हालांकि यह 6 मार्च को ही पता चलेगा कि किसे राज-पाठ मिलता है और किसे संन्यास लेकिन अभी तक ऐगजिट पोल के जो रुझान आए हैं उनको देख कर तो यही लगता है कि उत्तराखंड में त्रिशंकु विधानसभा की मजबूत संभावना है. इसलिए यहां बसपा की भूमिका महत्वपूर्ण रहने की उम्मीद है क्योंकि कांग्रेस और भाजपा में से जो भी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरेगा वह बसपा के समर्थन का मुहताज होगा और इस तरह उत्तराखंड में बसपा किंग मेकर का काम करेगी.
जहां एक तरफ पंजाब में कांग्रेस के अपने बूते पर सरकार बनाने के मजबूत आसार हैं. वहीं दूसरी ओर गोवा में भाजपा गठबंधन की सरकार बनती नजर आ रही है.
जहां तक उत्तर प्रदेश का सवाल है तो सभी ऐगजिट पोल के अनुसार वहां समाजवादी पार्टी ही सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरेगी, लेकिन उसे सरकार बनाने के लिए कांग्रेस का हाथ थामना होगा.
ऐसा नहीं है कि यह ऐगजिट पोल अचानक आगये हैं. पहले चरण से लेकर सातवें चरण तक अधिकांश टीवी चैनलों ने ऐगजिट पोल कराए थे जिनके परिणाम तो उसी दिन मिल गए थे यह अलग बात है कि कोड ऑफ कंडकट के कारण इन परिणामों को सार्वजनिक नहीं किया गया. यानी कि टीवी पर तुरंत नहीं दिखाया गया. लेकिन सभी चैनल वालों को आने वाले परिणाम के बारे में पता था और यह अनदाजा लगाना मुशकिल नहीं है कि उसे राजनीतिक दलों के साथ भी साझा किया गया होगा. इन्हीं ऐगजिट पोल से कांग्रेस को हर चरण के बाद ही पता चलता गया कि उत्तर प्रदेश में उसका बुरा हाल होने वाला है. इसलिए अपना वोट बेस बढ़ाने के लिए ऐसा कोई भी हथकंडा नहीं है जो कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में मुसलमानों को रिझाने के लिए उपयोग नहीं किया हो. मगर सात चरण वाले चुनाव के हर चरण के बाद ऐसा लगा कि वह मुसलमानों को रिझाने में सफल नहीं रही है.
मीर तक़ी मीर के इस शेर की तरह
उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारीये दिल ने आख़िर काम तमाम किया
शायद इसीलिए हर चरण के चुनाव के बाद चुनाव आयोग के सखत कदम के बावजूद उसके बड़े नेता और भी जोर शोर से मुस्लिम आरक्षण की बात करते नजर आए. पहले सलमान खुर्शीद ने मुस्लिम आरक्षण की बात को लेकर चुनाव आयोग को धमकी तक दे डाली और उसे मीडिया द्वारा खूब उछाला गया. उनका उद्देश्य यह था कि सब लोगों को पता चले कि कांग्रेस आरक्षण देने की बात कर रही है, टीवी पर इसी मुद्दे पर चर्चायें आयोजित हुईं और यह मामला खूब उछाला गया. बाद में सलमान खुर्शीद के एक छोटे से बयान के बाद मामला अचानक ही ठंडा पड़ गया. उसके बाद जो चुनाव हुए तो कांग्रेस को लगा कि अभी भी इस मुद्दे का कोई विशेष असर नहीं हुआ है इसलिए अब उसने बेनी प्रसाद वर्मा को आगे कर दिया कि वह आरक्षण पर बयान ठोंक दें. उन्होंने भी बयान दिया जिसके बाद फिर वही हो हल्ला मचा और यह भी टीवी पर खूब उछाला गया, बाद में जब चुनाव आयोग ने उन्हें नोटिस दिया तो उन्होंने अपनी सफाई पेश की और चुनाव आयोग ने उसे जस का तस मान लिया.
केबनट ने जो बुनकर पैकेज स्वीकृत किया वह इतनी देर से आया कि चुनाव से पहले लागू किया जाना संभव नहीं था. फ़ुड सीक्योरटी बिल तो रो-पीट कर केबनट से पास करा लिया गया लेकिन इसमें इतनी देर हो गई कि उसके बारे में लोगों को कोई अधिक जानकारी नहीं पहुंची और उसके संभावित लाभ के बारे में किसी ने भी कुछ नहीं कहा. फिर कांग्रेस ने ओबीसी से साढ़े चार प्रतिशत सीटें माईनार्टी को देने का आदेश जारी करा दिया. इससे जो भी फायदा होता नज़र आया उस पर चुनाव आयोग के इस को लागू न करने के आदेश से पानी फिरता हुआ नजर आ रहा था.
इसके बाद तो जेसे उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आरक्षण की बोली लग रही थी. कांग्रेस ने कहा कि साढ़े चार फीसदी पर बाद में उसे लगा कि यह ज्यादा असर नहीं कर रहा है तो उस ने कहा कि नौ प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा. मुलायम कहां पीछे रहने वाले थे उन्होंने अपनी बोली बढ़ाकर 19 प्रतिशत कर दी. बसपा ने कहा कि आबादी के अनुपात में मुसलमानों को आरक्षण देगी. लेकिन ऐसा लगता है कि इस बोली में जीत आखि़र समाजवादी पार्टी को ही मिली.
