वीर अर्जुन दिनाक 28-03-2011 में प्राकाशित
अफीफ अहसन
उनका 20 नवम्बर, 2006 का एक भाषण इराक में हुई अमेरिकी त्रुटियों और कमियों का कच्चा चिट्ठा है. इराक़ में अमरीका की घुसपैठ पर उन्होंने अपने इस भाषण में कहा था कि:
"हमें अपने इस विश्वास में बहुत उचित होना चाहिए कि हम किसी देश पर सैन्य शक्ति द्वारा लोकतंत्र लागू कर सकते हैं. अतीत में, आंतरिक आन्दोलनों से तानाशाह सरकारों के विरुद्द स्वतंत्रता आन्दोलन उभरे हैं जिन से सफल लोकतंत्र अस्तित्व में आया, आन्दोलन जो आज भी जारी हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि हम अपने मूल्यों और विचारों को छोड़ दें, जहां भी हम कर सकते हैं, यह हमारे हित में है कि हम उपलब्ध कूटनीतिक और आर्थिक संसाधनों के माध्यम से लोकतंत्र के प्रोत्साहन में मदद करें. लेकिन जब हम इस तरह की सहायता प्रदान करें तो हमें यह स्पष्ट होना चाहिए कि लोकतंत्र के संस्थानों, स्वतंत्र बाज़ार, मुक्त प्रेस, एक मजबूत सिविल सोसाइटी को एक रात में नहीं बनाया जा सकता, और यह बंदूक की नोक पर भी नहीं किया जा सकता. और इस तरह हमें यह अहसास होना चाहिए कि स्वतंत्रता जिसकी फ़्रैंक डी रूज़वेल्ट (FDR) ने एक बार बात की थी, खासकर इच्छा की स्वतंत्रता और भय से स्वतंत्रता, एक ज़ालिम को बर्ख़ास्त करने और वोट की शक्ति मिलने से नहीं आती, यह केवल तब ही प्राप्त होती है जब किसी राष्ट्र की जान ओर माल की सुरक्षा भी सुनिश्चित बनाई जाए."
इन पवित्र विचारों को बराक ओबामा ने 'शिकागो काउंसिल ऑन ग्लोबल अफ़ेयरस' में 20 नवम्बर, 2006 के अपने लंबी चौड़े भाषण में व्यक्त किया था. मगर यह उन दिनों की बात है जब वह राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की तैयारियों में लगे हुए थे. तब मामला था कैसे मौजूदा राष्ट्रपति की नीतियों को ग़लत ओर बेहूदा बताया जाय. उनकी बातों से लगता था कि वह बहुत ही सुलझे हुये और समझदार व्यक्ति हैं और वह अमेरिका की इन गलत निष्क्रिय नीतियों को बदलना चाहते हैं जिनकी वजह से अमेरिका की आर्थिक स्थिति खराब हो गई है.
मगर 20 जनवरी 2009 को राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद उनके व्यक्ति में ऐसा कौन सा परिवर्तन आ गया की आज वह खुद उसी राह पर चल पड़े हैं जिस पर चलने के लिए वह उस समय के राष्ट्रपति बुश और अमरीकी प्रशासन पर भारी चोट करने से नहीं चूकते थे. ओबामा के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद संपादकीय बोर्ड की बैठक में यह सवाल उठा था कि आया ओबामा अमेरिकी नीतियों को पूर्णत्य बदल देंगे और नई नीतियाँ बनायेंगे तो हमारे एक साथी ने जो अमेरिकी मामलों की काफ़ी जानकारी रखते हैं ओर अमेरिकी मामलों पर एक अथारिटी माने जाते हैं यह कहा था कि अमेरिका की नीति तो पेंटागन और सीआईए नियंत्रित करता है. चाहे कोई भी राष्ट्रपति आए अमेरिका की नीति नहीं बदलती.
अब जब के लीबिया के मामले पर ओबामा भी उसी राह पर चल पड़े हैं जिस पर हर अमेरिकी राष्ट्रपति चलता रहा है, तो हमारे दोस्त की बात बिल्कुल सच साबित हुई है.
लीबिया में बम विस्फोट शुरू हो गए हैं, यह ठीक उस दिन की आठवीं वर्षगांठ के पहले शुरू हुए यानी कि 19 मार्च के दिन जिस दिन इराक की तबाही का सूत्रधार हुआ था. लीबिया को भी नष्ट किया जाएगा. उसके स्कूल, शिक्षा संस्थान, बुनियादी सुविधाऐं, अस्पताल, सरकारी इमारतें ध्वस़्त कर दिये जाएंगे. ऐसी कई "दुखद त्रुटियाँ", "अनचाहे नुकसान", माँ, बाप, संतान, बच्चे, दादा दादी, अबदी नींद सो जाएँगे या अंधे, बहरे, लूले लंगड़े हो जाएंगे. औरतें विधवा, बच्चे यतीम, मां बाप निसंतान हो जाएंगे, और यह अनंत सिलसिला रुकने का नाम नहीं लेगा.
इनफ्रास्ट्रक्चर नष्ट किया जाएगा. पाबंदी लगी रहने की स्थिति में यह असंभव हो जाएगा कि पुनर्निर्माण किया जासके. ब्रिटेन, फ्रांस और अमरीका, मिलकर देश की आवश्यकताओं का फैसला करेंगे "स्थिरता की स्थापना", "पुनर्निर्माण के साथ मदद" आदि जैसी व्याख्य को एक बार फिर इस्तेमाल किया जाएगा. तेज़ी के साथ देश में सेनिक दस्ते भेज कर यह देश लीबिया के तेल प्रतिष्ठानों और तेल के भंडारों को सहेजने की व्यवस्था करेंगी, और इस तरह तेल के भंडार पर क़बज़ा हो जाएगा. इन प्रयासों में लीबिया की जनता एक अवांच्छित रोडा बन जाएगी और जल्द ही 'दुश्मन' और 'विद्रोही' कहलाइ जाने लगेगी और गोली से उड़ाइ, जेल में ठूंसी, हिंसा और दुर्व्यवहार का शिकार की जाएगी.
