प्रकाशित: 24 मार्च 2011
अफीफ अहसन
पाकिस्तान में इस्लामी और शरई कानून के गलत ओर बेजा उपयोग की बातें बहुत आम हैं। उन्हें लेकर यूरोप से लेकर अमेरिका तक हमेशा पाकिस्तान को लानत मलामत का सामना रहता है। अमेरिकी मीडिया और यूरोपीय मीडिया इस के खिलाफ बराबर कलम उठाते रहे हैं खासकर कसास और दीयत का कानून तो हमेशा आलोचना का विषय बनता रहा है। यही नहीं पाकिस्तानी धर्मनिरपेक्ष मीडिया भी इस कानून का लगातार विरोध करता रहा है और यह कहा जाता रहा है कि कसास और दीयत का कानून समाप्त किया जाए। मगर धार्मिक दलों द्वारा इस कानून के जोर दार समर्थन करती रही है और उसके समर्थन में लगातार हदीसें और कुरान की आयतें पेश की जाती रही हैं।
पाकिस्तान में ऐसे मामलों में जिनमें कातिल और मकतूल एक ही खानदान के व्यक्ति होते हैं, बाकी वारिसों द्वारा कातिल को माफ कर दिया जाना एक सामान्य सी बात है। विशेष कर कारोकारी यानी सम्मान और नामूस के नाम पर महिलाओं की हत्या के मामलों में जिनमें हत्यारे अधिकतर उनके परिवार के सदस्य ही होते हैं। क्योंकि बाकी सभी परिवार वाले कातिल के साथ हत्या के सिलसिले में सहमत होते हैं इसलिए वह कातिल को माफ कर देते हैं और इस तरह एक कातिल बड़ी आसानी से कानून की पकड़ से मुक्त हो जाता है और उसका बाल भी बांका नहीं किया जा सकता।
इस कानून को एमनेस्टी इंटरनेशनल और अन्य विश्व संस्थाओं द्वारा सख्त आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। आम पाकिस्तानी इस आलोचना को धार्मिक मामलों में बेवजह हस्तक्षेप समझता है और मानता है कि ऐसा इस्लाम को बदनाम करने के लिए किया जा रहा है।
जब लाहौर में दो पाकिस्तानी नागरिकों की गोली मार कर हत्या करने वाले अमेरिकी अधिकारी रेमन्ड डेविस को मरने वालों के परिजनों द्वारा क्षमा कर दिया गया ओर इसके बाद अदालत के आदेश पर रिहा कर दिया गया जिसमें परिजनों के वकील के अनुसार अमरीकी अधिकारियों ने दीयत के मद में बीस करोड़ रुपए की बड़ी राशि का भुगतान किया गया जो सभी वारिसों को कानून के अनुसार वितरित होगी और मरने वालों के अठारह वारिस अदालत में पेश हुए थे। यही नहीं अवैध हथियारों के मामले में रेमन्ड डेविस को केवल चालीस दिन की कैद और बीस हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई गई जिसके बाद जुर्माने की रकम का तुरंत भुग्तान कर दिया गया जबकि कारावास की अवधि जो रेमन्ड ने हिरासत में गुजारी मानी गई ओर रेमन्ड को हिरासत से तुरंत रिहा कर देश से बाहर जाने दिया गया।
आज कसास और दियत के इसी कानून की कड़ी आलोचना करने वाले अमेरिका को यह खुदा की दी हुई नेमत महसूस हो रहा है।अमेरिका अब इस कानून के डेविस के मामले में इस्तेमाल को हर तरह से वैध ठहराने में लगा हुआ है। इस्लामाबाद में अमेरिकी राजदूत कैमरून मंट्र की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि मरने वालों के प रिजनों ने रेमन्ड डेविस को क्षमा कर दिया है और मैं इस कृपा के लिए परिजनों का शुक गुजार हूं।
पाकिस्तान में इस कानून के इस तरह डेविस के पक्ष में इस्तेमाल किए जाने पर चारों ओर प्रदर्शन हो रहे हैं।
