अगर
जनरल सिंह की मानें तो हमारे देश के पास दो दिन से अधिक युद्ध जारी रखने के लिए सही
मात्रा में गोला बारूद नहीं है लेकिन जनरल साहब के खुद के तरकश में इतने तीर हैं
या यूं कहिए कि इतना गोला बारूद है कि वह देश के राजनीतिज्ञों, जनता और
मीडिया को दो महीने तक यानी कि अपनी रिटायर्मेंट की तारीख तक तो जबानी युद्ध में
उलझाये रख सकते हैं. जनरल साहब ने अपने सेनाध्यक्ष कार्यकाल अवधी में चाहे कोई भी
ऐसा बड़ा कारनामा नहीं किया हो जिसके लिए देश की जनता उनको याद करे मगर जाते जाते
वह ऐसे धमाके करने से नहीं चूके रहे हैं जिनके लिए देश उन को हमेशा याद रखेगा.
सबसे
पहले तो उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें टटरा ट्रकों की खरीद के लिए उनके एक साथी
लेफ्टिनेंट जनरल तेजिंद्र ने चौदह करोड़ रुपये की रिश्वत की पेशकश की थी. उसके बाद
उनका एक गुप्त पत्र सामने आगया जिसमें उन्होंने भारतीय सेना में व्याप्त कमियों की
ओर प्रधानमंत्री का ध्यान आकर्षित कराया था. अब जनरल सिंह ने सीबीआई की ओर एक और “भ्रष्टाचार
बम” लपका दिया है.
सेना
प्रमुख द्वारा तृणमूल कांग्रेस के सांसद अम्बीका बेनर्जी के मई 2011 के एक पत्र को
सीबीआई को सीधे भेजने से एक नया विवाद पैदा हो गया है. सांसद ने अपने पत्र में “खुफिया”
स्पेशल फरन्टीर बल में खरीद में व्यापक घोटालों का आरोप लगाया है. यह उस समय से
संबंध रखता है जब लेफटनेंट जनरल दलबीर सिंह उसके महानिरीक्षक थे. इस में रात में
देखने के उपकरण, संचार प्रणाली, हथियार और पैराशूट शामिल हैं. यह बल रिसर्च एंड अनालिसेस
विंग के तहत काम करती है जो देश की बाहरी खुफिया एजेंसी है.
सांसद
बेनर्जी ने पूर्व सेनाध्यक्ष सहित अन्य कई सैन्य अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप
लगाए हैं, उन्होंने आरोप लगाया है कि उन्होंने सैन्य सौदों में
करोड़ों की दलाली कमाई है और अपनी आय से अधिक जायेदादें जमा कर ली है.
शिकायत
के साथ जुड़े अपने कवरिंग लेटर में जनरल सिंह ने सीबीआई से बनर्जी की शिकायत की
जांच करने को कहा है. बनर्जी के लिखे पत्र पर इतना समय चुप रहने के बाद अब उसे
सीधे सीबीआई को भेजने का जनरल साहब का फैसला कुछ लोगों के लिए आश्चर्य जनक हो सकता
है लेकिन उसे अपने पुराने दुश्मन से हिसाब बराबर करने के लिए भी देखा जा रहा है.
यह बात किसी से छुपी नहीं है कि जनरल साहब ने लेफटीनेंट जनरल दलबीर सिंह सुहाग के
आर्मी कमांडर बनाए जाने का सख्त विरोध किया था, हालांकि
रक्षा मंत्रालय दलबीर सिंह का पुरजोर समर्थन कर रहा था.
अपने
नोट में जनरल सिंह ने दावा किया है कि दलबीर सिंह सुहाग ने सीनियर आरमी अधिकारी की
खुफिया वार्षिक रिपोर्ट (एसीआर) को इसलिए डाउनग्रेड किया था क्योंकि यह मेजर जनरल
एक कार्टल के दबाव के आगे नहीं झुका था जो सेना को पेराशूट बेचना चाहता था. सेना
प्रमुख ने इस अधिकारी का नाम तो नहीं लिखा लेकिन उन्होंने यह जरूर लिखा है कि
अधिकारी ने इस संबंध में उन्हें एक लिखित याचिका दी थी.
खुद
को मिले रिश्वत के ऑफ़र पर जनरल साहब का पूरे दो साल तक कुछ भी न करना, न ही उसकी
लिखित शिकायत करना न ही उसकी जांच की मांग करना, दूसरी ओर एक
ऐसे संस्थान के खिलाफ सीबीआई को जांच करने के लिए लिखना जो के सीधे उनके तहत नहीं आता
अजीब सा लगता है.
