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Saturday, 31 March 2012
Monday, 26 March 2012
जलते घर को देखने वालो, फूंस का छप्पर आपका है
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 26 March 2012
अफ़ीफ़ अहसन
हालांकि मानवाधिकार हनन पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है और उसके खिलाफ बिना भेदभाव आवाज़ उठाए जाने की जरूरत है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय फोरमों में जिस तरह मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर इसे पकड़ो उसे जाने दो का बोलबाला है वह चिंता का विषय है.
यह भी जग जाहिर है कि मानवाधिकार की पुरजोर वकालत करने वालों का अपना स्वयं का रिकॉर्ड इस मामले में कोई बहुत अच्छा नहीं है. चाहे वियतनाम युद्ध हो, तालाबानी आतंकवादियों के खिलाफ अमेरिका और नाटो की वार ऑन टेरर सद्दाम हुसैन के खिलाफ तथाकथित 'वेपन ऑफ मास डेसटरकशन को नष्ट करने के लिए युद्ध. हर जगह अमेरिका ने मानवाधिकार का हनन किया है. वियतनाम में तो उसका रिकॉर्ड इतिहास की किताबों की ज़ीनत बन चुका है. लेकिन इराक और अफगानिस्तान के घाव तो अभी ताजा हैं. इराक में कैदियों पर अमानवीय अत्याचार, खुलेआम हत्या और मार काट से प्रत्येक जागरूक व्यक्ति की आत्मा कांप जाएगी.
अफगानिस्तान और पाकिस्तान में अमेरिका के ड्रोन हमले आम सी बात हो गए हैं. इन हमलों में आतंकवादियों से ज्यादा मासूम नागरिक मारे गए हैं. जिनमें मासूम बच्चे और औरतें भी शामिल हैं. मानवाधिकार तो यह है कि चाहे हजारों गुनाहगार छूट जाएं लेकिन एक मासूम को सज़ा नहीं होनी चाहिए. जबकि अमेरिका की यह नीति है कि एक गुनहगार को मारने के लिए चाहे हजारों बेगुनाहों की जान चली जाए एक गुनाहगार नहीं बचना चाहिए.
हाल ही में अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों द्वारा मारे गए आतंकवादियों की लाशों पर पेशाब करने की घटना सामने आयी था. कुरान जलाए जाने की घटना हुइ. इसके बाद सैनिक द्वारा अंधाधुंध मासूम नागरिकों की गोलीबारी करके नरसंहार करने की घटना हुई. लेकिन फिर भी इन घटनाओं से किसी भी तरह का मानवाधिकार हनन नहीं हुआ.
श्रीलंका का गृहयुद्ध बहुमत सिन्हाली और अल्पसंख्यक तमिलों के बीच लगभग 25 साल तक चला। इस गृहयुद्ध में दोनों ओर बड़ी संख्या में लोग मारे गए. लिट्टों द्वारा अपनाई गई युद्ध नीतियों की वजह से 32 देशों ने इसे आतंकवादीयों की श्रेणी में रखा जिनमें हिंदुस्तान, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, यूरोपीय संघ के कई सदस्य देशों और अन्य कई देश शामिल थे. एक चौथाई सदी तक चले इस जातीय संघर्श में सरकारी आँकड़ों के अनुसार ही लगभग 80,000 लोग मारे गए जबकि सही संख्या इस से कहीं अधिक है.
हिंदुस्तान ने कई कारणों से श्रीलंका के संघर्ष में हस्तक्षेप किया. इनमें क्षेत्रीय शक्ति के रूप में खुद को उजागर करना और तमिलनाडु में स्वतंत्रता की मांग को दबाना शामिल था. क्योंकि तमिल नाडू के लोग सांस्कृतिक कारणों से श्रीलंका के तमिलों के हितों के पक्ष में रहे हैं, इसलिए हिंदुस्तान सरकार को भी संघर्ष के दौरान श्रीलंका के तमिलों की सहायता के लिए आगे आना पड़ा. 80 के दशक के शुरू में हिंदुस्तान संस्थानों ने कई तरह से तमिलों की मदद की.
5 जून, 1987 को जब श्रीलंका सरकार ने दावा किया कि वह जाफना पर कबज़े के करीब है, तभी हिंदुस्तान ने पेराशूट द्वारा जाफना में राहत सामग्री गिरायी. हिंदुस्तान की इस सहायता को लिट्टे की सीधे मदद भी माना गया. इस के बाद 29 जुलाई, 1987 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और तत्कालीन श्रीलंका के राष्ट्रपति जयवर्धने के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए. इस समझौते के तहत श्रीलंका में तमिल भाषा को सरकारी दर्जा दिया गया. साथ ही, तमिलों की कई अन्य मांग मान ली गयीं. वहीं, हिंदुस्तान शांति रक्षक बलों के सामने विद्रोहियों को हथियार डालना पड़ा.
अधिकांश विद्रोही गुटों ने हिंदुस्तान शांति रक्षक बलों के सामने हथियार डाल दिए थे, लेकिन लिट्टे इसके लिए तैयार नहीं हुआ. हिंदुस्तान शांति रक्षक सेना ने विद्रोहियों को तोड़ने की पूरी कोशिश की. तीन साल तक दोनों के बीच युद्ध चला. इस दौरान हिंदुस्तान शांति रक्षक बलों पर मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप भी लगा. उधर, सिनहालियों ने भी अपने देश में हिंदुस्तान सैनिकों की मौजूदगी का विरोध करना शुरू कर दिया. इसके बाद श्रीलंका सरकार ने हिंदुस्तान से शांति रक्षक बलों को वापस बुलाने की मांग की, लेकिन राजीव गांधी ने इससे इनकार कर दिया. 1989 के लोकसभा चुनाव में राजीव गांधी की हार के बाद नए प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने श्रीलंका से शांति रक्षक बलों को हटाने का आदेश दिया. इन तीन वर्षों में श्रीलंका में ग्यारह सौ हिंदुस्तान सैनिक मारे गए, वहीं पांच हजार लिट्टे भी मारे गए.
1991 में एक आत्मघाती हमलावर लिट्टे ने राजीव गांधी को शहीद कर दिया. इसके बाद हिंदुस्तान ने श्रीलंका के तमिलों की मदद बंद कर दी.
2008 में जब श्रीलंका की सेना ने विद्रोहियों के ठिकानों पर हमलह करना शुरू किया तो यूपीए सरकार हिल गई. तमिलनाडु के राजनीतिक दलों ने केंद्र सरकार से श्रीलंका के मामले में हस्तक्षेप की मांग की. ऐसा नहीं करने पर डीएमके ने हिमायत वापस लेने की धमकी दे डाली. दबाव बनाने के लिए करुणानिधि ने अपने सांसदों से इस्तीफा ले लिया. तमिलों के मुद्दे पर तमिलनाडू के सभी राजनीतिक दल तुरंत संघर्ष विराम की मांग पर एक साथ आ गये. भारी दबाव के बीच विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी श्रीलंका गए. श्रीलंका के राष्ट्रपति ने उन्हें तमिलों की सुरक्षा का भरोसा दिलाया. युद्ध में फंसे नागरिकों को बाहर निकालने के लिए श्रीलंका ने एकतरफा संघर्ष विराम की घोषणा की. लेकिन अब तक काफी मासूम अपनी जान से हाथ धो बैठे थे. खासकर युद्ध के अंतिम चरण में हजारों मारे गए. अगर यही काम समय रहते कर लिया गया होता तो सैंकड़ों निर्दोष लोगों की जान बच जाती.
इस घटना के लगभग चार साल बीतने के बाद मानवाधिकार के सबसे बड़े ठेकेदार अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) में श्रीलंका के खिलाफ एक प्रस्ताव पेश किया. प्रस्ताव श्रीलंका से तमिल टाईगरस के खिलाफ युद्ध के अंतिम चरण में हुए कथित मानवाधिकार उल्लंघन की जांच कराने का अनुरोध किया गया था. प्रस्ताव में कोलंबो से अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के कथित उल्लंघन से निपटने की घोषणा की गई. प्रस्ताव में कहा गया है कि श्रीलंका सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय नियमों के 'गंभीर उल्लंघन' के मामले को सही तरीके से नहीं निपटा.
पहले पहल तो हिंदुस्तान ने अपने क्षेत्रीय हितों और महत्व को ध्यान में रखते हुए इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट देने का मन बनाया था. हिंदुस्तान ने किसी देश के खिलाफ लाये गये प्रस्ताव के पक्ष में वोट देने को लेकर नापसंदीदगी जताई थी, लेकिन यूपीए गठबंधन के सहयोगी डीएमके और तमिलनाडु के कई अन्य राजनीतिक दलों के दबाव के आगे सरकार को अपना रुख बदलना पड़ा. डीएमके ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार से अपने मंत्रियों को हटाने तक की धमकी दे दी थी. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के कुल 47 सदस्यों में हिंदुस्तान सहित 24 देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया, जबकि 15 देशों ने इसके खिलाफ वोट दिया. आठ देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया.
