अफ़ीफ़ अहसन
ऐसा लगता है कि अरब देशों की क्रांतियों, खासकर मिस्र की क्रांति ने अमेरीका को अरब-इसराइल नीति बदलने पर मजबूर कर दिया है, अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने मध्य पूर्व के लिए अमेरिका की नीति में परिवर्तन लाने की घोषणा करते हुए कहा कि अमरीका को अरब नीति बदलना होगा, उन्होंने कहा कि तुनिशिया से शुरू होने वाली क्रांति के बाद साबित हो गया है कि ज़ोर ज़बरदस्ती की सरकारें नहीं चल सकतीं, 1967 ई. की सीमा स्थिति के तहत स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना की जाए, सीरिया और ईरानी नेता सत्ता हस्तांतरण का समर्थन करें, यमन और बहरीन में सरकार विपक्ष से बातचीत करे, सीरिया के राष्ट्रपति बशार अलअसद राजनीतिक सुधार लाएं या फिर लोकतंत्र को रास्ता दें, मोअम्मर कद्दाफ़ी को लीबिया छोड़ना होगा, अमेरिकी कमांडो ने ओसामा के खिलाफ कार्रवाई कर अलकायदा संगठन को भारी झटका पहुंचाया है, वह शहीद नहीं हुआ है बल्कि मारा गया है, ओसामा एक कातिल था जिसका संदेश नफरत था, उसने लोकतंत्र को अस्वीकार करके मानवाधिकार को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था, और वह अफगानिस्तान से जुलाई में वापसी शुरू कर देंगे और यह कि अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का प्रभाव कम कर दिया गया है.
गुरुवार को विदेश मंत्रालय में मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में उत्पन्न होने वाले राजनीतिक परिवर्तन के विषय पर संबोधिन करते हुए राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा कि मध्य पूर्व की क्रांति की कहानी नई नहीं है. पिछले छह महीने से मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में परिवर्तन का सिलसिला जारी है, वह मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में सार्वजनिक राय का समर्थन करते हैं क्योंकि मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में शक्ति का संतुलन कुछ हाथों में है. राष्ट्रपति ओबामा ने कहा है कि मध्य पूर्व अहिंसा के आधार पर लोकतंत्र, विकास, स्वतंत्रता, अपनी बात कहने की आजादी और राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तन की प्राप्ति के लिए एक क्रांतिकारी राह पर है जिसका श्रेय उन देशों के लोगों के सिर है. इस बारे में ओबामा ने तुनिशिया और मिस्र में सफल परिवर्तन का उल्लेख किया और कहा कि आर्थिक और राजनीतिक स्थिति की वजह से लोग इकट्ठा होने पर मजबूर हुए और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया और ले रहे हैं.
उन्होंने कहा कि अमेरिका हिंसा के इस्तेमाल का विरोध करता है, जबकि वह अपनी बात कहने की स्वतंत्रता और धर्म की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तन का समर्थन करता है. राष्ट्रपति ने कहा कि हालात ज्यों का तयों रहने का कोई विकल्प नहीं रहा, क्रांति के अधिकार में आई हुई लहर हवा का एक ताज़ा झोंका है. राष्ट्रपति ओबामा ने कहा कि अहिंसा का प्रदर्शन करते हुए अरब महाद्वीप में इस स्तर के परिवर्तन का हासिल होना कोई मामूली कामयाबी नहीं है. गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा के कम अवसर वह अन्य कारक इन प्रदर्शनों के पीछे कार्यरित हैं. उन्होंने कहा कि अरब देशों में नई पीढ़ी परिवर्तन के नारे लगा रही है, अरब क्रांति से पता चलता है कि शक्ति का प्रयोग स्थिर नहीं.
अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि मध्य पूर्व के लिए अमेरिकी नीति में बदलाव ज़रूरी है, मध्य पूर्व में व्यापार और निवेश किया जाएगी. राष्ट्रपति ने कहा कि अमेरिका धर्म और व्यक्त की आजादी का समर्थन करता है. मध्य पूर्व में महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार मिलने चाहिए. हमने इराक से सीखा है कि किसी देश में नेतृत्व बदलना कितना मुश्किल है. उन्होंने कहा कि इस्राइल-फिलिस्तीनी अपने मुद्दों का स्वयं हल निकालेंगे, अमेरिका या कोई देश उनकी मदद नहीं कर सकता, इस्राइल को स्वीकार किए बिना फ़िलिस्तीन शांति प्राप्त नहीं कर सकता. इस्राइल और फ़िलिस्तीन के बीच शांति बहाली की आवश्यकता पहले से अधिक है. राष्ट्रपति ओबामा ने आरोप लगाया कि ईरान में महिलाओं और पुरुषों पर अत्याचार किया जाता है, वह ईरानी जनता के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते रहेंगे. शाम की जनता ने सुधार के लिए आवाज़ उठाई है, बशार अलअसद अपने लोगों के खिलाफ ईरान से मदद ले रहे हैं, बहरीन में ईरान का हस्तक्षेप अस्वीकार्य है. मध्य पूर्व में परमाणु होड़ से किसी को फायदा नहीं होगा.