कांग्रेस पार्टी ने एक माहिर हकीम की तरह यह तो बता दिया था कि यूपी को क्या बीमारी है लेकिन वह यह नहीं बता पाई कि उसका इलाज कैसे करेगी. उसके बड़े बड़े नेता यह बताते हुए नहीं थकते थे के उत्तर प्रदेश किस वजह से पिछड़ा है और उसके बाद कहते थे कि यदि कांग्रेस सत्ता में आ गई तो सभी समस्यायें खत्म हो जाएंगी लेकिन किसी ने यह बताने कि ज़हमत गवारा नहीं कि की कांग्रेस कैसे इन समस्याओं को दूर करेगी. ऐसा लगता था कि किसी नीम हकीम ने शायद उन्हें यह बता दिया था कि मुस्लिम आरक्षण एक ऐसी अचूक दवा है जिस से कि उत्तर प्रदेश की सभी बीमारियों का इलाज हो जाएगा.
लेकिन उत्तर प्रदेश का मतदाता अब बहुत घाग हो चुका है. वह अपना अच्छा और बुरा अच्छी तरह समझता है. उत्तर प्रदेश के मतदाता को यही बात लगातार खटक रही. क्योंकि वह यह जानना चाहता था आप के पास कौन सा ऐसा अमरित है जिससे आप उत्तर प्रदेश का इलाज करेंगे. मगर शायद कांग्रेस यह मान कर चल रही थी कि उसे सत्ता मिलने भर से ही उत्तर प्रदेश की समस्याएं हल हो जाएंगी, इसलिए उसने इस बारे में कोई सफाई नहीं दी और न ही कोई व्यापक फ़ारमुला ही पेश किया, जनता अब इतनी भोली नहीं है, उसे कोई ठोस सबूत चाहिए था, जो कांग्रेस देने की स्थिति में नहीं थी.
उत्तर प्रदेश का मतदाता जो मायावती से नाराज़ चल रहा था ने इस बात को अपने मन में ठान लिया था कि उसे मायावती को कुर्सी से बे-दखल करना ही है इसलिए उसने मायावती की जगह एक ऐसे व्यक्ति को गद्दी नशीन करना था जो उसकी उम्मीदों पर पूरा उतर सके. शायद उसे लगा कि वह कांग्रेस को वोट दे भी दे तो पूरा जोर लगाकर भी उसके प्रत्याशी को नहीं जिता पाएगा क्योंकि 2007 के चुनाव में जिस पार्टी के अधिकांश उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गयी हो उसे जिताना कोई आसान काम नहीं था. इस तरह उसे अपना वोट बर्बाद होने का डर था. इसलिए उसने थोड़ा जोर लगाकर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार को जिताना ही बेहतर समझा.
हालांकि इस चुनाव में और इससे पहले भी राहुल गांधी ने बहुत मेहनत की लेकिन क्योंकि अधिकांश क्षेत्रों में कांग्रेस का कोई दिग्गज उम्मीदवार नहीं था. ऐसा उम्मीदवार जिसने हारने के बाद भी पांच साल तक लोगों के बीच काम किया हो और उनके दुख-सुख का भागीदार रहा हो, ऐसा उम्मीदवार जो हर कदम पर अपने प्रतिद्वंद्वी विधायक से लोहा लेता रहा हो और उसने पूरा वकत इस क्षेत्र के लोगों की सेवा में गुज़ारी हो. इसीलिए कांग्रेस ने जो भी चाहा जहां चाहा टिकट दिया और उसने यह मान लिया कि उसके उम्मीदवार को कांग्रेस के नाम पर वोट मिल जाएगा. बहुत पहले तो ऐसा होता था. मगर अब ऐसा नहीं है. अब तो हर मतदाता यह देखता है कि वह जिसे चुन रहा है उसने इसके लिए क्या किया है? वह उसके किस काम आया है. इस क्षेत्र का है कि नहीं. अब लोग वोट पार्टी से अधिक व्यक्तिगत जान पहचान के आधार पर देते हैं.
कांग्रेस में ऐसे लोगों की भरमार है जो चुनाव के समय तो कुकर मुत्तों की तरह उग आते हैं और फिर रीज़लट चाहे कुछ भी हो पांच साल तक अपनी शक्ल तक नहीं दिखाते. किस आधार पर जनता अपने आप को ऐसे लोगों के साथ जोड़ सकती है.
वास्तविक रीज़लट आने में सिर्फ चौबीस घंटे बचे हैं, अधिक अनुमान तो यही है कि जो संकेत ऐगजिट पोल कर रहा है उसी के अनुसार परिणाम आएंगे लेकिन यह भी संभव है कि समाजवादी पार्टी को इतनी सीटें मिल जाएं कि वह अकेले ही सरकार बना ले और अगर ऐसा हुआ तो यूपीए सरकार पर खतरे के बादल और घने हो जाएंगे.
Afif Ahsen, Congress, Daily Pratap, Rahul Gandhi, Uttar Pradesh, Vir Arjun,

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