ऐसा
नहीं लगता के सीबीआई इस मामले में कुछ कर सकेगी. क्योंकि यह तथ्य कि एसएफएफ “रा” के
तहत है मामले को और भी बदतर कर देगा. रा एक ऐसा संगठन है जिसके पास बहुत अधिक फंड
होता है जिसका ज़िक्र बजट में भी नहीं होता और जो आडिट या अपने खर्च की जवाबदीही
के लिए भी ज़िम्मेदार नहीं है.
इसी
अधिकार के कारण रा के कुछ प्रमुख और दूसरों ने उसे लूट लूट कर अपने बेटों और
बेटियों को विदेश अध्ययन करने और अछी तरह सैटल करने के लिए किया है क्योंकि वह
किसी को उत्तरदायी नहीं हैं. इस तरह हर साल करोड़ों रुपये लूट लिए गए. यह भी सच है
कि जब भी कोई पकड़ा गया तो उसका मामला गोपनीयता की दफा के तहत दबा दिया गया.
राष्ट्रीय
सुरक्षा के पूर्व सलाहकार ब्रजेश मिश्रा ने रिश्वत के प्रस्ताव के आरोप पर कोई
कार्रवाई नहीं करने के लिए सरकार और जनरल दोनों को जिम्मेदार ठहराया. उनका यह भी
कहना है कि जनरल वीके सिंह को जबरदस्ती छुट्टी पर भेजा जाए. यह पूछे जाने पर कि
क्या सेना प्रमुख को बर्खास्त किया जाना चाहिए या जबरन छुट्टी पर भेजा जाना चाहिए, मिश्रा ने
कहा कि अगर उनकी बर्खास्तिगी हुयी तो कुछ और भी हो सकता है. अगर उन्हें चाहिए
छुट्टी पर भेजा जाता है तो उन्हें बर्खास्त नहीं माना जाएगा.
मिश्रा
ने कहा कि उनसे कहा जाना चाहिए कि सरकारी वेतन पर दो महीने की छुट्टी बिताइए और
फिर वेतन लीजिए और घर जाइए. प्रधानमंत्री को लिखे सिंह के पत्र के लीक होने के
बारे में मिश्रा ने सेना प्रमुख के करीबी साथियों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराने की
कोशिश की. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री जिनका में बहुत सम्मान करता हूँ, ऐसे व्यक्ति
नहीं हैं जो इस तरह का कुछ लीक करें. में मान नहीं सकता कि प्रधानमंत्री कार्यालय
में नौकर इसे लीक करें. इसलिए यदि जनरल ने इस पत्र को खुद लीक नहीं किया है तो हो
सकता है कि उनके दोस्त ने ऐसा किया हो. जनरल सिंह के लेफ्टिनेंट जनरल दलबीर सिंह
सुहाग के खिलाफ सीबीआई जांच कराने की सिफारिश पर उन्होंने कहा कि सेना प्रमुख को
एसा करने का अधिकार नहीं है.
हालांकि
जनरल सिंह के पत्र के लीक होने के समय को लेकर भाजपा ने संदेह व्यक्त किया है.
लेकिन राजद ने कहा है कि जनरल सिंह जनता का विश्वास खो चुके हैं और उन्हें
बर्खास्त कर दिया जाना चाहिए. समाजवादी पार्टी और जनता दल (यू) के नेताओं ने कहा
है कि सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखे पत्र को
मीडिया को लीक करने के लिए हटा दिया जाना चाहिए. बीजू जनता दिल और वामपंथीयों ने
पत्र के लीक होने पर सख्त कार्रवाई की मांग में भागीदारी की और कहा कि जो भी इसके
लिए जिम्मेदार है वह बचना नहीं चाहिए. जनता दल (यू) के नेता शिवानंद तिवारी ने
कहा कि “यह गंभीर चिंता का मामला है, सेनाध्यक्ष का व्यवहार संदेहास्पद है. अब, कि वह इस विवाद में
शामिल हो रहे हैं, शायद वह आरोप स्थानांतरित करने की कोशिश कर रहे हैं.” “वीके सिंह को गुप्त
मामलों को सार्वजनिक नहीं करना चाहिए. उन्होंने उस समय क्यों नहीं कहा जब वह
प्रमुख बने थे.” समाजवादी पार्टी के नेता मोहन सिंह ने कहा. समाजवादी पार्टी के एक
नेता राम गोपाल यादव ने मांग की कि जनरल सिंह को तुरंत हटा दिया जाना चाहिए.