अमेरिका इस क्षेत्र के देशों के आंतरिक मामलों में धीरे धीरे अपना दखल अमल बढ़ा रहा है. दिन बदिन उसका हस्तक्षेप बढ़ती ही जा रही है और वह दिन दूर नहीं जब हिंदुस्तान के चारों ओर के देशों को कवर करने के बाद हिंदुस्तान के साथ भी इसी प्रकार की हरकत करे. अगर हिंदुस्तान इसी तरह झुकता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब कोई भी देश हिंदुस्तान के साथ खड़ा नज़र नहीं आएगा.
अमेरिका और यूरोपीय देशों की नज़र में हिंदुस्तान का मानवाधिकार का रिकॉर्ड कोई बहुत अच्छा नहीं है. कश्मीर, नॉर्थ ईस्ट, माओवादी और अन्य आतंकवादियों को लेकर हिंदुस्तान के खिलाफ वहां आवाज उठती रहती हैं. जिन को गुलाम नबी फ़ाइ जैसे आईएसआई के पैसे से काम करने वाले लोबीइसट भड़काते रहते हैं और कभी भी हिंदुस्तान को भी इसी तरह से घेराव किया जा सकता है जैसे कि श्रीलंका का किया गया है.
इस अवसर पर नवाज़ देवबन्दी का एक प्रसिद्ध और पुरानी चार पंक्तीयां बिल्कुल उपयुक्त लगती हैं. यह
पंक्तीयां नवाज़ साहब ने शनिवार को डीसीएम के प्रसिद्ध 48वें शंकर-शाद मुशायरे में यह कहते हुए पढ़ा था कि यह
पंक्तीयां कुछ दिनों के बाद फिर ताजा हो जाता है क्योंकि कोई ना कोई नई घटना उत्पन्न होती रहती है.
जलते घर को देखने वालो, फूस का छप्पर आपका है।
आग के पीछे तेज़ हवा है, आगे मुक़द्दर आपका है।।
उसके क़तल पे मैं चुप था, मेरा नंबर अब आया।
मेरे कतल पे आप भी चुप हैं, अगला नम्बर आपका है।।
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جلتے گھر کو دیکھنے والو، پھونس کا چھپر آپ کا ہے
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| Daily Pratap, Indias Oldest Urdu Daily |
Published on 26 March 2012
عفیف احسن
حالانکہ انسانی حقوق کی پامالی پوری دنیا کے لئے تشویش کا باعث ہے اور اس کے خلاف بلا تفریق آواز اٹھائے جانے کی ضرورت ہے۔ لیکن بین الاقوامی فورموں میں جس طرح حقوق انسانی کی پامالی کو لیکر اس کو پکڑو اُس کو جانے دو کا بول بالا ہے وہ یقیناً فکر کی بات ہے۔
یہ بات بھی جگ ظاہر ہے کہ حقوق انسانی کی پرزور وکالت کرنے والوں کا اپنا خود کا ریکارڈ اس سلسلے میں کوئی بہت اچھا نہیں ہے۔ چاہے ویت نام کی جنگ ہو، طالبانی دہشت گردوں کے خلاف امریکہ اور ناٹو کی ’وار آن ٹیرر‘ ، صدام حسین کے خلاف نام نہاد ’’ویپن آف ماس ڈیسٹرکشن‘‘ کو تباہ کرنے کے لئے جنگ۔ ہر جگہ امریکہ نے حقوق انسانی کو پامال کیا ہے۔ ویت نام میں تو اس کا ریکارڈ تاریخ کی کتابوں کی زینت بن چکاہے۔ مگرعراق اور افغانستان کے زخم تو ابھی تازہ ہیں۔ عراق میں قیدیوں پرانسانیت سوزمظالم، کھلےعام قتل اورغارت گردی سے ہر ایک باشعورانسان کی روح کانپ جائے گی۔
افغانستان اور پاکستان میں امریکہ کے ڈرون حملے ایک عام سی بات ہوگئے ہیں۔ ان حملوں میں دہشت گردوں سے زیادہ معصوم شہری ہلاک ہوئے ہیں۔ جن میں معصوم بچے اور عورتیں بھی شامل ہیں۔ حقوق انسانی کا تقاضہ تو یہ ہے کہ چاہے ہزاروں گناہ گار چھوٹ جائیں لیکن ایک معصوم کو سزا نہیں ہونی چاہئے۔ جبکہ امریکہ کی یہ پالیسی ہے کہ ایک گناہگار کو مارنے کے لئے چاہے ہزاروں بیگناہوں کی جان چلی جائے ایک گناہ گار نہیں بچنا چاہے۔
ابھی حال ہی میں افغانستان میں امریکی فوجیوں کے ذریعہ مارے گئے دہشت گردوں کی لاشوں پر پیشاب کرنے کا واقعہ منظر عام پرآیا تھا۔ قرآن جلائے جانے کا واقعہ رونما ہوا۔ اس کے بعد امریکی فوجی کے ذریعہ اندھا دھند معصوم شہریوں کی گولی باری کرکے قتل عام کرنے کا واقعہ پیش آیا ۔ لیکن پھر بھی ان واقعات سے کسی بھی طرح کی حقوق انسانی کی پامالی سرزد نہیں ہوئی۔
سری لنکا کی خانہ جنگی اکثریت سنہالا اور اقلیتی تملوں کے درمیان تقریبا 25 سال تک چلی اس خانہ جنگی میں دونوں جانب سے بڑی تعداد میں لوگ ہلاک ہو ئے۔ لٹوں کی جانب سے اپنائی گئی جنگی پالیسیوں کی وجہ سے 32 ممالک نے اسے دہشت گرد وں کے زمرے میں رکھا جن میں بھارت، آسٹریلیا، کینیڈا، یوروپی یونین کے بہت سے ممبر ممالک اور دیگر کئی ملک شامل ہیں۔ ایک چوتھائی صدی تک چلے اس نسلی تسادم میں سرکاری اعدادوشمار کے مطابق ہی تقریبا 80,000 افراد ہلاک ہوئے جبکہ سہی تعداد س سے کہیں زیادہ ہے۔
ہندوستان نے کئی وجوہات کی بنا پر سری لنکا کی جدوجہد میں مداخلت کی۔ ان میں علاقائی طاقت کے طور پر خود کو ظاہر کرنا اور تامل ناڈو میں آزادی کے مطالبہ کو دبانا شامل تھا۔ چونکہ تامل ناڈ وکے لوگ ثقافتی وجوہات کی بنا پر سری لنکا کے تملوں کے مفادات کے حق میں رہے ہیں، اس لئے حکومت ہند کو بھی جدوجہد کے دوران سری لنکا کے تملوں کی مدد کے لئے آگے آنا پڑا۔ 80 کی دہائی کے شروع میں ہندوستانی اداروں نے کئی طرح سے تملوں کی مدد کی۔
5 جون، 1987 کو جب سری لنکا کی حکومت نے دعوی کیا کہ وہ جافنا پرقبضہ کرنے کے قریب ہے، تبھی ہندوستان نے پیراشوٹ کے ذریعے جافنا میں راحتی سازو سامان گرایا۔ ہندوستان کی اس مدد کو لٹّے کی براہ راست مدد بھی مانا گیا۔ اس کے بعد 29 جولائی، 1987 کو اس وقت کے وزیر اعظم راجیو گاندھی اوراس وقت کے سری لنکا کے صدر جے وردھنے کے درمیان ایک معاہدے پر دستخط ہوئے۔ اس معاہدے کے تحت سری لنکا میں تمل زبان کو سرکاری درجہ دیا گیا۔ ساتھ ہی، تملوں کے کئی دیگر مطالبات مان لئے گئے۔ وہیں، بھارتی امن محافظ دستوں کے سامنے باغیوں کو ہتھیارڈالنا پڑا۔
زیادہ تر باغی گروہوں نے ہندوستانی امن محافظ دستوں کے سامنے ہتھیار ڈال دیئے تھے، لیکن لٹّے اس کے لئے تیار نہیں ہوا۔ بھارتی امن محافظ فوج نے باغیوں کو توڑنے کی پوری کوشش کی۔ تین سال تک دونوں کے درمیان جنگ چلی۔ اس دوران ہندوستانی امن محافظ دستوں پر انسانی حقوق کی خلاف ورزی کے الزام بھی لگے۔ ادھر، سنہالیوں نے بھی اپنے ملک میں ہندوستانی فوجیوں کی موجودگی کی مخالفت کرنا شروع کردی۔ اس کے بعد سری لنکا کی حکومت نے بھارت سے امن محافظ دستوں کو واپس بلانے کا مطالبہ کیا، لیکن راجیو گاندھی نے اس سے انکار کر دیا۔ 1989 کے پارلیمانی انتخابات میں راجیو گاندھی کی شکست کے بعد نئے وزیر اعظم وی پی سنگھ نے سری لنکا سے امن محافظ دستوں کو ہٹانے کا حکم دیا۔ ان تین برسوں میں سری لنکا میں گیارہ سو بھارتی فوجی ہلاک ہوئے، وہیں پانچ ہزار لٹّے بھی مارے گئے۔
