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Monday, 18 April 2011

क्या लोकपाल बिल से भ्रष्टाचार का अंत होगा?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 18 अप्रैल 2011

अफ़ीफ़ अहसन
इसमें कोई शक नहीं है कि इस समय देश का सबसे बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार है. मगर इसमें भी कोई शक नहीं है कि भ्रष्टाचार से निपटने के लिए हमें उसकी जड़ पर हमला करना चाहिए. मगर लगता एसा हे कि कुछ लोग उसकी जड़ के बजाय उसके फल से लाभान्वित होने वालों पर ज़बानी हमले करते रहते हैं और उसकी जड़ पर हमला करने की नहीं सोचते, जिससे यह पेड़ फलता फूलता रहता है, ओर भ्रष्टाचार का खात्मा नहीं हो पाता.
किसी ज़माने में बर्गद के पेड़ को बहुत महत्व प्राप्त था और यह हर गांव का मुख्य पेड़ होता था, और इसी पेड़ के नीचे गांव की पंचायत भी लगा करती थी जहां पर गरीब को मुफ्त में न्याय प्राप्त हुआ होता था. मगर आज वह पुराना बर्गद का पेड़ कहाँ? और वह मुफ्त का न्याय कहाँ? अब तो करोड़ों रुपये खर्च करके भी आप न्याय की उम्मीद नहीं कर सकते. आज वकील करोड़ों रुपए की फीस वसूलते है. कभी कभी तो एसा लगता है कि गरीब को न्याय मिल ही नहीं सकता.
भ्रष्टाचार, परिवार वाद और बद दयानती का यह पेड़ आज़ादी के बाद से दिन बदिन बढ़ता और फलता फूलता चला गया और आज उस ने बर्गद के एक घने पेड़ का रूप धारण कर लिया है जिसके आगे अन्य सभी पेड़ बोने दिखाई देते हैं. यही नहीं इसमें और नयी नयी जड़ें निकल आई हैं जिसके सहारे उसने पूरे जंगल को अपनी लपेट में ले लिया है. बर्गद के पेड़ की एक विशेषता यह भी है कि इसके नीचे किसी भी तरह की वनस्पति पनप नहीं सकती, इसलिए इसके नीचे की ज़मीन पर अन्य पौधे नहीं पाऐ जाते. इसका कारण यह बताया जाता है यह कि पेड़ ‍सुरज की रोशनी को जमीन तक नहीं पहुंचने देता जो कि किसी भी पौधे के जीवित रहने के लिए आवश्यक है. भ्रष्टाचार के पेड़ को न चाहते हुए भी प्रत्येक भारतीय को पानी देना पड़ रहा है और भ्रष्टाचार के जीन्स हमारी अगली पीढ़ी में भी भी प्रवाहित हो गए हैं.
आन्ना हज़ारे के अंशन शुरू करने के दूसरे दिन मेरे एक मित्र मुझसे मिलने आए. वह मुझसे पूछने लगे की "क्या आपने आन्ना हज़ारे को फोन किया? मैंने ना में जवाब दिया तो उन्होंने बड़े दुख के साथ कहा कि आप ने ऐसा क्यों नहीं किया. तो मैंने मजाक में कहा कि मेरे फोन में बेलेंस नहीं था. उन्होंने कहा कि ''अरे आप को तो एक मिस कॉल ही करनी है, उसमें बेलेंस के होने और न होने की क्या बात है, मैं तो उनको अभी अभी मिस कॉल करके आ रहा हूँ, मेरा एक भी पैसा खर्च नहीं हुआ''. मैंने उनसे पूछा कि इस से क्या होगा तो उन्होंने कहा कि आन्ना हज़ारे उन लोगों के खिलाफ अंशन कर रहे हैं जो रिश्वत लेते हैं और देश को लूट कर खा रहे हैं. मैंने अपने दोस्त से निवेदन किया कि जनाब यदि हमें भ्रष्टाचार का अंत करना है तो हमें सबसे पहले स्वंय यह क़सम खानी होगी कि हम किसी को एक पैसा भी रिश्वत नहीं देंगे, यही नहीं इस अभियान में प्रत्येक व्यक्ति अपनी धार्मिक पुस्तक पर हाथ रख कर यह क़सम भी खाये कि वह न तो रिश्वत देगा और न ही रिश्वत लेगा, और यह कि चाहे कुछ भी हो वह किसी के साथ भी कोई भेदभाव या द्वेश नहीं करेगा और न ही होने देगा जो कि भ्रष्टाचार की ही एक किसम है.
