बहरीन के इतिहास ने कई उतार चढ़ाओ देखे हैं. कुछ को छोड़कर अधिकांश समय बहरीन पर ईरान का कबज़ा रहा है और बहरीन ईरानी म्मिलकत का ही हिस्सा रहा है. मगर बहरीन में अलखलीफा परिवार के सत्ता में आने के बाद उसने कई उतार चढ़ाओ देखे हैं. अलखलीफा परिवार बहुत चालाक साबित हुआ, वह कभी ईरान के साथ होजाता था तो कभी ब्रिटेन के साथ.
जब 1820 में अलखलीफा परिवार बहरीन में सत्ता में आया तो उसने अपनी ताकत को मजबूत करने के लिए ब्रिटेन के साथ समझौता कर लिया जो उस समय फारस की खाड़ी में सैन्यशक्ति में ग़ालिब था. इस करार ने अलखलीफा को बहरीन के शासक की पदवी से सम्मानित किया.
1830 में उसमानिया राज्य द्वारा जब मिस्र के मोहम्मद पाशा ने अरब द्वीप समुह को वहाबयों से मुक्त करा लिया तो शेख आबदुलखलीफा ने ईरानी सरकार की बैअत कर ली ताकि मिस्र को बहरीन पर कब्जा करने से रोका जा सके.
1860 में अलखलीफा सरकार ने उस समय यही दांव अपनाया जब ब्रिटेन बहरीन में कबज़े की कोशिश कर रहा था, तब शेख मोहम्मद बिन खलीफा ने उस समय ईरान के शाह नसीरुद्दीन को एक पत्र लिखकर खुद को और उन्हें भाई भाई बताया और बहरीन के सभी लोगों के ईरान की जनता होने की घोषणा की. ईरानी विदेश मंत्री को लिखे एक अन्य पत्र में शेख खलीफा ने ईरान सरकार से मांग की कि वह उनका सीधा मार्गदर्शन करे और ब्रिटेन के दबाव से सुरक्षा दे.
कर्नल सर लेविस पीली के दबाव के बाद शेख़ मोहम्मद ने ईरान से सैनिक सहायता का अनुरोध किया, लेकिन उस समय ईरान सरकार के पास ब्रिटिश अतिक्रमण से बहरीन की रक्षा करने की क्षमता नहीं थी, इसलिए, ब्रिटिश भारतीय सेना ने अंत में बहरीन पर कबज़ा कर लिया ओर
1861 में कर्नल पीली ने शेख मोहम्मद के साथ और बाद में उसके भाई शेख अली के साथ समझौतों पर हस्ताक्षर किए जिसके तहत बहरीन को ब्रिटिश सरकार का संरक्षित राज्य बना दिया गया. जब ब्रिटिश सेना बहरीन में दाखिल हुई तो उनहोंने पाया कि शेख़ मोहम्मद बिन खलीफा ने बहरीन की सभी मीनारों और कि़लों पर ईरानी ध्वज लहरा दिया था.
1868 में ब्रिटेन के प्रतिनिधियों ने अलखलीफा परिवार के शासकों के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए और बहरीन ने फारस की खाड़ी में ब्रिटेन के असरवाले सुरक्षित क्षेत्र में शामिल होना मान लिया. यह समझौता फारस की खाड़ी के दूसरे राज्यों के साथ ब्रिटिश सरकार द्वारा किए गए समझौतों की तरह ही था जिस में यह स्पष्ट किया गया था कि सत्तारूढ़ वर्ग इस क्षेत्र को ब्रिटेन के सिवाय किसी दूसरे के इसतेमाल में नहीं दे सकता
है और किसी भी विदेशी सरकार के साथ ब्रिटेन की अनुमति के बिना संधी नहीं हो सकती है, उसके बदले में ब्रिटेन ने सागर की ओर से किसी भी अतिक्रमण से बहरीन की सुरक्षा और देश पर जमीनी हमले की स्थिति में उसका साथ देने का वादा क्या, मज़ीद यह कि ब्रिटेन बहरीन में अलखलीफा के शासन का समर्थन करता है और देश के शासक के रूप में उसकी अस्थिर स्थिति को मज़बूत करने का वादा भी करता है.