यही नहीं इस कानून का लगातार समर्थन और वकालत करने वाली पार्टियां कसास और दियत कानून के सीआईए के ठेकेदार रेमन्ड डेविस को क्षमादान करने में प्रयोग को बिल्कुल अवैध मान रही हैं और हर तरफ इसकी निंदा की जा रही है। रेमन्ड डेविस के खिलाफ पाकिस्तान भर में धार्मिक दलों ने प्रदर्शन किए हैं। आज वह ही धार्मिक दल जो इस कानून के वैध एंव अवांछित उपयोग के समर्थन में मरी जा रही थीं, अब इस उपयोग के खिलाफ किला बंद हैं और उसके डेविस के मामले में इस तरह उपयोग किए जाने पर मरी जा रही हैं।
इस कानून के कारण रेमन्ड डेविस दो दो हत्या करने के बावजूद पाकिस्तानी जेल से ऐसे रिहा हो गया जैसे मक्खन से बाल निकल जाता है और उसकी रिहाई को अब सरकार में बैठे वही लोग वैध करार दे रहे हैं जो बड़े जोर शोर से यह दावा करते हुए नहीं थकते थे कि वह रेमन्ड डेविस को हर कीमत पर सजा दिला कर ही दम लेंगे और चाहे कुछ भी हो यह रिहा नहीं किया जाएगा ओर पाकिस्तान किसी भी सूरत में अमेरिका के गीदड़ भबकी से डरने वाला नहीं है।
दरअसल पहले पाकिस्तान में भारत की तर्ज पर ही एक कानून था जो हत्या को राज्य के खिलाफ किया गया एक अपराध मानता था मगर कसास और दियत का यह कानून एक न्यायाधीश के नेतृत्व में वास्तव में जिया के सैनिक शासन के दौरान पाकिस्तान के इस्लामीकरण के वकत बना था। लेकिन इससे कहीं जुल्फिकार अली भुट्टो को लाभ न पहुंच जाए इस डर से जिया ने उसे रोके रखा था।
अत्तूबर 1977 में चुनाव स्थगित करने के बाद जिया ने इस्लामी कानून लागू करने में इस्लाम की केवल मुंह जोए के लिए दूसरों को लताड़ा था और अपने एजेंडे को लागू करने की शुरुआत की थी। 1978 और 1979 के बीच जिया ने इस्लामी कानून की बाढ़ सी ला दी थी लेकिन विधि मंत्रालय की द्वारा तैयार किए गए कसास और दियत के कानून के मसौदे पर अमल नहीं होने दिया।
1977 में जिया ने मौलाना मुफ्ती महमूद से जो बेनजीर भुट्टो के खिलाफ पीएनए आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे इस मसौदे पर बातचीत की। मुफ्ती ने बाद में मुल्तान में कहा था कि जिया का तुरंत दियत कानून लागू करने का कोई इरादा नहीं है। मुफ्ती महमूद ने जिया के हवाले से कहा था कि वह उसे भुट्टो को फांसी पर लटकाने के बाद ही लागू करेंगे।
वह दस साल तक दियत कानून के मसौदे को विधि मंत्रालय, इस्लामी वैचारिक परिषद और अपनी संसद शोरा की एक समिति के बीच लटकाए रहे। उन्होंने शहादत कानून को लागू करने में देरी की क्योंकि इसके कारण गवाह मसूद महमूद को भुट्टो के खिलाफ सबूत पेश करने की अनुमति नहीं होती।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मोहम्मद अफजल उल्लाह के नेतृत्व में अदालत की ओर से इसरार पर भुट्टो सरकार ने 1990 में इस बारे में एक अध्यादेश जारी किया और बाद में नवाज शरीफ की सरकार में संसद में केवल बीस मिनट की बहस के बाद इस को एक कानून के रूप में मान्यता मिल गई।
डेविस की गिरफ्तारी के जटिल मामले को हल करने के लिए पाकिस्तान के इस्लामी और शरई कानून का उपयोग करने की बातें पहले भी सामने आई थीं और इस घटना के कुछ दिन बाद ही पंजाब के कानून मंत्री राणा सनाउल्ला खान ने कहा कि रेमन्ड डेविस माफी मांगने के साथ अगर मुआवजा भी देना चाहें तो पाकिस्तान का कानून और इस्लामी कानून इस बात की अनुमति देता है लेकिन इसके लिए मरने वालों के परिजनों को स्वतंत्र रूप से प्रस्ताव को स्वीकार करना चाहिए। इस सिलसिले में एक और बात सामने आई है कि इस रिहाई में सउदी अरब सरकार ने बहुत बड़ा योगदान दिया है। मरने वालों के रिश्तेदारों को उमरा कराने के बहाने सउदी अरब ले जाया गया और फिर वहां के उलमाउं द्वारा उनकी ब्रेन वाशिंग की गई और उन्हें इस बात के लिए तैयार किया गया कि पैसे लेकर जिस को खून बहा भी कहा जाता है रेमन्ड डेविस को क्षमा करें और यह भी कहा जा रहा है कि 20 करोड़ रुपए कि बड़ी राशि सउदी सरकार ने ही अमेरिका के कहने पर मरने वालों के परिजनों को खून बहा के रूप में अदा की गई है।
