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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 19th December 2011
अफ़ीफ़ अहसन
मुझे कुछ महीने पहले ही अनुमान हो गया था की देश जिस राह पर चल रहा है अगर उसी पर चलता रहा तो आर्थिक तबाही बहुत दूर नहीं है. जब मुझे लगा कि हमारा देश इस बारे में बिल्कुल चिंतित नहीं लग रहा हे, इसलिए सरकार का ध्यान इस ओर दिलाने के लिए मैंने एक विस्तृत लेख लिखा था जिस में मैंने इस बात का खुलासा किया था कि कैसे हमारे देश की अर्थव्यवस्था तबाही की राह पर आगे बढ़ रही हे और अगर जल्द ही इसका कोई उपाय नहीं किया गया तो हमारा देश तबाही की कगार पर पहुँच जाएगा. मगर ऐसा लगता है कि शासक वर्ग ही नहीं बल्कि हमारे देश का विपक्षी दल भी इस समस्या को लेकर गंभीर नहीं हैं. क्योंकि उन्हें राजनीति के अलावा न तो कुछ और दिखाई ही देता है और न ही सुनाई ही देता है. शायद इसीलिए वह उसे कोई समस्या मानने से लगातार इनकार कर रहे हैं.विपक्षी दलों की नीयत तो समझ में आती है कि उनके हित में हो सकता है कि देश के हालात बद से बदतर हों. और देश की जनता सरकार से नाराज़ हो और परेशान हो जिसकी वजह से एक ऐसी सरकार विरोधी लहर चले जिसमें लोग सरकारी वर्ग को सत्ता से बेदखल कर दें. क्योंकि जब जनता नाराज़ होती है तो वह यह नहीं देखते के कौन सी पार्टी उनकी परेशानियों को दूर कर सकती है बल्कि वह तो केवल यह देखती है कि उसे शासक दल को हटाना है, क्योंकि वे ही सारी परेशानियों की जड़ नज़र आती है. उनके वोट के कारण चाहे कोई भी दल सत्ता में आ जाये उसकी उन्हें कोई परवाह नहीं होती.
मगर हमारे सत्ताधारी दल को न जाने क्या हुआ है? वह क्यों चिर निद्रा से नहीं जागता. और क्यों परेशानी का निवारण नहीं करती. इस सब की एक बड़ी वजह तो लोकपाल बिल ही है. ऐसा माहौल बनाया जारहा है कि जैसे देश की सभी समस्याओं का एकमात्र अचूक और रामबाण इलाज लोकपाल बिल ही है. या यूँ कहिए कि हैदराबाद की प्रसिद्ध दवा “जिन्दा तिलस्मात” की तरह है. जिसको कि आप हर बीमारी में उपयोग कर सकते हैं. एक समय “जिन्दा तिलस्मात” का उपयोग बहुत आम था और इसका उपयोग हर बीमारी के इलाज में किया जाता था. मगर वह पुराना दौर था जब बीमारियां कम थीं या यूं कहिए के लोगों को कम बीमारियों के नाम पता थे. इसलिए सभी बीमारी के लिए गिने चुने नाम ही थे. मगर अब स्पेशलाईज़ेशन का दौर है और इसलिए एक-एक बीमारी में कई-कई बीमारियां निकल आई हैं. और इन बीमारियों के अलग अलग विशेषज्ञ और डॉक्टर हो गए हैं. मगर हम उसी पुराने ज़माने में जी रहे हैं. हमें अब भी यही विश्वास है कि लोकपाल बिल ही हमारी सारी परेशानियों का इलाज है.
हालांकि सभी पार्टियां अन्ना की सभी बातों से सहमत नहीं हैं, लेकिन कोई भी खुलकर इसका विरोध नही कर रही है. बल्कि विपक्ष पार्टियां तो उसकी आग में अपनी रोटियाँ सेंकने से भी नहीं चूक रही हैं. और जितना हो सके इस मामले को हवा दे रही हैं. बंद कमरों में इन पार्टियों का जो स्टैंड होता हे वह उनके खुले आम स्टैंड से बिल्कुल अलग है.
