے مغربی ممالک ہندوستان کو جوہری ٹکنالوجی دینے کی سختی کے ساتھ مخالفت کررہے تھے۔
حالانکہ این جی اوز کو باہری ممالک سے مدد ملنا کوئی نئی بات نہیں ہے لیکن وزیر اعظم نے جس مسئلہ کی طرف اشارہ کیا ہے، وہ ملک کے لئے ایک لمحہ فکریہ ہے۔ توانائی کی پیداوار میں اضافہ کے بغیر ہندوستان مسلسل ترقی نہیں کرسکتا۔ کیونکہ تیز رفتار ترقی کی راہ میں سب سے بڑی رکاوٹ توانائی کی کمی ہے۔
اس کے ساتھ ہی ساتھ ملک کے سامنے کاربن کا اخراج کم کرنے جیسا بڑا چیلنج بھی منہ پھاڑے کھڑا ہے۔ہندوستان پاور پلانٹ چلانے کے لئے استعمال ہونے والے کوئلے کا سب سے بڑا درآمد کنندہ ہے، یہ کوئلے سے چلنے والے پلانٹ بہت زیادہ آلودگی پھیلاتے ہیں اور پوری دنیا ان سے نجات حاصل کرنا چاہ رہی ہے۔ ملک نے گزشتہ کچھ عرصے میں کئی ہائڈرو بجلی پلانٹ بھی قائم کئیہیں، لیکن یہ بھی ماحولیات کو نقصان پہنچاتے ہیں۔ اس لئے بڑے پیمانے پر بجلی کی پیداوار کا ایک ہی طریقہ بچ جاتا ہے کہ جوہری بجلی کو اپنایا جائے۔ یہ طریقہ ماحولیات کو نقصان پہنچانے والا بھی نہیں ہے اور طویل عرصے تک ہماری ضروریات کو پوراکر سکتا ہے۔
اسی طرح کی صورتحال کا سامنا ہندوستان کو خوردنی کے محاذ پر بھی ہے، جسے ایک بڑی آبادی کا پیٹ بھرنا پرتا ہے۔ملک ابھی تک فاقہ کشی اورکم غزائی جیسے مسائل سے نبرد آزما ہے۔ خوراک کی پیداوار بڑھانا اور اسے برباد ہونے سے بچانا ایسے اہداف ہیں، جن کے لئے ہمیں نئی ٹیکنالوجی کی ضرورت ہے۔ جی ایم فوڈ بھی ایسی ہی ایک ٹیکنالوجی ہے۔ یہ دونوں چیزیں ہماری سب سے بڑی ضرورت ہیں۔ یہ ٹھیک ہے کہ ایسی ٹیکنالوجی میں لوگوں کی حفاظت اور ان کی صحت کا مکمل خیال رکھا جانا چاہئے۔ اس کے لئے مضبوط شرائط بنائے جانے اور ان پر سختی سے عمل کرنے پر زور دیا جانا چاہئے۔ لیکن یہ مخالفت مضبوط شرائط بنانے کے لئے نہیں ہو رہی ہیں۔ بلکہ یہ تو ان منصوبوں کو پوری طرح سے بند کرنے کے لئے ہو رہی ہیں۔ اس کے لئے مغرب کے وہ این جی او سرگرم ہو گئے ہیں، جو ہر جگہ اس طرح کے منصوبوں کی مخالفت کرتے ہیں۔
یقیناًیہ مخالفت ہماری ترقی کے راستے کو روک رہی ہے۔لیکن ہم جس دنیا اور جس جمہوریت میں رہ رہے ہیں، وہاں ایسے مخالفت کوئی نئی بات نہیں۔ ایسے مخالفت دنیا بھر میں ہوتی ہیں اور اس کے باوجود وہاں ایسی منصوبے پورے ہوتے ہیں۔ مخالفت کے باوجود منصوبوں کی کامیابی کو عام طور پر سیاسی عزم کا معاملہ خیال کیا جاتا ہے۔ لیکن ہمارے ملک میں مسائل کچھ دوسری شکل میں ہی سامنے آتے ہیں۔ ہم اہم منصوبے شروع کرتے ہیں اور انہیں نوکر شاہی کے حوالے کر دیتے ہیں۔ مقامی سطح پر ان منصوبوں کے خلاف جو چھوٹی موٹی تحریک کھڑی ہوتی ہے، کئی بار ان سے وابستہ لوگوں کے مسائل کافی واجب ہوتی ہیں، لیکن ان سے انتظامی سطح پرنہیں نمٹا جاتا ، جس سے ایسے تحریک اکثر بے وجہ بڑھ جاتی ہیں اور پھر ان کی قیادت پیشہ وارانہ این جی اوز کے ہاتھوں میں پہنچ جاتی ہے۔ یہ این جی اوزملکی بھی ہو سکتے ہیں اور غیر ملکی بھی۔
