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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 12 March 2012
अफ़ीफ़ अहसन
कांग्रेस
को 2004 में सरकार बनाने का मौका मिला. पार्टी ने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री के
लिए चुना. लेकिन तब भाजपा सहित कई विपक्षी पार्टियों ने उनके विदेशी मूल के कारण
उनके प्रधानमंत्री जैसे पद पर नियुक्त होने का विरोध किया. तब भी मौका था कि वह
राहुल गांधी को अपनी जगह प्रधानमंत्री बनाने की घोषणा कर देतीं. मगर वह उस समय चूक
गईं और उन्होंने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के लिए चुना.
अगला
मौका 2009 में तब आया जब यूपीए को 262 सीटें मिलीं जिसमें से कांग्रेस को अकेले ही
206 सीटें मिली थीं. इस जीत का श्रेय तो पूरी तरह से कांग्रेस की नई पीढ़ी को जाता
था जिस का नेतृत्व राहुल गांधी कर रहे थे. आम राय यही थी कि राहुल गांधी को
प्रधानमंत्री बनाया जाएगा लेकिन तब भी सोनिया गांधी राहुल गांधी के पक्ष में फैसला
नहीं कर सकीं. और इस तरह एक बार फिर देश का नेतृत्व कमजोर और बोसीदा हाथों में
सौंपना ही बेहतर समझा और युवाओं की इच्छाओं का कोई सम्मान नहीं किया गया.
प्रधानमंत्री ही नहीं दूसरे मंत्री भी बुजुर्ग ही बनाए गए. और युवाओं को देश के
शासन में उनका जायज़ अधिकार नहीं दिया गया. और इस देश का युवा अपने को ठगा सा
महसूस करने लगा.
लेकिन
इसे मुलायम सिंह जैसे रूढ़ीवादी और पुराने नेता की दूरदृष्टि कहिए या राजनीतिक
दूरदर्शीता कि उन्होंने युवाओं की भावनाओं की कदर करते हुए अखिलेश यादव के उत्तर
प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बनने की राह प्रशस्त की और उनकी पूरी पार्टी ने इसमें
उनका साथ भी दिया.
समाजवादी
पार्टी के विधायकों ने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और विधानसभा चुनाव में पार्टी की
जीत के हीरो रहे 38 वर्षीय अखिलेश यादव को अपना नया नेता चुन राज्य के मुख्यमंत्री
के रूप में उनके नाम पर मुहर लगा दी.
हालांकि
शुरूआत में आजम खान और शिवपाल यादव अखिलेश के मुख्यमंत्री बनाए जाने के खिलाफ थे.
इसलिए आजम खान पार्लैमेंटरी पार्टी की बैठक में नहीं आए और जो हेलीकॉप्टर को लेने
के लिए गया था खाली वापस आ गया. बाद में शुक्रवार को वह लखनऊ पहुंचे और सीधे अपने
घर दारउलशिफा चले गए और मुलायम और अखिलेश नहीं मिले. शाम को मुलायम और
प्रधानमंत्री के बीच लगभग 45 मिनट तक बातचीत हुई. मुलायम ने उन्हें समझा बुझाकर
मना लिया और इस बात के लिए राजी कर लिया की वह खुद ही अखिलेश के नाम की सिफारिश
करें. बहरहाल शनिवार को पार्टी मुख्यालय में पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव की
मौजूदगी में हुई विधायक की बैठक में इस पर मुहर लगा दी गई, विधायकों को
संबोधित करने के बाद आज़म खान ने अखिलेश की राजनीतिक क्षमताओं पर भरोसा जताते हुए
विधानसभा पार्टी के नेता और राज्य के अगले मुख्यमंत्री के रूप में उनके नाम का
प्रस्ताव पेश किया, जिसमें पार्टी के वरिष्ठ नेता शिवपाल सिंह यादव ने
समर्थन किया और उसी के साथ बैठक में सभी विधायकों ने सबसे युवा मुख्यमंत्री बनाने
के लिए अखिलेश यादव को चुन लिया. बाद में अखिलेश यादव ने पार्टी महासचिव आजम खान
और वरिष्ठ नेता शिवपाल सिंह यादव के साथ राज्यपाल निवास जाकर राज्यपाल को नेता
चुने जाने की औपचारिक सूचना दी.