हालांकि बाद में अपने बयान में जनरल सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री को भेजे गए सरकारी पत्र के लीक होने को मुलक से गद्दारी के रूप में लिया जाना चाहिए. उन्होंने साफ किया कि यह पत्र उन्होंने लीक नहीं किया है. इस मामले पर जनरल सिंह ने कहा कि उनकी छवी को कलंकित करने का बेतुका रवैया बंद होना चाहिए. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को लिखे उनके पत्र के लीक होने के स्रोत का पता लगाया जाना चाहिए और उससे सख्ती से निपटना चाहिए.
हालांकि रक्षा मंत्री सरकार और जनरल के बीच किसी भी टकराव से लगातार इनकार कर रहे हैं जिस बात का समर्थन जनरल सिंह कर रहे हैं लेकिन फिर भी वह हर वह हरबा अपना रहे हैं जिससे कि सरकार को उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने पर मजबूर होना पड़े और वह जिंदा शहीद के रूप में अपनी शेष जीवन गुज़ार दें. क्योंकि प्रत्येक सैनिक की यह दिली तमन्ना होती हे कि वह देश पर शहीद हो शायद यही इच्छा जनरल सिंह के दिल में भी है और अब उन्हें लग रहा है कि दो महीने रह गए हैं और यह इच्छा पूरी नहीं हो सकती तो क्यों न कुछ ऐसा किया कि वह शहीद कहलाएँ.
हालांकि बाद में अपने बयान में जनरल सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री को भेजे गए सरकारी पत्र के लीक होने को मुलक से गद्दारी के रूप में लिया जाना चाहिए. उन्होंने साफ किया कि यह पत्र उन्होंने लीक नहीं किया है. इस मामले पर जनरल सिंह ने कहा कि उनकी छवी को कलंकित करने का बेतुका रवैया बंद होना चाहिए. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को लिखे उनके पत्र के लीक होने के स्रोत का पता लगाया जाना चाहिए और उससे सख्ती से निपटना चाहिए.
हालांकि रक्षा मंत्री सरकार और जनरल के बीच किसी भी टकराव से लगातार इनकार कर रहे हैं जिस बात का समर्थन जनरल सिंह कर रहे हैं लेकिन फिर भी वह हर वह हरबा अपना रहे हैं जिससे कि सरकार को उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने पर मजबूर होना पड़े और वह जिंदा शहीद के रूप में अपनी शेष जीवन गुज़ार दें. क्योंकि प्रत्येक सैनिक की यह दिली तमन्ना होती हे कि वह देश पर शहीद हो शायद यही इच्छा जनरल सिंह के दिल में भी है और अब उन्हें लग रहा है कि दो महीने रह गए हैं और यह इच्छा पूरी नहीं हो सकती तो क्यों न कुछ ऐसा किया कि वह शहीद कहलाएँ.
ऐसा
नहीं लगता कि जनरल सिंह और सरकार के बीच विवाद कम होने का नाम लेंगे. बल्कि ऐसा
लगता है कि विवाद आगे और बढ़ेंगे क्योंकि जनरल सिंह जिस स्थान पर बैठे हैं वहां पर
चाहे जनरल के अनुसार देश की सेना के पास पर्याप्त गोला-बारूद न हो लेकिन जनरल साहब
के तरकश में अभी कई तीर बाकी हैं और समय समय पर उनका इस्तेमाल करेंगे क्योंकि
उन्हें एक ऐसी सरकार से हिसाब बराबर करना है जिसने उनकी एक साल की नौकरी को कम कर
दिया और उन्हें सुप्रीम कोर्ट तक से हार का मुंह देखना पड़ा.
दूसरी
ओर रक्षा मंत्री और सरकार से यह उम्मीद नहीं है कि वह अपना बचाव करने के अलावा
जनरल के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई करेंगे, क्योंकि किसी
शायर के बकोल:
ना
ख़नजर उठेगा ना तलवार इनसे।
यह
बाजू मेरे आज़माए हुवे हैं।।
A K Antony, Afif Ahsen, Daily Pratap, Defence Ministry, General V K Singh, india, Indian Army, Vir Arjun,

hello sir nice words
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