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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 26th September 2011
अफ़ीफ़ अहसन
कल जब मैंने अपनी बेगम से कहा कि वह बहुत फजूल खर्च है तो वह भड़क उठी और लगी मुझे बुरा भला कहने, वह कहने लगी कि आपको क्या पता में- कैसे आपके घर का ख़रचा चला हूँ, मेरी जगह कोई और होती तो आपको पता चलता. मैंने आज तक अपनी बेगम को फजूल खर्च कहने की हिम्मत तो नहीं थी लेकिन दिल ही दिल में उसकी फजूल ख़रची का गुमान रखता था. मगर मेरी हिम्मत योजना आयोग ने बढ़ा दी थी, अब मेरे पास आंकड़े थे उसकी व्यर्थ ख़रची को साबित करने के लिए. और वह थे योजना आयोग के वे आँकड़े जिस में उसने ग़रीबी रेखा की व्याख्या की थी. मैंने उससे कहा कि अब हम चार लोगों के खर्च के लिए महीने में केवल चार हजार रुपये ही मिलेंगे और उसने इसी में पूरे महीने का खर्च चलाना है. उसने कहा कि पहले आप स्वयं ही इतने रुपये में घर का खर्च चला कर दिखाएँ तब मैं जानूं गी. मैंने कहा कि यह मेरा काम नहीं है के मैं तुम्हारे घर के खर्च की योजना करूँ क्यों कि यह छोटे मोटे काम या तो तुम्हारे हैं या देश के योजना आयोग के हैं. मुझे तो देश के बड़े बड़े मुद्दों से फुर्सत कहाँ है जो मैं तुम्हारे छोटे घरेलू मामलों को देखूं. तुम योजना आयोग की सलाह से घर के खर्च चलाउ. इस पर वह लगी योजना आयोग को कोस्ने. उसने कहा कि योजना आयोग वालों से कहो कि वह एक महीने तक चार हज़ार में मेरे घर का खर्च चला कर दिखादें तब मैं मानों गी. खुद तो ये लोग लाखों खर्च करते हैं, बैठकों पर हजारों रुपया खर्च करते हैं और चले हैं मुझे सिखाने. वह खुद क्यों नहीं चार हज़रा में अपने घर का खर्च चलाएँ और बाकी पैसा हम जैसे गरीबों को दे दें. बेगम का रुख योजना आयोग की ओर मोड़ कर मैंने तो सुकून की सांस ली और देश के बड़े मुद्दों पर विचार करने लगा.यही हाल पूरे हिन्दुस्तान का है, योजना आयोग ने गरीबी का आंकलन करने के लिए स्तर निर्धारित किया है, इसकी कड़ी आलोचना की जा रही है. आलोचकों का कहना है कि इस तरह ज़रूरतमंद लोगों की बहुत बड़ी संख्या सामाजिक भलाई के कार्यक्रमों के लाभ से वंचित हो जाएगी. सरकारी अनुमानों के अनुसार, भारत की एक दशमला दो अरब आबादी का एक तिहाई हिस्सा गरीब है.
योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि ग्रामीण क्षेत्र में जो व्यक्ति भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य पर 26 रुपये खर्च करता है जो 781 रुपये मासिक होता है, उसे गरीब नहीं माना जाएगा. शहरी क्षेत्रों के लिए गरीबी की लाइन कुछ ऊँची है यानी 32 रुपये जो 965 रुपये मासिक होता है. यह आंकड़ा गरीबी के लिए विश्व बैंक के निर्धारित एक डॉलर पच्चीस सेंट यानी कि 75 रुपये प्रतिदिन की आय के स्तर से कहीं कम हैं.
योजना आयोग ने जो आर्थिक नीति बनाता है, यह आंकड़ा उस समय निर्धारित किया जब देश की सर्वोच्च अदालत ने कहा कि वह बताए कि उसने गरीबी का स्तर किस आधार पर तय किए हैं. यह आंकड़ा योजना आयोग ने तब दिए जब सुप्रीम कोर्ट ने उससे कहा कि वह बताए के उसने जो आंकड़े दिए हैं वह कैसे सही माने जाएं और उसे वैध ठहराने के लिए योजना आयोग एक हलफनामा दाखिल करे. क्योंकि जो आंकड़ों उसने पहले दिए थे वह किसी भी रूप में उचित नहीं थे. पहले योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि ग्रामीण क्षेत्र में 14 रुपये और शहर में 19 रुपये खर्च करने वाले गरीबी की रेखा से ऊपर हैं.
लेकिन कई विशेषज्ञों अर्थशास्त्र और सक्रिय कार्यकर्ताओं ने कहा है कि नए स्तर वास्तविकता के खिलाफ हैं. वह कहते हैं कि नई दिल्ली जैसे शहर में तीस रुपये में एक प्याज, एक आलू, कुछ चावल, एक केला, एक पेंसिल, एक एसपरीन और बस एक टिकट के सिवा और कुछ नहीं ख़रीदा जा सकता.
जैन दरीज़ एक प्रमुख आर्थिक विशेषज्ञ हैं जो भारत में आर्थिक नीति के गठन में भाग लेते रहे हैं. वह कहते हैं ''हम यह तो जानते हैं कि गरीबी की परिभाषा में बहुत कम लोग आते हैं. लेकिन जो कुछ नई और बिल्कुल हैरान करने वाला है वह यह दावा है कि गरीबी का जो पैमाना नियुक्त किया गया है वह भोजन, स्वास्थ्य और शिक्षा के खर्च पूरे करने के लिए काफी है. यह समझ में आने वाली बात नहीं. उसे ग़रीबी रेखा के बजाय भूख की रेखा कहना अधिक उचित होगा.