1880 और 1892 के दूसरे समझौतों की वजह से बहरीन सरकार को ब्रिटेन द्वारा समर्थित सरकार की पूर्ण दर्जा मिल गया. और इस तरह बहरीन जो व्यावहारिक रूप से 1783 में ईरान के मातहत था अधीकारिक तौर पर 1868 और अन्तिम बार 1892 के वर्ष के बीच ईरान से अलग हुआ. भारत के साथ बहरीन के व्यवसाय ने उपमहाद्वीप की संस्कृति पर नाटकीय प्रभाव दिखाया, कपड़े, भोजन और शिक्षा सहित, हर चीज पर भारतीय रंग दिखाई देने लगा.
1911 में बहरीन के व्यापारियों के एक समूह ने बहरीन में ब्रिटेन के प्रभाव और हस्तक्षेप पर लगाम लगाने की मांग की तो आंदोलन के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया और देश निकाला दे कर भारत भेज दिया गया. 1923 में ब्रिटेन के विरोध का आरोप लगाया गया और शेख ईसा बिन अली को हटा कर बहरीन में एक स्थायी प्रतिनिधि नियुक्त कर दिया गया. यह सब ईरान के बहरीन पर स्वामित्व के दावे के नवीनीकरण से सहमती के साथ हुआ बर्तानिया ने शेख ईसा पर दावा का स्वागत करने का आरोप लगाया था. इसके अलावा बहरीन पर ईरान द्वारा स्वामित्व के दावे के नवीनीकरण से लोगों द्वारा दिखाइ गयी सहबद्ध ब्रिटेन के लिए चिंता का कारण बन गयी. इन समस्याओं के समाधान के लिए ब्रिटेन ने अपने सबसे अनुभवी कालोनियल अधिकारी, सर चार्ल्स बेलगरेव को 1926 में बहरीन के अमीर के सलाहकार के रूप में भेजा. उसने बहुत सख्त कदम उठाए जिससे लोगों की बढ़ती नफरत में और वृद्धि हुई, जिसका परिणाम 1957 में बहरीन से उनके निष्काशन के रूप में सामने आया.
1927 में रज़ा शाह ने लीग आफ नेशन्स को एक पत्र लिखकर बहरीन की वापसी की मांग की. ब्रिटेन का मानना था कि बहरीन में उसका कमज़ोर तसल्लुत खाड़ी फारस की खाड़ी पर नियंत्रण खोने का कारण बनेगा, और उस ने किसी भी कीमत पर बहरीन के लोगों के बीच आपस में नहरत फैलाने का फैसला किया. इस को अंजाम तक पहुंचाने के लिए ब्रिटिश तत्वों ने बहरीन के शिया और सुन्नी समुदाय के बीच विवादों को हवा दी और प्रेरित या.
बहरीन में ब्रिटिश चार्ल्स बेलगरेव के शेख़ हमाद इब्ने ईसा अलखलीफा (1872-1942) के सलाहकार के कार्यकाल के दौरान 1926 और 1957 के बीच महत्वपूर्ण सामाजिक सुधारों का आधार पड़ी. 1919 में इमाम हिदायत ब्वाय स्कूल के उद्घाटन के साथ देश के पहले आधुनिक स्कूल की स्थापना की गई जबकि अरब फारस की खाड़ी का पहला लड़कियों का स्कूल 1928 ई. में खुला. डच रैफार्म चर्च की ओर से अमेरिकी मिशन अस्पताल ने 1903 ई. में काम करना शुरु कर दिया. अन्य सुधारों में गुलामी की समाप्ती शामिल हैं, जबकि सागर से मोती निकालने के उद्योग ने तेज रफतार से विकास किया.
इन सुधारों का बहरीन के कई ताक़तवर समूहों द्वारा ओर सत्तारुड परिवार के भीतर, कबायली सेना, धार्मिक अधिकारियों और व्यापारियों सहित भारी मुखालफ़्त का सामना रहा. रूडीवादियों की दबाने के लिए ब्रिटेन ने अमीर ईसा बिन अली अलखलीफा को हटा दिया और 1923 में उनके बेटे को उसकी जगह दे दी. कुछ सुन्नी कबीलों जैसे अलदोसारी को ज़बरदस्ती बहरीन से बाहर निकाल दिया गया और अरब की धरती पर भेज दिया गया, जबकि सामाजिक सुधारों के विरोधी मोलवियों को सऊदी अरब और ईरान भेज दिया गया और कुछ राज घरानों और महत्वपूर्ण परिवारों के मुख्याओं को देश निकाला दे दिया गया. बहरीन में आधुनिकता के इस कदम की ब्रिटेन की सऊदी वहाबी और ईरान के बहरीन के बारे में आज़ाएम के भय ने प्रोत्साहित किया था.
