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Monday, 14 February 2011

अगर सोनिया गांधी की नसीहत पर अमल किया होता


प्रकाशित: 14 फरवरी 2011

अफीफ अहसन

अगर कृष्णा ने सोनिया गांधी की नसीहत पर अमल किया होता उन की ऐसी किरकिरी नहीं होती जैसी पिछले दिनों संयुक्त संघ में हुआ। ये उनकी उम्र का तकाज़ा कहा जाय या लापरवाही कि उन्होंने अपने भाषण के बजाए पुर्तगाल के मंत्री का भाषण पढ़ डाला।

थोड़ी सी लापरवाही विदेश मंत्री एस एम कृष्णा की संयुक्त राष्ट्र में चल रही जी -4 की बैठक में किरकिरी का सबब बन गई। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कृष्णा ने अपने भाषण के बदले पुर्तगाल के मंत्री के भाषण पढ़ना शुरू कर दिया। बाद में भारतीय राजदूत हरदीप सिंह ने उन्हें गलती का एहसास दिलाया और उनके भाषण की प्रति दी। इससे पहले कृष्णा 3 मिनट तक पुर्तगाली प्रधानमंत्री का भाषण पढ़ चुके थे। आश्चर्य तो यह है कि बाद में उन्होंने यह भी पढ़ दिया कि आज यहां पुर्तगाली बोलने वाले दो देश पुर्तगाल और ब्राजील एक साथ हैं। मुझे इस बात पर बेहद संतोष है और उसे प्रगट करने की अनुमति दी जाए। खास बात यह है कि पुर्तगाली के मंत्री पहले ही यह भाषण पढ़ चुके थे। विदेश मंत्री एस एम कृष्णा को समझ ही नहीं आया कि वह क्या कह रहे हैं। उनके भाषण में कहीं भी भारत का उल्लेख नहीं था। बातें पुर्तगाल की हो रही थीं लेकिन कृष्णा को कुछ अजीब नहीं लगा। उन्होंने कागज उठाकर बस पढ़ना शुरू किया तो तीन मिनट तक पढ़ते ही चले गए। जब भारतीय अधिकारी ने कृष्णा को उनकी गलती का एहसास कराया तो कृष्णा ने सही कागज लेकर भाषण पढ़ना शुरू किया।

कृष्णा ने अपना भाषण कुछ यूं शुरू किया। सम्मान महासचिव, मेरे प्रिय साथयों और सभी देशों से आए प्रतिनिधियों। इस अवसर पर सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष के रूप में ब्राजील के नेता नतानीव पेट्रोटा की सराहना करना चाहता हूँ। उन्होंने समय रहते छोटे देशों को विभिन्न कार्यों के लिए फंड देने के लिए नई बहस छेड़ी। मैं उन्हें बधाई देना चाहता हूँ। छोटा मुँह बड़ी बात होगी लेकिन मेरी खुश नसीब है कि यहां पर पुर्तगाली बोलने वाले देशों की समिति के सदस्य हैं। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र में तैनात भारतीय राजदूत ने कृष्णा को रोका और सही कागज से भाषण पढ़ने को कहा। कृष्णा ने रुककर फिर भारत का भाषण पढ़ा जिसमें उन्होंने फिर ग़लती कर दी और कहने लगे। श्री राष्ट्रपति हमारे राष्ट्रपति महात्मा गांधी ने कहा था। पिछले दिनों हरियाणा के दिवंगत सवतंत्रता सेनानी और हुड्डा के पिता की याद में स्मृति टिकट जारी करते हुए सोनिया गांधी ने पार्टी के बुजुर्ग नेताओं को सत्ता ओर राजनीति से बोरिया बिस्तर स्वयं बांध लेने का बेबाक संकेत कर दिया था। कांग्रेस अध्यक्ष के इस इशारे को संगठन और सत्ता में नई पीढ़ी का रास्ता खोलने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा था।  सरकार और संगठन की कुर्सी पर लंबे समय से काबिज पार्टी के बड़े नेताओं को सोनिया गांधी ने खुद ही संन्यास लेने की यह नसीहत मंगलवार को आजादी के सिपाही चौधरी रणबीर सिंह की याद में डाक टिकट जारी करते हुए दी थी। हाई कमान का संकेत विशेष रूप पर उनके लिए था जो 70-80 साल की उम्र पार करने के बावजूद कुर्सी नहीं छोड़ना चाहते। रणबीर सिंह के 64 साल की उम्र में राजनीति से सन्यास लेने का उदाहरण देते हुए सोनिया ने कहा कि सबको यह सोचना चाहिए कि हम नई पीढ़ी के लिए क्या उदाहरण पेश कर रहे हैं। अगर सोनिया गांधी की नसीहत पर अमल करते हुए कृष्णा ने अपने पद से सवंय सन्यास धारण कर लिया होता तो आज उनकी और देश की इतनी फज़ीहत नहीं होती। मगर क्या कहें देश के सबसे बुज़ुर्ग राजनीतिक दल में बुज़ुर्गों का ही बोलबाला है, जिस की वजह से नई पीढ़ी के राजनीतिज्ञ आगे नहीं आपाते। कुछ नेता तो ऐसे हैं जिनके बारे में यह कहा जा सकता है कि मुंह में दांत नहीं, और पेट में आंत नहीं मगर इनहें सत्ता से चिपके रहने में ही मज़ा आता है।