सिविल सोसाइटी के ऐसे दस्ते बनाए जाएं जो कार्यालय कार्यालय जाकर हर एक सरकारी नौकर को यह क़सम दिलायें कि वह किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार में न तो खुद शामिल होगे और न ही किसी को इस में शामिल होने देंगा और अगर कोई शामिल पाया जाता है तो उसका सरे आम मुंह काला किया जाय.
इस पर हमारे दोस्त ने फ़र्माया कि यह कैसे हो सकता है. अभी तो हम थोड़े बहुत पैसे देकर सरकारी कार्यालय से अपना काम निकाल लेते हैं यदि ऐसा हो गया तो हमारा कोई भी काम नहीं होगा और हमें लाइन में लगना होगा और यह भी हो सकता है कि हम हर दिन लाइन में लगें और हमारा नंबर कभी भी न आए. मैंने कहा कि आप तो पाखंडी बात कर रहे हैं तो उन्होंने कहा कि ''मैं तो केवल नेतऔं के भ्रष्टाचार की बात कर रहा हूँ क्योंकि ये लोग तो देश को लूट कर खा रहे हैं और केवल इस पर रोक लगनी चाहिय''. अब आप ही बताएं के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के समर्थक अगर ऐसे लोग हों तो देश का भगवान ही मालिक है.
इस अभियान को चलाने वाली एनजीओ भारत अगेन्स्ट करप्शन ने जो ब्युरा पेश किया है उसमें उसने बताया कि उसे 82,87,668 रुपये का दान मिला है जिसमें से उसने 50,17,768 रुपये खर्च कर दिए हैं. यदि 96 घंटे अभियान चलाने का खर्च पचास लाख आता है जिसमें कि हर व्यक्ति को केवल अंशन ही करना था तो अगर यह अभियान आगे चलता तो  कितना खर्च आता. इस एनजीओ की वेबसाइट पर 45 दानियों की सूची दी गई है मगर यह नहीं बताया गया है कि किसने कितना चंदा दिया है. यही नहीं इस सूची में अभियान में शामिल करोड़पतियों और अरबपतियों के नाम नहीं हैं. कुछ ओर एनजीओ भी पैदा हो गई हैं जो अलग अलग दान जमा कर रही हैं. ऐसी ही एक संगठन डांडी मार्च2 है जो देश के बाहर दान ले रही है और उसके बारे में कोई भी ब्युरा नहीं मिला है कि उसने अब तक कितनी राशि जमा की और कहाँ खर्च की है.
आन्ना हजारे को छोड़कर सिविल सोसाइटी के हर किसी सदस्य की संपत्ति पर सवाल उठ रहे हैं. हालांकि कभी आन्ना हजारे पर दो लाख रुपए के ग़लत खर्च करने का आरोप लगा था मगर इसके अलावा उनके ख़िलाफ़ कोई अन्य आरोप नहीं है. सिविल सोसाइटी का कमीटी में नामित कोई सदस्य लखपति है तो कोई करोड़पति, और कोई और अरबपती. एक सदस्य तो पिछले कुछ सालों में ही अरब पति बने हैं और उसे वैध ठहराने के लिए उन्होंने पिछले दस साल की आमदनी का ब्युरा भी दिया है हालांकि उसकी बिल्कुल जरूरत नहीं थी. एक अरबपती सदस्य अपने मकान मालिक की कोठी पर कब्जा करके उन्हें मजबूर करके उनसे उस कोठी का दो तिहाइ भाग एक लाख में अपने नाम लिखवाकर अरबपति बने हैं.
इस अभियान के सार्वजनिक होने का इस से बड़ा सबूत क्या होगा कि इसमें आगे आगे रहने वाले अधिकतर नायक करोड़पति हैं, बड़े बड़े बंगलों में रहते हैं, हवाई जहाज़ से यात्रा करते हैं और बड़ी बड़ी गाड़ियों में घूमते हैं.
देश के सामने मोजूद आंतरिक और बाहरी खतरों के बावजूद हमारे राजनीतिक नेतृत्व का रवैया दुखद रहा है. जबकि पिछले कुछ वर्षों के दौरान, सिविल सोसाइटी संगठनों, वकील समुदाय और मीडिया ने बहुत सकारात्मक भूमिका निभाई है. बहरहाल जब तक उनकी कोशिशों को हिन्दोस्तानी समाज का पूरा सहारा नहीं मिलेगा तो उनको शक्तिशाली लोगों और सरकार द्वारा प्रोत्साहनों, पर्लोभन और धमकियों द्वारा बे असर कर दिया जाएगा.
