प्रकाशित: 24 जनवरी 2011
अफीफ अहसन
शुक्रवार की रात को कर्नाटक के राज्यपाल एच आर भारद्वाज के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा के खिलाफ मुकदमा चलाए जाने की अनुमति दिये जाने के बाद शनिवार को उनके खिलाफ दो आपराधिक मामले न्यायाल्य में दर्ज किए गए। वकील सराजिन बाशा और केएल बलराज ने अपनी शिकायत में अन्य लोगों सहित येदियुरप्पा, उनके दो बेटों और दामाद को नामित किया है। शिकायतों में अदालत से मामले का संज्ञान लेते हुए सभी लोगों को सुनवाई के लिए बुलाने का अनुरोध किया है। मुख्यमंत्री येदियुरप्पा के एक बेटे बीवाई राघवेन्दर भाजपा के लोकसभा सदस्य हैं। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सी हिप्पारगी इस मामले की सुनवाई 24 जनवरी को करेंगे। उसी दिन और शिकायतें भी दर्ज की जा सकती है। राज्यपाल के उनके खिलाफ मामले चलाए जाने की अनुमति देने और उनके खिलाफ मामलों के दर्ज होने से मुख्यमंत्री येदियुरप्पा पर इस्तीफा देने का दबाव बनाया जा रहा है। मगर येदियुरप्पा ने ज़ोर देकर कहा कि उन्हें पद छोड़ने की कोई जरूरत नहीं है और वह अंत तक अपना संघर्ष जारी रखेंगे और साबित करेंगे कि वह बेदाग़ हैं। ऐसा लगता है कि वह राज्यपाल के फैसले को चुनौती देने के लिए सोमवार को उच्च न्यायालय की शरण में जा सकते हैं। भाजपा ने येदियुरप्पा के खिलाफ अदालत में दाखिल मामलों का विरोध करते हुए आनन फानन में पूरे राज्य में बंद की अपील कर दी। जिसका काफी असर कर्नाटक की राजधानी बंगलुरू में दिखाई दिया। राज्यपाल के फैसले के खिलाफ भाजपा कार्यकर्ताओं ने कई बसों को आग के हवाले किया और कई स्थानों पर दुकानों पर पथराउ किया जिस से राज्य में जनजीवन प्रभावित हुआ। मगर सत्ता पार्टी का इस तरह बंद करना और तोड़फोड़ करना भोंडे मज़ाक से अधिक कुछ नहीं हो सकता। इस मुद्दे पर राज्यपाल को गृह मंत्री पी चिदंबरम का पूरा समर्थन मिल रहा है। उनका कहना है कि यह कोई पहली बार नहीं है जब किसी राज्यपाल ने मुख्यमंत्री के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दी है।
वास्तविक्ता भी यही है, अतीत में कई राज्यपालों ने मुकदमा चलाए जाने की अनुमति दी थी। महाराष्ट्र के राज्यपाल ने 1982 में उस समय के मुख्यमंत्री एआर अंतुले के खिलाफ उनके सत्ता में रहते किए गए अवैध कामों के लिये मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी थी, मगर जैसे ही एआर अंतुले को यह ज्ञात हुआ कि उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति मिल गई है तो उन्होंने तुरंत इस्तीफा दे दिया। इस मामले में मुख्यमंत्री और राज्यपाल दोनों कांग्रेस के ही थे। बिहार के राज्यपाल एआर किदवाई ने 1997 में उस समय के बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के खिलाफ चारा घोटाले में म़ुकदमा चलाने की अनुमति दे दी थी। इस मामले में लालू प्रसाद के अलावा उनके मंत्री भोला राम तूफानी और विद्या सागर निशाद, केंद्रीय मंत्री सी पी वर्मा और पूर्व मुख्यमंत्री जगननाथ मिश्र पर भी म़ुकदमा चलाया गया था। लालू प्रसाद ने तुरंत अपने पद से इस्तीफा दे दिया था मगर अपनी पत्नी को बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया था। मध्य प्रदेश के राज्यपाल भाई महावीर ने सितम्बर 1998 में मध्य प्रदेश सरकार के दो मंत्रियों, जिन्हें कि लोक आयुक्त ने आरोपी बताया था के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी थी। उस समय मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और राज्यपाल भारतीय जनता पार्टी के थे। उन लोगों के ख़िल़ाफ आरोप था कि उन्होंने इंदौर विकास प्राधिकरण द्वारा एकवायर की गई सात एकड भूमि उसके पूर्व मालिक को लौटा दी थी। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया और इस पर 2004 में निर्णय सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यपाल को ऐसा करने का पूरा अधिकार है। कर्नाटक के मौजूदा लोक आयुक्त न्यायाधीश संतोष हेगड़े सुप्रीम कोर्ट की उस बेंच में शामिल थे जिसने यह निर्णय सुनाया था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का यह सेटिल्ड ला है कि इस देश का कानून है कि राज्यपाल खुद मुख्यमंत्री और मंत्रियों के ऊपर मुकदमा चलाने की अनुमति देने का सक्षम है।