اس لئے ایسی منصوبے شروع کرنے سے پہلے یہ ضروری ہے کہ حکومت پورے ملک کو اور خاص طور پر مقامی آبادی کو ساتھ لے کر چلے، ان کے مسائل کو ہمدردی سے سلجھائے کیونکہ اگر ایسا نہیں ہوا تو قدرتی طور پر قیادت پیشہ ورانہ این جی اوز کے ہاتھوں میں ہی چلی جائے گی۔
Afif Ahsen, Daily Pratap, Vir Arjun, Kudankulam, Atomic Energy, Tamilnadu, Manmohan Singh, 

Monday, 20 February 2012

ہوئے تم دوست جس کے ۔۔۔


Daily Pratap, Indias Oldest Urdu Daily
Published on 20th February 201
عفیف احسن
ممتا بینرجی مرکزی سرکار کے ہرقدم کی مخالفت کرنا اپنا نسب العین سمجھتی ہیں وہ کانگریس کی مخالفت کا کوئی بھی موقعہ ہاتھ سے نہیں جانے دیتیں ۔لوک پال بل پر انہوں نے راجیہ سبھا میں کانگریس کی مخالفت کرکے اس کو پریشانی میں ڈال دیا تھا۔ حالانکہ ریلوے کے مالی حالت خراب ہورہی ہے مگر وہ کرایہ اور مال بھاڑا نہ بڑھائے جانے پر اڑی ہوئی ہیں۔بنگال میں کانگریس اور ممتا بینرجی آمنے سامنے ہیں اور روز ہی ٹکراؤ کی نوبت آجاتی ہے۔ کانگریس کے کوٹے کے ایک منسٹر نے ان کی کابینہ سے استعفیٰ بھی دیدیا ۔ یہی نہیں اب ممتا نے منموہن سنگھ کوایک خط لکھ کر مرکزی حکومت سے مطالبہ کیاہے کہ این سی ٹی سی سے متعلق حکم کا جائزہ لیا جائے اور اسے واپس لیا جائے۔ 
غالب کا ایک مشہور شعر ہے:
یہ فتنہ آدمی کی خانہ ویرانی کو کیا کم ہے؟
ہوئے تم دوست جسکے ،دشمن اسکا آسماں کیوں ہو؟
جب 26نومبر 2008کو ممبئی پر پاکستانی دہشت گردوں نے بھیانک حملہ کیا جس میں کم از کم ایک سو پچیانوے (195) افراد بشمول بائیس غیر ملکیوں کے جاں بحق ہوگئے اور تین سو ستائیس (327) افراد زخمی ہوئے۔ اس کے بعد نہ صرف ممبئی میں بلکہ پورے ملک میں بہت زبردست غم اور غصّہ کی لہر پھیل گئی۔ 
اس حملہ کے بعد بہت زورشور سے ایسے کسی بھی حملہ کو ہونے سے روکنے کے لئے ایک بہترین اور کارآمد میکینزم بنانے پر پورے ملک میں ایک عام رائے تیار کی گئی۔ اس میں تمام جماعتوں اور تمام ریاستوں کے بیچ یک جہتی نظر آئی۔ مگر ہماری مرکزی حکومت جس کی اس سلسلے میں فوری اقدامات کرنے کی ذمہ داری تھی نے اس کام میں بہت زیادہ وقت ضائع کردیا اور اس طرح تقریباً تین سال کا عرصہ گزر گیا۔عوام کا غصہ خاص کر اس ملک کے سیاست داں اور ہر بات پر سیاست کرنے والے لوگوں کے خلاف تھا جس نے سیاست دانوں کو بڑے بڑے کھوکھلے بیانات دینے کے بجائے چپ رہنے اورعمل کرنے پر مجبور کردیا۔
اسے وقت کی مجبوری کہیں یا عوامی دباؤ کہ ہر ایک سیاست داں اس مسئلہ کا مل جل کر حل تلاش کرنے اور اس سلسلے میں ہر ممکن قدم اٹھانے پرآمادہ اور تیار نظر آتا تھا۔ مگر 26/11حملہ کے تین سال بعد شاید حالات ایسے نہیں ہیں جیسے اس وقت تھے ۔یایوں کہیں کے سیاست ایسی نہیں ہے جو 26/11کے فوراًبعد تھی۔ اب تو ہرسیاست داں کو ملک سے زیادہ اپنی سیاست چمکانے کی فکر ہے۔اس میں چاہے ملک کا کتنا بھی نقصان ہوجائے۔یو پی اے کی اہم اتحادی ترنمول کانگریس اور مرکزی حکومت کی قیادت کر رہی کانگریس پارٹی کے درمیان اختلافات بھی اسی سیاست کا حصہ ہیں۔