1991 میں ایک خودکش حملہ آور لٹّے نے راجیو گاندھی کوشہید کردیا۔ اس کے بعد بھارت نے سری لنکا کے تملوں کی مدد بند کر دی۔
2008 میں جب سری لنکا کی فوج نے باغیوں کے ٹھکانوں پرحملہ کرنا شروع کیا تو ہندوستان کی یوپی اے حکومت ہل گئی۔ تامل ناڈو کے سیاسی جماعتوں نے مرکزی حکومت سے سری لنکا کے معاملے میں مداخلت کا مطالبہ کیا۔ ایسا نہیں کرنے پر ڈی ایم کے نے ہمایت واپس لینے کی بھی دھمکی دے ڈالی۔ دبائو بنانے کے لئے کرونا ندھی نے اپنے ممبران پارلیمنٹ سے استعفی تک لے لیا۔ تملوں کے مسئلے پر تامل ناڈ کی تمام سیاسی پارٹیاں فوری جنگ بندی کی مانگ پر ایک ساتھ آگئیں۔ بھاری دباؤ کے بیچ وزیر خارجہ پرنب مکھرجی سری لنکا گئے۔ سری لنکا کے صدر نے انہیں تملوں کی حفاظت کا بھروسہ دلایا۔ جنگ میں پھنسے عام شہریوں کو باہر نکا لنے کے لئے سری لنکا نے یک طرفہ جنگ بندی کا اعلان کیا۔ مگر اب تک کافی معصوم اپنی جان سے ہاتھ دھو بیٹھے تھے۔ خاص کر جنگ کے آخری مرحلے میں ہزاروں شہری ہلاک ہوئے۔ اگر یہی کام وقت رہتے کرلیا گیاہوتا تو سینکڑوں بے گناہ لوگوں کے جان بچ جاتی۔
اس سانحہ کے تقریباً چار سال گزرنے کے بعد انسانی حقوق کے سب سے بڑے ٹھیکیدار امریکہ نے اقوام متحدہ انسانی حقوق کونسل (یو این ایچ آر سی ) میں سری لنکا کے خلاف ایک تجویز پیش کی۔ تجویز میں سری لنکا سے تامل ٹائیگرس کے خلاف جنگ کے آخری مرحلے میں ہوئے مبینہ حقوق انسانی کی پامالی کی تحقیقات کرانے کی درخواست کی گئی تھی۔ تجویز میں کولمبو سے بین الاقوامی انسانی حقوق کے قانون کے مبینہ خلاف ورزی سے نمٹنے کا اعلان کیا گیا تھا۔ تجویز میں کہا گیا ہے کہ سری لنکا کی حکومت نے بین الاقوامی قوانین کے ’’سنگین خلاف ورزی‘‘ کے معاملے کو صحیح طریقے سے نہیں نپٹا۔
پہلے پہل تو ہندوستان نے اپنی علاقائی مفادات اور اہمیت کو دھیان میں رکھتے ہوئے اس تجویز کے خلاف ووٹ دینے کا من بنایا تھا۔ ہندوستان نے کسی مخصوص ملک کے خلاف لائی گئی تجویز کے حق میں ووٹ دینے کو لے کرناپسندیدگی ظاہر کی تھی، لیکن یو پی اے کے اتحادی ڈی ایم کے اور تامل ناڈو کے کئی دیگر سیاسی جماعتوں کے دباؤ کے آگے حکومت کو اپنا رخ تبدیل کرنا پڑا۔ ڈی ایم کے نے اس مسئلے پر مرکزی حکومت سے اپنے وزراء کو ہٹانے تک کی دھمکی دے دی تھی۔ اقوام متحدہ انسانی حقوق کونسل کے کل 47 ارکان میں بھارت سمیت 24 ممالک نے تجویز کے حق میں ووٹ دیا، جبکہ 15 ممالک نے اس کے خلاف ووٹ دیا۔ آٹھ ممالک نے ووٹنگ میں حصہ نہیں لیا۔
امریکہ اس خطہ کے ممالک کے اندرونی معاملات میں دھیرے دھیرے اپنا دخل عمل بڑھا رہا ہے۔ روز بروزاس کی دخل اندازی بڑھتی ہی جارہی ہے اور وہ دن دور نہیں جب وہ ہندوستان کے چاروں طرف کے ممالک کا احاطہ کرنے کے بعد ہندوستان کے خلاف بھی اسی قسم کی حرکت کرے۔ اگر ہندوستان اسی طرح جھکتا رہا تو وہ دن دور نہیں جب کوئی بھی ملک ہندوستان کے ساتھ کھڑا نظر نہیں آئیگا۔
امریکہ اور یوروپی ممالک کی نظر میں ہندوستان کا حقوق انسانی کا ریکارڈ کوئی بہت اچھا نہیں ہے۔ کشمیر، نارتھ ایسٹ، ماؤ وادی اور دوسرے دہشت گردوں کو لیکر ہندوستان کے خلاف وہاں آوازیں اٹھتی رہتی ہیں۔ جن کوغلام نبی فائی جیسے آئی ایس آئی کے پیسے سے کام کرنے والے لوبیئسٹ بھڑکاتے رہتے ہیں اور کبھی بھی ہندوستان کا بھی اسی طرح سے احاطہ کیا جاسکتا ہے جیسا کہ سری لنکا کا کیا گیا۔
اس موقعہ پر نواز دیوبندی کا ایک مشہور اور پرانا شعر بالکل موزوں لگتا ہے۔ یہ شعر نواز صاحب نے سنیچر کو ڈی سی ایم کے مشہور 48 ویں شنکر وشاد مشاعرہ میں یہ کہتے ہوئے پڑھا تھا کہ یہ شعر کچھ دنوں کے بعد پھر تازہ ہوجاتا ہے کیونکہ کوئی نا کوئی نیا واقعہ رونما ہوتا رہتا ہے۔
جلتے گھر کو دیکھنے والو، پھونس کا چھپر آپ کا ہے
آگ کے پیچھے تیز ہوا ہے، آگے مقدر آپ کا ہے
اُس کے قتل پہ میں چپ تھا،میرا نمبر اب آیا
میرے قتل پہ آپ بھی چپ ہیں، اگلا نمبر آپ کا ہے۔
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Monday, 12 March 2012
जो सोनिया नहीं कर सकीं मुलायम ने कर दिखाया
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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 12 March 2012
अफ़ीफ़ अहसन
कांग्रेस
को 2004 में सरकार बनाने का मौका मिला. पार्टी ने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री के
लिए चुना. लेकिन तब भाजपा सहित कई विपक्षी पार्टियों ने उनके विदेशी मूल के कारण
उनके प्रधानमंत्री जैसे पद पर नियुक्त होने का विरोध किया. तब भी मौका था कि वह
राहुल गांधी को अपनी जगह प्रधानमंत्री बनाने की घोषणा कर देतीं. मगर वह उस समय चूक
गईं और उन्होंने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के लिए चुना.
अगला
मौका 2009 में तब आया जब यूपीए को 262 सीटें मिलीं जिसमें से कांग्रेस को अकेले ही
206 सीटें मिली थीं. इस जीत का श्रेय तो पूरी तरह से कांग्रेस की नई पीढ़ी को जाता
था जिस का नेतृत्व राहुल गांधी कर रहे थे. आम राय यही थी कि राहुल गांधी को
प्रधानमंत्री बनाया जाएगा लेकिन तब भी सोनिया गांधी राहुल गांधी के पक्ष में फैसला
नहीं कर सकीं. और इस तरह एक बार फिर देश का नेतृत्व कमजोर और बोसीदा हाथों में
सौंपना ही बेहतर समझा और युवाओं की इच्छाओं का कोई सम्मान नहीं किया गया.
प्रधानमंत्री ही नहीं दूसरे मंत्री भी बुजुर्ग ही बनाए गए. और युवाओं को देश के
शासन में उनका जायज़ अधिकार नहीं दिया गया. और इस देश का युवा अपने को ठगा सा
महसूस करने लगा.
लेकिन
इसे मुलायम सिंह जैसे रूढ़ीवादी और पुराने नेता की दूरदृष्टि कहिए या राजनीतिक
दूरदर्शीता कि उन्होंने युवाओं की भावनाओं की कदर करते हुए अखिलेश यादव के उत्तर
प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बनने की राह प्रशस्त की और उनकी पूरी पार्टी ने इसमें
उनका साथ भी दिया.
समाजवादी
पार्टी के विधायकों ने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और विधानसभा चुनाव में पार्टी की
जीत के हीरो रहे 38 वर्षीय अखिलेश यादव को अपना नया नेता चुन राज्य के मुख्यमंत्री
के रूप में उनके नाम पर मुहर लगा दी.
हालांकि
शुरूआत में आजम खान और शिवपाल यादव अखिलेश के मुख्यमंत्री बनाए जाने के खिलाफ थे.