तेहरान से जारी किए जा रहे बहरीन के शिया बहुल समर्थन के बयान सुन कर कोई भी व्यक्ति यह मान सकता है कि शायद बहरीन के शिया विपक्षी पड़ोस के अपने हम मसलकों की मदद पर निर्भर है. लेकिन वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है. सच तो यह है कि शिया विपक्ष तेहरान से इस से अधिक और कुछ नहीं चाहता कि वह इस छोटे से राज्य में चल रहे विवाद से बाहर ही रहे.
मुख्य धारा की विपक्षी पार्टी की सबसे बड़ी मांग एक संवैधानिक बादशाहत का स्थापना है जैसा कि यूरोप के कई देशों में है. अन्य माँगो में चूनी हुइ सरकार, एक स्वतंत्र प्रेस, एक मुक्त सिविल सोसाइटी और सुन्नी अल्पसंख्यक समुदाय को छोड़कर बाकी अन्य धर्म और मसलकों के खिलाफ बरता जा रहा भेदभाव, जैसे रोजगार के ना बराबर अवसर, माल व धन का गैर बराबर वितरण और हर प्रकार के प्रशासनिक और वित्तीय भ्रष्टाचार का खातमा शामिल हैं.
अब जब कि दुनिया का ध्यान लीबिया पर केंद्रित है, बहरीन के केंद्रीय धारा की विपक्ष खुद को तेहरान के शासकों से दूर करने की कोशिश कर रही है.शेख अली जो अलविफाक़ पार्टी के महासचिव हैं जो एक शिया विपक्ष दल है ने सार्वजनिक रूप से मार्च में यह घोषणा की थी कि उनकी संस्था ईरान वाली रहबर ए आज़म वाली विलायत अलफकीह वाली शैली के शासन के विचार को लागू करने की बिल्कुल इच्छुक नहीं है. इन तथ्यों को जानते बोझ हुए ईरान की ओर से युवा ईरानी लड़कों को विपक्ष के साथ बहरीन के विरोध प्रदर्षन में शामिल होने के लिए भेजने के बड़े बड़े वादे से पता चलता है कि ईरान दुनिया को यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि वह इस संकट में बहरीन के शिया के साथ है.
वास्तव में बहरीन इस इलाके में राजनीतिक रूप से सबसे अधिक जागरुक राज्यों में से एक है. सुधार की मांग कुछ हफ्ते पहले, जब से बहरीन में बेचैनी शुरू हुइ है, नहीं निकल आइ है बल्कि इस का इतिहास 1971 ई. में ब्रिटेन से राज्य की स्वतंत्रता से पहले का है.
शिया बहुमत के मुकाबले के लिए पिछले दिनों सऊदी सेना के बहरीन में आना वहां के शासकों की केवल एक चाल है ताकि स्थिति को ज्यों का त्यों बनाए रखा जाए और विपक्ष की इस मांग को दबाया जा सके कि बिना विलम्ब के एक पश्चिमी शैली के लोकतंत्र की स्थापना की जाए. जबकि सऊदी अरब के लिए बहरीन में शिया प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सैन्य शक्ति का प्रदर्शन वास्तव में सऊदी अरब के पूर्वी भाग में शोरिश पसंद शिया नागरिकों को जो अपने देश में लोकतांत्रिक सरकार की मांग कर रहे हैं कड़ा संदेश देना हे.
