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Monday, 26 March 2012

जलते घर को देखने वालो, फूंस का छप्पर आपका है


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 26 March 2012
अफ़ीफ़ अहसन
हालांकि मानवाधिकार हनन पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है और उसके खिलाफ बिना भेदभाव आवाज़ उठाए जाने की जरूरत है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय फोरमों में जिस तरह मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर इसे पकड़ो उसे जाने दो का बोलबाला है वह चिंता का विषय है. 
यह भी जग जाहिर है कि मानवाधिकार की पुरजोर वकालत करने वालों का अपना स्वयं का रिकॉर्ड इस मामले में कोई बहुत अच्छा नहीं है. चाहे वियतनाम युद्ध हो, तालाबानी आतंकवादियों के खिलाफ अमेरिका और नाटो की वार ऑन टेरर सद्दाम हुसैन के खिलाफ तथाकथित 'वेपन ऑफ मास डेसटरकशन को नष्ट करने के लिए युद्ध. हर जगह अमेरिका ने मानवाधिकार का हनन किया है. वियतनाम में तो उसका रिकॉर्ड इतिहास की किताबों की ज़ीनत बन चुका है. लेकिन इराक और अफगानिस्तान के घाव तो अभी ताजा हैं. इराक में कैदियों पर अमानवीय अत्याचार, खुलेआम हत्या और मार काट से प्रत्येक जागरूक व्यक्ति की आत्मा कांप जाएगी. 
अफगानिस्तान और पाकिस्तान में अमेरिका के ड्रोन हमले आम सी बात हो गए हैं. इन हमलों में आतंकवादियों से ज्यादा मासूम नागरिक मारे गए हैं. जिनमें मासूम बच्चे और औरतें भी शामिल हैं. मानवाधिकार तो यह है कि चाहे हजारों गुनाहगार छूट जाएं लेकिन एक मासूम को सज़ा नहीं होनी चाहिए. जबकि अमेरिका की यह नीति है कि एक गुनहगार को मारने के लिए चाहे हजारों बेगुनाहों की जान चली जाए एक गुनाहगार नहीं बचना चाहिए. 
हाल ही में अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों द्वारा मारे गए आतंकवादियों की लाशों पर पेशाब करने की घटना सामने आयी था. कुरान जलाए जाने की घटना हुइ. इसके बाद सैनिक द्वारा अंधाधुंध मासूम नागरिकों की गोलीबारी करके नरसंहार करने की घटना हुई. लेकिन फिर भी इन घटनाओं से किसी भी तरह का मानवाधिकार हनन नहीं हुआ. 
श्रीलंका का गृहयुद्ध बहुमत सिन्हाली और अल्पसंख्यक तमिलों के बीच लगभग 25 साल तक चला। इस गृहयुद्ध में दोनों ओर बड़ी संख्या में लोग मारे गए. लिट्टों द्वारा अपनाई गई युद्ध नीतियों की वजह से 32 देशों ने इसे आतंकवादीयों की श्रेणी में रखा जिनमें हिंदुस्तान, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, यूरोपीय संघ के कई सदस्य देशों और अन्य कई देश शामिल थे. एक चौथाई सदी तक चले इस जातीय संघर्श में सरकारी आँकड़ों के अनुसार ही लगभग 80,000 लोग मारे गए जबकि सही संख्या इस से कहीं अधिक है. 
हिंदुस्तान ने कई कारणों से श्रीलंका के संघर्ष में हस्तक्षेप किया. इनमें क्षेत्रीय शक्ति के रूप में खुद को उजागर करना और तमिलनाडु में स्वतंत्रता की मांग को दबाना शामिल था. क्योंकि तमिल नाडू के लोग सांस्कृतिक कारणों से श्रीलंका के तमिलों के हितों के पक्ष में रहे हैं, इसलिए हिंदुस्तान सरकार को भी संघर्ष के दौरान श्रीलंका के तमिलों की सहायता के लिए आगे आना पड़ा. 80 के दशक के शुरू में हिंदुस्तान संस्थानों ने कई तरह से तमिलों की मदद की.
5 जून, 1987 को जब श्रीलंका सरकार ने दावा किया कि वह जाफना पर कबज़े के करीब है, तभी हिंदुस्तान ने पेराशूट द्वारा जाफना में राहत सामग्री गिरायी. हिंदुस्तान की इस सहायता को लिट्टे की सीधे मदद भी माना गया. इस के बाद 29 जुलाई, 1987 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और तत्कालीन श्रीलंका के राष्ट्रपति जयवर्धने के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए. इस समझौते के तहत श्रीलंका में तमिल भाषा को सरकारी दर्जा दिया गया. साथ ही, तमिलों की कई अन्य मांग मान ली गयीं. वहीं, हिंदुस्तान शांति रक्षक बलों के सामने विद्रोहियों को हथियार डालना पड़ा. 
अधिकांश विद्रोही गुटों ने हिंदुस्तान शांति रक्षक बलों के सामने हथियार डाल दिए थे, लेकिन लिट्टे इसके लिए तैयार नहीं हुआ. हिंदुस्तान शांति रक्षक सेना ने विद्रोहियों को तोड़ने की पूरी कोशिश की. तीन साल तक दोनों के बीच युद्ध चला. इस दौरान हिंदुस्तान शांति रक्षक बलों पर मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप भी लगा. उधर, ‍सिनहालियों ने भी अपने देश में हिंदुस्तान सैनिकों की मौजूदगी का विरोध करना शुरू कर दिया. इसके बाद श्रीलंका सरकार ने हिंदुस्तान से शांति रक्षक बलों को वापस बुलाने की मांग की, लेकिन राजीव गांधी ने इससे इनकार कर दिया. 1989 के लोकसभा चुनाव में राजीव गांधी की हार के बाद नए प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने श्रीलंका से शांति रक्षक बलों को हटाने का आदेश दिया. इन तीन वर्षों में श्रीलंका में ग्यारह सौ हिंदुस्तान सैनिक मारे गए, वहीं पांच हजार लिट्टे भी मारे गए.
