प्रकाशित: 21 फरवरी 2011
अफीफ अहसन
बुधवार को मनमोहन सरकार ने एक और घोटाला कर दिया। यह घोटाला संवाददाता सम्मेलन का था। मनमोहन सिंह ने एक प्रेस कांपेंस बुलाई। इस संबंध में पक्षपात से काम लेते हुए केवल चुने हुऐ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बड़े बड़े संपादकों को ही बुलाया गया। प्रिंट मीडिया को इससे दूर रखा गया। एक बात समझ में नहीं आती कि पारम्परिक मीडिया को इस संवाददाता सम्मेलन से अलग क्यों रखा गया?
ऐसा लगता है कि यह प्रेस कांपेंस एक नाटक से ज्यादा कुछ नहीं थी, जिसका क्रिप्ट पहले से तैयार था। क्योंकि एक नाटक में वीज़ोअल का बहुत अधिक महत्व होता है शायद इसी लिए केवल वीज़ोअल मीडिया (टीवी वालों) को बुलाया गया था। मनमोहन सिंह ने कुछ तो रटे रटाए उत्तर दिए ओर कुछ लंबे चौड़े उत्तर उन्होंने पढ़कर सुनाए, इस सब से साफ पता चलता है कि उन्हें पहले से पता था कि कौन क्या सवाल करेगा, या यह भी हो सकता है संवाद पहले ही लिखे जा चुके थे और केवल पात्रों को उन्हें मात्र अदा करना था।
अपने टीवी कार्पामों के विपरीत हर व्यक्ति बहुत ही धैर्य का प्रदर्शन कर रहा था और प्रश्न ऐसे पूछ रहा था जेसे कि मरहम पट्टी से पहले घाव को पोछा जाता है। टीवी चैनलों के कार्पाम में आम तौर पर दिखाई जाने वाली बेमतलब की चीख पुकार ओर गरमा गरमी का दूर दूर तक कोई पता नहीं था। मगर जब देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के विचार और उत्तर सुने तो बहुत दुख हुआ। एक उत्तर में मनमोहन सिंह ने बहुत मासूमियत से कहा कि हां मुझसे कुछ गलतियां हुई है लेकिन में कोई गुनाहगार या अपराधी नहीं। मैं भी एक इंसान हूँ, इसलिए त्रुटियाँ मुझसे हो सकती हैं, और मैं तो मान ही रहा हूं कि हां मैंने गलती की है। उन्होंने कहा कि गठबंधन सरकार चलाने की कुछ कीमत तो अदा करनी ही पड़ती है जो उन्होंने भी अदा की है। मगर क्या 176,000 करोड़ रूप्य कुछ जयादा मूल्य अदा नही किया गया? अगर उन्होंने राजा की तरह पहले आओ पहले पाओ फार्मूला अपनाकर इतनी भारी कीमत चुकाने के बजाय एक ओपन टेंडर (चुनाव) किया होता कि जनता ही बताए कि इस गठबंधन को बनाए रखने के लिए देश क्या भुगतान करने को तैयार है तो वह कहीं अधिक लाभ में रहते। हालांकि जयललिता ने बहुत पहले यह आ़फर दे दिया था कि राजा के खिलाफ किसी कार्रवाई की स्थिति में अगर डीएमके उनका साथ छोड़ दे तो वह सरकार का साथ देने के लिए तैयार हैं, मगर न जाने और क्या मजबूरी थी कि राजा के खिलाफ कार्रवाई टाली जाती रही।
मनमोहन सिंह के अनुसार उन्होंने देश की जनता पर कई एहसान किए हैं। एक एहसान यह किया है कि देश को मध्यवधी चुनाव से छुटकारा दिलाया इस तरह उन्होंने देश के कुछ सौ करोड़ रुपए बचालिये हैं मगर इस राशि को बचाने में उनको भ्रष्टाचार से जो समझौता करना पड़ा उसके बदले देश का कई लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
यह बयान उनके और उनकी पार्टी के सात साल पहले दिए गए बयान और मैऩीफेस्टो से बिल्कुल अलग है जिसमें बड़े ज़ोर शोर से यह दावा किया गया था कि यह आम आदमी की सरकार होगी और उसके लाभ के लिए काम करेगी। राज करने के लिए सरकार नहीं होगी बल्कि आम आदमी के दुख दूर करने के लिए हकूमत की जाएगी।
ऐसा लगता है कि शायद काँग्रेस जनों का यह बयान राजा रंति के भागवतपुराण में अदा किए इन शब्दों से ही प्रभावित था जिसमें उन्हें कहते हुए कहा गया हैः
त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम्।
कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्।।
अर्थात तो मुझे राज्य, न स्वर्ग और न ही मुक्ति की इच्छा है, मैं तो केवल दुःख से संतप्त प्राणियों के कष्टों का नाश चाहता हूँ।
मगर सत्ता प्राप्ति के बाद कांग्रेस की कथनी और करनी में स्पष्ट अंतर पैदा हो गया। इसमें मनमोहन सिंह की कोई गलती नहीं है और वह इस सबसे बड़ी आसानी से बच सकते हैं। लोग जरूर सवाल करें गे कि वह कैसे बच सकते हैं तो इसका जवाब यह है कि वह कलयुग में जी रहे हैं और उन का कोई दायित्व नहीं बनता कि वह स्वयं अकेले कलयुग में जीते हुए सतयुग की बातें करें।
लोग अक्सर यह सवाल करते हैं कि कलयुग क्या है तो उनकी जानकारी के लिए कलयुग की परिभाषा यहाँ पर पेश की जा रही है। भागवतपुराण में कलयुग का बयान कुछ इस तरह किया गया है बुराई कलयुग की विशेषता है। माल लोगों के लिए सब कुछ है और पवित्र जीवन का कोई मूल्य नहीं है। ताकत ही सही है। कारोबार का मतलब धोखा है। न्यायालयों में गरीब को न्याय नहीं कमलता। लोग लंबे बाल रखेंगे। भेदभाव और भ्रष्टाचार हावी होंगे। राजा चोर और लुटेरे हैं।
उन्होंने जिस यूपीए गठबंधन सरकार की नींव डाली थी, वह सात साल से सिर्प शासन कर रही है। गौरतलब है कि जब से यूपीए सत्ता में आई है तब से देश में भ्रष्टाचार का बोल बाला है, आदर्श सोसाइटी घोटाला, राष्ट्रमंडल खेल घोटाला और 2 जी घोटाला आप सब के सामने हैं, बढ़ती महंगाई ने जीवन अस्त व्यस्त और बर्बाद कर दिया है।
इन सब बातों पर सफाई देने के लिए इतने दिनों तक मनमोहन सिंह ने कोई प्रेस कॉन्पेंस नहीं की। मगर जब मामला उनके कार्यालय का आया तो उन्हें सफाई देने की जरूरत पेश आई। मामला है देवास-इसरो डील का। इस डील में उनके कार्यालय पर उंगलियां उठ रही थीं और एक चैनल उनके खिलाफ पूरा अभियान चलाए हुए था। इस चैनल के एडीटर को उन्होंने संवाददाता सम्मेलन में सवाल पूछने का पूरा अवसर दिया और उनके प्रश्न का उत्तर मनमोहन सिंह ने पहले से तैयार लिखित उत्तर से पढ़ कर दिया।
जब राष्ट्रमंडल खेलों में हुए घोटाले के जिम्मेदार अधिकारियों को जमानत मिलने की बात पूछी गई तो उन्होंने कहा कि इस देश का एक कानून है और उसके अनुसार कार्य चलता है। उन्होंने यह सफाई पेश नहीं की कि सीबीआई ने क्यों समय रहते आरोप पत्र दाखिल नहीं किया और इस तरह परदे के पीछे से आरोपियों की मदद की और इस कारण आरोप पत्र दाखिल न होने के चलते उनहैं जमानत मिल गई।
जब उनसे यह पूछा गया कि वह अपनी सरकार को दस में से कितने नंबर देते हैं तो उन्होंने अपनी सरकार को सात नंबर दिए। हो सकता है कि उन्होंने यह समझा हो कि उनसे उनकी सरकार की उम्र पूछी जा रही है और यह भी हो सकता है कि उन्होंने हर साल के लिए अपनी सरकार को दस में से एक नंबर दिया हो और उसे जोड कर इस तरह सात वर्षीय कार्यकाल में यह संख्या जमा कर ली हो क्योंकि संख्या के खेल में तो वह विशेषज्ञ हैं ही। अगर जनता से पूछा जाता तो वह उनकी सरकार को दस में से एक नंबर भी नहीं देती।
मनमोहन सिंह का कहना है कि मीडिया हर समय उन्हें गुनाहगार की तरह पेश करता है, जो गलत है, मैं सबके सामने पूरे देश की जनता से वादा करता हों की दोषियों को अवश्य सजा मिलेगी। जिन्होंने जो गलत किया है इसका दंड उन्हें भुगतना ही होगा लेकिन मेरी भी कुछ मजबूरियां है, हम एक गठबंधन सरकार चला रहे हैं।