पाकिस्तान में ऐसे मामलों में जिनमें कातिल और मकतूल एक ही खानदान के व्यक्ति होते हैं, बाकी वारिसों द्वारा कातिल को माफ कर दिया जाना एक सामान्य सी बात है। विशेष कर कारोकारी यानी सम्मान और नामूस के नाम पर महिलाओं की हत्या के मामलों में जिनमें हत्यारे अधिकतर उनके परिवार के सदस्य ही होते हैं। क्योंकि बाकी सभी परिवार वाले कातिल के साथ हत्या के सिलसिले में सहमत होते हैं इसलिए वह कातिल को माफ कर देते हैं और इस तरह एक कातिल बड़ी आसानी से कानून की पकड़ से मुक्त हो जाता है और उसका बाल भी बांका नहीं किया जा सकता।
इस कानून को एमनेस्टी इंटरनेशनल और अन्य विश्व संस्थाओं द्वारा सख्त आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। आम पाकिस्तानी इस आलोचना को धार्मिक मामलों में बेवजह हस्तक्षेप समझता है और मानता है कि ऐसा इस्लाम को बदनाम करने के लिए किया जा रहा है।
जब लाहौर में दो पाकिस्तानी नागरिकों की गोली मार कर हत्या करने वाले अमेरिकी अधिकारी रेमन्ड डेविस को मरने वालों के परिजनों द्वारा क्षमा कर दिया गया ओर इसके बाद अदालत के आदेश पर रिहा कर दिया गया जिसमें परिजनों के वकील के अनुसार अमरीकी अधिकारियों ने दीयत के मद में बीस करोड़ रुपए की बड़ी राशि का भुगतान किया गया जो सभी वारिसों को कानून के अनुसार वितरित होगी और मरने वालों के अठारह वारिस अदालत में पेश हुए थे। यही नहीं अवैध हथियारों के मामले में रेमन्ड डेविस को केवल चालीस दिन की कैद और बीस हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई गई जिसके बाद जुर्माने की रकम का तुरंत भुग्तान कर दिया गया जबकि कारावास की अवधि जो रेमन्ड ने हिरासत में गुजारी मानी गई ओर रेमन्ड को हिरासत से तुरंत रिहा कर देश से बाहर जाने दिया गया।
आज कसास और दियत के इसी कानून की कड़ी आलोचना करने वाले अमेरिका को यह खुदा की दी हुई नेमत महसूस हो रहा है।अमेरिका अब इस कानून के डेविस के मामले में इस्तेमाल को हर तरह से वैध ठहराने में लगा हुआ है। इस्लामाबाद में अमेरिकी राजदूत कैमरून मंट्र की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि मरने वालों के प रिजनों ने रेमन्ड डेविस को क्षमा कर दिया है और मैं इस कृपा के लिए परिजनों का शुक गुजार हूं।
पाकिस्तान में इस कानून के इस तरह डेविस के पक्ष में इस्तेमाल किए जाने पर चारों ओर प्रदर्शन हो रहे हैं।
यही नहीं इस कानून का लगातार समर्थन और वकालत करने वाली पार्टियां कसास और दियत कानून के सीआईए के ठेकेदार रेमन्ड डेविस को क्षमादान करने में प्रयोग को बिल्कुल अवैध मान रही हैं और हर तरफ इसकी निंदा की जा रही है। रेमन्ड डेविस के खिलाफ पाकिस्तान भर में धार्मिक दलों ने प्रदर्शन किए हैं। आज वह ही धार्मिक दल जो इस कानून के वैध एंव अवांछित उपयोग के समर्थन में मरी जा रही थीं, अब इस उपयोग के खिलाफ किला बंद हैं और उसके डेविस के मामले में इस तरह उपयोग किए जाने पर मरी जा रही हैं।