یہ بات تو جگ ظاہر ہے کہ دہشت گردی کسی ایک ریاست کا مسئلہ نہیں رہا ہے۔ بلکہ اب تو یہ ایک بین الاقوامی مسئلہ اور معاملہ بن گیا ہے۔اور اس سے نمٹنے کے لئے ہمیں ملک کے اندر تو ایک بین الریاستی ادارہ درکار ہے ہی ساتھ ہی ایک ایسا ادارہ چاہئے جو بین الاقوامی پلیٹ فارم پر بھی دہشت گردی سے لڑسکے۔
دہشت گردی کبھی بھی ایک عام لاء اینڈ آرڈر کا مسئلہ نہیں رہا جو کہ ریاستی سبجیکٹ ہو بلکہ یہ تو ملک کی سلامتی اور سا لمیت سے جڑا ہوا معاملہ ہے اور اگر پورے ملک میں اس سے مل کر نہیں نپٹا گیا تو اس کا کبھی بھی خاتمہ نہیں ہوپائے گا۔
دہشت گردانہ حملہ سے نپٹنے کے لئے اور ان کی جانچ کے لئے این آئی اے کا قیام بھی عمل میں آیا تھا۔ مگر اس کو بھی پورے اختیارات نہیں دئے گئے۔ اور پھر اس کا کام تو حملہ ہونے کے بعد شروع ہوتا ہے اس لئے ضرورت یہ تھی کہ ایک ایسی باڈی کا قیام عمل میں لایا جائے جو ایسے کسی حملہ کو ہونے سے پہلے روک سکے۔ اسی لئے پچھلے مہینے وزیر اعظم کی صدارت والی سیکورٹی معاملات کی کابینہ کمیٹی نے امریکہ کے نیشنل کاؤنٹر ٹیرورزم سینٹر (این سی ٹی سی) کی ہی طرز پر ہندوستان میں بھی ایک این سی ٹی سی کے قیام کی منظوری دے دی۔ دہشت گردی پر قابو پانے کا کام کرنے والی یہ تنظیم خفیہ ایجنسی آئی بی کے کنٹرول میں رہے گی۔ آئی بی کے جوائنٹ ڈائریکٹر کے عہدے کے افسراین سی ٹی سی کی قیادت کریں گے۔وزیر داخلہ پی چدمبرم نے بتایا تھا کہ سب سے پہلے اس تنظیم کی کور ٹیم قائم کی جائے گی۔ یہ ٹیم پوری تنظیم کو کھڑا کرے گی۔ چدمبرم کے مطابق یہ ادارہ دہشت گردی روکنے والے بنیادی منصوبوں پر کام کرے گی۔ اسے پورے ملک کی ایجنسیوں سے خفیہ معلومات سمیت کسی بھی طرح کی مدد لینے کا حق ہوگا۔ اتنا ہی نہیں کسی بھی دہشت گردانہ سرگرمیوں کے لئے یہ دوسری ایجنسیوں کے درمیان ہم آہنگی والی ایجنسی بن جائے گی۔ چدمبرم نے کہا کہ اس تنظیم کے قیام کے بعد ضروری ہے کہ تمام ریاستیں پولیس میں اصلاحات کے لئے سپریم کورٹ کے ہدایات پر عمل کریں۔این سی ٹی سی دہشت گرد تنظیموں اور ان سے متعلق لوگوں کے بارے میں اعداد شمارجمع کرے گا ساتھ ہی اسے غیر قانونی سرگرمیوں کو روکنا قانون کے تحت گرفتاری اور تلاشی لینے کے حق بھی ہوں گے۔ باقی افسر مختلف تحقیقات تنظیموں سے لئے جائیں گے۔یہ بھی سچ ہے کہ پولیس تنظیم میں بہتری لائے بغیر یہ تنظیم مضبوطی سے کام نہیں کر پائے گی۔
حالانکہ پچھلے ماہ اس ایجنسی کے قیام کے اعلان کے بعد کسی نے بھی اس کی کوئی مخالفت نہیں کی تھی مگر جیسے ہی یہ اعلان ہوا کہ پہلی مارچ سے این سی ٹی سی کے قیام کا حکم نافذالعمل ہوجائے گا تو ممتا بینرجی کو ریاستوں کے اختیارات کا خیال ستانے لگا ہے۔اور موقعہ غنیمت جان کر ان کے ساتھ جے للتا ، بیجو پٹنائیک اور بی جے پی کے چیف منسٹر بھی سر میں سر ملانے لگے ۔