लोक पाल बिल पास कराने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाए जाने और चालू सत्र की अवधि बढ़ाए जाने तक की बात हो रही है मगर दूसरे बहुत ही आवश्यक और महत्वपूर्ण विधेयक हैं जो दोनों सदनों में पास होने के इंतजार में हैं उनकी कोई बात भी नहीं करता. इसके अलावा बहुत से ऐसे बिल अभी ड्राफ्ट स्टेज पर ही अटके हुए हैं. और बहुत से ऐसे बिल हैं जो ठंडे बस्ते में डाल दिए गए हैं. सरकार ने मोजूदा सत्र शुरू होने से पहले 62 ऐसे नए बिलों की सूची बनाई थी जो इसमें पारित कराए जाने थे. यह बिल उन के अलावा थे जो पहले से ही लम्बित हैं. लेकिन अब जब इस सत्र के खत्म होने में कुछ दिन ही बचे हैं सरकार एक भी बिल पास कराने में कामयाब नहीं हो सकी है. बैठक का अधिकांश समय शोर शराबे और हंगामे की नज़र हो चुका है. पिछले वर्ष शीत सत्र में कोई भी बिल पास नहीं हो सका था. जबकि बजट सत्र में कुल पांच बिल ही पास हो सके और मानसून सत्र में दस बिल पास हुए थे.
इस नाअहली में सरकार ने खुदरा में एफडीआई पर लिए गए अपने फैसले को वापस लेकर और उस पर अमल न करके ओर भी गलत काम किया है. इससे सरकार और ज़यादा कमज़ोर दिख रही है. अब तो हालात यहां तक पहुंच गए हैं के केबिनेट में लिए गए निर्णय का विरोध कांग्रेस के सहयोगी दल संसद और सड़क पर करते हैं हालांकि जिस समय यह फैसला लिया जाता है वह केबनट की बैठक में मोजूद होते हैं और तब वह इस फैसले को रोकने के लिए कुछ नहीं करते.
यूपीए की स्थिति ऐसी हो गई है कि वह अपने सहयोगी दलों तक को किसी विधेयक के लिए राज़ी नहीं कर पाता है और यूपीए के घटक दल ही उसके हर फ़ेसले का विरोध करना शुरू कर देते हैं. रही सही कसर भाजपा पूरी कर देती है और वह भी कांग्रेस के हर कदम का विरोध करना शुरू कर देती है. पेंशन बिल को ही ले लीजिए. 2004 में भाजपा इस विधेयक का समर्थन कर रही थी लेकिन उस समय कम्युनिस्ट इस विधेयक का विरोध कर रहे थे. आज हालत यह है कि कम्युनिस्ट और भाजपा दोनों मिल कर उसकी पुरज़ोर मुखाल्फ़त में आ गए हैं.
आज हालात यह हो गए हैं कि सरकारी अधिकारी और मंत्री छोटे से छोटा फैसला लेने से डरते हैं के कहीं उन पर भ्रष्टाचार का आरोप न लग जाए. और कई योजनाएं और कार्यक्रमों का क्रियान्वित नहीं हो सका है. सरकारी खजाना खाली होता जा रहा है. और आय कम होती जा रही है.
सरकार के सभी आँकड़े ग़लत साबित होते जा रहे हैं. जिसकी वजह साफ है कि सरकार अभी तक खुश फहमी में जी रही है और वर्तमान वास्तविकता और भविष्य के संकट से नज़रें चूरा रही है. योजना आयोग के उप-अध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने बड़ी बेशरमी से इस बात को स्वीकार कर लिया है की योजना आयोग ने महंगाई दर का ग़लत अनुमान लगाया था. मगर उस पर कोई भी हंगामा नहीं हुआ. उनसे किसी ने भी यह नहीं कहा कि आप अपना बोरिया बिस्तर गोल करें क्योंकि आपको काम करना नहीं आता. सरकार का अधिकांश कामकाज इनही आँकड़े पर चलता है. क्योंकि गलत आंकड़ों का आंकलन सरकार को गलत राह पर ले जा सकता है. इतना ही नहीं वह यह दावा करने से भी नहीं चूक रहे हैं के मार्च 2012 तक महंगाई दर सात से आठ प्रतिशत तक आ जाएगी. और इसी को आधार बनाकर प्रणब मुखर्जी यह दावा कर रहे हैं कि मार्च तक महंगाई कम हो जाएगी. यह आंकड़े जिस आधार पर बनाए गए थे जब वह आधार ही धराश्य हो गया हो तो फिर कैसे इन नए आंकड़ों पर भरोसा किया जासकता है.
अभी भी समय है कि सरकार देश की मौजूदा आर्थिक स्थिति की नए सिरे से आंकलन और समीक्षा करे और उस पर एक व्हाइट पेपर जारी करे और उसको ठीक करने के लिए जल्द से जल्द कदम उठाये और सभी राजनीतिक दलों के साथ बैठ कर देश के हालात बेहतर बनाने की ओर काम करे.
Afif Ahsen, Congress, Daily Pratap, FDI in Retail, Parliament, UPA, Vir Arjun,

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