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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 20th February 2012
अफ़ीफ़ अहसन
ममता बेनर्जी केंद्र सरकार के हर कदम का विरोध करना अपना पर्म-धर्म समझती हैं वह कांग्रेस विरोध का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देती. लोकपाल विधेयक पर उन्होंने राज्यसभा में कांग्रेस का विरोध कर उसे परेशानी में डाल दिया था. हालांकि रेलवे की वित्तीय हालत खराब हो रही है लेकिन वह किराया और माल भाड़े न बढ़ाए जाने पर अड़ी हुई हैं. बंगाल में कांग्रेस और ममता बेनर्जी आमने सामने हैं और आये दिन ही टकराव की नौबत आ जाती है. कांग्रेस के कोटे के मंत्री ने उनकी सरकार से इस्तीफा भी दे दिया. यही नहीं अब ममता ने मनमोहन सिंह को एक पत्र लिखकर केंद्र सरकार से मांग की हे कि एनसीटीसी आदेश की समीक्षा करें और उसे वापस लिया जाए.
ग़ालिब का एक प्रसिद्ध शेर है:
यह फ़ितना आदमी की ख़ाना वीरान को क्या कम है?
हुए तुम दोस्त जिसके, दुश्मन उसका आसमान क्यों हो?
जब 26 नवंबर 2008 को मुंबई पर पाकिस्तानी आतंकवादियों ने भयानक हमला किया जिसमें कम से कम एक सौ पचयानवे (195) लोगों सहित बाईस विदेशियों की मौत हो गइ और तीन सौ स्ताईस (327) लोग घायल हुए. इसके बाद न केवल मुंबई में बलकि पूरे देश में बहुत भारी दुख और क्रोध की लहर फैल गई.
इस हमले के बाद बहुत ज़ोर-शोर से ऐसे किसी भी हमले को होने से रोकने के लिए एक अच्छा और उपयोगी मेकेनिज़म बनाने पर पूरे देश में एक आम राय तैयार की गई. इसमें सभी दलों और सभी राज्यों के बीच यक जहती नज़र आई. मगर हमारी केंद्र सरकार जिस की इस बारे में तत्काल कदम उठाने की जिम्मेदारी थी ने इस काम में काफी समय बर्बाद कर दिया और इस तरह लगभग तीन साल बीत गया. जनता का गुस्सा खासकर देश के राजनीतिज्ञ और हर बात पर राजनीति करने वाले लोगों के खिलाफ था जिसने राजनीतिज्ञों को बड़े खोखले बयान देने के बजाय चुप रहने और अमल करने पर मजबूर कर दिया. इसे समय की मजबूरी कहें या सार्वजनिक दबाव हर एक राजनीतिज्ञ इस समस्या का मिलकर समाधान करने और इस संबंध में हर संभव कदम उठाने पर आमादा और तैयार नज़र आता था. लेकिन 26/11 हमले के तीन साल बाद शायद हालात ऐसे नहीं हैं जैसे उस समय थे. या यों कहें के राजनीति ऐसी नहीं है जो 26/11 के तुरंत बाद थी. अब तो हर राजनेता को देश से अधिक अपनी राजनीति चमकाने की चिंता है. इसमें चाहे देश का कितना भी नुकसान हो. यूपीए की महत्वपूर्ण सहयोगी तृणमूल कांग्रेस और केंद्र सरकार का नेतृत्व कर रही कांग्रेस पार्टी के बीच मतभेद भी इसी राजनीति का हिस्सा हैं.
यह बात तो जग जाहिर है कि आतंकवाद किसी एक राज्य की समस्या नहीं है. बल्कि अब तो यह एक अंतरराष्ट्रीय समस्या और मामला बन गया है. इससे निपटने के लिए हमें देश के भीतर एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर के संगठन की आवश्यकता है साथ ही एक ऐसा संगठन चाहिए जो अंतरराष्ट्रीय मंच पर आतंकवाद से लड़ सके.
आतंकवाद कभी भी एक आम लॉ एंड ऑर्डर की समस्या नहीं रहा जो राज्य का सब्जेक्ट हो बल्कि यह तो मुलक की सुरक्षा और अखंडता से जुड़ा मामला है और अगर देश में उससे मिलकर नहीं निपटा गया तो यह कभी भी समाप्त नहीं हो सकता.
आतंकवादी हमले से निपटने के लिए और उनकी जांच के लिए एनआईए का गठन भी हुआ था. मगर उसे भी पूरे अधिकार नहीं दिए गए. और फिर उसका काम तो हमले के बाद शुरू होता है जरूरत यह थी कि एक ऐसी बॉडी की स्थापना की जाए जो ऐसे किसी हमले को पहले ही रोक सके. इसी लिए पिछले महीने प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति ने अमेरिका के नेशनल काउंटर टैरोरज़म केन्द्र (एनसीटीसी) की ही तर्ज पर भारतीय भी एनसीटीसी की स्थापना की मंजूरी दे दी. आतंकवाद पर काबू पाने का काम करने वाली यह संस्था खुफिया एजेंसी आईबी के नियंत्रण में रहेगी. आईबी के संयुक्त निदेशक पद के अफसर एनसीटीसी का नेतृत्व करेंगे. गृहमंत्री पी चिदंबरम ने बताया कि सबसे पहले इस संगठन की कोर टीम गठित की जाएगी. यह टीम पूरे संगठन को खड़ा करेगी. चिदंबरम के अनुसार संगठन आतंकवाद रोकने वाले बुनियादी परियोजनाओं पर काम करेगी. उसे पूरे देश की एजेंसियों से खुफिया जानकारी सहित किसी भी तरह की मदद लेने का अधिकार होगा. इतना ही नहीं किसी भी आतंकवादी गतिविधियों के लिए अन्य एजेंसियों के बीच तालमेल वाली एजेंसी बन जाएगी. चिदंबरम ने कहा कि संगठन के गठन के बाद आवश्यक है कि सभी राज्य पुलिस सुधार के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करें. एनसीटीसी आतंकवादी संगठनों और उनसे जुड़े लोगों के बारे में आंकड़े जमा करेगी साथ ही उसे अवैध गतिविधियों को रोकना कानून के तहत गिरफ्तारी और तलाशी लेने के अधिकार भी होंगे. बाकी अधिकारी विभिन्न जांच संगठनों से लिए जाएंगे. यह भी सच है कि पुलिस संगठन में सुधार लाए बिना यह संगठन मजबूती से काम नहीं कर पाएगा.