این سی ٹی سی کی مخالفت کر رہی ممتا سمیت گیارہ ریاستوں کے وزرائے اعلی کو پیغام دیتے ہوئے چدمبرم نے صاف کہا کہ داخلی سلامتی ایک پیچیدہ مسئلہ ہے۔ ملک کی سلامتی کی مرکزی اور ریاستوں کی مشترکہ ذمہ داری ہے۔ آئین میں نظم و قانون کو ریاست کا موضوع بتایا گیا ہے، لیکن یہ بھی کہا گیا ہے کہ مرکز کو تمام لوگوں کو ضروری سیکورٹی فراہم کرانی چاہئے۔
کولکتہ میں قومی سلامتی گارڈ (این ایس جی) مرکز کا افتتاح تھا اس پروگرام میں ممتا نہیں آئیں۔ مہمانوں کی فہرست میں ممتا کا نام تھا، لیکن بعد میں ہٹا دیا گیا۔ ریاستی حکومت کی طرف سے ریاست کے وزیر مکل رائے پروگرام میں شریک ہوئے۔ لیکن ممتا کی ناراضگی کو بخوبی سمجھ رہے چدمبرم نے اپنا رخ صاف کرنے میں کوئی کسر نہیں چھوڑی۔ کولکاتا کے قریب شمالی 24 پرگنہ ضلع کے باڈو میں افتتاح کے بعد وزیر داخلہ نے یہ بھی کہا کہ مرکز نے سلامتی کے مسائل پر غیر کانگریس حکمرانی والی ریاستوں کے ساتھ کبھی بھیدبھاوکی پالیسی نہیں اپنائی ہے۔ دہشت گردی اور نکسل واد جیسے پیچیدہ اور گمبھیر مسائل پر مرکزی حکومت کا رخ پورے ملک کے لئے یکساں ہے۔ لیکن ریاستوں کے تعاون کے بغیر دہشت گردی کے خلاف جنگ نہیں جیتی جا سکتی ہے۔ چدمبرم نے کہا کہ ہم نے مغربی بنگال میں گزشتہ حکومت کے ساتھ بھی کام کیا اور اس حکومت کے ساتھ کام کر کے بھی ہم خوش ہیں۔ جنگل محل سمیت پورے ریاست میں نکسلی سرگرمیوں پر لگام کسنے میں کامیابی پر چدمبرم نے ممتا کی حکومت کی تعریف بھی کی۔ چدمبرم نے کہا،’’ہمیں مغربی بنگال کی نئی حکومت کے ساتھ کام کرنے میں خوشی ہو رہی ہے۔ مغربی بنگال کے لوگ وسیع طور پر اس بات کو قبول کریں گے کہ ریاست میں نکسل واد کا مسئلہ کافی کنٹرول میں آ گیا ہے‘‘۔چدمبرم نے این سی ٹی سی پر اٹھے تنازعہ اور وزرائے اعلی کے اس پر احتجاج کا ذکر کیے بغیر ہی یہ باتیں کہیں۔
این سی ٹی سی کی مخالفت کرنے والوں کا کہنا ہے کہ این سی ٹی سی کے قیام سے نظم و قانون کی حالت پر ریاست کے حقوق میں مداخلت ہوگی۔این سی ٹی سی کو مرکز کی جانب سے دی گئی قانونی طاقت کو انہوں نے ملک کے وفاقی ڈھانچے کے لئے خطرہ قرار دیا ہے۔یو پی اے میں شریک نیشنل کانفرنس کے سربراہ فاروق عبداللہ نے بھی کہا ہے کہ ایسا کچھ نہیں کرنا چاہئے، جس سے ملک کے وفاقی ڈھانچے پر آنچ آئے۔ این سی ٹی سی پر وزیر داخلہ کو اپنا رخ صاف کرنا چاہئے۔
دراصل ترنمل کانگریس کے سللے میں کانگریس کی پالیسی تو یہ تھی کے کسی طرح ریاستی الیکشن ہوجائیں اور اس کے بعد جو بھی سیاسی حالات ہوں گے اس کے مطا بق ممتا سے نپٹا جائے گا۔ کانگریس کی اس چال کو سمجھتے ہوئے ممتا نے یوپی اور گووا تک میں اپنے کینڈیڈیٹ میدان میں اتار دئے تاکہ کانگریس کو زیادہ سے زیادہ غصہ دلایا جائے او ر لگاتار ٹکراؤ چلتا رہے۔ 