इस कानून के कारण रेमन्ड डेविस दो दो हत्या करने के बावजूद पाकिस्तानी जेल से ऐसे रिहा हो गया जैसे मक्खन से बाल निकल जाता है और उसकी रिहाई को अब सरकार में बैठे वही लोग वैध करार दे रहे हैं जो बड़े जोर शोर से यह दावा करते हुए नहीं थकते थे कि वह रेमन्ड डेविस को हर कीमत पर सजा दिला कर ही दम लेंगे और चाहे कुछ भी हो यह रिहा नहीं किया जाएगा ओर पाकिस्तान किसी भी सूरत में अमेरिका के गीदड़ भबकी से डरने वाला नहीं है।
दरअसल पहले पाकिस्तान में भारत की तर्ज पर ही एक कानून था जो हत्या को राज्य के खिलाफ किया गया एक अपराध मानता था मगर कसास और दियत का यह कानून एक न्यायाधीश के नेतृत्व में वास्तव में जिया के सैनिक शासन के दौरान पाकिस्तान के इस्लामीकरण के वकत बना था। लेकिन इससे कहीं जुल्फिकार अली भुट्टो को लाभ न पहुंच जाए इस डर से जिया ने उसे रोके रखा था।
अत्तूबर 1977 में चुनाव स्थगित करने के बाद जिया ने इस्लामी कानून लागू करने में इस्लाम की केवल मुंह जोए के लिए दूसरों को लताड़ा था और अपने एजेंडे को लागू करने की शुरुआत की थी। 1978 और 1979 के बीच जिया ने इस्लामी कानून की बाढ़ सी ला दी थी लेकिन विधि मंत्रालय की द्वारा तैयार किए गए कसास और दियत के कानून के मसौदे पर अमल नहीं होने दिया।
1977 में जिया ने मौलाना मुफ्ती महमूद से जो बेनजीर भुट्टो के खिलाफ पीएनए आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे इस मसौदे पर बातचीत की। मुफ्ती ने बाद में मुल्तान में कहा था कि जिया का तुरंत दियत कानून लागू करने का कोई इरादा नहीं है। मुफ्ती महमूद ने जिया के हवाले से कहा था कि वह उसे भुट्टो को फांसी पर लटकाने के बाद ही लागू करेंगे।
वह दस साल तक दियत कानून के मसौदे को विधि मंत्रालय, इस्लामी वैचारिक परिषद और अपनी संसद शोरा की एक समिति के बीच लटकाए रहे। उन्होंने शहादत कानून को लागू करने में देरी की क्योंकि इसके कारण गवाह मसूद महमूद को भुट्टो के खिलाफ सबूत पेश करने की अनुमति नहीं होती।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मोहम्मद अफजल उल्लाह के नेतृत्व में अदालत की ओर से इसरार पर भुट्टो सरकार ने 1990 में इस बारे में एक अध्यादेश जारी किया और बाद में नवाज शरीफ की सरकार में संसद में केवल बीस मिनट की बहस के बाद इस को एक कानून के रूप में मान्यता मिल गई।
डेविस की गिरफ्तारी के जटिल मामले को हल करने के लिए पाकिस्तान के इस्लामी और शरई कानून का उपयोग करने की बातें पहले भी सामने आई थीं और इस घटना के कुछ दिन बाद ही पंजाब के कानून मंत्री राणा सनाउल्ला खान ने कहा कि रेमन्ड डेविस माफी मांगने के साथ अगर मुआवजा भी देना चाहें तो पाकिस्तान का कानून और इस्लामी कानून इस बात की अनुमति देता है लेकिन इसके लिए मरने वालों के परिजनों को स्वतंत्र रूप से प्रस्ताव को स्वीकार करना चाहिए। इस सिलसिले में एक और बात सामने आई है कि इस रिहाई में सउदी अरब सरकार ने बहुत बड़ा योगदान दिया है। मरने वालों के रिश्तेदारों को उमरा कराने के बहाने सउदी अरब ले जाया गया और फिर वहां के उलमाउं द्वारा उनकी ब्रेन वाशिंग की गई और उन्हें इस बात के लिए तैयार किया गया कि पैसे लेकर जिस को खून बहा भी कहा जाता है रेमन्ड डेविस को क्षमा करें और यह भी कहा जा रहा है कि 20 करोड़ रुपए कि बड़ी राशि सउदी सरकार ने ही अमेरिका के कहने पर मरने वालों के परिजनों को खून बहा के रूप में अदा की गई है।

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