हालांकि पिछले महीने एजेंसी के गठन की घोषणा के बाद किसी ने भी कोई विरोध नहीं किया था लेकिन जैसे ही यह घोषणा हुई कि पहली मार्च से एनसीटीसी के गठन का आदेश लागु हो जाएगा तो ममता बेनर्जी को राज्यों के अधिकार के हनन का विचार सताने लगा है. मौका गनीमत जानकर उनके साथ जयललिता, बीजू पटनाईक और भाजपा के मुख्यमंत्री भी सुर में सुर मिलाने लगे.
एनसीटीसी का विरोध कर रही ममता सहित ग्यारह राज्यों के मुख्यमंत्रियों को संदेश देते हुए चिदंबरम ने साफ कहा कि आंतरिक सुरक्षा एक जटिल समस्या है. देश की सुरक्षा केंद्र और राज्यों की संयुक्त जिम्मेदारी है. संविधान में व्यवस्था और कानून को राज्य का विषय बताया गया है, लेकिन यह भी कहा गया है कि केंद्र को सभी लोगों को आवश्यक सुरक्षा प्रदान करानी चाहिए.
कोलकाता में राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) केंद्र का उद्घाटन था इस कार्यक्रम में ममता नहीं आईं. मेहमानों की सूची में ममता का नाम था, लेकिन बाद में हटा दिया गया. राज्य सरकार द्वारा राज्य मंत्री मुकल राय कार्यक्रम में शामिल हुए. लेकिन ममता की नाराज़गी को बखूबी समझ रहे चिदंबरम ने अपना रुख साफ करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. कोलकाता के निकट उत्तरी 24 परगना जिले के बाडो में उद्घाटन के बाद गृहमंत्री ने कहा कि केंद्र ने सुरक्षा मुद्दों पर गैर कांग्रेस शासन वाली राज्यों के साथ कभी भेदभाव की नीति नहीं अपनाई है. आतंकवाद और नक्सलवाद जैसे जटिल और गंभीर मुद्दों पर केंद्र सरकार का रुख पूरे देश के लिए समान है. लेकिन राज्यों के सहयोग के बिना आतंकवाद के खिलाफ युद्ध नहीं जीता जा सकता है. चिदंबरम ने कहा कि हमने पश्चिम बंगाल में पिछली सरकार के साथ भी काम किया और इस सरकार के साथ काम करके भी हम खुश हैं. जंगलमहल सहित पूरे राज्य में नक्सली गतिविधियों पर लगाम कसने में सफलता पर चिदंबरम ने ममता सरकार की प्रशंसा भी की. चिदंबरम ने कहा, “हमें पश्चिम बंगाल की नई सरकार के साथ काम करने में खुशी हो रही है. पश्चिम बंगाल के लोग व्यापक तौर पर यह स्वीकार करेंगे कि राज्य में नक्सलवाद की समस्या काफी नियंत्रण में आ गया हे. चिदंबरम ने एनसीटीसी पर उठे विवाद और मुख्यमंत्रियों के विरोध का उल्लेख किए बिना ही ये बातें कहीं.
एनसीटीसी का विरोध करने वालों का कहना है कि एनसीटीसी की स्थापना से कानून व इन्तेज़ाम की स्थिति पर राज्य के अधिकारों में हस्तक्षेप होगा. एनसीटीसी को केंद्र द्वारा दी गई कानूनी शक्ति को उन्होंने देश के संघीय ढांचे के लिए खतरा करार दिया है. यूपीए में शामिल नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने कहा है कि ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिससे देश के संघीय ढांचे पर आंच आए. एनसीटीसी पर गृहमंत्री को अपना रुख़ साफ करना चाहिए.
दरअसल तिरीनमूल कांग्रेस के लिए कांग्रेस की नीति यह थी कि किसी तरह राज्य चुनाव हो और उसके बाद जो भी राजनीतिक परिस्थितियां होंगे उसके अनूसार ममता से निपटा जाएगा. कांग्रेस की इस चाल को समझते हुए ममता ने उत्तर प्रदेश और गोवा तक में अपने कैंडीडेट मैदान में उतार दिए ताकि कांग्रेस को अधिक गुस्सा दिलाया जाए और लगातार टकराव चलता रहे.
इस खींच-तान में सबसे अधिक नुकसान तो देश का ही हो रहा है और जैसे चक्की के दो पाट में गेहूं पिसता है उसी तरह देश की जनता भी लगातार पिस रही है. क्योंकि यह चुनाव का मौसम है इसलिए हर राजनीतिज्ञ को राजनीति चमकाने की चिंता है और कोई भी देश के लिए चिंतित नहीं है.
Afif Ahsen, Daily Pratap, Vir Arjun, Mamta Banerjee, Manmohan Singh, West Bengal, NCTC, Terrorism, Ghalib,
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