ऐसा लगता है कि मनमोहन सिंह इस बात को स्वीकार करके कि उन्होंने सत्ता में बने रहने के लिए मूल्यों के साथ समझौता किया है यह दलील पेश करना चाहते हैं के जवाबदेही की जिम्मेदारी सरकार में बने रहने की आवश्यकता पर निर्भर करती है। मनमोहन सिंह के संवाददाता सम्मेलन का लब्बोलबाब यह रहा कि वह नहीं दबते तो देश को चुनाव का सामना करना पड़ता जो भ्रष्टाचार से अधिक विनाशकारी होता।
ऐसा लगता है कि यह प्रेस कांपेंस एक नाटक से ज्यादा कुछ नहीं थी, जिसका क्रिप्ट पहले से तैयार था। क्योंकि एक नाटक में वीज़ोअल का बहुत अधिक महत्व होता है शायद इसी लिए केवल वीज़ोअल मीडिया (टीवी वालों) को बुलाया गया था। मनमोहन सिंह ने कुछ तो रटे रटाए उत्तर दिए ओर कुछ लंबे चौड़े उत्तर उन्होंने पढ़कर सुनाए, इस सब से साफ पता चलता है कि उन्हें पहले से पता था कि कौन क्या सवाल करेगा, या यह भी हो सकता है संवाद पहले ही लिखे जा चुके थे और केवल पात्रों को उन्हें मात्र अदा करना था।
अपने टीवी कार्पामों के विपरीत हर व्यक्ति बहुत ही धैर्य का प्रदर्शन कर रहा था और प्रश्न ऐसे पूछ रहा था जेसे कि मरहम पट्टी से पहले घाव को पोछा जाता है। टीवी चैनलों के कार्पाम में आम तौर पर दिखाई जाने वाली बेमतलब की चीख पुकार ओर गरमा गरमी का दूर दूर तक कोई पता नहीं था। मगर जब देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के विचार और उत्तर सुने तो बहुत दुख हुआ। एक उत्तर में मनमोहन सिंह ने बहुत मासूमियत से कहा कि हां मुझसे कुछ गलतियां हुई है लेकिन में कोई गुनाहगार या अपराधी नहीं। मैं भी एक इंसान हूँ, इसलिए त्रुटियाँ मुझसे हो सकती हैं, और मैं तो मान ही रहा हूं कि हां मैंने गलती की है। उन्होंने कहा कि गठबंधन सरकार चलाने की कुछ कीमत तो अदा करनी ही पड़ती है जो उन्होंने भी अदा की है। मगर क्या 176,000 करोड़ रूप्य कुछ जयादा मूल्य अदा नही किया गया? अगर उन्होंने राजा की तरह पहले आओ पहले पाओ फार्मूला अपनाकर इतनी भारी कीमत चुकाने के बजाय एक ओपन टेंडर (चुनाव) किया होता कि जनता ही बताए कि इस गठबंधन को बनाए रखने के लिए देश क्या भुगतान करने को तैयार है तो वह कहीं अधिक लाभ में रहते। हालांकि जयललिता ने बहुत पहले यह आ़फर दे दिया था कि राजा के खिलाफ किसी कार्रवाई की स्थिति में अगर डीएमके उनका साथ छोड़ दे तो वह सरकार का साथ देने के लिए तैयार हैं, मगर न जाने और क्या मजबूरी थी कि राजा के खिलाफ कार्रवाई टाली जाती रही।
मनमोहन सिंह के अनुसार उन्होंने देश की जनता पर कई एहसान किए हैं। एक एहसान यह किया है कि देश को मध्यवधी चुनाव से छुटकारा दिलाया इस तरह उन्होंने देश के कुछ सौ करोड़ रुपए बचालिये हैं मगर इस राशि को बचाने में उनको भ्रष्टाचार से जो समझौता करना पड़ा उसके बदले देश का कई लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
यह बयान उनके और उनकी पार्टी के सात साल पहले दिए गए बयान और मैऩीफेस्टो से बिल्कुल अलग है जिसमें बड़े ज़ोर शोर से यह दावा किया गया था कि यह आम आदमी की सरकार होगी और उसके लाभ के लिए काम करेगी। राज करने के लिए सरकार नहीं होगी बल्कि आम आदमी के दुख दूर करने के लिए हकूमत की जाएगी।
ऐसा लगता है कि शायद काँग्रेस जनों का यह बयान राजा रंति के भागवतपुराण में अदा किए इन शब्दों से ही प्रभावित था जिसमें उन्हें कहते हुए कहा गया हैः
त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम्।
कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्।।
अर्थात तो मुझे राज्य, न स्वर्ग और न ही मुक्ति की इच्छा है, मैं तो केवल दुःख से संतप्त प्राणियों के कष्टों का नाश चाहता हूँ।