इसलिए आजम खान पार्लैमेंटरी पार्टी की बैठक में नहीं आए और जो हेलीकॉप्टर को लेने
के लिए गया था खाली वापस आ गया. बाद में शुक्रवार को वह लखनऊ पहुंचे और सीधे अपने
घर दारउलशिफा चले गए और मुलायम और अखिलेश नहीं मिले. शाम को मुलायम और
प्रधानमंत्री के बीच लगभग 45 मिनट तक बातचीत हुई. मुलायम ने उन्हें समझा बुझाकर
मना लिया और इस बात के लिए राजी कर लिया की वह खुद ही अखिलेश के नाम की सिफारिश
करें. बहरहाल शनिवार को पार्टी मुख्यालय में पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव की
मौजूदगी में हुई विधायक की बैठक में इस पर मुहर लगा दी गई, विधायकों को
संबोधित करने के बाद आज़म खान ने अखिलेश की राजनीतिक क्षमताओं पर भरोसा जताते हुए
विधानसभा पार्टी के नेता और राज्य के अगले मुख्यमंत्री के रूप में उनके नाम का
प्रस्ताव पेश किया, जिसमें पार्टी के वरिष्ठ नेता शिवपाल सिंह यादव ने
समर्थन किया और उसी के साथ बैठक में सभी विधायकों ने सबसे युवा मुख्यमंत्री बनाने
के लिए अखिलेश यादव को चुन लिया. बाद में अखिलेश यादव ने पार्टी महासचिव आजम खान
और वरिष्ठ नेता शिवपाल सिंह यादव के साथ राज्यपाल निवास जाकर राज्यपाल को नेता
चुने जाने की औपचारिक सूचना दी.
अखिलेश
का जन्म 1 जुलाई, 1973 को इटावा में हुआ था. बचपन में उनकी मां का
निधन हो गया और उनकी परवरिश उनकी दादी ने की. अनुशासन के बाध्य पिता मुलायम ने
उन्हें प्राथमिक शिक्षा के लिए राजस्थान के धोलपुर सैनिक स्कूल भेजा। मैसूर में
1990 में अखिलेश ने कर्नाटक कामन इंजीनियरिंग एनट्रेंस टेस्ट में सिविल
इंजीनियरिंग की परीक्षा में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया और मेरिट सूची में जगह
बनाई. जहां पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय से पर्यावरण
प्रौद्योगिकी में स्नातक किया और ऑस्ट्रेलिया के सिडनी विश्वविद्यालय से पीजी की
डिग्री हासिल की. 2000 में उन्होंने पहली बार कन्नोज लोकसभा सीट से उपचुनाव जीतकर
सक्रिय राजनीति में कदम रखा.
नातजुरबेकार
अखिलेश यादव प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री बनकर इतिहास रचने जा रहे हैं. लेकिन
जहां एक ओर उन का नोजवान होना उनका सबसे मजबूत प्वाइंट माना जा रहा है, वहीं
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि देश के सबसे बड़े प्रांत के सबसे कम उम्र के
मुख्यमंत्री के रूप में लोगों की उम्मीदें पूरी करना बेहद मुश्किल है. समाजवादी
पार्टी के 20 वर्षों के इतिहास में यह पहला मौका है, जब पार्टी को
अपने बूते पर बहुमत मिला है. ऐसे में अखिलेश से लोगों की उम्मीदें भी बहुत हैं.
अखिलेश आज तक किसी पद पर नहीं रहे हैं. वह समाजवादी पार्टी के सांसद और प्रदेश
अध्यक्ष के रूप में काम करते रहे हैं. उनके पास किसी तरह का प्रशासनिक अनुभव नहीं
है. ऐसे में बिल्कुल न के बराबर अनुभव रखने वाले अखिलेश के लिए जनता की उम्मीदों
का बोझ उठाना आसान नहीं होगा. समाजवादी पार्टी के संभावित मंत्रिमंडल में कुछ ही मंत्री
होंगे जो अखिलेश यादव से कम आयु के होंगे. सरकार के अधिकांश मंत्री उनसे ऊपर और
राजनीति का लंबा अनुभव रखने वाले होंगे. ऐसे में सबके साथ तालमेल बिठाकर चलना और
सरकार चलाना अपने आप में बड़ी चुनौती होगी.
शिक्षा
पूरी होने के बाद अखिलेश ने डिंपल सिंह से शादी का फैसला किया. डिंपल एक राजपूत
परिवार से हैं और अखिलेश के पिता मुलायम सिंह को यह रिश्ता मंजूर नहीं था लेकिन
अखिलेश ने पिता की इच्छा के खिलाफ जाकर डिंपल से शादी कर ली. इसके बाद 2009 में
डिंपल ने लोकसभा चुनाव भी लड़ा और राज बब्बर से हार गईं.
अखिलेश
की तरह ही राहुल गांधी ने भी अपनी पार्टी के चुनाव अभियान की कमान संभाली थी.
दोनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि बसपा सरकार के दौरान राज्य में उनकी
पार्टियों का बेस नष्ट हो चुका था. कांग्रेस उत्तर प्रदेश की सत्ता से 22 साल से
बाहर थी. अखिलेश की तरह ही राहुल गांधी ने भी अपनी पार्टी के चुनाव प्रचार में
बेहद मेहनत की. उन्होंने 200 से अधिक बैठकें कीं. जगह जगह गए और जलसे किए, लेकिन
जब परिणाम आए तो समाजवादी पार्टी को सत्ता मिली जबकि कांग्रेस को तसल्ली तक नहीं
मिल सकी.
राहुल
के सामने सबसे बड़ी दिक्कत यह आई कि राज्य की जनता के लिए राहुल वह चेहरा नहीं बन
सके जिसकी चाह जनता को थी. अगर राहुल गांधी को शुरू से ही मुख्यमंत्री पद का
दावेदार बताया गया होता तो छवी शायद थोड़ी अलग हो सकती थी. वहीं अखिलेश की स्थानीय
छवी और पहचान ने बेहद फायदा पहुंचाया. अखिलेश की रैलियों और सभाओं में अधिकांश
युवा शामिल हो रहे थे. सितंबर 2011 में साइकिल और उसके बाद रथ यात्रा शुरू करने के
बाद से ही राज्य भर के युवाओं के लिए 'भैया' बन गए थे. एक वकता के रूप में अखिलेश भले ही कड़े
शब्द न बोल सकते हों लेकिन अपने व्यवहार से लोगों का दिल जीत गए. उत्तर प्रदेश में
समाजवादी पार्टी की जीत का एक बड़ा कारण युवा मतदाता वर्ग का पार्टी के साथ जुड़ना
भी है. राहुल गांधी प्रदेश में यही नहीं कर पाए.
अखिलेश
ने फ्री में लैपटॉप और टॅबलेट के साथ मोडम और बिजली देने का वादा किया. उत्तर
प्रदेश में इस बार 1.49 करोड़ युवा मतदाता जुड़े थे. अखिलेश अपने वादों और व्यवहार
से नए मतदाता वर्ग के एक बड़े हिस्से को अपने साथ जोड़ने में सफल रहे.
डीपी
यादव को बाहर करने के फैसले के बाद राज्य की जनता को लगा कि माया राज के
भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए अखिलेश ही सबसे बेहतर विकल्प हैं.
अखिलेश की तुलना राहुल के सामने एक चुनौती यह भी थी कि कांग्रेस का कोई मतदाता वर्ग नहीं है. पिछले विधानसभा चुनाव में सपा को 25 प्रतिशत वोट मिले थे. पार्टी चुनाव हारी जरूर थी लेकिन फिर भी वोटों में उसकी एक मजबूत हिस्सेदारी थी. यह समाजवादी पार्टी का ठोस मतदाता बेस था जिसे इस बार अखिलेश ने और मजबूत किया. समाजवादी पार्टी के पास ठोस मुस्लिम और यादव मतदाता थे लेकिन राहुल की झोली में ऐसा कोई भी समाज नहीं था जो पूरी तरह पार्टी का वोट बैंक हो. 2007 में मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग कर समाज के हर वर्ग को पार्टी से जोड़ा था और सत्ता में आई थी, राहुल को भी इस बार राज्य में यही करना था लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाए. न ही ब्राह्मण मतदाता पार्टी से जुड़ा, आरक्षण के वादों के बावजूद न ही मुसलमान पार्टी से ठोस रूप में जुड़ा और न ही दलित या ओबीसी.
अखिलेश की तुलना राहुल के सामने एक चुनौती यह भी थी कि कांग्रेस का कोई मतदाता वर्ग नहीं है. पिछले विधानसभा चुनाव में सपा को 25 प्रतिशत वोट मिले थे. पार्टी चुनाव हारी जरूर थी लेकिन फिर भी वोटों में उसकी एक मजबूत हिस्सेदारी थी. यह समाजवादी पार्टी का ठोस मतदाता बेस था जिसे इस बार अखिलेश ने और मजबूत किया. समाजवादी पार्टी के पास ठोस मुस्लिम और यादव मतदाता थे लेकिन राहुल की झोली में ऐसा कोई भी समाज नहीं था जो पूरी तरह पार्टी का वोट बैंक हो. 2007 में मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग कर समाज के हर वर्ग को पार्टी से जोड़ा था और सत्ता में आई थी, राहुल को भी इस बार राज्य में यही करना था लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाए. न ही ब्राह्मण मतदाता पार्टी से जुड़ा, आरक्षण के वादों के बावजूद न ही मुसलमान पार्टी से ठोस रूप में जुड़ा और न ही दलित या ओबीसी.