اس کھینچ تان میں سب سے زیادہ نقصان تو ملک کا ہی ہورہا ہے اور جیسے چکی کے دو پاٹ میں گیہوں پستا ہے اسی طرح اس ملک کا عوام بھی لگاتار پس رہا ہے۔کیونکہ یہ الیکشن کا موسم ہے اس لئے ہر ایک سیاست داں کو اپنی سیاست چمکانے کی فکر لاحق ہے اور کوئی بھی ملک کے لئے فکر مند نہیں ہے۔
Afif Ahsen, Daily Pratap, Vir Arjun, Mamta Banerjee, Manmohan Singh, West Bengal, NCTC, Terrorism, Ghalib, 

हुए तुम दोस्त जिसके ...


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 20th February 2012
अफ़ीफ़ अहसन
ममता बेनर्जी केंद्र सरकार के हर कदम का विरोध करना अपना पर्म-धर्म समझती हैं वह कांग्रेस विरोध का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देती. लोकपाल विधेयक पर उन्होंने राज्यसभा में कांग्रेस का विरोध कर उसे परेशानी में डाल दिया था. हालांकि रेलवे की वित्तीय हालत खराब हो रही है लेकिन वह किराया और माल भाड़े न बढ़ाए जाने पर अड़ी हुई हैं. बंगाल में कांग्रेस और ममता बेनर्जी आमने सामने हैं और आये दिन ही टकराव की नौबत आ जाती है. कांग्रेस के कोटे के मंत्री ने उनकी सरकार से इस्तीफा भी दे दिया. यही नहीं अब ममता ने मनमोहन सिंह को एक पत्र लिखकर केंद्र सरकार से मांग की हे कि एनसीटीसी आदेश की समीक्षा करें और उसे वापस लिया जाए. 
ग़ालिब का एक प्रसिद्ध शेर है: 
यह फ़ितना आदमी की ख़ाना वीरान को क्या कम है?
हुए तुम दोस्त जिसके, दुश्मन उसका आसमान क्यों हो? 
जब 26 नवंबर 2008 को मुंबई पर पाकिस्तानी आतंकवादियों ने भयानक हमला किया जिसमें कम से कम एक सौ पचयानवे (195) लोगों सहित बाईस विदेशियों की मौत हो गइ और तीन सौ स्ताईस (327) लोग घायल हुए. इसके बाद न केवल मुंबई में बलकि पूरे देश में बहुत भारी दुख और क्रोध की लहर फैल गई. 
इस हमले के बाद बहुत ज़ोर-शोर से ऐसे किसी भी हमले को होने से रोकने के लिए एक अच्छा और उपयोगी मेकेनिज़म बनाने पर पूरे देश में एक आम राय तैयार की गई. इसमें सभी दलों और सभी राज्यों के बीच यक जहती नज़र आई. मगर हमारी केंद्र सरकार जिस की इस बारे में तत्काल कदम उठाने की जिम्मेदारी थी ने इस काम में काफी समय बर्बाद कर दिया और इस तरह लगभग तीन साल बीत गया. जनता का गुस्सा खासकर देश के राजनीतिज्ञ और हर बात पर राजनीति करने वाले लोगों के खिलाफ था जिसने राजनीतिज्ञों को बड़े खोखले बयान देने के बजाय चुप रहने और अमल करने पर मजबूर कर दिया. इसे समय की मजबूरी कहें या सार्वजनिक दबाव हर एक राजनीतिज्ञ इस समस्या का मिलकर समाधान करने और इस संबंध में हर संभव कदम उठाने पर आमादा और तैयार नज़र आता था. लेकिन 26/11 हमले के तीन साल बाद शायद हालात ऐसे नहीं हैं जैसे उस समय थे. या यों कहें के राजनीति ऐसी नहीं है जो 26/11 के तुरंत बाद थी. अब तो हर राजनेता को देश से अधिक अपनी राजनीति चमकाने की चिंता है. इसमें चाहे देश का कितना भी नुकसान हो. यूपीए की महत्वपूर्ण सहयोगी तृणमूल कांग्रेस और केंद्र सरकार का नेतृत्व कर रही कांग्रेस पार्टी के बीच मतभेद भी इसी राजनीति का हिस्सा हैं. 
