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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 27th December 2011
अफ़ीफ़ अहसन
धर्म आरक्षण का आधार नहीं हो सकता, तो फिर आरक्षण किस आधार पर मांगा या दिया जा सकता है. इस सवाल का प्राकृतिक जवाब यह होगा कि आरक्षण का हकदार ना तो कोई खास वर्ग, न ही कोई खास समुदाय और न ही कोई विशेष धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक हो सकता है. आरक्षण तो आर्थिक पिछड़े पन के आधार पर दिया जाना चाहिए.इस मामले को समझने के लिए हमें पहले यह जानना चाहिए की देश में आरक्षण की शुरुआत कब, कैसे और क्यों हुई. आम विचार है कि हिंदुस्तान में आरक्षण डॉ. अंबेडकर और कांग्रेस ने शुरू किया. तथ्य इसके बिल्कुल विपरीत है. दरअसल हिंदुस्तान में आरक्षण का आधार अंग्रेजों ने डाला. आरक्षण की नीति की शुरुआत मद्रास और मैसूर प्रजीडेंसियों में सरकारी नौकरियों में ब्राह्मणों के बहुल के खिलाफ गैर ब्राह्मणों के विरोध के बाद हुई. ब्राह्मणों ने इसके खिलाफ कोई सख्त प्रतिरोध नहीं किया और उन क्षेत्रों को पलायन कर गए जहाँ समृद्धी के अवसर उपलब्ध थे.
मैसूर प्रजीडेंसी ने 1874 से ही अनौपचारिक तौर पर अपनी आरक्षण नीति तैयार कर रखी थी. उसकी सरकार ने (1874 और 1885 के बीच) ब्राह्मणों के लिए मध्यम और निचले स्तर पर 20 प्रतिशत और शेष 80 प्रतिशत नौकरियां दूसरों के लिए आरक्षित कीं. 1881 से 1910 के दौरान नौकरियों की मांग को “माटी के लाल” आंदोलन के कारण प्रोत्साहन प्राप्त हुआ.
इस कार्य में 1858 में ब्रिटिश सरकार के ईस्ट इंडिया कंपनी से चार्ज लेने के बाद तेजी आई. 1858 में ब्रिटिश सरकार ने “बांटो और राज करो” की नीति अपनाई. उस पर अमल करने के लिए अंग्रेजों से जो भी बन पड़ता था उन्होंने किया ताकि सभी हिदुस्तानियों में अंग्रेजों के खिलाफ ऐका न पनप सके और अंग्रेज बिना किसी रोक-टोक के देश पर शासन करते रहें. आज़मगढ़ में एक ब्रिटिश राजदूत यूटस जे किट्स ने 1881 की जनगणना में पिछड़ी जातियों और जनजातियों की पहचान की, जिसका उद्देश्य उन्हें स्थानीय और प्रांतीय स्तर पर माली मदद देना और शिक्षा और सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता देना था. शायद इसी वजह से 1905 से 1940 के दौरान “बांटो और राज करो” की ब्रिटिश नीति बहुत जोर-शोर से फली-फूली. इसी दौर में आरक्षण को व्यापक रूप मिला.
क्योंकि हमारे देश में वसायल सीमित हैं, जो कभी आबादी के अनुपात में मेयसर नहीं रहे, हमारा देश बेरोज़गार तो पैदा करता रहा मगर रोजगार के अवसर पैदा नहीं कर पाता. शिक्षा व्यवस्था ऐसी है कि जिस कोर्स में अपलाई करने के लिए कम से कम योग्यता 45 प्रतिशत होती है उसमें 98 से 100 प्रतिशत नमबर लाने वालों को ही प्रवेश मिल पाता है. क्या इसका मतलब यह हे की बाकी छात्र पात्र नहीं हैं? ऐसा हरगिज़ नहीं. हर 45 प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाला उसका पात्र है.