राहुल
की राह में कांग्रेस के कुछ बड़बोले नेताओं ने भी हानी पहुंचायी. कभी बटला हाउस, कभी
राष्ट्रपति शासन तो कभी मुस्लिम आरक्षण को लेकर ऐसे बयान दिए गए जिससे एक विशेष
मतदाता वर्ग पार्टी से अलग हुआ. जनता प्रदेश सरकार चुनने के लिए वोट करने जा रही
थी और शासन के लिए राहुल या कांग्रेस उत्तर प्रदेश की जनता को पूर्ण बहुमत का
भरोसा नहीं दिला सके. ऐसे में उन्होंने यही बेहतर समझा कि वह समाजवादी का साथ दें.
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جو کام سونیا نہیں کرپائیں ملائم نے کردکھایا
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Published on 12 March 2012
عفیف احسن
کانگریس کو 2004میں حکومت سازی کا موقعہ ملا۔ پارٹی نے سونیا گاندھی کو وزیراعظم کے لئے چنا۔ مگر تب بی جے پی سمیت کئی اپوزیشن پارٹیوں نے ان کے غیر ملکی نژاد ہونے کے سبب ان کے وزیر اعظم جیسے عہدے پر فائز ہونے کی مخالفت کی۔تب بھی موقعہ تھا کہ وہ راہل گاندھی کو اپنی جگہ وزیر اعظم بنانے کا اعلان کردیتیں۔ مگر وہ اس وقت چوک گئیں اور انہوں نے منموہن سنگھ کو وزیر اعظم کے لئے منتخب کیا۔
دوسرا موقعہ 2009میں تب آیا جب یوپی اے کو 262سیٹیں ملیں جس میں سے کانگریس کو اکیلے ہی 206سیٹیں حاصل ہوئی تھیں۔ اس جیت کا سہرا تو پوری طرح سے کانگریس کی نئی نسل کو جاتا تھاجس کی قیادت راہل گاندھی کررہے تھے۔عام رائے یہی تھی کے راہل گاندھی کو وزیر اعظم بنایا جائے گا مگر تب بھی سونیا گاندھی راہل گاندھی کے حق میں فیصلہ نہیں کرسکیں۔اور اس طرح ایک بار پھر دیش کی قیادت کمزور اور بوسیدہ ہاتھوں میں سونپنا ہی بہتر سمجھا اور نوجوانوں کے خواہشات کو کوئی عزت نہیں دی گئی۔ وزیر اعظم ہی نہیں دوسرے وزیر بھی بزرگ ہی بنائے گئے۔ اور نوجوانوں کو دیش کی حکمرانی میں انکاجائز حق نہیں دیا گیا۔اس سے ملک کا نوجوان اپنے کو ٹھگا سا محسوس کرنے لگا۔
مگر اسے ملائم سنگھ جیسے روڑی وادی اورپرانے لیڈر کی دور اندیشی کہئے یا سیاسی بصیرت کہ انہوں نے نوجوانوں کے جذبات کی قدر کرتے ہوئے اکھیلیش یادو کے یوپی کے نئے وزیر اعلیٰ بننے کی راہ ہموار کی اور ان کی پوری پارٹی نے اس میں انکا ساتھ بھی دیا۔
سماج وادی پارٹی کے ممبران اسمبلی نے پارٹی کے ریاستی صدر اور اسمبلی انتخابات میں پارٹی کی جیت کے ہیرو رہے 38 سالہ اکھلیش یادو کو اپنا نیا لیڈر منتخب کر کے ریاست کے وزیر اعلیٰ کے طور پر ان کے نام پر مہر لگا دی۔
حالانکہ شروع شروع میں اعظم خاں اور شیوپال یادو اکھیلیش کے وزیر اعلیٰ بنائے جانے کے خلاف تھے۔ اسی لئے اعظم خاں پارلیامینٹری پارٹی کی میٹنگ میں نہیں آئے اور جو ہیلی کاپٹر ان کو لینے کے لئے گیا تھا خالی واپس آگیا۔ بعد میں جمعہ کے دن وہ لکھنؤ پہنچے اور سیدھے اپنے گھر دارالشفاع چلے گئے اور ملائم اور اکھیلیش سے نہیں ملے۔شام کو ملائم اور اعظم کے درمیان تقریبا 45 منٹ تک بات چیت ہوئی۔ ملائم نے انہیں سمجھا بجھاکر منا لیا اور اس بات کے لئے راضی کرلیاکہ وہ خود ہی اکھیلیش کے نام کی سفارش کریں۔ بہرحال سنیچر کو پارٹی کے صدر دفتر میں پارٹی سربراہ ملائم سنگھ یادو کی موجودگی میں ہوئی ممبر اسمبلی کی میٹنگ میں اس پر مہر لگا دی گئی، اراکین اسمبلی کو خطاب کرنے کے بعداعظم خاں نے اکھلیش کی سیاسی صلاحیتوں پر بھروسہ ظاہر کرتے ہوئے اسمبلی پارٹی کے لیڈر اور ریاست کے اگلے وزیر اعلیٰ کے طور پر ان کے نام کی تجویز پیش کی، جس کی پارٹی کے سینئر لیڈر شوپال سنگھ یادو نے حمایت کی اور اسی کے ساتھ اجلاس میں موجود تمام اراکین اسمبلی نے اتفاق رائے سے ریاست کا سب سے نوجوان وزیر اعلی بنانے کے لئے اکھلیش یادو کو منتخب کرلیا۔بعد میں اکھلیش یادو نے پارٹی کے سیکریٹری جنرل اعظم خان اور سینئر لیڈر شوپال سنگھ یادو کے ساتھ گورنر ہاؤس جا کر گورنر کو اپنے رہنما منتخب کئے جانے کی باضابطہ اطلاع دی۔
اکھلیش کی پیدائش 1 جولائی، 1973 کو اٹاوا میں ہوئی تھی۔بچپن میں ان کی والدہ کا انتقال ہو گیا اور ان کی پرورش ان کی دادی نے کی۔ ڈسپلن کے پابند والد ملائم نے انہیں ابتدائی تعلیم کے لیے راجستھان کے دھولپور فوجی اسکول بھیجا، میسور میں 1990 میں اکھلیش نے کرناٹک کامن انجینئرنگ انٹرینس ٹیسٹ میں سول انجینئرنگ کے امتحان میں بہترین کارکردگی کا مظاہرہ کیا اور میرٹ لسٹ میں جگہ بنائی۔ جہاں پڑھائی پوری کرنے کے بعد انہوں نے میسور یونیورسٹی سے ماحولیاتی ٹیکنالوجی میں گریجویشن کیاا ور آسٹریلیا کے سڈنی یونیورسٹی سے پی جی کی ڈگری حاصل کی۔ 2000 میں انہوں نے پہلی بارکنوج لوک سبھا سیٹ سے ضمنی انتخاب جیت کر متحرک سیاست میں قدم رکھا۔
ناتجربہ کار اکھلیش یادو پردیش کے سب سے نوجوان وزیر اعلیٰ بن کر تاریخ رچنے جا رہے ہیں۔ لیکن جہاں ایک طرف ان کانوجوان ہونا ان کا سب سے مضبوط پوائنٹ مانا جا رہا ہے، وہیں ماہرین یہ بھی مانتے ہیں کہ ملک کے سب سے بڑے صوبے کے سب سے کم عمر کے وزیر اعلی کے طور پر لوگوں کی توقعات پوری کرنا بے حد مشکل ہے۔ سماج وادی پارٹی کے 20 سالوں کی تاریخ میں یہ سب سے پہلا موقع ہے، جب پارٹی کو اپنے بل بوتے پر اکثریت حاصل ہوئی ہے۔ ایسے میں اکھلیش سے لوگوں کی امیدیں بھی بہت زیادہ ہیں۔ اکھلیش آج تک کسی عہدے پر نہیں رہے ہیں۔ وہ سماج وادی پارٹی کے ممبر پارلیمنٹ اور ریاستی صدر کے طور پر کام کرتے رہے ہیں۔ ان کے پاس کسی طرح کا انتظامی تجربہ نہیں ہے۔ ایسے میں بالکل نہ ہونے کے برابر تجربہ رکھنے والے اکھلیش کے لئے عوام کی توقعات کا بوجھ اٹھانا آسان نہیں ہوگا۔ سماج وادی پارٹی کی ممکنہ کابینہ میں کچھ ہی وزیر ہوں گے جو اکھلیش یادو سے کم عمر کے ہوں گے۔ کابینہ کے زیادہ تر وزیر ان سے زیادہ عمر کے اور سیاست کا طویل تجربہ رکھنے والے ہوں گے۔ ایسے میں سب کے ساتھ تال میل بٹھاکر چلنا اور حکومت چلانا اپنے آپ میں بڑا چیلنج ہوگا۔
تعلیم مکمل ہونے کے بعد اکھلیش نے ڈمپل سنگھ سے شادی کا فیصلہ کیا۔ ڈمپل ایک راجپوت خاندان سے ہیں اور اکھلیش کے والد ملائم سنگھ کو ان سے یہ رشتہ منظور نہیں تھا مگر اکھلیش نے والد کی مرضی کے خلاف جا کر ڈمپل سے شادی کر لی۔ اس کے بعد 2009 میں ڈمپل نے لوک سبھا انتخاب بھی لڑا اور راج ببر سے ہار گئیں۔