अखिलेश
का जन्म 1 जुलाई, 1973 को इटावा में हुआ था. बचपन में उनकी मां का
निधन हो गया और उनकी परवरिश उनकी दादी ने की. अनुशासन के बाध्य पिता मुलायम ने
उन्हें प्राथमिक शिक्षा के लिए राजस्थान के धोलपुर सैनिक स्कूल भेजा। मैसूर में
1990 में अखिलेश ने कर्नाटक कामन इंजीनियरिंग एनट्रेंस टेस्ट में सिविल
इंजीनियरिंग की परीक्षा में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया और मेरिट सूची में जगह
बनाई. जहां पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय से पर्यावरण
प्रौद्योगिकी में स्नातक किया और ऑस्ट्रेलिया के सिडनी विश्वविद्यालय से पीजी की
डिग्री हासिल की. 2000 में उन्होंने पहली बार कन्नोज लोकसभा सीट से उपचुनाव जीतकर
सक्रिय राजनीति में कदम रखा.
नातजुरबेकार
अखिलेश यादव प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री बनकर इतिहास रचने जा रहे हैं. लेकिन
जहां एक ओर उन का नोजवान होना उनका सबसे मजबूत प्वाइंट माना जा रहा है, वहीं
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि देश के सबसे बड़े प्रांत के सबसे कम उम्र के
मुख्यमंत्री के रूप में लोगों की उम्मीदें पूरी करना बेहद मुश्किल है. समाजवादी
पार्टी के 20 वर्षों के इतिहास में यह पहला मौका है, जब पार्टी को
अपने बूते पर बहुमत मिला है. ऐसे में अखिलेश से लोगों की उम्मीदें भी बहुत हैं.
अखिलेश आज तक किसी पद पर नहीं रहे हैं. वह समाजवादी पार्टी के सांसद और प्रदेश
अध्यक्ष के रूप में काम करते रहे हैं. उनके पास किसी तरह का प्रशासनिक अनुभव नहीं
है. ऐसे में बिल्कुल न के बराबर अनुभव रखने वाले अखिलेश के लिए जनता की उम्मीदों
का बोझ उठाना आसान नहीं होगा. समाजवादी पार्टी के संभावित मंत्रिमंडल में कुछ ही मंत्री
होंगे जो अखिलेश यादव से कम आयु के होंगे. सरकार के अधिकांश मंत्री उनसे ऊपर और
राजनीति का लंबा अनुभव रखने वाले होंगे. ऐसे में सबके साथ तालमेल बिठाकर चलना और
सरकार चलाना अपने आप में बड़ी चुनौती होगी.
शिक्षा
पूरी होने के बाद अखिलेश ने डिंपल सिंह से शादी का फैसला किया. डिंपल एक राजपूत
परिवार से हैं और अखिलेश के पिता मुलायम सिंह को यह रिश्ता मंजूर नहीं था लेकिन
अखिलेश ने पिता की इच्छा के खिलाफ जाकर डिंपल से शादी कर ली. इसके बाद 2009 में
डिंपल ने लोकसभा चुनाव भी लड़ा और राज बब्बर से हार गईं.
अखिलेश
की तरह ही राहुल गांधी ने भी अपनी पार्टी के चुनाव अभियान की कमान संभाली थी.
दोनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि बसपा सरकार के दौरान राज्य में उनकी
पार्टियों का बेस नष्ट हो चुका था. कांग्रेस उत्तर प्रदेश की सत्ता से 22 साल से
बाहर थी. अखिलेश की तरह ही राहुल गांधी ने भी अपनी पार्टी के चुनाव प्रचार में
बेहद मेहनत की. उन्होंने 200 से अधिक बैठकें कीं. जगह जगह गए और जलसे किए, लेकिन
जब परिणाम आए तो समाजवादी पार्टी को सत्ता मिली जबकि कांग्रेस को तसल्ली तक नहीं
मिल सकी.