यह बात तो जग जाहिर है कि आतंकवाद किसी एक राज्य की समस्या नहीं है. बल्कि अब तो यह एक अंतरराष्ट्रीय समस्या और मामला बन गया है. इससे निपटने के लिए हमें देश के भीतर एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर के संगठन की आवश्यकता है साथ ही एक ऐसा संगठन चाहिए जो अंतरराष्ट्रीय मंच पर आतंकवाद से लड़ सके. 
आतंकवाद कभी भी एक आम लॉ एंड ऑर्डर की समस्या नहीं रहा जो राज्य का सब्जेक्ट हो बल्कि यह तो मुलक की सुरक्षा और अखंडता से जुड़ा मामला है और अगर देश में उससे मिलकर नहीं निपटा गया तो यह कभी भी समाप्त नहीं हो सकता. 
आतंकवादी हमले से निपटने के लिए और उनकी जांच के लिए एनआईए का गठन भी हुआ था. मगर उसे भी पूरे अधिकार नहीं दिए गए. और फिर उसका काम तो हमले के बाद शुरू होता है जरूरत यह थी कि एक ऐसी बॉडी की स्थापना की जाए जो ऐसे किसी हमले को पहले ही रोक सके. इसी लिए पिछले महीने प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति ने अमेरिका के नेशनल काउंटर टैरोरज़म केन्द्र (एनसीटीसी) की ही तर्ज पर भारतीय भी एनसीटीसी की स्थापना की मंजूरी दे दी. आतंकवाद पर काबू पाने का काम करने वाली यह संस्था खुफिया एजेंसी आईबी के नियंत्रण में रहेगी. आईबी के संयुक्त निदेशक पद के अफसर एनसीटीसी का नेतृत्व करेंगे. गृहमंत्री पी चिदंबरम ने बताया कि सबसे पहले इस संगठन की कोर टीम गठित की जाएगी. यह टीम पूरे संगठन को खड़ा करेगी. चिदंबरम के अनुसार संगठन आतंकवाद रोकने वाले बुनियादी परियोजनाओं पर काम करेगी. उसे पूरे देश की एजेंसियों से खुफिया जानकारी सहित किसी भी तरह की मदद लेने का अधिकार होगा. इतना ही नहीं किसी भी आतंकवादी गतिविधियों के लिए अन्य एजेंसियों के बीच तालमेल वाली एजेंसी बन जाएगी. चिदंबरम ने कहा कि संगठन के गठन के बाद आवश्यक है कि सभी राज्य पुलिस सुधार के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करें. एनसीटीसी आतंकवादी संगठनों और उनसे जुड़े लोगों के बारे में आंकड़े जमा करेगी साथ ही उसे अवैध गतिविधियों को रोकना कानून के तहत गिरफ्तारी और तलाशी लेने के अधिकार भी होंगे. बाकी अधिकारी विभिन्न जांच संगठनों से लिए जाएंगे. यह भी सच है कि पुलिस संगठन में सुधार लाए बिना यह संगठन मजबूती से काम नहीं कर पाएगा. 
हालांकि पिछले महीने एजेंसी के गठन की घोषणा के बाद किसी ने भी कोई विरोध नहीं किया था लेकिन जैसे ही यह घोषणा हुई कि पहली मार्च से एनसीटीसी के गठन का आदेश लागु हो जाएगा तो ममता बेनर्जी को राज्यों के अधिकार के हनन का विचार सताने लगा है. मौका गनीमत जानकर उनके साथ जयललिता, बीजू पटनाईक और भाजपा के मुख्यमंत्री भी सुर में सुर मिलाने लगे. 
