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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 8th August 2011
अफ़ीफ़ अहसन
आजकल हर दिन किसी न किसी भ्रष्टाचार, योजना या नियम के उल्लंघन पर से पर्दा उठ रहा है. ऐसा नहीं है कि इसमें केवल एक ही पार्टी शामिल है बल्कि हर पार्टी जहां जहां भी वह सत्तारूढ़ है वह वहां वहां इसमें लिप्त नज़र आ रही है. बस फ़र्क इतना सा हे कि जो जितनी अधिक अच्छी स्थिति में है उसके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों उतने ही गंभीर हैं. जो पार्टी जिस राज्य में भी सत्ता में है वहां पर इसके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं. और जो पार्टी केंद्र में सत्तारूढ़ है उस पर वहां भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं. कोई भी नेता चाहे वह किसी भी पार्टी का हो अपने दिल पर हाथ रख कर यह नहीं कह सकता कि उसकी पार्टी में कोई भी भ्रष्ट नहीं है.हमारे देश में रूलेट का एक खेल चल रहा है. जिसमें एक दायरे में चारों ओर बिना भेदभाव सभी राजनीतिज्ञों और पार्टियों के नाम लिखे हुए हैं. इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि कोई भी व्यक्ति अपना नाम आने से बच सकता है. क्यों की जब एक बार पहया घुमाया जाता है तो सुंई किसी एक के नाम पर आकर ठहर जाती है और जब फिर यह पहया घुमाया जाता है तो सुंई किसी दूसरे के नाम पर आकर ठहर जाती है. इस तरह हर बार किसी ना किसी का नाम भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता है. कोई यह नहीं कह सकता कि कब भ्रष्टाचार की सुंई किसके नाम पर आकर ठहर जाए और कब उसके विरोधी भूखे गिद्धों की तरह उस पर टूट पड़ें.
इसके बाद आरोपों और जवाबी आरोपों का एक नया सिलसिला शुरू हो जाता है और पहले वाले भ्रष्ट को लोग भूल कर नए भ्रष्ट के पीछे हो लेते हैं. ऐसा लगता है कि कोई भी पार्टी यह नहीं कह रही है कि वह और उसके लोग भ्रष्ट नहीं हैं बल्कि वह यह कहते नज़र आते हैं के तुम भी तो भ्रष्ट हो और यह कि भला मेरा भ्रष्टाचार उसके भ्रष्टाचार से बड़ा कैसे.
अब भ्रष्टाचार की यह सुंई घूमते घूमते शीला दीक्षित के नाम पर आकर रुक गई है. सीएजी की रिपोर्ट जो कि शुक्रवार को संसद में पेश की गई में यह खुलासा किया गया है कि कैसे शीला दीक्षित सरकार ने राष्ट्रमंडल खेल से संबंधित परियोजनाओं में व्यर्थ ख़रचा किया है. 23 अबवाब वाली 743 पन्नों की इस रिपोर्ट में कॉमनवेल्थ खेलों में भ्रष्टाचार के लिए एक तरफ जहां आयोजन समिति को जिम्मेदार ठहराया गया है वहीं दूसरी ओर दिल्ली सरकार के साथ ही पीएमओ को भी इस विवाद में खींचा गया है.
रिपोर्ट मिलने के बाद भाजपा ने मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से तुरंत इस्तीफा देने की मांग की. इस रिपोर्ट के बाद खेल मंत्री अजय माकन के इन प्रयासों को भी ज़बरदस्त धक्का लगा जिनमें वह कलमाडी की नियुक्ति का सारा आरोप एनडीए के सिर थोपने में लगे हुए थे. क्योंकि संसद में और उससे बाहर वह ताल ठोंक कर कह रहे थे कि एनडीए ही कलमाडी की नियुक्ति के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार है. अब इस रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि “संगीन आपत्तियाँ” के बावजूद पीएमओ के कहने पर कलमाडी को आयोजन समिति का सरबराह बनाया गया.
सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में सरकार पर यह आरोप लगाया है कि उसने राष्ट्रमंडल खेलों के लिए एक प्रणाली बनायी जिसमें किसी भी प्रकार की जवाबदेही का अभाव था और किसी निगरानी के बिना कमान की यूनिट को छोड़ दिया गया. रिपोर्ट मैं इस बात पर भी िटप्पणी की गई है कि इतना बडा सरकारी पेसा गैर सरकारी अधिकारियों के हाथों में बिना निगरानी और जवाबदेही के छोड़ दिया गया. रिपोर्ट में यह भी खुलासा किया गया है कि आवश्यक निर्णय लेने में असाधारण देरी की गई जिसकी किसी तरह से भी व्याख्या नहीं की जा सकती और देरी के चलते अंतिम समय में एक कृत्रिम तत्काल आवश्यकता का माहौल जानबूझकर पैदा किया गया और उसके चलते टैंडर देने में कानून की अनदेखी और नियमों का उल्लंघन किया गया और मूल से कई गुना अधिक राशि के ठेके दिए गए या वर्क आर्डर दिए गए. और जिन चीजों के लिए ठेके दिए गए उनका स्तर वही था या नहीं इसका निर्धारण नहीं किया गया.
