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| Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi |
Published on 20th June 2011
अफ़ीफ़ अहसन
सभी संस्थानों में भ्रष्टाचार के खिलाफ आज हम लोकपाल बना रहे हैं. इसमें हम इन संस्थाओं को भी शामिल करने जा रहे हैं जिनकी खुद की यह जिम्मेदारी है कि वह भ्रष्टाचार पर लगाम लगाएँ ओर भ्रष़्ट लोगों को सज़ा दें या दिलाएँ. ऐसा इसलिए हुआ है कि हम इन संस्थाओं पर अपना विश्वास खो बैठे हैं जिन पर भ्रष्टाचार की रोकथाम की जिम्मेदारी थी क्योंकि इन संस्थाओं ने अपनी जिम्मेदारी को सही रूप में नहीं निभाया. यही नहीं उन्हीं संस्थाओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे जो कि इस को रोकने के जिम्मेदार थे. हालांकि कोर्ट के जजों के खिलाफ कुछ कहना, लिखना या उन पर कोई आरोप लगाना न्यायपालिका की अवमान्ना की श्रेणी में आता है, मगर नयायाल्यों के खिलाफ भी आरोप लगाने वालो लोगों की कोई कमी नहीं है. आज से कुछ साल पहले तक कोई न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में सोच भी नहीं सकता था, मगर अब खुलेआम न्यायपालिका पर भ्रष्टाचार और परिवारवाद के आरोप लगाए जा रहे हैं.
एक घटना तो मेरे अपने साथ हुइ. यह शायद 1996-97 की बात है जब मैं एक मामले की पैरवी के सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट के चक्कर लगा रहा था. यह एक ऐसा मामला था जिसमें हाईकोर्ट की दो लगातार बैन्चों ने हमारे खिलाफ फैसला दे रखा था. पहले एकल बेंच ने ओर फिर डबल बेंच ने एकल बेंच के फैसले पर मुहर साबित कर दी थी और जो रही सही कसर थी उसे भी पूरा कर दिया था. इस मामले की अपील सुप्रीम कोर्ट में सुनी जारही थी. हमें कई लोगों से खासकर वकीलों से दबे शब्दों में यह सुनने को मिलता था कि आपके विरोधी ने जज से सेटिंग कर ली थी इसलिए ये दोनों निर्णय आपके खिलाफ आये हैं वरना केस तो आपको ही जीतना चाहिए था. इसका सबूत तब मिला जब सुप्रीम कोर्ट की दोहरी बेंच के एक जज ने पूरी कोर्ट को यह कहते हुए आश्चर्य में डाल दिया कि मुझे अप्रोच किया गया है. उन्होंने कहा कि “यह बड़े खेद की बात है कि ऐसी चीज़ यहाँ भी हो रही है”” और फिर उन्होंने इस मामले से अपने आपको अलग कर लिया. इसके बाद हमारे संपादक साहब ने हिंदुस्तान टाइम्स को एक पत्र भेजा जिसमें उन्होंने जिम्मेदार अधिकारियों का ध्यान इस ओर केंद्रित करते हुए यह मांग भी की कि इस घटना की जांच होनी चाहिए, इस पत्र के प्रकाशित होने के बावजूद इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं हुई. बाद के दिनों में एक के बाद एक सुप्रीम कोर्ट के जजों ने इस मामले को सुनने से इनकार कर दिया. वह यही कहते, “नॉट बीफोर मी” या कहते कि “टो बी लिसटेड बीफोर ए बेंच ऑफ विच आई एम नॉट ए मेम्बर” आपको यह जानकर हैरानी होगी के हमारे विरोधी की पैरवी करने वाले वकील ओर कोई नहीं बाप बेटे की मशहूर जोड़ी ही थी. खैर इस बात का लब्बोलुबाब यह है कि तब तक यह बात आम थी कि सुप्रीम कोर्ट को छोड़कर सभी निचली अदालतों में भ्रष्टाचार पनप रहा था जो एक आम बात थी लेकिन उसका सुप्रीम कोर्ट तक पैर पसार लेना एक हैरानी और दुख की बात थी. आपको यह जानकर खुशी होगी के दो-दो अदालतों से मुकदमा हारने के बावजूद, और इतना सब कुछ होने के बावजूद इस मामले में न्याय की ही जीत हुई और हम यह मामला जीत गए. इस सब का लब्बोलुबाब यह है उस समय सुप्रीम कोर्ट ही न्याय का एक आसरा थी और हर एक को यह विश्वास था कि अगर उसे निचली अदालतों से न्याय न भी मिला तो सुप्रीम कोर्ट से तो न्याय मिल ही जाएगा.