वॉशिंगटन में अमेरिकी और विदेशी राजनयिकों को संबोधित करते हुये राष्ट्रपति ओबामा ने कहा कि भविष्य का फिलिस्तीनी राज्य कुछ शर्तों के साथ 1967 की सीमाओं की उन लकीरों पर होनी चाहिए जिस तरह से 1967 ई. के छह दिवसीय युद्ध से पहले था. राष्ट्रपति ने कहा कि फतह और हमास के बीच समझौता इस्राइल के लिए बड़ा सवाल है.
बराक ओबामा ने कहा कि इस्राइल को संयुक्त राष्ट्र में अकेला करने की कोशिश के रूप में स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य नहीं बन सकता. उधर इस्राइल ने वर्ष 1967 की स्थिति पर सीमाओं के बारे में ओबामा का प्रस्ताव ठुकरा दिया है. इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नितिन याहू अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के तकरीर से सटपटा गए ओर उन्होंने इस फ़ॉर्मूले को एकदम ठुकरा दिया.
नितन याहू ने वॉशिंगटन के लिए एक वायूयान में सवार होते हुए कहा कि जहां एक ओर वह श्री ओबामा के शांति स्थापित करने के संकल्प की सराहना करते हैं, वह ''राष्ट्रपति ओबामा को उस इक़रार को दोहराते हुवे सुनने की उम्मीद करते हैं जिसका वादा अमेरिका ने 2004 में इस्राइल से किया थी और जिसे कांग्रेस के दोनों सदनों की भारी हिमायत मिली थी''
संयुक्त राष्ट्र में इस्राइल के पूर्व राजनयिक ओर नितन याहू के राजदार, डोरे गोलड ने ओबामा के वक्तव्य पर इन शब्दों मैं खेद व्यक्त किया ''यह इस्राइल के बारे में संयुक्त राज्य अमेरिका की नीति में बुनियादी बदलाव है''
अमेरिका पहुंचने के बाद शुक्रवार को व्हाइट हाउस में होने वाली दोनों नेताओं की मुलाक़ात के बाद अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नितिन याहू ने कहा कि मध्य पूर्व में शांति के रास्ते में मतभेद हैं. इस बयान से ऐसा लगता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति अपनी बात से पलट सकते हैं.
अखबार के प्रतिनिधियों से बात करते हुए नितिन याहू ने कहा कि इस्राइल कुछ रियाआतें देना चाहता है, लेकिन वह 1967 ई. तक जाने के लिए तैयार नहीं, जिन्हें उन्होंने 'असमर्थ रक्षा' बताया.
जिस समय ओबामा और नितिन याहू मुलाकात जारी थी, चार-राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय सुलहकारों ने, जो लगभग एक दशक से मध्य पूर्व में समझौते के लिए प्रतिबद्ध हैं, मध्य पूर्व में शांति के बारे में अपने एक बयान में ओबामा की सोच का समर्थन किया. अमेरिका के अलावा चार-राष्ट्रीय समूह में संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ और रूस शामिल हैं.
दूसरी ओर फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने सभी नेताओं की आपात बैठक तलब की है. हमास का कहना है बयानों की बजाय ओबामा ईरान और अरब जनता के अधिकारों के लिए ठोस प्रयास करें. अरब देशों में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भाषण को केवल टिप्पणी भर करार दिया जा रहा है. मिस्री लोगों का कहना है कि बराक ओबामा क्षेत्र में शांति और स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य के लिए इस्राइल पर दबाव डालें और खाली खूली बातें न करें. मगर फलस्तीनियों ने जो अपने राज्य के लिए लाबेयिंग करते रहे हैं, ओबामा के इस बयान को सराहा है.
