अफीफ अहसन
बहरीन के विरोध प्रदर्शन ने फारस की खाडी के इस देश में प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू कर दिया है. 2010-2011 मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका विरोध के भाग के रूप में बहरीन के विरोध का उद्देश्य शुरू में बहुल शिया आबादी के लिए व्यापक राजनीतिक स्वतंत्रता और समानता की प्राप्ती था. और 17 फरवरी को मनामह में पर्ल गोल चक्कर पर एक घातक रात को प्रदर्शनकारियों के खिलाफ छापे की कार्रवाई के बाद जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए और घायल हुए थे, उसमें शाह हमाद की शाही सरकार का अंत करने की मांग शामिल हो गयी.
मनामह में प्रदर्शनकारी पर्ल गोल चक्कर के बाहर डेरा डाले हुए हैं जो प्रदर्शन के मुख्य बिंदु के रूप में जान जाता है. एक महीने बाद सरकार ने खाड़ी सहयोग परिषद से सेना और पुलिस सहायता का अनुरोध किया और 14 मार्च को वहां पर दुबई और सऊदी अरब की सेना ने पहुंचकर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई शुरू कर दी जो अभी तक जारी है और सैकड़ों शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की मौत और हजारों घायल हो गए, जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घोर निंदा की जा रही है.
बहरीन के राजा ने भी इस आंदोलन को कुचलने के लिए वही सुन्नी ओर शिया का पुराना फार्मूला अपनाया है जो कि किसी जमाने में ब्रिटेन ने बहरीन में अपने शासन को मजबूत करने के लिए अपनाया था.
एक तरफ तो संयुक्तराष्ट्र और पश्चिमी देश लीबिया में सेना भेज कर वहां पर लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित करने की बात कर रहे हैं वहीं इसके उलट बहरेन के बहुसंख्यकों को उनका अधिकार दिलाने के लिए और वहां पर लोकतंत्र की बहाली के लिए कोई कुछ कहने और सुनने को तैयार नहीं है. जहां एक ओर लीबिया में लोकतंत्र की स्थापना के लिए पश्चिमी देश सेन्य कार्यवाही कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर लोकतंत्र की आवाज़ को दबाने के लिए बहरीन के शाह दूसरे पड़ोसी राजाओं के साथ मासूम और निहत्थे लोगों पर सेन्य कार्यवाही कर रहा और निर्दोष लोगों की हत्या की जा रही है मगर इस पर किसी के सिर पर जूं तक नहीं रेंगती है.
बहरीन की तस्वीर को समझने के लिए हमें इस की तारीख़ का गहराई से अध्ययन करना होगा. बहरीन एक अरबी शब्द है उसका अर्थ "दो बहर" के हैं जो इस के मीठे पानी के इन चश्मों के कारण मिला है जिनके आसपास नमकीन सागर है. प्राचीन ज़माने से बहरीन में आबादी पाई जाती है. फारस की खाड़ी में उसके सामरिक महत्व के कारण इस पर आशुरियों, बॉबीलोनिया, फारस और अरब का असर रहा जिनके तहत द्वीप में इस्लामी का आगमन हुआ . बहरीन को दिलमून के साथ जोड़ कर देख सकते हैं जिसका मेसोपोटामिया संस्कृति में पता मिलता है.
इस इतिहास के विभिन्न चरणों में यह ईरानी साम्राज्य का हिस्सा था तब इस को विभिन्न नामों से पुकारा गया जैसे म्श्माल, छटी से तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व तक बहरीन हख़मामंशी परिवार के तहत ईरान साम्राज्य में शामिल था. तीसरी सदी ईसा पूर्व से सातवीं शताब्दी में इस्लाम आने तक, बहरीन पारथिया और सासानी दो अन्य ईरानी परिवारों द्वारा नियंत्रित किया जाता था. लगभग 250 ईसा पूर्व तक पारथिया परिवार फारस की खाड़ी को पूरे नियंत्रण में ले आया और उसने अपना बर्चस्व और प्रभाव ओमान तक बढ़ा लिया.
फारस की खाड़ी के व्यापारिक मार्ग पर नियंत्रण करने के लिए पारथियों ने फारस की खाड़ी के दक्षिणी किनारे पर फ़ोजी चौकियों की स्थापित की. तीसरी शताब्दी में पारथिया के बाद सासानी काबिज़ हो गए ओर चार सदी बाद इसलाम के चरम तक इस क्षेत्र पर शासन किया. सासानी परिवार के पहले शासक आर्दशीर बाबकान ने ओमान और बहरीन पर चढ़ाई की और उसने सनातरक को हरा दिया, तब बहरीन में दक्षिण सासानी राज्य जिसमें फारस की खाड़ी का दिक्षणी किनारा और बहरीन के द्वीप समूह शामिल थे.
सासानी साम्राज्य के दिक्षणी राज्य तीन जिलों आशीर बाबकान (अब कातिफ, सऊदी अरब), हिगर (अब हफ़ोफ, सऊदी अरब) मशमाहिग में बंटा हुआ था, यहां तक कि बहरीन के 629 ई. में इस्लाम को अपनाने तक यह नसतूरी ईसाई केन्द्र रहा. प्रारंभिक इस्लामी सूत्रों के अनुसार यह आबदुलकेस, तमीम और बकर कबीलों का आवास था जो अवाल की पूजा करते थे.