1991 में एक आत्मघाती हमलावर लिट्टे ने राजीव गांधी को शहीद कर दिया. इसके बाद हिंदुस्तान ने श्रीलंका के तमिलों की मदद बंद कर दी. 
2008 में जब श्रीलंका की सेना ने विद्रोहियों के ठिकानों पर हमलह करना शुरू किया तो यूपीए सरकार हिल गई. तमिलनाडु के राजनीतिक दलों ने केंद्र सरकार से श्रीलंका के मामले में हस्तक्षेप की मांग की. ऐसा नहीं करने पर डीएमके ने हिमायत वापस लेने की धमकी दे डाली. दबाव बनाने के लिए करुणानिधि ने अपने सांसदों से इस्तीफा ले लिया. तमिलों के मुद्दे पर तमिलनाडू के सभी राजनीतिक दल तुरंत संघर्ष विराम की मांग पर एक साथ आ गये. भारी दबाव के बीच विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी श्रीलंका गए. श्रीलंका के राष्ट्रपति ने उन्हें तमिलों की सुरक्षा का भरोसा दिलाया. युद्ध में फंसे नागरिकों को बाहर निकालने के लिए श्रीलंका ने एकतरफा संघर्ष विराम की घोषणा की. लेकिन अब तक काफी मासूम अपनी जान से हाथ धो बैठे थे. खासकर युद्ध के अंतिम चरण में हजारों मारे गए. अगर यही काम समय रहते कर लिया गया होता तो सैंकड़ों निर्दोष लोगों की जान बच जाती. 
इस घटना के लगभग चार साल बीतने के बाद मानवाधिकार के सबसे बड़े ठेकेदार अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) में श्रीलंका के खिलाफ एक प्रस्ताव पेश किया. प्रस्ताव श्रीलंका से तमिल टाईगरस के खिलाफ युद्ध के अंतिम चरण में हुए कथित मानवाधिकार उल्लंघन की जांच कराने का अनुरोध किया गया था. प्रस्ताव में कोलंबो से अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के कथित उल्लंघन से निपटने की घोषणा की गई. प्रस्ताव में कहा गया है कि श्रीलंका सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय नियमों के 'गंभीर उल्लंघन' के मामले को सही तरीके से नहीं निपटा. 
पहले पहल तो हिंदुस्तान ने अपने क्षेत्रीय हितों और महत्व को ध्यान में रखते हुए इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट देने का मन बनाया था. हिंदुस्तान ने किसी देश के खिलाफ लाये गये प्रस्ताव के पक्ष में वोट देने को लेकर नापसंदीदगी जताई थी, लेकिन यूपीए गठबंधन के सहयोगी डीएमके और तमिलनाडु के कई अन्य राजनीतिक दलों के दबाव के आगे सरकार को अपना रुख बदलना पड़ा. डीएमके ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार से अपने मंत्रियों को हटाने तक की धमकी दे दी थी. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के कुल 47 सदस्यों में हिंदुस्तान सहित 24 देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया, जबकि 15 देशों ने इसके खिलाफ वोट दिया. आठ देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया. 
अमेरिका इस क्षेत्र के देशों के आंतरिक मामलों में धीरे धीरे अपना दखल अमल बढ़ा रहा है. दिन बदिन उसका हस्तक्षेप बढ़ती ही जा रही है और वह दिन दूर नहीं जब हिंदुस्तान के चारों ओर के देशों को कवर करने के बाद हिंदुस्तान के साथ भी इसी प्रकार की हरकत करे. अगर हिंदुस्तान इसी तरह झुकता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब कोई भी देश हिंदुस्तान के साथ खड़ा नज़र नहीं आएगा. 
अमेरिका और यूरोपीय देशों की नज़र में हिंदुस्तान का मानवाधिकार का रिकॉर्ड कोई बहुत अच्छा नहीं है. कश्मीर, नॉर्थ ईस्ट, माओवादी और अन्य आतंकवादियों को लेकर हिंदुस्तान के खिलाफ वहां आवाज उठती रहती हैं. जिन को गुलाम नबी फ़ाइ जैसे आईएसआई के पैसे से काम करने वाले लोबीइसट भड़काते रहते हैं और कभी भी हिंदुस्तान को भी इसी तरह से घेराव किया जा सकता है जैसे कि श्रीलंका का किया गया है. 
इस अवसर पर नवाज़ देवबन्दी का एक प्रसिद्ध और पुरानी चार पंक्तीयां बिल्कुल उपयुक्त लगती हैं. यह  पंक्तीयां नवाज़ साहब ने शनिवार को डीसीएम के प्रसिद्ध 48वें शंकर-शाद मुशायरे में यह कहते हुए पढ़ा था कि यह  पंक्तीयां कुछ दिनों के बाद फिर ताजा हो जाता है क्योंकि कोई ना कोई नई घटना उत्पन्न होती रहती है.
जलते घर को देखने वालो, फूस का छप्पर आपका है।
आग के पीछे तेज़ हवा है, आगे मुक़द्दर आपका है।।
उसके क़तल पे मैं चुप था, मेरा नंबर अब आया।
मेरे कतल पे आप भी चुप हैं, अगला नम्बर आपका है।।
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