ऐक समय प्रधानमंत्री का पद भी बहुत ही मुतबरिक समझा जाता था मगर इसके बावजूद और बावजूद इसके कि वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह स्वयं बहुत ही ईमानदार व्यक्ति हैं उन पर भी भ्रष्टाचार या इस में लिप्त लोगों पर लगाम न लगाने यानी मनमानी करने की खुली छूट देने के आरोप लगाने वालों की कोई कमी नहीं है.
अतीत में जजों, मंत्रियों और प्रधानमंत्री पर आरोप लगे. एक नहीं दोदो प्रधानमंत्रीयों पर आरोप लगे, एक तो वह जिस पर पहले आरोप लगाया गया था दूसरा वह जिस ने आरोप लगाया था ओर इस आरोप पर सवारी करते हुए जब वह खुद प्रधानमंत्री की गद्दी पर बिराजमान हो गया तो उस पर भी भ्रष्टाचार का आरोप लगाया गया, पहले पर तो कोई भी आरोप साबित नहीं हो सका तो दूसरे पर लगाया गया आरोप गलत साबित हुआ और उसके बाद गलत आरोप लगाने के लिए जाली दस्तावेज तैयार करने वालों के खिलाफ मामले स्थापित किए गए.
इसी तरह कुछ समय बाद यह भी हो सकता है कि लोकपाल समिति के दस में से एक सदस्य या कई सदस्यों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों लगने लगें, यह झूठे भी हो सकते हैं और सच्चे भी. ऐसे में हम क्या करेंगे. क्या हम प्रधानमंत्री से शिकायत करेंगे, नहीं क्योंकि हो सकता है कि प्रधानमंत्री के खिलाफ कुछ अर्ज़ियाँ लोकपाल के पास विचाराधीन हों, तब यह कहा जाएगा कि क्योंकि प्रधानमंत्री के खिलाफ याचिका विचाराधीन हैं इसलिए उनको लोकपाल के खिलाफ कार्रवाई करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है. ऐसे में क्या हम सुप्रीम कोर्ट का रुख करेंगे, लेकिन हो सकता है कि उस समय सुप्रीम कोर्ट के किसी जज के खिलाफ और यह भी हो सकता है कि कइ जजों या मुख्य न्यायधीश के खिलाफ कोई शिकायत लोकपाल के पास विचाराधीन हो, अगर ऐसा हुआ तो लोग यही कहेंगे कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले पर विचार करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है क्योंकि इसके जज पहले ही शक के दायरे में हैं जिनकी जांच खुद लोकपाल कर रहा है, यह भी हो सकता है कि लोकपाल के खिलाफ लगाए गए आरोप बेबुनियाद पाए जाएं और सुप्रीम कोर्ट लोकपाल को किसी शिकायत में क्लीन चिट दे दे, तो लोग (सिविल सोसाइटी) यह कह सकती है कि सुप्रीम कोर्ट ने लोक पॉल को शायद इसलिए क्लीन चिट दे दी है क्योंकि उसके ओर लोक पाल के बीच सौदा हो चुका है कि बाद में लोकपाल भी सुप्रीम कोर्ट के जज को क्लीन चिट दे देगा. यह भी हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट को लगे कि लोकपाल के खिलाफ शिकायत में कुछ दम हे और उसके खिलाफ लगाए गए आरोप सही हों ऐसी स्थिति में क्या यह नहीं कहा जाएगा कि लोकपाल के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का फैसला द्वेश से प्रेरित है क्योंकि लोकपाल ने सुप्रीम कोर्ट के किसी जज के खिलाफ कोई मामला दर्ज करने के लिए कह दिया.
आजकल हम सीबीआई जांच की मांग करते हुए नहीं थकते, रोज यह मांग उठती है कि अमुक मामले में स्थानीय पुलिस से जांचा हटाकर सीबीआई के सुपुर्द की जाए. मगर क्या सीबीआई दूध की धुली है, क्या वह दबाव, लालच और प्रभाव में नहीं आती, बेशक आती है. सीबीआई जाँच का हाल तो आप जानते ही है, और अधिकतर बड़े बड़े मामलों में इसकी सजा दिला पाने का रेट न के बराबर हे. बड़े बड़े बयान देने के बावजूद ट्रायल के समय वकीले सफाइ सीबीआई के मामले की धज्जयां उड़ा देते हैं और सीबीआई के गवाहों को या तो खरीद लिया जाता है या खदेड़ दिया जाता है या वह अपने बयानों से मुकर जाते हैं.