जहां एक ओर विश्व के सभी प्रमुख देशों में कम उमर लोग सत्ता धारी हैं वहीं भारत की सरकार में आधे से अधिक मंत्री अपनी आयु की 60 से अधिक बहारें देख चुके हैं। श्री कृष्णा मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल के सबसे बुजुर्ग मंत्री हैं वे 77 साल के हैं। प्रणब  मुखर्जी की उम्र 75 साल है, वीरभद्र  सिंह बीके हांडीक की 76 साल, मुरली देवड़ा 74 साल, फारूक अब्दुल्ला वयालार रवि की उम्र 73 साल, शरद पवार, वीरप्पा मोइली ओर ऐ के एंटनी की उम्र 70 साल, स्शील कुमार शिंदे और जयपाल रेड्डी की उम्र 69 साल, अम्बिका सोनी और मलिक अर्जुन खडगे की उम्र 68 वर्ष है।  जिस देश की आबादी की औसत उम्र 26 साल हो उस देश की सरकार की औसत उम्र 60 साल है जो आने वाली पीढ़ी के लिए प्लानिंग और उस पर अमल के लिए जिम्मेदार है। यही नहीं प्लानिंग कमीशन में भी बड़ी उम्र के लोगों का बोलबाला है। खुद मोंटेक सिंह अहलूवालिया की उम्र 67 साल है और उसके सदस्यों का तो कहना ही क्या। दरअसल बड़ी उम्र के यही लोग नई उम्र के नेताउाsं की राह का रोडा हैं। क्योंकि ये लोग सत्ता में रहने की अपनी इच्छा को नहीं दबा पाते ओर मंत्री बनने का लालच नहीं छोड़ते इसलिए नई पीढ़ी के लोगों के लिए मंत्रिमंडल में जगह नहीं बचती। जब यूपीए एक का मंत्रिमंडल बना था तब यह सोचा जा रहा था कि मनमोहन सिंह नई पीढ़ी के लोगों को और कम उम्र के लोगों को मंत्रिमंडल में दिल खोलकर जगह देंगे और नई पीढ़ी को पार्टी ओर सरकार के साथ जोड़ने के लिए एक सकारात्मक संकेत देंगे मगर ऐसा नहीं हुआ। और यूपीए दो में भी कम जयादा उन्हीं पुराने लोगों को जगह दी गई। यही नहीं नए लोगों को सत्ता के लिए तैयार करने के लिए भी कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया गया है। हाला की राहुल गांधी देश भर में घूम कर नई पीढ़ी को कांग्रेस से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं मगर ऐसा लगता है कि इस अभियान में वह अकेले ही हैं सरकार द्वारा इस संबंध में कोई व्यापक नीति नहीं अपनाई गई है। 47 साल की उम्र में ओबामा अमेरिका के पांचवें कम उम्र राष्ट्रपति बन गए, रोजवेलट के बाद जो केवल 42 साल की उम्र में ही अमेरिका के राष्ट्रपति बन गए थे। टोनी बलेयर 44 साल की उम्र में बर्तानिया के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री बन गए थे।

 इससे पहले 1812 में लार्ड लीवरिपूल ब्रिटेन के कम उम्र प्रधानमंत्री बने थे। स्वर्गीय राजीव गांधी 40 साल की उम्र में भारत के प्रधानमंत्री बने थे और उनकी सरकार में भी काफी संख्या में युवा मंत्री शामिल थे। इसके विपरीत मनमोहन सिंह मंत्रालय में बुजुर्गों की भरमार है। एक कहावत है कि `जस राजा तस प्रजा' पर यहां तो यह कहना पड़ेगा कि `जस राजा तस मंत्री'।

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