सऊदी अरब सरकार के बहरीन में मौजूदगी ने नकारात्मक परिणाम उत्पन्न किए हैं, एक तरफ तो सऊदी अरब बहरीन के शासकों पर दबाव डाल रहा है कि वह किसी भी संभावित ईरानी हस्तक्षेप को कम करने और अपने शिया नागरिकों को आतंकित करने के लिये अपने ही लोगों के खिलाफ हिंसा का प्रयोग करे और दूसरे ओर ईरान अब सऊदी अरब के इस हमले को बहरीन की सरकार को धमकाने और पड़ोसी राज्य में अपने शिया भाइयों की सुरक्षा का हव्वा पेदा करने में इस्तेमाल कर रहा है.
दुख की मगर सच बात यह है कि खाड़ी में तनाव का अब जितना इजाफा हुआ है उसकी मिसाल सालों मैं नहीं देखी गई है. इससे बहरीन और सऊदी अरब दोनों को खतरों का अनदेशा है लेकिन ईरान को निश्चित रूप से किसी नुकसान की अनदेशा नहीं है.
अधिकतर शिया लोगों का सोचना है कि संयुक्त राज्य अमेरिका का मानना है कि कुछ अरब तानाशाहों को बचाए रखना उसके हित में हैं और वह ईरान के साथ बहरीन के शिया गठबंधन से डरता है. वास्तव में अमेरिका ने ही सऊदी अरब को सेना भेजने की हरी झंडी दी है. क्योंकि वह नहीं चाहता कि वह खुद हस्तक्षेप करके बहरीन के शासकों को सुरक्षा दे क्योंकि ऐसा करना जहां एक ओर इसे लोकतंत्र विरोधियों की पंक्ति में शामिल कर देगा वहीं दूसरी ओर उसकी लीबिया में चल रही लोकतंत्र समर्थक अभियान पर भी असर पड़ेगा और उसका विरोधाभास सबके सामने आ जाएगी.
यह वॉशिंगटन के हित में है कि बहरीन में स्थिरता कायम हो ओर ऐसी सरकार रहे जो उसके इशारे पर चले क्योंकि मनामा में अमरीका का पांचवां समुद्री बेड़ा है.
बहरीन का संकट तभी समाप्त होगा अगर सउदी अरब और ईरान इस अंदरूनी संकट से बाहर रहते हैं, बहरीन के शासकों पर विपक्ष के साथ समझौता करने के लिए दबाव डाला जाए और अमेरिका इस बात को साफ कर दे कि एक प्रॉक्सी युद्ध किसी भी मूल्य पर बर्दाश्त नहीं करेगा क्योंकि इसमें किसी ओर से जयादा ईरान को लाभ होगा.
जब 1820 में अलखलीफा परिवार बहरीन में सत्ता में आया तो उसने अपनी ताकत को मजबूत करने के लिए ब्रिटेन के साथ समझौता कर लिया जो उस समय फारस की खाड़ी में सैन्यशक्ति में ग़ालिब था. इस करार ने अलखलीफा को बहरीन के शासक की पदवी से सम्मानित किया.
1830 में उसमानिया राज्य द्वारा जब मिस्र के मोहम्मद पाशा ने अरब द्वीप समुह को वहाबयों से मुक्त करा लिया तो शेख आबदुलखलीफा ने ईरानी सरकार की बैअत कर ली ताकि मिस्र को बहरीन पर कब्जा करने से रोका जा सके.
1860 में अलखलीफा सरकार ने उस समय यही दांव अपनाया जब ब्रिटेन बहरीन में कबज़े की कोशिश कर रहा था, तब शेख मोहम्मद बिन खलीफा ने उस समय ईरान के शाह नसीरुद्दीन को एक पत्र लिखकर खुद को और उन्हें भाई भाई बताया और बहरीन के सभी लोगों के ईरान की जनता होने की घोषणा की. ईरानी विदेश मंत्री को लिखे एक अन्य पत्र में शेख खलीफा ने ईरान सरकार से मांग की कि वह उनका सीधा मार्गदर्शन करे और ब्रिटेन के दबाव से सुरक्षा दे.