दूसरी ओर योजना आयोग का कहना है कि उसे ग़रीबी रेखा इस तरह स्थापित करना है कि उन लोगों की मदद हो सके जो सबसे ज़रूरतमंद हैं. सरकार को सामाजिक कल्याण के लिए उपलब्ध सीमित संसाधनों का सर्वश्रेष्ठ इस्तेमाल करना पड़ता है और इसमें बहुत अधिक लोगों को शामिल नहीं किया जा सकता. योजना आयोग की इसी बात से पता चलता है कि वह जो चाहे ग़रीबी रेखा निर्धारित कर ले क्योंकि ऐसा करने से पहले उसे यह देखना होता है कि उसके पास ऐसे लोगों को देने के लिए कितनी राशि है न कि यह कि कितने लोग उसकी मदद के पात्र हैं.
भारत की शानदार आर्थिक विकास के बावजूद करोड़ों लोग अब भी गरीब हैं. कांग्रेस के नेतृत्व में चलने वाली सरकार ने गरीबी कम करने और रोजगार, इलाज चिकित्सक और शिक्षा कार्यक्रमों पर अरबों रुपये खर्च करने की योजना बनाइ हैं. वह एक कानून पारित करना चाहती जिसके तहत गरीबों को सस्ता अनाज प्रदान किया जाएगा. वह कम कीमत ईंधन और खाद की जगह नकद राशि देना चाहती है. लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार ऐसे लोगों की संख्या घटा कर जो सरकार के सामाजिक भलाई के कार्यक्रमों के पात्र हैं, अपना बोझ कम कर रही है. आलोचकों में पटनाईक भी शामिल हैं जो भोजन के अधिकार के बारे में एक सरकारी आयोग के सलाहकार हैं. वे कहते हैं वह इस देश के 70 प्रतिशत लोगों को गरीबी दूर करने के कार्यक्रमों के लाभ से अलग कर रहे हैं. इस तरह सरकार द्वारा मिलने वाली सहायता में कमी आ जाएगी. लेकिन इसका उद्देश्य तो यह है कि गरीबों की संख्या उनकी हालत सुधार नहीं, बल्कि धोखा देकर कम कर दी जाएगी. सरकारी अनुमानों के अनुसार, भारत की एक दशमला दो अरब आबादी में से 32 प्रतिशत या लगभग चालीस करोड़ लोग गरीबी की हालत में जिंदा हैं. लेकिन कई आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि इन आंकड़ों से एक ऐसे देश में जहां पांच साल से कम उम्र के बच्चों की लगभग आधी संख्या पोषण की कमी का शिकार है, लोगों की महरूमी का सही आंकलन नहीं होता.
सरकार द्वारा निर्धारित राष्ट्रीय सलाहकार परिषद यह कहती रही है कि सामाजिक सहायता सभी नागरिकों को प्रदान की जानी चाहिए क्योंकि देश में ऐसा करने की क्षमता है. आर्थिक माहिर दरीज़ इसके समर्थक हैं. वे कहते हैं कि देश में कुछ राज्यों, जैसे दक्षिण में तमिलनाडु और उत्तर में हिमाचल प्रदेश में इस दिशा में पहले ही बहुत अच्छा काम हो रहा है.
इन मंत्रियों की क्या कहिए जो के आलीशान सरकारी बंगलों में रहते हैं जिनका उनहें कोई किराया भी नहीं देना पड़ता. उनको यह भी नहीं सोचना पड़ता कि आज शाम को घर में चूलहा जले गा भी के नहीं, उन्हें तो केवल एक ही काम है कि वह देश के ग़रीबों के बारे में सोचें और सोचते भी खूब हैं.
कोई मंत्री लख पति से कम नहीं है, तो अधिकांश करोड़पती हैं और काफी मंत्री तो ऐसे हैं जो अरबपति हैं. ऐसा व्यक्ति जिसे इस बात की चिंता न हो कि वह शाम को क्या खाएगा किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में कैसे सोच सकती है, जो पेट पर पत्थर बांधकर अपने परिवार के लिए मेहनत मजदूरी करता है.
एक बार चुनाव जीतने और मंत्री बनने के बाद उनको इतनी फुर्सत ही कहाँ रह जाती है के वे गरीब और नादार लोगों की खबर लेने के लिए छोटे गांवों और कस्बों का दौरा कर सकें. उसे साल में शायद एक या दो अवसर ही मिलते हैं जब वह कुछ घंटों के लिए अपने क्षेत्र के मुखय स्थान पर जापाता होगा और वह भी चार्टर्ड उड़ान और एयरकंडीशन कारों से.
दरअसल हमारे देश में ग़रीबी रेखा के आंकड़ों का खेल खेला जा रहा है. और ऐसा लगता है कि यह सब एशिया कोई विकास बैंक या वर्ल्ड बैंक के इशारे पर किया जा रहा है. दरअसल सरकार यह चाहती है कि दुनिया के सामने अपनी स्थिति स्थिर और बेहतर बनाकर पेश करे और ऐसा करने के लिए वह गरीबी की रेखा को नीचा रखने की कोशिश कर रही है.

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