اکھلیش کی طرح ہی راہل گاندھی نے بھی اپنی پارٹی کے انتخابی مہم کی کمان سنبھالی تھی۔ دونوں کے سامنے سب سے بڑا چیلنج یہ تھا کہ بی ایس پی حکومت کے دوران ریاست میں ان کی پارٹیوں کا ڈھانچہ تباہ ہو چکا تھا۔ کانگریس اتر پردیش کی اقتدار سے 22 سال سے باہر تھی۔ اکھلیش کی طرح ہی راہل گاندھی نے بھی اپنی پارٹی کے انتخابی مہم میں بے حد محنت کی۔ انہوں نے 200 سے زیادہ ملاقاتیں کیں۔ جگہ جگہ گئے اور جلسے کئے، لیکن جب نتائج آئے تو سماج وادی پارٹی کو اقتدار ملا جب کہ کانگریس کو تسلی بھی نہیں مل سکی۔
راہل کے سامنے سب سے بڑی دقت یہ آئی کہ ریاست کے عوام کے لئے راہل وہ چہرہ نہیں بن سکے جس کی چاہ عوام کو تھی۔ اگر راہل گاندھی کو شروع سے ہی وزیر اعلیٰ کے عہدے کا دعویدار بتایا گیا ہوتا تو تصویر شاید تھوڑی الگ ہو سکتی تھی۔ وہیں اکھلیش کو ان کی مقامی تصویر اور شناخت نے بے حد فائدہ پہنچایا۔ اکھلیش کی ریلیوں اور جلسوں میں زیادہ تر نوجوان شامل ہو رہے تھے۔ ستمبر 2011 میں سائیکل اور اس کے بعد رتھ یاترا شروع کرنے کے بعد سے ہی وہ ریاست بھر کے نوجوانوں کے لئے ’بھیّا‘ بن گئے تھے۔ ایک مقرر کے طور پر اکھلیش بھلے ہی سخت الفاظ نہ بول سکتے ہوں لیکن اپنے طرز عمل سے وہ لوگوں کا دل جیت گئے۔ اتر پردیش میں سماج وادی پارٹی کی جیت کا ایک بڑا سبب نوجوان ووٹر طبقے کا پارٹی کے ساتھ جڑنا بھی رہا۔ راہل گاندھی پردیش میں یہی نہیں کر پائے۔
اکھلیش نے فری میں لیپ ٹاپ اور ٹیبلیٹ کے ساتھ موڈم اور بجلی دینے کا وعدہ کیا۔ اتر پردیش میں اس بار 1.49 کروڑ نوجوان ووٹر جڑے تھے۔ اکھلیش اپنے وعدوں اور سلوک سے اس نئے ووٹر طبقے کے ایک بڑے حصے کو اپنے ساتھ شامل کرنے میں کامیاب رہے۔
ڈی پی یادو کو باہر کرنے کے فیصلے کے بعد ریاست کے عوام کو لگا کہ مایاراج کی بدعنوانی کو ختم کرنے کے لئے اکھلیش ہی سب سے بہتر متبادل ہیں۔
اکھلیش کے مقابلہ راہل کے سامنے ایک اور چیلنج یہ بھی تھا کہ ریاست میں کانگریس کا کوئی خاص ووٹر طبقہ نہیں ہے۔ گزشتہ اسمبلی انتخابات میں ایس پی کو 25 فیصد ووٹ ملے تھے۔ پارٹی انتخابات ہاری ضرور تھی لیکن پھر بھی ووٹوں میں اس کی اپنی ایک مضبوط حصہ داری تھی۔ یہ سماج وادی پارٹی کا ٹھوس ووٹر بیس تھا جسے اس بار اکھلیش نے اور مضبوط کیا۔ سماج وادی پارٹی کے پاس ٹھوس مسلم اور یادو ووٹر تھے لیکن راہل کی جھولی میں ایسا کوئی بھی فرقہ نہیں تھا جو مکمل طور پر پارٹی کا ووٹ بینک ہو۔ 2007 میں مایاوتی نے سوشل انجینئرنگ کرکے سماج کے ہر طبقہ کو پارٹی سے جوڑا تھا اور اقتدار میں آئی تھی، راہل کو بھی اس بار ریاست میں یہی کرنا تھا لیکن وہ ایسا نہیں کر پائے۔ نہ ہی برہمن ووٹر پارٹی سے منسلک ہوا، ریزرویشن کے وعدوں کے باوجود نہ ہی مسلمان پارٹی سے ٹھوس شکل میں جڑا اور نہ ہی دلت یا اوبی سی۔
راہل کی راہ میں کانگریس کے کچھ بڑبولے لیڈروں نے بھی رکاوٹ ڈالی۔ کبھی بٹلہ ہاؤس، کبھی صدر راج تو کبھی مسلم ریزرویشن کو لے کر ایسے بیانات دئے گئے جس سے ایک خاص ووٹر طبقہ پارٹی سے الگ ہوا۔ عوام پردیش کی حکومت منتخب کرنے کے لئے ووٹ کرنے جارہے تھے اور حکمرانی کے لئے راہل یا کانگریس یوپی کے عوام کو مکمل اکثریت کا بھروسہ نہیں دلا سکے۔اور ایسے میں انہوں نے یہی بہتر سمجھا کہ وہ سماجوادی کا ساتھ دیں۔
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Monday, 5 March 2012
उल्टी हो गईं सब तदबीरें ...
हालांकि यह 6 मार्च को ही पता चलेगा कि किसे राज-पाठ मिलता है और किसे संन्यास लेकिन अभी तक ऐगजिट पोल के जो रुझान आए हैं उनको देख कर तो यही लगता है कि उत्तराखंड में त्रिशंकु विधानसभा की मजबूत संभावना है. इसलिए यहां बसपा की भूमिका महत्वपूर्ण रहने की उम्मीद है क्योंकि कांग्रेस और भाजपा में से जो भी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरेगा वह बसपा के समर्थन का मुहताज होगा और इस तरह उत्तराखंड में बसपा किंग मेकर का काम करेगी.
जहां एक तरफ पंजाब में कांग्रेस के अपने बूते पर सरकार बनाने के मजबूत आसार हैं. वहीं दूसरी ओर गोवा में भाजपा गठबंधन की सरकार बनती नजर आ रही है.
जहां तक उत्तर प्रदेश का सवाल है तो सभी ऐगजिट पोल के अनुसार वहां समाजवादी पार्टी ही सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरेगी, लेकिन उसे सरकार बनाने के लिए कांग्रेस का हाथ थामना होगा.
ऐसा नहीं है कि यह ऐगजिट पोल अचानक आगये हैं. पहले चरण से लेकर सातवें चरण तक अधिकांश टीवी चैनलों ने ऐगजिट पोल कराए थे जिनके परिणाम तो उसी दिन मिल गए थे यह अलग बात है कि कोड ऑफ कंडकट के कारण इन परिणामों को सार्वजनिक नहीं किया गया. यानी कि टीवी पर तुरंत नहीं दिखाया गया. लेकिन सभी चैनल वालों को आने वाले परिणाम के बारे में पता था और यह अनदाजा लगाना मुशकिल नहीं है कि उसे राजनीतिक दलों के साथ भी साझा किया गया होगा. इन्हीं ऐगजिट पोल से कांग्रेस को हर चरण के बाद ही पता चलता गया कि उत्तर प्रदेश में उसका बुरा हाल होने वाला है. इसलिए अपना वोट बेस बढ़ाने के लिए ऐसा कोई भी हथकंडा नहीं है जो कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में मुसलमानों को रिझाने के लिए उपयोग नहीं किया हो. मगर सात चरण वाले चुनाव के हर चरण के बाद ऐसा लगा कि वह मुसलमानों को रिझाने में सफल नहीं रही है.
मीर तक़ी मीर के इस शेर की तरह
उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारीये दिल ने आख़िर काम तमाम किया
शायद इसीलिए हर चरण के चुनाव के बाद चुनाव आयोग के सखत कदम के बावजूद उसके बड़े नेता और भी जोर शोर से मुस्लिम आरक्षण की बात करते नजर आए. पहले सलमान खुर्शीद ने मुस्लिम आरक्षण की बात को लेकर चुनाव आयोग को धमकी तक दे डाली और उसे मीडिया द्वारा खूब उछाला गया. उनका उद्देश्य यह था कि सब लोगों को पता चले कि कांग्रेस आरक्षण देने की बात कर रही है, टीवी पर इसी मुद्दे पर चर्चायें आयोजित हुईं और यह मामला खूब उछाला गया. बाद में सलमान खुर्शीद के एक छोटे से बयान के बाद मामला अचानक ही ठंडा पड़ गया. उसके बाद जो चुनाव हुए तो कांग्रेस को लगा कि अभी भी इस मुद्दे का कोई विशेष असर नहीं हुआ है इसलिए अब उसने बेनी प्रसाद वर्मा को आगे कर दिया कि वह आरक्षण पर बयान ठोंक दें. उन्होंने भी बयान दिया जिसके बाद फिर वही हो हल्ला मचा और यह भी टीवी पर खूब उछाला गया, बाद में जब चुनाव आयोग ने उन्हें नोटिस दिया तो उन्होंने अपनी सफाई पेश की और चुनाव आयोग ने उसे जस का तस मान लिया.