कर्नल सर लेविस पीली के दबाव के बाद शेख़ मोहम्मद ने ईरान से सैनिक सहायता का अनुरोध किया, लेकिन उस समय ईरान सरकार के पास ब्रिटिश अतिक्रमण से बहरीन की रक्षा करने की क्षमता नहीं थी, इसलिए, ब्रिटिश भारतीय सेना ने अंत में बहरीन पर कबज़ा कर लिया ओर
1861 में कर्नल पीली ने शेख मोहम्मद के साथ और बाद में उसके भाई शेख अली के साथ समझौतों पर हस्ताक्षर किए जिसके तहत बहरीन को ब्रिटिश सरकार का संरक्षित राज्य बना दिया गया. जब ब्रिटिश सेना बहरीन में दाखिल हुई तो उनहोंने पाया कि शेख़ मोहम्मद बिन खलीफा ने बहरीन की सभी मीनारों और कि़लों पर ईरानी ध्वज लहरा दिया था.
1868 में ब्रिटेन के प्रतिनिधियों ने अलखलीफा परिवार के शासकों के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए और बहरीन ने फारस की खाड़ी में ब्रिटेन के असरवाले सुरक्षित क्षेत्र में शामिल होना मान लिया. यह समझौता फारस की खाड़ी के दूसरे राज्यों के साथ ब्रिटिश सरकार द्वारा किए गए समझौतों की तरह ही था जिस में यह स्पष्ट किया गया था कि सत्तारूढ़ वर्ग इस क्षेत्र को ब्रिटेन के सिवाय किसी दूसरे के इसतेमाल में नहीं दे सकता
है और किसी भी विदेशी सरकार के साथ ब्रिटेन की अनुमति के बिना संधी नहीं हो सकती है, उसके बदले में ब्रिटेन ने सागर की ओर से किसी भी अतिक्रमण से बहरीन की सुरक्षा और देश पर जमीनी हमले की स्थिति में उसका साथ देने का वादा क्या, मज़ीद यह कि ब्रिटेन बहरीन में अलखलीफा के शासन का समर्थन करता है और देश के शासक के रूप में उसकी अस्थिर स्थिति को मज़बूत करने का वादा भी करता है.
1880 और 1892 के दूसरे समझौतों की वजह से बहरीन सरकार को ब्रिटेन द्वारा समर्थित सरकार की पूर्ण दर्जा मिल गया. और इस तरह बहरीन जो व्यावहारिक रूप से 1783 में ईरान के मातहत था अधीकारिक तौर पर 1868 और अन्तिम बार 1892 के वर्ष के बीच ईरान से अलग हुआ. भारत के साथ बहरीन के व्यवसाय ने उपमहाद्वीप की संस्कृति पर नाटकीय प्रभाव दिखाया, कपड़े, भोजन और शिक्षा सहित, हर चीज पर भारतीय रंग दिखाई देने लगा.
1911 में बहरीन के व्यापारियों के एक समूह ने बहरीन में ब्रिटेन के प्रभाव और हस्तक्षेप पर लगाम लगाने की मांग की तो आंदोलन के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया और देश निकाला दे कर भारत भेज दिया गया. 1923 में ब्रिटेन के विरोध का आरोप लगाया गया और शेख ईसा बिन अली को हटा कर बहरीन में एक स्थायी प्रतिनिधि नियुक्त कर दिया गया. यह सब ईरान के बहरीन पर स्वामित्व के दावे के नवीनीकरण से सहमती के साथ हुआ बर्तानिया ने शेख ईसा पर दावा का स्वागत करने का आरोप लगाया था. इसके अलावा बहरीन पर ईरान द्वारा स्वामित्व के दावे के नवीनीकरण से लोगों द्वारा दिखाइ गयी सहबद्ध ब्रिटेन के लिए चिंता का कारण बन गयी. इन समस्याओं के समाधान के लिए ब्रिटेन ने अपने सबसे अनुभवी कालोनियल अधिकारी, सर चार्ल्स बेलगरेव को 1926 में बहरीन के अमीर के सलाहकार के रूप में भेजा. उसने बहुत सख्त कदम उठाए जिससे लोगों की बढ़ती नफरत में और वृद्धि हुई, जिसका परिणाम 1957 में बहरीन से उनके निष्काशन के रूप में सामने आया.
