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Sunday, 4 September 2011

राजीव के हत्यारों की फांसी पर राजनीति

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 5th September 2011
अफ़ीफ़ अहसन

सच है के राजनीति में न कोई स्थायी दोस्त होता है और न ही कोई स्थायी दुश्मन होता है. शायद इसी नीति को अपनाते हुए करुणानिधि ने अब पलटी मारी है और राजीव गांधी के हत्यारों को माफी दिए जाने की वकालत कर रहे हैं. इससे एक हास्यास्पद स्थिति पैदा हो गई है. क्योंकि यह वही करुणानिधि हैं जिनकी सरकार ने तीन हत्यारों के लिए वर्ष 2000 में उनके मुख्यमंत्री रहते हुए माफी की सिफारिश से इनकार कर दिया था. मगर एक दशक बाद तमिलनाडु राजनीति में बहुत अंतर पैदा हो गया है. अब करुणानिधि सत्ता से बाहर हैं, उनकी बेटी और ए राजा जेल के अंदर हैं उन्की पार्टी हाल के चुनावों में मुंह की खा चुकी है, इसलिए शायद उन्हें लगता है कि इसी मुद्दे के सहारे वह तमिल वोटों को फिर अपने क़ब्ज़े में कर सकते हैं. करुणानिधि को लगता है कि तमिल इलम के खातमे के बाद तमिल आक्रोश के आधार पर वोट भुनाने का बहुत अच्छा अवसर है. हालांकि डीएमके दिल्ली में कांग्रेस के साथ सत्ता में साझेदार है यह वही कांग्रेस है जिसके प्रमुख कभी सोनिया गांधी के पति पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी हुआ करते थे. सोनिया गांधी जिनकी अनुमति के बिना पार्टी में पता तक नहीं हिलता.
उल्लेखनीय है कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की 21 मई, 1991 को श्री पेरम्बदूर में एक चुनावी रैली के दौरान हत्या कर दी गई. एलटीटीई की एक आत्मघाती हमलावर ने उनके पास जाकर खुद को विस्फोट से उड़ा दिया था. वर्ष 1998 में स्पेशल कोर्ट ने मुरुगन, संथम, पेरारिवलन और मुरुगन की पत्नी नलिनी सहित इस हत्या के सभी 26 आरोपियों को मौत की सज़ा सुनाई थी. वर्ष 1999 में सुप्रीम कोर्ट ने चारों की मौत की सजा बरकरार रखी थी, लेकिन दूसरे दोषियों की सज़ा कम कर दी थी. जेल में मां बनी नलिनी की दया याचिका पर उसकी मौत की सजा बाद में आजीवन कारावास में बदल दी गई थी. सोनिया गांधी ने भी नलिनी को मौत की सजा न देने की सिफारिश की थी. उधर, राजीव गांधी की हत्या के बीस साल बाद दोषी मुरुगन और नलिनी की बेटी हर्थरा ने अब तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता से अपने पिता मुरुगन के लिए दया की अपील की है. हर्थरा ने जयललिता को एक पत्र भेजा है जिसमें उसने मरुगन जान बखश देने की अपील की है.
उधर हर ओर यह बहस छिड़ी हुई है कि क्या राजीव गांधी के हत्यारों को कानून के अनुसार फांसी पर लटका दिया जाना चाहिए या फिर नेताओं, वकीलों, और हमदरदों से ज़ोरदार तोर से पेश किये गये सजा टालने के अनुरोध को मान लिया जाए. यह कहा जारहा है कि क्योंकि इन तीन अपराधियों ने 20 साल से अधिक का समय मौत की प्रतिक्षा में जेल में गुज़ार दिया है इसलिए उन्हें माफी दे देनी चाहिए.
मगर इन सभी तर्कों के पीछे राजनीति है. करुणानिधि केवल सहानुभूति दिखाने के लिए हत्यारों को बचाने की कोशिश में अगर ज़मीन आसमान को इस तरह हिला सकते हैं तो कल्पना कीजिए कि किसी हत्यारे दोस्त को बचाने की कोशिश में तो वह ब्रह्मांड को ही हिलाकर रख देंगे. ऐसा हरगिज़ नहीं लगता कि करुणानिधि सैद्धांतिक तौर पर मौत की सजा समाप्त करने के समर्थक हैं क्योंकि अगर ऐसा होता तो उन्होंने ऐसी सजा के खिलाफ पूर्व में नियमित अभियान चलाया होती. उनकी दिलचस्पी तो राजीव गांधी के हत्यारों को ज़िंदा रखने में ही है. अगर इन नेताओं को सज़ाए मौत उतनी ही अमानवीय लगती है तो उन्हें कानून में बदलाव का माद्दा रखना चाहिए. क्योंकि जब तक मौजूदा कानून है वह अपना काम करे गा चाहे उसका रास्ता मोत के तख्त तक ही क्यों न जाता हो. कानून के तहत काफी सोच विचार के बाद दी गई मौत की सज़ा जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी मुहर लगा दी हु उन लोगों के लिए भला गलत कैसे है जिन्होंने भारतीय पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या की योजना बनाई और उसे लागू किया वह भी केवल इसलिए कि वह एक राजनीतिक फैसले से सहमत नहीं थे.