इस सहारे को बढ़ने में समय लगेगा क्योंकि हमारे समाज में बदलाव की इच्छा रखने वाली शक्तियां बिखरी हुई हैं इसलिए वह सरकार पर इतना दबाव नहीं डाल सकते कि वह अपने तोर तरीक़े सही कर ले और हिन्दुस्तान की जनता की इच्छाओं के अनुसार कार्य करे. ऐसा आवश्यक है कि लोकतांत्रिक शक्तियों को एकजुट करने के तरीके खोजे जाएं.
प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के यह दावे गलत साबित हो चुके हैं कि उन्हें जनता का समर्थन प्राप्त है जब हम यह देखते हैं कि मतदान के दिन केवल 45 से 50 प्रतिशत लोग अपने अधिकार का प्रयोग करने मतदान केंद्र पर जाते हैं. और 45 से 50 प्रतिशत में से केवल 30 प्रतिशत वोट हासिल करने वाली पार्टी देश में सत्ता में आजाती है और उसका प्रतिनिधि प्रधानमंत्री बन जाता है. बहुत से ऐसे लोग हें जो मामलात को समझते हैं और अच्छे और बुरे राजनीतिज्ञों के बीच तमीज़ कर सकते हैं, उनमें से बहुमत वोट देने की ज़हमत गवारा नहीं करती. ताकतवर लोग और उद्योगपति जो राजनीतिक पार्टियों का नेतृत्व करते हैं अपने कार्यकर्ताओं और यहाँ तक कि सशस्त्र गुटों द्वारा काम करते हैं. उन राजनीतिक नेताओं का एक विशिष्ट वोट बैंक है. और जब वह सत्ता में होते हैं तो अपने मनपसंद लोगों को हर प्रकार लाभ पहुंचाते हैं. यह वही नेता हैं जो सत्ता में आने के बाद सरकार चलाने की प्रक्रिया को नष्ट करते हैं.
किसी ज़माने में आन्दोलन जनता द्वारा चलता था और हर आम आदमी स्वयं इस का हिस्सा होता था. अगर किसी जलसे जुलूस में जाना होता था तो लोग अपना किराया खर्च कर के जाते और अपने हाथों से पोस्टर और बैनर तैयार कर के ले जाते थे. मगर अब हालात बदल गए हैं. इंटरनेट और मोबाइल फोन की उपलब्धता ने सिविल सोसाइटी की शक्ति में एक और पहलू शामिल कर दिया है, जिसे भारत में परिवर्तन लाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. पूरी दुनिया में अपराध, भ्रष्टाचार और पर्दा के पीछे की हस्तियों को बेनक़ाब करने में मीडिया आज इतना स्वतंत्र है जितना कभी नहीं था और इस कारण यह शासन प्रणाली का अनुकूलन करने में सहायक हो सकते हैं.
कुछ लोग सिविल सोसाइटी संगठनों पर आपत्ति करते हैं. उन्हें लगता है कि इन संगठनों ने बिना चुनाव या नियुक्ति के जबर्दस्त शक्ति प्राप्त कर ली. लेकिन इन संगठनों को लोकतंत्र का सहायक और सहारा समझा जाना चाहिए. एक राष्ट्र के तोर पर हमारे लिए यह अंतिम अवसर है. बदलाव व्यक्तिगत स्तर से शुरू होना चाहिए फिर परिवार के स्तर पर और उसके बाद समुदाय के स्तर पर आना चाहिए और इस तरह हिन्दुसतान में भूमिका और भ्रष्टाचार के रोग का इलाज होना चाहिए. हिंदुस्तान को विचार की क्रांति की आवश्यकता है जो नीचे से उठकर ही ऊपर आ सकता है. व्यकित विशेष पर आरोप लगाने या दूसरों को जिम्मेदार ठहरा देने भर से नहीं जिसमें हमेशा नेताओं से अपेक्षा की जाती है कि वह बदलाव लाएं जो जोकरों को टोपी पहनाने जेसा है.

1 comment:

  1. But it may be a mile stone for those who want to remove corruption from the society and from the world. It may not be possible to remove it completely but definitely it will help to reduce the corruption. So we must appreciate the efforts being done by anyone.

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