1927 में रज़ा शाह ने लीग आफ नेशन्स को एक पत्र लिखकर बहरीन की वापसी की मांग की. ब्रिटेन का मानना था कि बहरीन में उसका कमज़ोर तसल्लुत खाड़ी फारस की खाड़ी पर नियंत्रण खोने का कारण बनेगा, और उस ने किसी भी कीमत पर बहरीन के लोगों के बीच आपस में नहरत फैलाने का फैसला किया. इस को अंजाम तक पहुंचाने के लिए ब्रिटिश तत्वों ने बहरीन के शिया और सुन्नी समुदाय के बीच विवादों को हवा दी और प्रेरित या.
बहरीन में ब्रिटिश चार्ल्स बेलगरेव के शेख़ हमाद इब्ने ईसा अलखलीफा (1872-1942) के सलाहकार के कार्यकाल के दौरान 1926 और 1957 के बीच महत्वपूर्ण सामाजिक सुधारों का आधार पड़ी. 1919 में इमाम हिदायत ब्वाय स्कूल के उद्घाटन के साथ देश के पहले आधुनिक स्कूल की स्थापना की गई जबकि अरब फारस की खाड़ी का पहला लड़कियों का स्कूल 1928 ई. में खुला. डच रैफार्म चर्च की ओर से अमेरिकी मिशन अस्पताल ने 1903 ई. में काम करना शुरु कर दिया. अन्य सुधारों में गुलामी की समाप्ती शामिल हैं, जबकि सागर से मोती निकालने के उद्योग ने तेज रफतार से विकास किया.
इन सुधारों का बहरीन के कई ताक़तवर समूहों द्वारा ओर सत्तारुड परिवार के भीतर, कबायली सेना, धार्मिक अधिकारियों और व्यापारियों सहित भारी मुखालफ़्त का सामना रहा. रूडीवादियों की दबाने के लिए ब्रिटेन ने अमीर ईसा बिन अली अलखलीफा को हटा दिया और 1923 में उनके बेटे को उसकी जगह दे दी. कुछ सुन्नी कबीलों जैसे अलदोसारी को ज़बरदस्ती बहरीन से बाहर निकाल दिया गया और अरब की धरती पर भेज दिया गया, जबकि सामाजिक सुधारों के विरोधी मोलवियों को सऊदी अरब और ईरान भेज दिया गया और कुछ राज घरानों और महत्वपूर्ण परिवारों के मुख्याओं को देश निकाला दे दिया गया. बहरीन में आधुनिकता के इस कदम की ब्रिटेन की सऊदी वहाबी और ईरान के बहरीन के बारे में आज़ाएम के भय ने प्रोत्साहित किया था.
तेहरान से जारी किए जा रहे बहरीन के शिया बहुल समर्थन के बयान सुन कर कोई भी व्यक्ति यह मान सकता है कि शायद बहरीन के शिया विपक्षी पड़ोस के अपने हम मसलकों की मदद पर निर्भर है. लेकिन वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है. सच तो यह है कि शिया विपक्ष तेहरान से इस से अधिक और कुछ नहीं चाहता कि वह इस छोटे से राज्य में चल रहे विवाद से बाहर ही रहे.
मुख्य धारा की विपक्षी पार्टी की सबसे बड़ी मांग एक संवैधानिक बादशाहत का स्थापना है जैसा कि यूरोप के कई देशों में है. अन्य माँगो में चूनी हुइ सरकार, एक स्वतंत्र प्रेस, एक मुक्त सिविल सोसाइटी और सुन्नी अल्पसंख्यक समुदाय को छोड़कर बाकी अन्य धर्म और मसलकों के खिलाफ बरता जा रहा भेदभाव, जैसे रोजगार के ना बराबर अवसर, माल व धन का गैर बराबर वितरण और हर प्रकार के प्रशासनिक और वित्तीय भ्रष्टाचार का खातमा शामिल हैं.
अब जब कि दुनिया का ध्यान लीबिया पर केंद्रित है, बहरीन के केंद्रीय धारा की विपक्ष खुद को तेहरान के शासकों से दूर करने की कोशिश कर रही है.शेख अली जो अलविफाक़ पार्टी के महासचिव हैं जो एक शिया विपक्ष दल है ने सार्वजनिक रूप से मार्च में यह घोषणा की थी कि उनकी संस्था ईरान वाली रहबर ए आज़म वाली विलायत अलफकीह वाली शैली के शासन के विचार को लागू करने की बिल्कुल इच्छुक नहीं है. इन तथ्यों को जानते बोझ हुए ईरान की ओर से युवा ईरानी लड़कों को विपक्ष के साथ बहरीन के विरोध प्रदर्षन में शामिल होने के लिए भेजने के बड़े बड़े वादे से पता चलता है कि ईरान दुनिया को यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि वह इस संकट में बहरीन के शिया के साथ है.