इसका एक कारण यह है कि सरकार ज़रूरत के अनुसार नए शैक्षणिक संस्थान नहीं बना पा रही है. और इसके लिए जिम्मेदार सीमित संसाधन को ठहराया जाता है. केवल निजी क्षेत्र के पास संसाधनों की कमी नहीं है. जिसके पास प्राप्त करने के ज़रायों की कोई कमी नहीं है. लेकिन क्योंकि हमारे देश में शिक्षा में अब भी कोटा सिस्टम और लाइसेंस राज लागू है, जिसकी वजह से लाइसेंस जारी करने वाली एजेंसियों को मनमानी रिश्वत प्राप्त करने की खुली छूट मिल जाती है. यह रिश्वत मिनिस्टर से लेकर क्लर्क तक ली जाती है. शर्तें ऐसी लगाई जाती हैं कि उन्हें पूरा करना जूए-शीर लाने जैसा है. अगर किसी तरह कोई विश्वविद्यालय बन भी जाए तो बाद में उसकी स्वीकृति वापस ले ली जाती है और छात्रों को बीच मजधार में छोड़ दिया जाता है .
हमें यह तो मंज़ूर है कि हमारे बच्चे विदेश जाकर वहां के शिक्षण संस्थानों में शिक्षा प्राप्त करें और देश की लाखों करोड़ों की विदेशी मूद्रा बाहर चली जाए मगर इन विदेशी विश्वविद्यालयों और संस्थाओं को इस बात पर राज़ी करने के लिए कोई काम नहीं किया जाता जिससे कि वह देश में ही अपनी शाखायें खोलें और इसके लिए उन्हें लूभाने की आवश्यकता को भी नहीं समझा जाता. अगर ऐसा किया गया तो एक तो विदेश के मुकाबले शिक्षा कम खर्च होगी और दूसरे शिक्षा के स्तर में इजाफा होगा.
ऐसा नहीं है के अंग्रेजों द्वारा शुरू किया गया आरक्षण निराधार था, दरअसल हुआ यह की कुछ लोगों ने अपनी शक्ति और पहुंच के आधार पर नौकरियों और सुविधाओं पर एकाधिकार स्थापित करने के लिए जाति के आधार पर एक समाज की संरचना की. जिसमें यह कहा गया कि राजा का बेटा राजा, मंत्री का बेटा मंत्री, दरबारी का बेटा दरबारी, सिपाही का बेटा सिपाही और इस तरह हर दूसरी उप जाति के लोग भी वही काम करते रहेंगे जो करते हैं. यानी धोबी का बेटा धोबी, नाई का बेटा नाई, तैली का बेटा तैली, भिशती का बेटा भिशती, जुलाहे का बेटा जुलाहा, किसान का बेटा किसान, जूते गांठने वाले का बेटा जूते गांठने वाला आदि आदि. यह समाज में स्वार्थ की हद थी और उसने एकाधिकार की नींव डाली. इसी कारण एक विशेष वर्ग हमेशा दबा व कुचला रहा, हालांकि यह बहुमत में था. अगर किसी देश में वर्षों तक किसी वर्ग, समुदाय या समूह का शोषण किया जाएगा तो वह स्वाभाविक रूप पर बगावत पर उतारू हो जाएगा.
जिस तरह कुछ लोगों को अछुत बताकर सदीयों तक उॅचे शाही निकायों से दूर रखा गया और बाद में इन लोग को हरिजन कहा गया और फिर वही लोग शेडयूलड जाति कहलाए इसी तरह स्वतंत्रता के बाद मुसलमानों को भी तरह तरह से परेशान किया गया और उनहें भी अछूत बना दिया गया. अब इसे माइनारिटी कहा जा रहा है. इस माइनारिटी में बेशक मुसलमान हैं मगर इसमें सिख, ईसाई, बौद्ध और जेनी भी शामिल हैं. इसलिए अगर माइनारिटी को कोई भी आरक्षण दिया जाता है तो वह धर्म के आधार पर दिया गया नहीं माना जा सकता. क्योंकि देश में जिस किसी को भी कोई आरक्षण मिलेगा या मिला है उसका अपना कोई व्यक्तिगत धर्म ज़रूर है. ऐसा तो नहीं हे की जिन लोगों को अनुसूचित जाति के तहत आरक्षण मिलता है वह किसी भी धर्म को नहीं मानते हैं. या धर्म को नहीं मानना ही आरक्षण की बुनियादा हो सकता है, हां यह ज़रूर है कि अगर कोई अनुसूचित जाति का व्यकती अपना धर्म बदल कर ईसाई (न्यू िक्रसचन) या इस्लाम धर्म अपना कर (न्यू मुस्लिम) हो जाये तो केवल उसे ही आरक्षण प्राप्त करने का अधिकार नहीं है. यानी कि हमारे देश में धर्म के आधार पर आरक्षण न देने की बात केवल शेडयूल जाति के लिए है और ऐसा किसी और कानून में नहीं है कि बाकी किसी तबक़े, समुदाय या दल को धार्मिक आधार पर आरक्षण देने से रोका जा सकता है.