एनसीटीसी का विरोध कर रही ममता सहित ग्यारह राज्यों के मुख्यमंत्रियों को संदेश देते हुए चिदंबरम ने साफ कहा कि आंतरिक सुरक्षा एक जटिल समस्या है. देश की सुरक्षा केंद्र और राज्यों की संयुक्त जिम्मेदारी है. संविधान में व्यवस्था और कानून को राज्य का विषय बताया गया है, लेकिन यह भी कहा गया है कि केंद्र को सभी लोगों को आवश्यक सुरक्षा प्रदान करानी चाहिए. 
कोलकाता में राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) केंद्र का उद्घाटन था इस कार्यक्रम में ममता नहीं आईं. मेहमानों की सूची में ममता का नाम था, लेकिन बाद में हटा दिया गया. राज्य सरकार द्वारा राज्य मंत्री मुकल राय कार्यक्रम में शामिल हुए. लेकिन ममता की नाराज़गी को बखूबी समझ रहे चिदंबरम ने अपना रुख साफ करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. कोलकाता के निकट उत्तरी 24 परगना जिले के बाडो में उद्घाटन के बाद गृहमंत्री ने कहा कि केंद्र ने सुरक्षा मुद्दों पर गैर कांग्रेस शासन वाली राज्यों के साथ कभी भेदभाव की नीति नहीं अपनाई है. आतंकवाद और नक्सलवाद जैसे जटिल और गंभीर मुद्दों पर केंद्र सरकार का रुख पूरे देश के लिए समान है. लेकिन राज्यों के सहयोग के बिना आतंकवाद के खिलाफ युद्ध नहीं जीता जा सकता है. चिदंबरम ने कहा कि हमने पश्चिम बंगाल में पिछली सरकार के साथ भी काम किया और इस सरकार के साथ काम करके भी हम खुश हैं. जंगलमहल सहित पूरे राज्य में नक्सली गतिविधियों पर लगाम कसने में सफलता पर चिदंबरम ने ममता सरकार की प्रशंसा भी की. चिदंबरम ने कहा, “हमें पश्चिम बंगाल की नई सरकार के साथ काम करने में खुशी हो रही है. पश्चिम बंगाल के लोग व्यापक तौर पर यह स्वीकार करेंगे कि राज्य में नक्सलवाद की समस्या काफी नियंत्रण में आ गया हे. चिदंबरम ने एनसीटीसी पर उठे विवाद और मुख्यमंत्रियों के विरोध का उल्लेख किए बिना ही ये बातें कहीं. 
एनसीटीसी का विरोध करने वालों का कहना है कि एनसीटीसी की स्थापना से कानून व इन्तेज़ाम की स्थिति पर राज्य के अधिकारों में हस्तक्षेप होगा. एनसीटीसी को केंद्र द्वारा दी गई कानूनी शक्ति को उन्होंने देश के संघीय ढांचे के लिए खतरा करार दिया है. यूपीए में शामिल नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने कहा है कि ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिससे देश के संघीय ढांचे पर आंच आए. एनसीटीसी पर गृहमंत्री को अपना रुख़ साफ करना चाहिए. 
दरअसल ‍तिरीनमूल कांग्रेस के लिए कांग्रेस की नीति यह थी कि किसी तरह राज्य चुनाव हो और उसके बाद जो भी राजनीतिक परिस्थितियां होंगे उसके अनूसार ममता से निपटा जाएगा. कांग्रेस की इस चाल को समझते हुए ममता ने उत्तर प्रदेश और गोवा तक में अपने कैंडीडेट मैदान में उतार दिए ताकि कांग्रेस को अधिक गुस्सा दिलाया जाए और लगातार टकराव चलता रहे. 
इस खींच-तान में सबसे अधिक नुकसान तो देश का ही हो रहा है और जैसे चक्की के दो पाट में गेहूं पिसता है उसी तरह देश की जनता भी लगातार पिस रही है. क्योंकि यह चुनाव का मौसम है इसलिए हर राजनीतिज्ञ को राजनीति चमकाने की चिंता है और कोई भी देश के लिए चिंतित नहीं है.
Afif Ahsen, Daily Pratap, Vir Arjun, Mamta Banerjee, Manmohan Singh, West Bengal, NCTC, Terrorism, Ghalib,