मगर सत्ता प्राप्ति के बाद कांग्रेस की कथनी और करनी में स्पष्ट अंतर पैदा हो गया। इसमें मनमोहन सिंह की कोई गलती नहीं है और वह इस सबसे बड़ी आसानी से बच सकते हैं। लोग जरूर सवाल करें गे कि वह कैसे बच सकते हैं तो इसका जवाब यह है कि वह कलयुग में जी रहे हैं और उन का कोई दायित्व नहीं बनता कि वह स्वयं अकेले कलयुग में जीते हुए सतयुग की बातें करें।
लोग अक्सर यह सवाल करते हैं कि कलयुग क्या है तो उनकी जानकारी के लिए कलयुग की परिभाषा यहाँ पर पेश की जा रही है। भागवतपुराण में कलयुग का बयान कुछ इस तरह किया गया है बुराई कलयुग की विशेषता है। माल लोगों के लिए सब कुछ है और पवित्र जीवन का कोई मूल्य नहीं है। ताकत ही सही है। कारोबार का मतलब धोखा है। न्यायालयों में गरीब को न्याय नहीं कमलता। लोग लंबे बाल रखेंगे। भेदभाव और भ्रष्टाचार हावी होंगे। राजा चोर और लुटेरे हैं।
उन्होंने जिस यूपीए गठबंधन सरकार की नींव डाली थी, वह सात साल से सिर्प शासन कर रही है। गौरतलब है कि जब से यूपीए सत्ता में आई है तब से देश में भ्रष्टाचार का बोल बाला है, आदर्श सोसाइटी घोटाला, राष्ट्रमंडल खेल घोटाला और 2 जी घोटाला आप सब के सामने हैं, बढ़ती महंगाई ने जीवन अस्त व्यस्त और बर्बाद कर दिया है।
इन सब बातों पर सफाई देने के लिए इतने दिनों तक मनमोहन सिंह ने कोई प्रेस कॉन्पेंस नहीं की। मगर जब मामला उनके कार्यालय का आया तो उन्हें सफाई देने की जरूरत पेश आई। मामला है देवास-इसरो डील का। इस डील में उनके कार्यालय पर उंगलियां उठ रही थीं और एक चैनल उनके खिलाफ पूरा अभियान चलाए हुए था। इस चैनल के एडीटर को उन्होंने संवाददाता सम्मेलन में सवाल पूछने का पूरा अवसर दिया और उनके प्रश्न का उत्तर मनमोहन सिंह ने पहले से तैयार लिखित उत्तर से पढ़ कर दिया।
जब राष्ट्रमंडल खेलों में हुए घोटाले के जिम्मेदार अधिकारियों को जमानत मिलने की बात पूछी गई तो उन्होंने कहा कि इस देश का एक कानून है और उसके अनुसार कार्य चलता है। उन्होंने यह सफाई पेश नहीं की कि सीबीआई ने क्यों समय रहते आरोप पत्र दाखिल नहीं किया और इस तरह परदे के पीछे से आरोपियों की मदद की और इस कारण आरोप पत्र दाखिल न होने के चलते उनहैं जमानत मिल गई।
जब उनसे यह पूछा गया कि वह अपनी सरकार को दस में से कितने नंबर देते हैं तो उन्होंने अपनी सरकार को सात नंबर दिए। हो सकता है कि उन्होंने यह समझा हो कि उनसे उनकी सरकार की उम्र पूछी जा रही है और यह भी हो सकता है कि उन्होंने हर साल के लिए अपनी सरकार को दस में से एक नंबर दिया हो और उसे जोड कर इस तरह सात वर्षीय कार्यकाल में यह संख्या जमा कर ली हो क्योंकि संख्या के खेल में तो वह विशेषज्ञ हैं ही। अगर जनता से पूछा जाता तो वह उनकी सरकार को दस में से एक नंबर भी नहीं देती।
मनमोहन सिंह का कहना है कि मीडिया हर समय उन्हें गुनाहगार की तरह पेश करता है, जो गलत है, मैं सबके सामने पूरे देश की जनता से वादा करता हों की दोषियों को अवश्य सजा मिलेगी। जिन्होंने जो गलत किया है इसका दंड उन्हें भुगतना ही होगा लेकिन मेरी भी कुछ मजबूरियां है, हम एक गठबंधन सरकार चला रहे हैं।
ऐसा लगता है कि मनमोहन सिंह इस बात को स्वीकार करके कि उन्होंने सत्ता में बने रहने के लिए मूल्यों के साथ समझौता किया है यह दलील पेश करना चाहते हैं के जवाबदेही की जिम्मेदारी सरकार में बने रहने की आवश्यकता पर निर्भर करती है। मनमोहन सिंह के संवाददाता सम्मेलन का लब्बोलबाब यह रहा कि वह नहीं दबते तो देश को चुनाव का सामना करना पड़ता जो भ्रष्टाचार से अधिक विनाशकारी होता।

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