एक और बात जो ध्यान देने योग्य है वह यह है कि अगर किसी को एक बार भी किसी भी प्रकार का आरक्षण मिल गया तो उसे और उसके बाल बच्चों को भविष्य में आरक्षण का कोई अधिकार नहीं रह जाना चाहिये क्योंकि जिस तरह हमारे देश के संसाधन सीमित हैं उसी तरह आरक्षण की सीटें भी सीमित हैं. और उस पर एक ही परिवार का एकाधिकार नहीं होना चाहिए नहीं तो एक नया पिछड़ा वर्ग उभर के सामने आ जाएगा. आज जो ऊपर हैं वह कल नीचे हो जाएंगे. एक जूती गांठने वाले का लड़का जब आईएएस अधिकारी बन जाता है तो वह जूती गांठंने वाला नहीं रह जाता बल्की उसका शुमार देश के अधिकारी वर्ग में होता है और वह शेडयूल जाति से निकलकर एक नई जाति में शामिल हो जाता है जो है नौकरशाहों की, लेकिन क्योंकि अब वह शक्तिशाली है, इसलिए वह खुद को शेडयूल जाति में बनाए रखता है और अपनी आने वाली पीढ़ियों को भी फायदा दिलाता रहता है जो शेडयूल कास्ट के दूसरे कमजोर लोगों की कीमत पर होता है, बहुत से लोग हैं जो आज तक आरक्षण का लाभ उठाने में सफल नहीं हुए हैं. इसी तरह अगर एक नाई को तैली को धोबी को भिशती को जिस दिन भी आरक्षण मिल गया वह उस दिन से नाई, तैली, धोबी, भिशती वर्ग से बाहर हो जाता है मगर फिर भी उसकी आने वाली पीढ़ियां आरक्षण का लाभ उठाती रहती हैं.
मुसलमानों को अन्य पिछड़ी जातियों की श्रेणी में दिया जाने वाला साढ़े चार प्रतिशत आरक्षण कुछ नया नहीं है. यह मांग भी ठीक उसी तरह की है जिस तरह की मांग गुर्जर आरक्षण के लिए की जा रही है. क्योंकि गुर्जर अन्य पिछड़े जातियों की श्रेणी में आते हैं और बहुत पिछड़े होने की वजह से और अन्य जातियों के एकाधिकार के कारण वह आरक्षण का लाभ नहीं प्राप्त कर पाते, इसलिए वह अपनी जाती के लिए अलग से आरक्षण चाहते हैं. इसमें कोई बुराई नज़र नहीं आती जब तक सत्ताईस प्रतिशत में ही उन की जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण दिया जाता हे, मगर अलग से उन्हें आरक्षण देना अभी संभव नहीं लगता. इसी तरह की मांग मुसलमान अन्य पिछड़े जातियों की है, वह कहते हैं के अन्य जातियां उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं लेने देतीं इसलिए आरक्षण में मुस्लिम पिछडी जातियों को उनके अनुपात के आधार पर हिस्सा निर्धारित किया जाये. ऐसा ही केंद्र सरकार ने किया है. इसलिए यह कतई नहीं समझना चाहिए के मुसलमानों को कोई नया आरक्षण मिल गया है, या यह कि कांग्रेस ने उन पर कोई बहुत बड़ा एहसान किया है बल्कि यह तो उन्हें पहले से ही मिल रहा था कांग्रेस ने तो केवल उस को सुनिश्चित करने का काम किया है.
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