फ़िलिस्तीन और इस्राइल मसले के समाधान के लिए आधार रूप में 1967 की सीमाओं के उपयोग के समर्थन का ओबामा का बयान किसी अमरीकी राष्ट्रपति द्वारा दिया गया एसा पहला बयान है जिससे शांति और समझोते की कुछ उम्मीदें पैदा हुई हैं और इसका स्वागत किया जाना चाहिए.
यदि सकारात्मक परीपेक्ष में देखा जाए तो ओबामा का यह बयान बहुत ही महत्व रखता है और आधी सदी से अधिक से चले आ रहे विवाद के समाधान की ओर एक जबर्दस्त छलांग है. ऐसा महसूस होता है कि अमेरिका फ़िलिस्तीनी समस्या के समाधान के लिए सही मायनों में प्रतिबद्ध है और जल्द या देर से इस में सक्रात्मक प्रगति हो सकती है.
गुरुवार को विदेश मंत्रालय में मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में उत्पन्न होने वाले राजनीतिक परिवर्तन के विषय पर संबोधिन करते हुए राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा कि मध्य पूर्व की क्रांति की कहानी नई नहीं है. पिछले छह महीने से मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में परिवर्तन का सिलसिला जारी है, वह मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में सार्वजनिक राय का समर्थन करते हैं क्योंकि मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में शक्ति का संतुलन कुछ हाथों में है. राष्ट्रपति ओबामा ने कहा है कि मध्य पूर्व अहिंसा के आधार पर लोकतंत्र, विकास, स्वतंत्रता, अपनी बात कहने की आजादी और राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तन की प्राप्ति के लिए एक क्रांतिकारी राह पर है जिसका श्रेय उन देशों के लोगों के सिर है. इस बारे में ओबामा ने तुनिशिया और मिस्र में सफल परिवर्तन का उल्लेख किया और कहा कि आर्थिक और राजनीतिक स्थिति की वजह से लोग इकट्ठा होने पर मजबूर हुए और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया और ले रहे हैं.
उन्होंने कहा कि अमेरिका हिंसा के इस्तेमाल का विरोध करता है, जबकि वह अपनी बात कहने की स्वतंत्रता और धर्म की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तन का समर्थन करता है. राष्ट्रपति ने कहा कि हालात ज्यों का तयों रहने का कोई विकल्प नहीं रहा, क्रांति के अधिकार में आई हुई लहर हवा का एक ताज़ा झोंका है. राष्ट्रपति ओबामा ने कहा कि अहिंसा का प्रदर्शन करते हुए अरब महाद्वीप में इस स्तर के परिवर्तन का हासिल होना कोई मामूली कामयाबी नहीं है. गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा के कम अवसर वह अन्य कारक इन प्रदर्शनों के पीछे कार्यरित हैं. उन्होंने कहा कि अरब देशों में नई पीढ़ी परिवर्तन के नारे लगा रही है, अरब क्रांति से पता चलता है कि शक्ति का प्रयोग स्थिर नहीं.
अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि मध्य पूर्व के लिए अमेरिकी नीति में बदलाव ज़रूरी है, मध्य पूर्व में व्यापार और निवेश किया जाएगी. राष्ट्रपति ने कहा कि अमेरिका धर्म और व्यक्त की आजादी का समर्थन करता है. मध्य पूर्व में महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार मिलने चाहिए. हमने इराक से सीखा है कि किसी देश में नेतृत्व बदलना कितना मुश्किल है. उन्होंने कहा कि इस्राइल-फिलिस्तीनी अपने मुद्दों का स्वयं हल निकालेंगे, अमेरिका या कोई देश उनकी मदद नहीं कर सकता, इस्राइल को स्वीकार किए बिना फ़िलिस्तीन शांति प्राप्त नहीं कर सकता. इस्राइल और फ़िलिस्तीन के बीच शांति बहाली की आवश्यकता पहले से अधिक है. राष्ट्रपति ओबामा ने आरोप लगाया कि ईरान में महिलाओं और पुरुषों पर अत्याचार किया जाता है, वह ईरानी जनता के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते रहेंगे. शाम की जनता ने सुधार के लिए आवाज़ उठाई है, बशार अलअसद अपने लोगों के खिलाफ ईरान से मदद ले रहे हैं, बहरीन में ईरान का हस्तक्षेप अस्वीकार्य है. मध्य पूर्व में परमाणु होड़ से किसी को फायदा नहीं होगा.