अब सवाल यह पैदा होता है कि येदियुरप्पा कब तक इस्तीफा देने से बच सकते हैं। ऐसा माना जा रहा है कि जब तक अदालत उन्हें सम्मन नहीं जारी करती तब तक उन्हें इस्त़ीफा देने की कोई जरूरत नहीं है, लेकिन जिस दिन उन्हें सम्मन जारी किया गया तो उन्हें अदालत में पेश होने से पहले इस्तीफा देना पड़ सकता है। कुछ और लोगों का एसा मान्ना है कि जब तक उनके खिलाफ आरोप पत्र नहीं दाखिल किया जाता तब तक येदियुरप्पा इस्तीफा देने से बच सकते हैं। 2009 में जब वीरभद्र सिंह जो हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री और एक केंद्रीय मंत्री हैं के विरूध ठीक इन्हीं धाराओं के अंतर्गत एफ़आईआर दर्ज की गई जिसमें येदियुरप्पा के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है, तो कांग्रेस ने कहा था कि उन्हें इस्तीफा देने की आवश्यकता नहीं और उन्होंने किया भी ऐसा ही। एक बार येदियुरप्पा ने इस्तीफा दे दिया तो उनका राजनीतिक करियर तो चौपट हुआ समझो, क्योंकि अतीत में जिस किसी भी भाजपा के मुख्यमंत्री ने इस्तीफा दिया था, वह फिर से मुख्यमंत्री नहीं बन सका।
मदन लाल खुराना, जो दिल्ली के पहले भाजपा के मुख्यमंत्री और ईमानदार और बड़े नेता थे को 1996 में मुख्यमंत्री के पद से सिर्प इसलिए इस्तीफा देना पड़ा था कि जैन हवाला कांड में खुराना का नाम जैन डायरी में लिखा हुआ था और लोगों ने आरोप लगाया कि यह मदन लाल खुराना का ही नाम है। क्योंकि मदन लाल खुराना एक सच्चे ओर नेक इंसान हैं और इस मामले से उनका दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं था इसलिए उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और मामले का सामना किया जिसमें उन्हें क्लीन चिट मिल गई, मगर पार्टी ने फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं दी और मरहूम साहब सिंह वर्मा को ही मुख्यमंत्री बनाए रखा ओर इस के बाद उन्हें पार्टी के भीतर और बाहर बहुत से उतार चढ़ाव देखने पड़े। भाजपा में उन के अपनों ने भी उनका साथ नहीं दिया और वह अपने को ठगा हुवा महसूस कर रहे हैं। यह खुराना ही थे जिन्होंने केदाराथ साहनी ओर विजय कुमार मल्होत्रा के साथ 1960 से लेकर 2000 तक चार दशकों तक पार्टी को जिंदा रखा। 1984 में इंदिरा गांधी की शहादत के तुरंत बाद हुए चुनाव में भाजपा का सफाया हो गया था लेकिन यह खुराना ही थे जिन्होंने दिल्ली भाजपा को नया जीवन दिया। 1994 में हूबली की ईदगाह पर तिरंगा लहराने को लेकर हुए दंगों के चलते उमा भारती के ऊपर एक मामला दर्ज हुआ था और इसमें 2004 में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री होते हुए उनके खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी किया गया था।
पार्टी ने यह सोचा कि यह सही समय है कि इस मामले से राजनीतिक लाभ उठाया जाए इसलिए उसने उमा भारती को इस्तीफा देने के लिए कहा और हूबली तक की यात्रा निकाली ताकि इससे राजनीतिक लाभ उठाया जा सके। उनके बाद बाबूलाल गोड़ को मुख्यमंत्री बनाया गया था मगर फिर पार्टी ने उमा भारती को दोबारा मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपने से इनकार कर दिया और उसके बाद उनका भी राजनीतिक करियर चौपट हो गया। येदियुरप्पा इन दिनों दिल्ली में हैं और इस फिराक में लगे हुए हैं कि पार्टी उनके इस्तीफा न देने की बात को मान ले और वह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने रहे मगर पार्टी मैं उनके विरोधी भी हैं और वे चाहते हैं कि यह अच्छा मौका है कि उनका इस्तीफा दिलवाकर उसका सारा आरोप कांग्रेस और उसके राज्यपाल पर मढ़ दें ताकि साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।

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