केबनट ने जो बुनकर पैकेज स्वीकृत किया वह इतनी देर से आया कि चुनाव से पहले लागू किया जाना संभव नहीं था. फ़ुड सीक्योरटी बिल तो रो-पीट कर केबनट से पास करा लिया गया लेकिन इसमें इतनी देर हो गई कि उसके बारे में लोगों को कोई अधिक जानकारी नहीं पहुंची और उसके संभावित लाभ के बारे में किसी ने भी कुछ नहीं कहा. फिर कांग्रेस ने ओबीसी से साढ़े चार प्रतिशत सीटें माईनार्टी को देने का आदेश जारी करा दिया. इससे जो भी फायदा होता नज़र आया उस पर चुनाव आयोग के इस को लागू न करने के आदेश से पानी फिरता हुआ नजर आ रहा था.
इसके बाद तो जेसे उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आरक्षण की बोली लग रही थी. कांग्रेस ने कहा कि साढ़े चार फीसदी पर बाद में उसे लगा कि यह ज्यादा असर नहीं कर रहा है तो उस ने कहा कि नौ प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा. मुलायम कहां पीछे रहने वाले थे उन्होंने अपनी बोली बढ़ाकर 19 प्रतिशत कर दी. बसपा ने कहा कि आबादी के अनुपात में मुसलमानों को आरक्षण देगी. लेकिन ऐसा लगता है कि इस बोली में जीत आखि़र समाजवादी पार्टी को ही मिली.
कांग्रेस पार्टी ने एक माहिर हकीम की तरह यह तो बता दिया था कि यूपी को क्या बीमारी है लेकिन वह यह नहीं बता पाई कि उसका इलाज कैसे करेगी. उसके बड़े बड़े नेता यह बताते हुए नहीं थकते थे के उत्तर प्रदेश किस वजह से पिछड़ा है और उसके बाद कहते थे कि यदि कांग्रेस सत्ता में आ गई तो सभी समस्यायें खत्म हो जाएंगी लेकिन किसी ने यह बताने कि ज़हमत गवारा नहीं कि की कांग्रेस कैसे इन समस्याओं को दूर करेगी. ऐसा लगता था कि किसी नीम हकीम ने शायद उन्हें यह बता दिया था कि मुस्लिम आरक्षण एक ऐसी अचूक दवा है जिस से कि उत्तर प्रदेश की सभी बीमारियों का इलाज हो जाएगा.
लेकिन उत्तर प्रदेश का मतदाता अब बहुत घाग हो चुका है. वह अपना अच्छा और बुरा अच्छी तरह समझता है. उत्तर प्रदेश के मतदाता को यही बात लगातार खटक रही. क्योंकि वह यह जानना चाहता था आप के पास कौन सा ऐसा अमरित है जिससे आप उत्तर प्रदेश का इलाज करेंगे. मगर शायद कांग्रेस यह मान कर चल रही थी कि उसे सत्ता मिलने भर से ही उत्तर प्रदेश की समस्याएं हल हो जाएंगी, इसलिए उसने इस बारे में कोई सफाई नहीं दी और न ही कोई व्यापक फ़ारमुला ही पेश किया, जनता अब इतनी भोली नहीं है, उसे कोई ठोस सबूत चाहिए था, जो कांग्रेस देने की स्थिति में नहीं थी.
उत्तर प्रदेश का मतदाता जो मायावती से नाराज़ चल रहा था ने इस बात को अपने मन में ठान लिया था कि उसे मायावती को कुर्सी से बे-दखल करना ही है इसलिए उसने मायावती की जगह एक ऐसे व्यक्ति को गद्दी नशीन करना था जो उसकी उम्मीदों पर पूरा उतर सके. शायद उसे लगा कि वह कांग्रेस को वोट दे भी दे तो पूरा जोर लगाकर भी उसके प्रत्याशी को नहीं जिता पाएगा क्योंकि 2007 के चुनाव में जिस पार्टी के अधिकांश उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गयी हो उसे जिताना कोई आसान काम नहीं था. इस तरह उसे अपना वोट बर्बाद होने का डर था. इसलिए उसने थोड़ा जोर लगाकर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार को जिताना ही बेहतर समझा.
हालांकि इस चुनाव में और इससे पहले भी राहुल गांधी ने बहुत मेहनत की लेकिन क्योंकि अधिकांश क्षेत्रों में कांग्रेस का कोई दिग्गज उम्मीदवार नहीं था. ऐसा उम्मीदवार जिसने हारने के बाद भी पांच साल तक लोगों के बीच काम किया हो और उनके दुख-सुख का भागीदार रहा हो, ऐसा उम्मीदवार जो हर कदम पर अपने प्रतिद्वंद्वी विधायक से लोहा लेता रहा हो और उसने पूरा वकत इस क्षेत्र के लोगों की सेवा में गुज़ारी हो. इसीलिए कांग्रेस ने जो भी चाहा जहां चाहा टिकट दिया और उसने यह मान लिया कि उसके उम्मीदवार को कांग्रेस के नाम पर वोट मिल जाएगा. बहुत पहले तो ऐसा होता था. मगर अब ऐसा नहीं है. अब तो हर मतदाता यह देखता है कि वह जिसे चुन रहा है उसने इसके लिए क्या किया है? वह उसके किस काम आया है. इस क्षेत्र का है कि नहीं. अब लोग वोट पार्टी से अधिक व्यक्तिगत जान पहचान के आधार पर देते हैं.
कांग्रेस में ऐसे लोगों की भरमार है जो चुनाव के समय तो कुकर मुत्तों की तरह उग आते हैं और फिर रीज़लट चाहे कुछ भी हो पांच साल तक अपनी शक्ल तक नहीं दिखाते. किस आधार पर जनता अपने आप को ऐसे लोगों के साथ जोड़ सकती है.
वास्तविक रीज़लट आने में सिर्फ चौबीस घंटे बचे हैं, अधिक अनुमान तो यही है कि जो संकेत ऐगजिट पोल कर रहा है उसी के अनुसार परिणाम आएंगे लेकिन यह भी संभव है कि समाजवादी पार्टी को इतनी सीटें मिल जाएं कि वह अकेले ही सरकार बना ले और अगर ऐसा हुआ तो यूपीए सरकार पर खतरे के बादल और घने हो जाएंगे.
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الٹی ہوگئیں سب تدبیریں۔۔۔
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Published on 5 March 2012
عفیف احسن
حالانکہ یہ تو 6مارچ کو ہی پتہ چلے گا کہ کسے راج پاٹ ملتا ہے اور کسے سنیاس لیکن ابھی تک ایگزٹ
پول کے جو رجحانات آئے ہیں ان کو دیکھ کر تو یہی لگتا ہے کہ اتراکھنڈ میں معلق اسمبلی کے قوی امکانات ہیں۔ اس لئے یہاں بی ایس پی کا رول اہم رہنے کی امید ہے کیونکہ کانگریس اور بی جے پی میں سے جو بھی سب سے بڑی پارٹی کے طور پر ابھرے گی وہ بی ایس پی کی حمایت کی مرہون منّت ہوگی اور اس طرح اتراکھنڈ میں بی ایس پی کنگ میکر کا رول ادا کرے گی۔
جہاں ایک طرف پنجاب میں کانگریس کے اپنے بل بوتے پر سرکار بنانے کے قوی آثار ہیں۔وہیں دوسری طرف گوا میں بی جے پی اتحاد کی سرکار بنتی نظر آرہی ہے۔
جہاں تک اترپردیش کا تعلق ہے تو سبھی ایگزٹ پول کے مطابق وہاں سماجوادای پارٹی ہی سب سے بڑی پارٹی کی شکل میں ابھرے گی، مگر اس کو حکومت بنانے کے لئے کانگریس کا ہاتھ تھامنا پڑے گا۔
ایسا نہیں ہے کہ یہ ایگزٹ پول اچانک وارد ہوئے ہیں ۔ پہلے فیس سے لیکر ساتویں فیس تک زیادہ تر ٹی وی چینلوں نے ایگزٹ پول کرائے تھے جن کے نتائج ان کو اسی دن مل گئے تھے یہ الگ بات ہے کہ کوڈ آف کنڈکٹ کی وجہ سے ان نتائج کو عام نہیں کیا گیا۔یعنیٰ کہ ٹی وی پرفوراً نہیں دکھایا گیا۔مگر تمام چینل والوں کو آنے والے نتائج کے بارے میں پتا تھا اور یہ بات بعید ازقیاص نہیں ہے کہ انہوں نے اسے سیاسی جماعتوں کے ساتھ بھی شئیر کیا ہوگا۔انہیں ایگزٹ پول سے کانگریس کو ہر فیس کے بعد ہی پتا چلتا گیا کہ اتر پردیش میں اس کا برا حال ہونے والا ہے۔اسی لئے اپنا ووٹ بیس بڑھانے کے لئے ایسا کوئی بھی ہتھکنڈا نہیں ہے جو کانگریس نے اترپردیش میں مسلمانوں کو رجھانے کیلئے استعمال نہ کیا ہو۔مگر سات فیس والے الیکشن کے ہر فیس کے بعد ایسا لگا کہ وہ مسلمانوں کو رجھانے میں کامیاب نہیں ہورہی ہے۔
