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Monday, 23 January 2012

प्रतिबंधित किताब पढ़े जाने पर त्वरित कार्रवाई


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 23th January 2012
अफ़ीफ़ अहसन
1988 में जब कुख्यात सलमान रुशदी ने अपना विवादास्पद उपन्यास सेटेनिक वरसेज़ प्रकाशित किया था तो इसके बाद दुनिया भर में एक रिकॉर्ड विवाद फट पड़ा था। आयोजित मार्च और प्रदर्शनों के द्वारा इस पुस्तक की सामग्री का विरोध किया गया। इस किताब ने लोगों की भावनाओं को इतनी गहराई तक आहत किया था कि इसकी वजह से उनमें से कुछ प्रदर्शनों में ना चाहते हुवे भी हिंसा फट पड़ी और कई लोग घायल या मारे गए।
एक तरफ तो दुनिया भर के मुसलमान देशों ने इस प्रकाशन की निंदा की और ईरान के आयतुल्ला खुमैनी ने इसके खिलाफ फतवा जारी किया, जबकि दूसरी ओर पश्चिमी देशों ने इसका समर्थन की भी हद कर दी और खुलकर इस प्रकाशन का बचाव किया। पश्चिम देशों का यह बचाव ब्रिटेन, जहां किताब पहली बार प्रकाशित की गई थी की प्रतिक्रिया की तकलीद था जिस में ब्रिटिश स्टेबलिश्मेंट ने दावा किया था कि वह उसके खिलाफ कुछ भी नहीं कर सकते क्योंकि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की सुरक्षा के खिलाफ था. ऐसा करके ब्रिटेन ने जासूस पकड़ने के मामले में अपनी हार को आसानी से दबा दिया और ब्रिटेन में सरकार द्वारा अश्लील टीवी चैनलों के प्रसारण पर सफल प्रतिबंध लगाए जाने से लोगों का ध्याना हटा दिया. जहां तक ​​ब्रिटेन का संबंध था तो ऐसा लगता था कि हवाई तरंगों पर गैर सभ्य भाषा के प्रसारण से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की पवित्र कसम का उल्लंघन होती था लेकिन प्रतिष्ठित लोगों के खिलाफ गैर सभ्य भाषा का प्रकाशन और पाक कलाम के खिलाफ अवांछित शब्दों द्वारा उसके लाखों लोगों और दुनिया भर के मुसलमानों को पहुंचाई गई चोट और दर्द के खिलाफ कुछ नहीं किया जा सकता था.
जैसे कि इतना काफी नहीं था, इसलिए इसके बाद इस किताब की एक साहित्यिक सहीफे के रूप में तारीफ और ताज़ीम की गई और किताब को बुक्र पुरस्कार के लिए भी नामित किया गया. यही नहीं लेखक के साथ एक हीरो जेसा व्यवहार किया गया और उसकी कुख्यात किताब को सार्वजनिक रूप से पढ़ा गया.
ब मुसलमानों ने इसका विरोध किया, तो उन्हें तंग विचार और प्राचीन सोच वाला करार दिया गया. ब्रैडफोर्ड शहर में सार्वजनिक रूप से सलमान रुशदी की किताब की एक प्रति जलाए जाने के बाद उसकी फुटेज को लगातार पश्चिमी मीडिया पर दिखाया जाता रहा. इस घटना ने पश्चिम मुस्लिम जनता को जो कई दशकों से कानून को मानती और शांति से रहती आयी थी और अधिक गुस्से से भर दिया और उसके व्यवहार में उग्रवाद पसंदी घर कर आई.
इसी दौरान जब ब्रिटेन के मुसलमानों ने अदालतों में न्याय खोजने की कोशिश की तो उनकी कोशिशों को शुरुआत में ही जबर्दस्त धक्का लगा क्योंकी ब्रिटेन जैसे एक बहुल धार्मिक समाज में अपमान के नियम केवल ईसाई धर्म के अपमान तक ही सीमित थे, अन्य धर्मों की अवमानना के लिए कोई रोक टोक नहीं थी और इस्लाम की तो कतई नहीं.
इस पर हिदुस्तान में भी सड़क से लेकर संसद तक बहुत ज़बरदस्त प्रतिक्रिया हुई. भारतीय तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी ने दूर अंदेशी का सबूत देते हुए किताब पर तुरंत पूरे देश में प्रतिबंध लगा दिया और उसका प्रकाशन और पढ़ना अवैध करार दे दिया गया.