लेकिन लंबी चौड़ी बातें करने वाले किसी की भी यह दलील नहीं है कि न्यायिक प्रक्रिया में कहीं कोई त्रुटि रह गई थी. न ही कोई यह कह सकता है कि सज़ा देने वाले जजों ने कानून की सीमाओं का उल्लंघन किया है. जो दलीलें इन अपराधियों को बचाने के लिए पेश की जारही हैं उनका दूसरा रुख भी है वह यह कि क्योंकि हत्यारों को अब तक बीस साल तक जीवित रहने की छूट मिल चुकी इसलिए बहुत हो चुका और ऐसे लोगों को बिना कोई देर किए उनके अंजाम तक पहुंचा दिया जाना चाहिए. बीस साल की सजा को काफी मानने वाले यह कैसे भूल जाते हैं के राजीव गांधी अगर जीवित होते तो वह अपने जीवन की कितनी दहाईयॅा अपने देश को देते और अपने परिवार को कितना प्यार दे सकते थे.
हालांकि तीनों दोषियों को मौत की सज़ा देने पर मद्रास हाईकोर्ट ने मंगलवार को आठ सप्ताह की रोक लगा दी. यह अपराधी मुरुगन, संथम और पेरारिवलन फिलहाल वेल्लोर जेल में बंद हैं जिनकी दया की याचिका को राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल पहले ही 11 अगस्त को नकार चुकी थीं और उन्हें नौ सितंबर को फांसी पर चढ़ाया जाना था. सज़ा प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाते हुए जस्टिस सी नागप्पन और जस्टिस एम सत्यनारायण की खंडपीठ ने पाया कि दोषियों ने दया के लिए राष्ट्रपति को जो आवेदन किया था, उसके निपटारे में 11 साल से अधिक की देरी हो चुकी है. अदालत ने कहा कि इस मामले में कानून का सवाल भी मौजूद है और केंद्र सरकार, तमिलनाडु और राज्य की पुलिस को नोटिस जारी किया. मौत के स्थगित किए जाने के बाद हाई कोर्ट के बाहर जिस तरह का जश्न मनाया गया, नारेबाजी हुई और पटाखे फोड़े गए उसकी मिसाल नहीं मिलती, वह भी ऐसे कातिलों की सजा पर रोक के बाद जिन्होंने देश की एक महान हसती और पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या कि हो. यही नहीं तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता के नेतृत्व में विधानसभा ने एक प्रस्ताव पारित करके कहा कि सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया जाए.
शायद इन सब बातों से खीज कर उमर अब्दुल्ला ने ट्विटर पर सवाल दाग दिया कि “अगर जम्मू और कश्मीर विधानसभा ने अफ़ज़ल गुरु के लिए तमिलनाडु की तरज़ पर एक प्रस्ताव पास कर दिया तो क्या उस पर उतनी ही खामोशी छाई रहेगी? मुझे लगता है नहीं.” इसके बाद उस पर चारों ओर कोहराम बरपा हो गया और हर कोई उमर अब्दुल्ला पर टूट पड़ा. जो तमिलनाडु विधानसभा के प्रस्ताव पर अब तक चुप्पी साधे हुए पड़े थे उमर अब्दुल्ला के खिलाफ ज़ोरशोर से बयान देने लगे और उन्हें गद्दार कहने से भी नहीं चूके. हालांकि उमर अब्दुल्ला ने अपना सवाल ऐसे लोगों को नंगा करने के लिए ही दिया था जो दोमूंही बात करते हैं, और शायद वह उसमें कामयाब भी रहे. उन्होंने फिर सवाल दागह कि “मैं यह देखने के लिए बेचैन हूँ के अब शाहनवाज़ हुसेन और दूसरे भाजपा वाले क्या कहते हैं. पंजाब में तो उनकी अपनी सरकार है.” उमर अब्दुल्ला का इशारा भुल्लर को माफी दिए जाने की पंजाब की सिफारिश की ओर था. अगर इन मामलों में क्षे‍त्रयता के आधार पर इसी तरह राजनीति होती रही तो किसी भी कातिल को उसके अंजाम तक पहुँचापाना मुश्किल हो जाएगा. यह राजनीति ही थी जिसकी वजह से भुल्लर के मामले में फैसला करने में इतनी देर हुई और यह राजनीति ही थी जिसकी वजह से राजीव के हत्यारों की फांसी माफी का अनुरोध इतने दिनों तक लटका गया, और दूसरी तरफ जम्मू कश्मीर में शांति का खतरा बता कर इसकी वजह से अफ़ज़ल गुरु की फांसी माफी की याचिका पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुइ. मगर पहले भुल्लर की याचिका को अस्वीकार करना फिर राजीव के हत्यारों की अपील की अस्वीकृति से यह संकेत मिलता है कि अफ़ज़ल गुरु के अनुरोध का भी यही हाल होगा.
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