میر تقی میرکے اس شعر کے مصداق
الٹی ہوگئیں سب تدبیریں کچھ نہ دوا نے کام کیا
دیکھا اس بیماریء دل نے آخر کام تمام کیا
شاید اسی لئے ہر فیس کے الیکشن کے بعد اور الیکشن کمیشن کی سرزنش کے باوجود اس کے بڑے بڑے لیڈر اوربھی زور شور سے مسلم ریزرویشن کی بات کرتے نظر آرہے تھے۔پہلے سلمان خورشید نے مسلم ریزرویشن کی بات کو لیکر الیکشن کمیشن کو دھمکی تک دی ڈالی اور اس کو میڈیا کے ذریعہ خوب اچھالاگیا ۔ان کا مقصد یہ تھا کہ سب لوگوں کو معلوم ہوسکے کہ کانگریس ریزرویشن دینے کی بات کررہی ہے، ٹی وی پر اسی مدعے پر بحث مباحثہ منعقد ہوئے اور یہ معاملہ خوب اچھالا گیا۔ بعد میں سلمان خورشید کے ایک چھوٹے سے بیان کے بعد معاملہ اچانک ہی ٹھنڈا پڑ گیا۔ اس کے بعد جو الیکشن ہوئے تو کانگریس کو لگا کہ ابھی بھی اس مدعے کاکوئی خاص اثر نہیں ہوا ہے اس لئے اب اس نے بینی پرساد ورما کو آگے کردیا کہ وہ ریزرویشن پر بیان ٹھونک دیں۔ انہوں نے بھی بیان دیا جس کے بعد پھر وہی ہو ہلا مچا اور اس بات کو ٹی وی پر خوب اچھالا گیا، بعد میں جب الیکشن کمیشن نے ان کو نوٹس دیا تو انہوں نے اپنی صفائی پیش کی اور اسے الیکشن کمیشن نے من وعین مان لیا۔
کیبنٹ نے جو بنکر پیکج منظور کیا وہ اتنی دیر سے آیا کہ اس کوالیکشن سے پہلے لاگو کیا جانا ممکن نہیں تھا۔فوڈسیکیورٹی بل تورو پیٹ کر کیبنٹ سے پاس کرالیا گیا مگر اس میں اتنی دیر ہوگئی کہ اس کے بارے میں لوگوں کو کوئی زیادہ معلومات نہیں پہنچی اور اس کے ممکنہ فوائد کے بارے میں کسی نے بھی زیادہ کچھ نہیں کہا۔ پھر کانگریس نے او بی سی میں سے ساڑھے چارفیصد سیٹیں مائینارٹی کو دینے کا حکم جاری کرادیا۔ اس سے جو بھی فائدہ ہوتا نظر آرہا تھااس پر الیکشن کمیشن کے اس کو لاگو نہ کرنے کے حکم سے پانی پھرتا ہوا نظر آرہا تھا۔
اس کے بعد توجیسے اتر پردیش میں مسلم ریزرویشن کی بولی لگ رہی تھی۔کانگریس نے کہا کہ ساڑھے چار فیصدمگر بعد میں اسے لگا کہ یہ تو زیادہ اثر نہیں کررہا ہے تو اس لئے اس نے کہا کہ نو فیصد ریزرویشن دیا جائے گا۔ ملائم کہاں پیچھے رہنے والے تھے انہوں نے اپنی بولی بڑھا کر 19فیصد کردی۔ بی ایس پی نے بھی کہا کہ وہ آبادی کے تناسب سے مسلمانوں کو ریزرویشن دے گی۔مگر ایسا لگتا ہے کہ اس بولی میں جیت آخرسماجوادی پارتی کوہی ملی۔
کانگریس پارٹی نے ایک ماہر حکیم کی طرح یہ تو بتادیاتھا کہ یوپی کو کیا بیماری ہے مگر وہ یہ نہیں بتا پائی کہ وہ اس کا علاج کیسے کرے گی۔اس کے بڑے بڑے لیڈر یہ بتاتے ہوئے نہیں تھکتے تھے کے اتر پردیش کس وجہ سے پچھڑا ہوا ہے اور اس کے بعد یہ کہتے تھے کہ اگر کانگریس اقتدار میں آگئی تو یہ تمام دشواریاں ختم ہوجائیں گی مگر کسی نے یہ بتانے کہ زحمت گوارا نہیں کی کہ کانگریس کس طرح سے ان پریشانیوں کو دور کرے گی۔ایسا لگتا تھاکہ کسی نیم حکیم نے شاید انہیں یہ بتادیا تھا کہ مسلم ریزرویشن ایک ایسی اچوک دوا ہے جس سے کہ یوپی کی تمام بیماریوں کا علاج ہوجائے گا۔
مگر اتر پردیش کا ووٹر اب بہت ہی گھاگ ہوچکا ہے۔وہ اپنا اچھا اور برا بخوبی سمجھتا ہے۔ اترپردیش کے ووٹر کو یہی بات مستقل کھٹکتی رہی۔ کیونکہ وہ یہ جاننا چاہتے تھے کے آپ کے پاس کونسا ایسا تریاق ہے جس سے آپ اتر پردیش کا علاج کریں گے۔ مگرشاید کانگریس یہ مان کرچل رہی تھی کے اس کو اقتدار ملنے بھر سے یوپی کی پریشانیاں حل ہوجائیں گی، اس لئے اس نے اس بارے میں کوئی صفائی نہیں پیش کی اور نہ ہی کوئی جامع لائح عمل ہی پیش کیا ، عوام اب اتنا بھولا نہیں ہے اسے کوئی ٹھوس ثبوت چاہئے تھا جو کانگریس دینے کی حالت میں نہیں تھی۔
یوپی کا ووٹر جومایاوتی سے ناراض چل رہا تھا نے اس بات کواپنے من میں ٹھان لیا تھا کہ اسے مایا وتی کو کرسی سے اتارنا ہی ہے اس لئے اس نے مایاوتی کی جگہ ایک ایسے شخص کو گدی نشین کرنا تھا جو اس کی امیدوں پر پورا تر سکے۔ شایداسے لگا کہ اگر وہ کانگریس کو ووٹ دے بھی دے تو پورا زور لگاکر بھی اس کے امیدوار کو نہیں جتا پائے گا کیونکہ2007 کے الیکشن میں جس پارٹی کے زیادہ تر امیدواروں کی ضمانت ضبط ہوگئی ہو اسے جتانا کوئی آسان کام تو نہیں تھا۔اس طرح اسے اپنا ووٹ ضائع جانے کا ڈر تھا۔اسی لئے اس نے تھوڑا زور لگاکر سماجوادی پارٹی کے امیدوار کو جتانا ہی بہتر سمجھا۔
حالانکہ اس الیکشن میں اور اس سے پہلے بھی راہل گاندھی نے بہت مہنت کی مگر کیونکہ زیادہ تر حلقوں میں کانگریس کا کوئی معروف امید وار نہیں تھا۔ ایسا امیدوار جس نے ہارنے کے بعد بھی پانچ سال تک لوگوں کے درمیان کام کیا ہو اور ان کے دکھ سکھ کا بھاگیدار رہا ہو، ایسا امید وار جو ہر قدم پر اپنے حریف ایم ایل اے سے لوہا لیتا رہا ہو اور اس نے پورا پانچ سال اس حلقہ کے لوگوں کی خدمت میں گزارا ہو۔ اسی لئے کانگریس نے جسے بھی چاہا جہاں سے چاہا ٹکٹ دے دیا اور اس نے یہ مان لیا کہ اس کے امید وارکو کانگریس کے نام پر ووٹ مل جائے گا۔ بہت پہلے تو ایسا ہوتا تھا۔ مگر اب ایسا نہیں ہوتا ہے۔ اب تو ہر ووٹر یہ دیکھتا ہے کہ وہ جسے چن رہا ہے اس نے اس کے لئے کیا کچھ کیا ہے؟ وہ اس کے کس کام آیا ہے ۔ وہ اس کے حلقہ کا ہے کہ نہیں۔ اب لوگ ووٹ پارٹی سے زیادہ شخصی جان پہچان کی بنیاد پر دیتے ہیں۔
کانگریس میں ایسے لوگوں کی بھرمار ہے جو الیکشن کے وقت تو ککر متوں کی طرح اگ آتے ہیں اور پھر ریزلٹ چاہے کچھ بھی ہو پانچ سال تک اپنی شکل تک نہیں دکھاتے۔ کس بنیاد پر عوام اپنے آپ کو ایسے لوگوں کے ساتھ جوڑ سکتا ہے۔
حقیقی ریزلٹ آنے میں صرف چوبیس گھنٹے بچے ہیں، زیادہ قیاس تو یہی ہے کہ جو اشارے ایگزٹ پول کر رہا ہے اسی کے مطابق نتیجے آئیں گے مگر یہ بھی ممکن ہے کہ سماجوادی پارٹی کو اتنی نشستیں مل جائیں کہ وہ اکیلے ہی حکومت بنالے اور اگر ایسا ہوا تو یوپی اے سرکار پر خطرے کے بادل مزید گہر ے ہوجائیں گے۔
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