लेकिन फिर भी इस विवादास्पद और प्रतिबंधित पुस्तक जयपुर ‍लिटरेरी फ़ेस्टीवल में खुलेआम प्रदर्शन किया गया. यही नहीं इस किताब को सार्वजनिक रूप से पढ़ा गया. ऐसा किया जाना भारतीय कानून का खुला उल्लंघन है और भारतीय कानून के खिलाफ अविश्वास का खुल्लम खुल्ला प्रदर्शन है. हालांकि लेखक समुदाय सलमान रुशदी के भारत आने से रोके जाने का पुरजोर विरोध कर रही थी लेकिन लिटररी फ़ेस्टोल में प्रतिबंधित पुस्तक के अंश पढ़े जाने के बाद लेखक समुदाय बंट गया. यही नहीं इन अंश के पढ़े जाने के बाद आयोजकों ने अपनी जान बचाने के लिए इन चारों लेखकों को फ़ेस्टीवल छोड़कर चले जाने के लिए कह दिया. उनसे कहा गया है कि किसी भी समय गिरफ्तारी हो सकती है. एक एसएमएस भी सरकूलेट किया गया है जिसमें सेटेनिक वरसेज़ पढ़ते पाए जाने पर गिरफतार होने की बात कही गई है. अब वही आरगनाईज़र्स जो की सलमान रुशदी के फ़ेस्टीवल में न आने दिए जाने को मुद्दा बनाए हुए थे, उन्होंने ही चार अन्य ऐसे लेखक को फ़ेस्टीवल से चले जाने के लिए कह दिया है जिन्होंने यह किताब खुलेआम पढ़ी थी. आरगनाईज़र्स के इस दोहरे माप दंड से उनकी नियत खुलकर सामने आ गई है. अब उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दलील का क्या हुआ?
लेखक चेतन भगत ने लेखक समुदाय से अपील की है कि प्रतिबंधित लोगों को हीरो बनाने की कोशिश न की जाए. उन्होंने कहा कि अगर किसी का लिखा कुछ लोगों को बुरा लगा है तो उन्हें विरोध करने का अधिकार है. क़ानून को अपने हाथ में लेना ठीक नहीं है.
जाने माने मलियालम लेखक के सचिदानंद का मानना ​​है कि अनावश्यक विवादों से बचने के लिए सावधानी बरतने की आवश्यकता है. और रुशदी को लेकर आयोजकों को किसी मुश्किल में नहीं डाला जाना चाहिए.
रुशदी ने यह कहकर फ़ेस्टीवल में आने से मना कर दिया था कि उन्हें भाड़े के माफिया की ओर से जान से मार ‍दिये जाने का खतरा है. हालांकि राज्य सरकारों ने उनके इस बयान को अकारण बताया और इस बात से इनकार किया है कि उनके द्वारा ऐसी कोई जानकारी सलमान रुशदी को दी गई है.
सलमान रुशदी का तनाज़ात से चोली दामन का साथ रहा है. या यूं कहा जाए की वह लोगों की दिल आज़ारी के सबसे बड़े ठेकेदार हैं और ऐसा वह अपने आकाओं को खुश करने के लिए करते हैं.
मुंबई में पैदा हुए सलमान रुशदी अपने को कश्मीरी नसल का बताते हैं ने एक और नाविल शालीमार दी कलाउन भी लिखा था जो 2005 में प्रकाशित हुआ. इस उपन्यास में उन्होंने भारतीय सेना की बहुत ही ग़लत ढंग की छवि पेश की है. और कश्मीर के भीतरर फैले हुए गांवों पर सेना के हमलों के बारे में बढ़ा चढ़ा कर लिखा है.
सेना द्वारा इस्तेमाल होने वाले वाक्य क्रेक डाउन को उन्होंने बड़े पैमाने पर तबाही, बलात्कार और वहशी पन वाला एक खुश कलाम कहा है. जो हर समय होता है और अब भी हो रहा है. एक इंरटरव्यू में उन्होंने इस को तमाम कश्मीरियों के इलाज के लिए एक होलोकासट से ताबीर किया है जैसे कि वह सब आतंकवादी हैं.
उनका कहना है इस उपन्यास के द्वारा यह बताना चाहते हैं कि कश्मीर में जिहाद की ओर झुकाव भारतीय सेना की कारगुज़ारयों के कारण ही पैदा हुआ है. उनका कहना है कि कश्मीर के बारे में सबसे स्पष्ट तथ्य सैनिक साजो सामान की एक बहुत बड़ी मात्रा है जो वहाँ हर जगह मौजूद है. टैंक, ट्रक, होविटज़र, बज़ूका, भारी हथियार ‍‍िडपो, हथियारों के बड़े बड़े कनवाये जो संकरे पहाड़ी रास्तों पर एक सिरे से दूसरे तक छः छः घंटे तक चलते रहते हैं. और ईश्वर आपकी मदद करे यदि आप इस के पीछे फंस गए हैं, क्योंकि वहां से आगे निकलने का कोई तरीका नहीं होता. रुशदी ने कहा.
अपनी इस किताब के द्वारा रुशदी ने भारतीय सेना की छवि को जिस तरह क्षतिग्रस्त करने की कोशिश की है उस पर कभी कोई आवाज़ नही उठी और उनके खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं हुआ. ऐसा शायद इसलिए हुआ होगा क्योंकि भारतीय जनता की नज़रों में उनकी खुद की छवि इतनी क्षतिग्रस्त है कोई भी उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लेता और उनकी बातों को एक दीवाने की बक-बक से अधिक कुछ भी नहीं समझा जाता.
अब देखना यह है कि सलमान रुशदी की प्रतिबंधित पुस्तक सेटेनिक वर्सेज़ के खुलेआम प्रदर्शन और इससे अंश पढ़ने वाले चारों लेखकों और आरगनाईज़र्स के खिलाफ कोई कार्रवाई होगी भी या नहीं. या कि भारतीय कानून की धज्जियां उड़ाने की भी आज़ादी है.
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