और फिर लीबिया में एक अमेरिकी मित्र की कठ पुतली 'सरकार' की स्थापना हो जाएगी. किसी भी हिसाब किताब के बिना लीबिया की ज़ब्त की गयी संपत्तियों से संभावित तौर पर ली जाने वाली राशि गायब हो जाएगी और अधिकांश देश खंडहर में परिवर्तित हो जाएगा.
इसके बाद हमलावर अपनी कंपनियों के साथ नव निर्माण के समझौते करेंगे. क्या यही लीबिया पर 'हमला और दबाव' है? फ्रांस शर्म करो, ब्रिटेन शर्म करो, अमेरिका शर्म करो और संयुक्त राष्ट्र को शर्म आनी चाहिए जो यह कहती है कि यह सब '.... लगातार पीढ़ियों को जंग के तबाहकारियों से बचाने के लिय' है़ हर तरफ बिखरे हुए शरीर के टुकडे, अपंग, टुकड़ों में उड़े बच्चे, हर विधवा, हर रंडुवा, हर यतीम, के खून से इन देशों का नाम और संयुक्त राष्ट्र का नाम उन की मौत की जगह लिखा होगा. और इन देशों की जनता को यह बताया जाएगा के हम तो केवल लोकतंत्र की स्थापना कर रहे हैं, लीबिया को एक ज़ालिम एक 'नवजात हिटलर' बेन ग़ाज़ी के कातिल क़साई से मुक्त करा रहे हैं.
युद्ध के संदर्भ में बराक ओबामा का रिकार्ड तो पहले के राष्ट्रपतियों से बदतर साबित होरहा है. बराक ओबामा अफगानिस्तान, इराक, पाकिस्तान और लीबिया में लड़ाई लड़ रहे हैं. वह अमेरिकी सेना पर कई पूर्व राष्ट्रपतियों से अधिक खर्च कर रहे हैं. ऐसा माना जाता है की अगर वह राष्ट्रपति के रूप में आठ साल तक काम करते हैं तो वह रक्षा पर 8 ट्रलियन डॉलर खर्च करेंगे जिसमें युद्ध अर्थव्यवस्था की गुप्त लागत भी शामिल है. सभी अमेरिकी टैक्स का पचास प्रतिशत अमेरिकी सेना पर खर्च किया जाता है. अमेरिका दुनिया के अन्य सभी देशों के कुल सैनिक बजट से अधिक रक्षा पर खर्च करता है.
पूर्व नाटो कमांडर जनरल वैस्ले क्लार्क ने इस बात की पुष्टि की है कि लीबिया पर बमबारी कई साल से पैंटागन के ड्राइंग बोर्ड पर थी और पैंटागन इस पर अमल करने के बहाने खोजा रहा था और अगर कोई बहाना न भी मिले तो वह ऐसे हालात पैदा करने के बारे में भी प्रक्रिया बनाने में लगा हुआ था जिससे की लीबिया पर सेनिक हमला किया जा सके. ऐसा माना जाता है कि लीबिया में विद्रोह की योजना पहले से ही तैयार थी ओर इसे केवल सैनिक अभियान के साथ जोड़ा गया है. यह योजना कई महीने से सावधानी से और गुप्त रूप से तैयार की जा रही थी और विरोध आंदोलन को आगे बढ़ाया गया.
इस ऑपरेशन को ऑपरेशन 'ओडेसी डॉन' का नाम दिया गया है जो अरब दुनिया में इराक पर हमले के बाद सबसे बड़ा पश्चिमी सैन्य हस्तक्षेप है. यह तेल के लिए युद्ध का हिस्सा है क्योंकि लीबिया की गिनती विश्व की तेल की आर्थिक शक्तियों में होती है और विश्वस्तर पर लीबिया के तेल के भंडार 3.5 प्रतिशत है जो अमेरिका के भंडार से लगभग दो गुना अधिक हैं.
20 नवम्बर, 2006 के अपने भाषण को ओबामा ने इन शब्दों के साथ समाप्त किया था: "बहुत सारे भाषण हो चुके, कई बहाने बनाए जा चुके, कई ध्वज में लिपटे ताबूत आ चुके और कई दिल टूटे परिवार हो चुके.
इराक में इंतजार का समय समाप्त हो गया है. यह हमारी नीति बदलने का समय है. यह ईराक़ियों को उनका देश वापस करने का समय है. और यह समय है फिर अमेरिका का ध्यान व्यापक संघर्ष (ओसामा) पर केंद्रित करने का, जो अभी जीतना है. धन्यवाद."
आज के हालात में यह बिल्कुल भी नहीं लगता कि यह वही ओबामा हैं जो इतनी प्यारी प्यारी ओर दिल को छू लेने वाली बातें करते थे. ऐसा लगता है कि ओबामा को पेंटागन और सीआईए ने अपने जाल मैं फंसा लिया है और उनसे भी वही सब कुछ कराया जा रहा है जो पुर्व में अमेरिकी राष्ट्रपतियों से कराया जाता रहा है. इन परिस्थितियों में ऐसा लगता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति एक कठ पुतली से अधिक कुछ भी नहीं हैं जो पेंटागन और सीआईए के इशारों पर नाचता है.
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