राहुल
के सामने सबसे बड़ी दिक्कत यह आई कि राज्य की जनता के लिए राहुल वह चेहरा नहीं बन
सके जिसकी चाह जनता को थी. अगर राहुल गांधी को शुरू से ही मुख्यमंत्री पद का
दावेदार बताया गया होता तो छवी शायद थोड़ी अलग हो सकती थी. वहीं अखिलेश की स्थानीय
छवी और पहचान ने बेहद फायदा पहुंचाया. अखिलेश की रैलियों और सभाओं में अधिकांश
युवा शामिल हो रहे थे. सितंबर 2011 में साइकिल और उसके बाद रथ यात्रा शुरू करने के
बाद से ही राज्य भर के युवाओं के लिए 'भैया' बन गए थे. एक वकता के रूप में अखिलेश भले ही कड़े
शब्द न बोल सकते हों लेकिन अपने व्यवहार से लोगों का दिल जीत गए. उत्तर प्रदेश में
समाजवादी पार्टी की जीत का एक बड़ा कारण युवा मतदाता वर्ग का पार्टी के साथ जुड़ना
भी है. राहुल गांधी प्रदेश में यही नहीं कर पाए.
अखिलेश
ने फ्री में लैपटॉप और टॅबलेट के साथ मोडम और बिजली देने का वादा किया. उत्तर
प्रदेश में इस बार 1.49 करोड़ युवा मतदाता जुड़े थे. अखिलेश अपने वादों और व्यवहार
से नए मतदाता वर्ग के एक बड़े हिस्से को अपने साथ जोड़ने में सफल रहे.
डीपी
यादव को बाहर करने के फैसले के बाद राज्य की जनता को लगा कि माया राज के
भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए अखिलेश ही सबसे बेहतर विकल्प हैं.
अखिलेश की तुलना राहुल के सामने एक चुनौती यह भी थी कि कांग्रेस का कोई मतदाता वर्ग नहीं है. पिछले विधानसभा चुनाव में सपा को 25 प्रतिशत वोट मिले थे. पार्टी चुनाव हारी जरूर थी लेकिन फिर भी वोटों में उसकी एक मजबूत हिस्सेदारी थी. यह समाजवादी पार्टी का ठोस मतदाता बेस था जिसे इस बार अखिलेश ने और मजबूत किया. समाजवादी पार्टी के पास ठोस मुस्लिम और यादव मतदाता थे लेकिन राहुल की झोली में ऐसा कोई भी समाज नहीं था जो पूरी तरह पार्टी का वोट बैंक हो. 2007 में मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग कर समाज के हर वर्ग को पार्टी से जोड़ा था और सत्ता में आई थी, राहुल को भी इस बार राज्य में यही करना था लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाए. न ही ब्राह्मण मतदाता पार्टी से जुड़ा, आरक्षण के वादों के बावजूद न ही मुसलमान पार्टी से ठोस रूप में जुड़ा और न ही दलित या ओबीसी.
अखिलेश की तुलना राहुल के सामने एक चुनौती यह भी थी कि कांग्रेस का कोई मतदाता वर्ग नहीं है. पिछले विधानसभा चुनाव में सपा को 25 प्रतिशत वोट मिले थे. पार्टी चुनाव हारी जरूर थी लेकिन फिर भी वोटों में उसकी एक मजबूत हिस्सेदारी थी. यह समाजवादी पार्टी का ठोस मतदाता बेस था जिसे इस बार अखिलेश ने और मजबूत किया. समाजवादी पार्टी के पास ठोस मुस्लिम और यादव मतदाता थे लेकिन राहुल की झोली में ऐसा कोई भी समाज नहीं था जो पूरी तरह पार्टी का वोट बैंक हो. 2007 में मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग कर समाज के हर वर्ग को पार्टी से जोड़ा था और सत्ता में आई थी, राहुल को भी इस बार राज्य में यही करना था लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाए. न ही ब्राह्मण मतदाता पार्टी से जुड़ा, आरक्षण के वादों के बावजूद न ही मुसलमान पार्टी से ठोस रूप में जुड़ा और न ही दलित या ओबीसी.
राहुल
की राह में कांग्रेस के कुछ बड़बोले नेताओं ने भी हानी पहुंचायी. कभी बटला हाउस, कभी
राष्ट्रपति शासन तो कभी मुस्लिम आरक्षण को लेकर ऐसे बयान दिए गए जिससे एक विशेष
मतदाता वर्ग पार्टी से अलग हुआ. जनता प्रदेश सरकार चुनने के लिए वोट करने जा रही
थी और शासन के लिए राहुल या कांग्रेस उत्तर प्रदेश की जनता को पूर्ण बहुमत का
भरोसा नहीं दिला सके. ऐसे में उन्होंने यही बेहतर समझा कि वह समाजवादी का साथ दें.
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