वास्तव में बहरीन इस इलाके में राजनीतिक रूप से सबसे अधिक जागरुक राज्यों में से एक है. सुधार की मांग कुछ हफ्ते पहले, जब से बहरीन में बेचैनी शुरू हुइ है, नहीं निकल आइ है बल्कि इस का इतिहास 1971 ई. में ब्रिटेन से राज्य की स्वतंत्रता से पहले का है.
शिया बहुमत के मुकाबले के लिए पिछले दिनों सऊदी सेना के बहरीन में आना वहां के शासकों की केवल एक चाल है ताकि स्थिति को ज्यों का त्यों बनाए रखा जाए और विपक्ष की इस मांग को दबाया जा सके कि बिना विलम्ब के एक पश्चिमी शैली के लोकतंत्र की स्थापना की जाए. जबकि सऊदी अरब के लिए बहरीन में शिया प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सैन्य शक्ति का प्रदर्शन वास्तव में सऊदी अरब के पूर्वी भाग में शोरिश पसंद शिया नागरिकों को जो अपने देश में लोकतांत्रिक सरकार की मांग कर रहे हैं कड़ा संदेश देना हे.
सऊदी अरब सरकार के बहरीन में मौजूदगी ने नकारात्मक परिणाम उत्पन्न किए हैं, एक तरफ तो सऊदी अरब बहरीन के शासकों पर दबाव डाल रहा है कि वह किसी भी संभावित ईरानी हस्तक्षेप को कम करने और अपने शिया नागरिकों को आतंकित करने के लिये अपने ही लोगों के खिलाफ हिंसा का प्रयोग करे और दूसरे ओर ईरान अब सऊदी अरब के इस हमले को बहरीन की सरकार को धमकाने और पड़ोसी राज्य में अपने शिया भाइयों की सुरक्षा का हव्वा पेदा करने में इस्तेमाल कर रहा है.
दुख की मगर सच बात यह है कि खाड़ी में तनाव का अब जितना इजाफा हुआ है उसकी मिसाल सालों मैं नहीं देखी गई है. इससे बहरीन और सऊदी अरब दोनों को खतरों का अनदेशा है लेकिन ईरान को निश्चित रूप से किसी नुकसान की अनदेशा नहीं है.
अधिकतर शिया लोगों का सोचना है कि संयुक्त राज्य अमेरिका का मानना है कि कुछ अरब तानाशाहों को बचाए रखना उसके हित में हैं और वह ईरान के साथ बहरीन के शिया गठबंधन से डरता है. वास्तव में अमेरिका ने ही सऊदी अरब को सेना भेजने की हरी झंडी दी है. क्योंकि वह नहीं चाहता कि वह खुद हस्तक्षेप करके बहरीन के शासकों को सुरक्षा दे क्योंकि ऐसा करना जहां एक ओर इसे लोकतंत्र विरोधियों की पंक्ति में शामिल कर देगा वहीं दूसरी ओर उसकी लीबिया में चल रही लोकतंत्र समर्थक अभियान पर भी असर पड़ेगा और उसका विरोधाभास सबके सामने आ जाएगी.
यह वॉशिंगटन के हित में है कि बहरीन में स्थिरता कायम हो ओर ऐसी सरकार रहे जो उसके इशारे पर चले क्योंकि मनामा में अमरीका का पांचवां समुद्री बेड़ा है.
बहरीन का संकट तभी समाप्त होगा अगर सउदी अरब और ईरान इस अंदरूनी संकट से बाहर रहते हैं, बहरीन के शासकों पर विपक्ष के साथ समझौता करने के लिए दबाव डाला जाए और अमेरिका इस बात को साफ कर दे कि एक प्रॉक्सी युद्ध किसी भी मूल्य पर बर्दाश्त नहीं करेगा क्योंकि इसमें किसी ओर से जयादा ईरान को लाभ होगा.

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