राष्ट्रमंडल के ठेकों में गड़बड़ी और धन की बर्बादी में सीएजी ने पीडबलयूडी, डीडीए, एनडीएमसी और एमसीडी को समान साझीदार बताया है. इसलिए यह कहना ग़लत होगा कि भाजपा का इस मामले से कोई लेना देना नहीं है, क्योंकि भाजपा निगम में सत्ता में है, इसलिए इसका शामिल होना भी इसमें साबित होता है चाहे यह कम या अधिक हो.
दूसरी ओर पीएमओ को भी फंसता हुवा देख कर कांग्रेस हाई कमांड शीला दीक्षित के बचाव में खड़ी हो गई है. सोनिया गांधी की अनुपस्थिति में लिए गए पहले बड़े फैसले में “ग्रुप ऑफ फोर” (जिस में राहुल गांधी मौजूद नहीं थे क्योंकि वह अपनी मां की देखभाल के लिए उनके साथ हैं) और अन्य बड़े नेताओं ने शीला दीक्षित के समर्थन का फैसला किया. शीला दीक्षित का खुलकर समर्थन करते हुए पार्टी ने कहा कि शीला की तुलना यदीयुरप्पा से नहीं की जासकती.
कांग्रेस का यह दोहरा मापदंड उसके गले की हड्डी बन सकता है. क्योंकि अब भाजपा ने कांग्रेस पर दोहरा मापदंड अपनाने का आरोप लगाते हुए हल्ला बोल दिया है. और भाजपा इस मामले को सोमवार को संसद में जोर शोर से उठाने के लिए कमर कस रही है और दूसरी विपक्षी पार्टियां भी यह मौका हाथ से जाने देने के लिए कतई तैयार नहीं हैं और इसे भुनाने की कोशिशों में लगी हैं.
कांग्रेस का कहना है कि वह केवल सीएजी की रिपोर्ट के आधार पर कोई कार्रवाई करने को तैयार नहीं है, यह तो रूटीन की आडिट आबजकशन है और इसका जवाब पीएसी में दिया जाएगा. यदि इसके बाद शीला दीक्षित के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई की जाती है तब ही उनहें इस्तीफा देने के लिए कहा जाएगा. कांग्रेस का कहना है कि सीएजी रिपोर्ट को शीला दीक्षित के खिलाफ सबूत नहीं माना जासकता.
आपको याद होगा कि पिछले अक्टूबर में कलमाडी ने शीला दीक्षित सरकार पर खेल ठेकों में भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे. यह तब हुआ जब दीक्षित ने कलमाडी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया तो अपना रदेअमल जताते हुए कलमाडी ने कहा था कि “संगठन समिति राष्ट्रमंडल खेल 2010 दिल्ली में भ्रष्टाचार पर दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित के आरोप बहुत अधिक निराशाजनक और अनुचित हैं. दूसरों पर उंगलियां उठाना और इशारा करना उचित नहीं, जबकि उन्हें अपने महकमों में भ्रष्टाचार पर खुद नजर डालनी चाहिए.” इस विस्फोटक बयान के बाद जो शीला दीक्षित के संगठन समिति पर कथित भ्रष्टाचार के लिए उंगली उठाए जाने के एक दिन बाद दिया गया था, कलमाडी ने कहा था कि चुप्पी को कमज़ोरी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, और न ही सबर को अपराध स्वीकार चिह्न के रूप में देखा जाना चाहिए.
उस समय दीक्षित ने कहा कि राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार का “संदेह” संगठन समिति जिसके अध्यक्ष सुरेश कलमाडी हैं पर है और उनहोंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा “तुरंत” जांच का आदेश दिए जाने का स्वागत किया था और कहा था कि इससे मकड़जाल साफ हो जाएगा.
मगर अब ऐसा लगता है कि शीला दीक्षित खुद ही अपने बने हुए जाल में फंस गई हैं देर या बदीर उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ सकता है और क्या जाने उनको भी कलमाडी के वर्तमान पते पर स्थानांतरित कर दिया जाए. और दोनों मिलकर यह शेर गुनगुनाते दिखाई दें. . . . . .
आ अनदलीब मिल के करें आह वो ज़ारियाँ
में हाय गुल पुकारूँ, तो चिल्लाए हाय दिल
में हाय गुल पुकारूँ, तो चिल्लाए हाय दिल

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