899 ई. में क़रामत, एक हजारा इस्माइल समुदाय ने बहरीन पर कब्जा कर लिया, जिन्होंने शुरुआत करने वालों के बीच समान रूप से सभी संपत्ति के विभाजन के आधार पर एक आदर्श समाज का निर्माण करने की कोशिश की. इसके बाद क़रामत वालों ने बगदाद के खलीफा से खिराज की मांग की, और 930 ई. में मध्य पूर्व बहरीन में मक्का और मदीना सरकार को बरतरफ करके, पवित्र हजरे असवद को तावान के रूप में अलअहसा में अपने केंद्र पर ले आए. इतिहासकार अलजवीनी के अनुसार 951 ई. में बाईस साल बाद पत्थर अबूझ स्थिति मैं अपनी जगह पर वापस आ गया था, एक बोरी में लिपटा हुआ यह पत्थर इराक़ के कूफ़ा की जामा मस्जिद में इस पत्र के साथ फेंक दिया गया था कि "आदेश से हमने उसे उठा लिया था, और आदेश से हम उसे वापस ले आए हैं" हजर असवद की चोरी ओर वापसी ने उसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया और पत्थर सात टुकड़ों में टूट गया.
क़रामत के 976 ई. में आबासियों से हारने के बाद बहरीन अल अहसा अरब यूनिद परिवार के हाथों में आ गया, जिन्होंने 1076 ई. में बहरीन के पूरे क्षेत्र पर कब्जा कर लिया. 1235 ई. तक बहरीन द्वीप उनके नियंत्रण में रहा, जबकि दीप समुह पर थोडे समय के लिए ईरानी शासकों का कब्जा हो गया. 1253 में बद्दू असफवारीद परिवार ने यूनिद सरकार का अंत कर दिया और इस तरह पूरे पूर्वी अरब पर कब्जा कर लिया जिन में बहरीन के द्वीप भी शामिल थे. 1330 में द्वीप हरमुज़ के शासकों का बाजगुज़ार राज्य बन गया लेकिन स्थानीय तोर पर इसे क़तीफ के शिया जरवानी परिवार द्वारा नियंत्रित किया जाता था.
आखिर मध्य एशिया तक बहरीन के व्यापक ऐतिहासिक क्षेत्र में अलअहसा और कतीफ (अब दोनों पूर्वी सऊदी अरब के प्रांत) अवाल द्वीप (अब बहरीन द्वीप) शामिल थे. यह क्षेत्र इराक में बसरा से ओमान में हरमुज़ के पानी के रासतों तक फैला हुआ था. यह अकलीम उल बहरीन कहलाता था. सही तिथि मालूम नहीं है जब से अवाल द्वीप समूह को पूरण रूप से शब्द "बहरीन" से पुकारा जाना शुरू हुआ. मध्य पन्द्रहवी शताब्दी में अलाहसा द्वीप जबूरियों के, जो एक बद्दू परिवार ही था द्वारा शासित किया गया जिन्होंने पूर्वी अरब पर लंबे समय तक शासन किया.
पु्र्तगालियों ने 1521 में हुरमुज के साथ गठबंधन में बहरीन पर हमला कर दिया और जबरीद शासक मगरीन इब्ने ज़ामिल से कब्ज़े में ले लिया जो युद्ध में मारा गया था. पुर्तगाली सत्ता 80 साल चली जिसके दौरान वह अधिकांश सुन्नी फ़ारसी गवर्नरों पर निर्भर रहे थे. पु्र्तगालियों को 1602 में द्वीप से ईरानी सफ़वी परिवार के महमूद अब्बास ने बाहर किया, जिसने शिया इस्लाम को बहरीन के सरकारी धर्म के रूप में मान्यता दी. ईरान के शासकों ने बिना किसी रुकावट के लगभग दो सदियों तक द्वीप पर स्वायत्ता को बनाए रखा, सिवाए 1717 और 1738 के जब द्वीप को ओमान के आबाधयों से दो गंभीर हमलों का सामना करना पड़ा. इस समय से कई में वह बहरीन पर अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण करते थे या तो बूशहरा के द्वारा या विस्थापित सुनी अरब क़बीलें के द्वारा 1753 में हवाला क़बीले ने ईरान की ओर से बहरीन पर हमला किया ओर उस पर सीधा ईरानी सरकार का नियंत्रण बहाल कर दिया.
1783 में नसर अल मज़कूर बोशहर और बहरीन का शासक था के हाथों से बनी उत्बाह ने बहरीन प्रबंधन छीन लिया.
1797 में बनी उत्बाह के सत्ता हासिल करने के चौदह साल बाद अलखलीफा परिवार बहरीन में चला आया और 'जव्व' के स्थान पर बस गया बाद में रफाआ चला गया. ये लोग मुख्य रूप से कुवैती थे जिस को उन्होंने 1766 में अलविदा कह दिया था. अलखलीफा परिवार का मानना है कि वह कुवैत में उमअलक़सर से तुर्कों द्वारा निशकासित किये जाने के बाद आए थे, जहां वह बसरा के कारवानों को लूटा करते थे और शत अल अरब में समुंदरी जहाज़ों को लुटा करते थे. उन्नीसवीं सदी के शुरू में ओमनियों और अलसउद ने हमला किया. 1802 में एक बारह वर्षीय लड़के की सरकार स्थापित हुई और ओमान के शासक सैयद सुल्तान ने अपने लड़के सलीम को आर्द किले का गवर्नर बनाया था. (जारी है)
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