वॉशिंगटन में अमेरिकी और विदेशी राजनयिकों को संबोधित करते हुये राष्ट्रपति ओबामा ने कहा कि भविष्य का फिलिस्तीनी राज्य कुछ शर्तों के साथ 1967 की सीमाओं की उन लकीरों पर होनी चाहिए जिस तरह से 1967 ई. के छह दिवसीय युद्ध से पहले था. राष्ट्रपति ने कहा कि फतह और हमास के बीच समझौता इस्राइल के लिए बड़ा सवाल है.
बराक ओबामा ने कहा कि इस्राइल को संयुक्त राष्ट्र में अकेला करने की कोशिश के रूप में स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य नहीं बन सकता. उधर इस्राइल ने वर्ष 1967 की स्थिति पर सीमाओं के बारे में ओबामा का प्रस्ताव ठुकरा दिया है. इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नितिन याहू अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के तकरीर से सटपटा गए ओर उन्होंने इस फ़ॉर्मूले को एकदम ठुकरा दिया.
नितन याहू ने वॉशिंगटन के लिए एक वायूयान में सवार होते हुए कहा कि जहां एक ओर वह श्री ओबामा के शांति स्थापित करने के संकल्प की सराहना करते हैं, वह ''राष्ट्रपति ओबामा को उस इक़रार को दोहराते हुवे सुनने की उम्मीद करते हैं जिसका वादा अमेरिका ने 2004 में इस्राइल से किया थी और जिसे कांग्रेस के दोनों सदनों की भारी हिमायत मिली थी''
संयुक्त राष्ट्र में इस्राइल के पूर्व राजनयिक ओर नितन याहू के राजदार, डोरे गोलड ने ओबामा के वक्तव्य पर इन शब्दों मैं खेद व्यक्त किया ''यह इस्राइल के बारे में संयुक्त राज्य अमेरिका की नीति में बुनियादी बदलाव है''
अमेरिका पहुंचने के बाद शुक्रवार को व्हाइट हाउस में होने वाली दोनों नेताओं की मुलाक़ात के बाद अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नितिन याहू ने कहा कि मध्य पूर्व में शांति के रास्ते में मतभेद हैं. इस बयान से ऐसा लगता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति अपनी बात से पलट सकते हैं.
अखबार के प्रतिनिधियों से बात करते हुए नितिन याहू ने कहा कि इस्राइल कुछ रियाआतें देना चाहता है, लेकिन वह 1967 ई. तक जाने के लिए तैयार नहीं, जिन्हें उन्होंने 'असमर्थ रक्षा' बताया.
जिस समय ओबामा और नितिन याहू मुलाकात जारी थी, चार-राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय सुलहकारों ने, जो लगभग एक दशक से मध्य पूर्व में समझौते के लिए प्रतिबद्ध हैं, मध्य पूर्व में शांति के बारे में अपने एक बयान में ओबामा की सोच का समर्थन किया. अमेरिका के अलावा चार-राष्ट्रीय समूह में संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ और रूस शामिल हैं.
दूसरी ओर फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने सभी नेताओं की आपात बैठक तलब की है. हमास का कहना है बयानों की बजाय ओबामा ईरान और अरब जनता के अधिकारों के लिए ठोस प्रयास करें. अरब देशों में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भाषण को केवल टिप्पणी भर करार दिया जा रहा है. मिस्री लोगों का कहना है कि बराक ओबामा क्षेत्र में शांति और स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य के लिए इस्राइल पर दबाव डालें और खाली खूली बातें न करें. मगर फलस्तीनियों ने जो अपने राज्य के लिए लाबेयिंग करते रहे हैं, ओबामा के इस बयान को सराहा है.
फ़िलिस्तीन और इस्राइल मसले के समाधान के लिए आधार रूप में 1967 की सीमाओं के उपयोग के समर्थन का ओबामा का बयान किसी अमरीकी राष्ट्रपति द्वारा दिया गया एसा पहला बयान है जिससे शांति और समझोते की कुछ उम्मीदें पैदा हुई हैं और इसका स्वागत किया जाना चाहिए.
यदि सकारात्मक परीपेक्ष में देखा जाए तो ओबामा का यह बयान बहुत ही महत्व रखता है और आधी सदी से अधिक से चले आ रहे विवाद के समाधान की ओर एक जबर्दस्त छलांग है. ऐसा महसूस होता है कि अमेरिका फ़िलिस्तीनी समस्या के समाधान के लिए सही मायनों में प्रतिबद्ध है और जल्द या देर से इस में सक्रात्मक प्रगति हो सकती है.
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