सरकार और सिविल सोसाइटी सदस्यों के बीच विवाद का कारण यह है कि सरकार यह चाहती है कि लोकपाल के दायरे से प्रधानमंत्री को बाहर रखा जाए क्योंकि उनके पद की मर्यादा हे और ऐसा करने से प्रधानमंत्री कोई भी ज़िम्मेदारी खुलकर निभाने से हिचकाएगा और देश के सारे कामकाज ठप हो जाएंगे. जबकि सिविल सोसाइटी यह चाहती है कि लोकपाल के दायरे में मुख्य न्यायाधीश और प्रधानमंत्री सहित सभी लोग आने चाहिए, लेकिन हम लोकपाल एक दो दिन या एक दो साल के लिए या मोजूदा स्थिति या मौजूदा प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश को घेरने के लिए तो बना नही रहे हैं, लोकपाल तो अगले सभी वर्षों के लिए बनाया जा रहा है, और लोकपाल बन जाने के बावजूद अगर मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी या प्रधानमंत्री की कुर्सी पर एक करपट आदमी पहुंच जाता है तो फिर ऐसे लोकपाल का क्या लाभ होगा, जिसके होते हुए भी एक करपट व्यक्ति दिन दोनी रात चौगनी तरक्की करते हुए इतने बड़े और मुतबरिक पद तक पहुंच सका.
आम लोगों का तो यह मानना है कि लोकपाल की वजह से भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त किया जा सकेगा ओर यदि जड़ ही समाप्त हो जाएगी तो भ्रष्टाचार का पेड़ सूख कर मिट्टी में मिल जाएगा. अगर ऐसा होता है तो देश के इतने बड़े पदों तक भ्रष्ट लोग पहुंच ही नहीं पाएंगे और अगर पहुंच गए तो लोकपाल की क्या उपयोगिता रह जाएगी.
आज उन्हीं संस्थानों, जिन पर कभी भ्रष्टाचार की रोकथाम की जिम्मेदारी थी पर खुलेआम भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं, क्या पता कुछ समय बाद लोकपाल पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगें. तब लोकपाल में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कौन सा पाल विधेयक लाया जाएगा.
एक घटना तो मेरे अपने साथ हुइ. यह शायद 1996-97 की बात है जब मैं एक मामले की पैरवी के सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट के चक्कर लगा रहा था. यह एक ऐसा मामला था जिसमें हाईकोर्ट की दो लगातार बैन्चों ने हमारे खिलाफ फैसला दे रखा था. पहले एकल बेंच ने ओर फिर डबल बेंच ने एकल बेंच के फैसले पर मुहर साबित कर दी थी और जो रही सही कसर थी उसे भी पूरा कर दिया था. इस मामले की अपील सुप्रीम कोर्ट में सुनी जारही थी. हमें कई लोगों से खासकर वकीलों से दबे शब्दों में यह सुनने को मिलता था कि आपके विरोधी ने जज से सेटिंग कर ली थी इसलिए ये दोनों निर्णय आपके खिलाफ आये हैं वरना केस तो आपको ही जीतना चाहिए था. इसका सबूत तब मिला जब सुप्रीम कोर्ट की दोहरी बेंच के एक जज ने पूरी कोर्ट को यह कहते हुए आश्चर्य में डाल दिया कि मुझे अप्रोच किया गया है. उन्होंने कहा कि “यह बड़े खेद की बात है कि ऐसी चीज़ यहाँ भी हो रही है”” और फिर उन्होंने इस मामले से अपने आपको अलग कर लिया. इसके बाद हमारे संपादक साहब ने हिंदुस्तान टाइम्स को एक पत्र भेजा जिसमें उन्होंने जिम्मेदार अधिकारियों का ध्यान इस ओर केंद्रित करते हुए यह मांग भी की कि इस घटना की जांच होनी चाहिए, इस पत्र के प्रकाशित होने के बावजूद इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं हुई. बाद के दिनों में एक के बाद एक सुप्रीम कोर्ट के जजों ने इस मामले को सुनने से इनकार कर दिया. वह यही कहते, “नॉट बीफोर मी” या कहते कि “टो बी लिसटेड बीफोर ए बेंच ऑफ विच आई एम नॉट ए मेम्बर” आपको यह जानकर हैरानी होगी के हमारे विरोधी की पैरवी करने वाले वकील ओर कोई नहीं बाप बेटे की मशहूर जोड़ी ही थी. खैर इस बात का लब्बोलुबाब यह है कि तब तक यह बात आम थी कि सुप्रीम कोर्ट को छोड़कर सभी निचली अदालतों में भ्रष्टाचार पनप रहा था जो एक आम बात थी लेकिन उसका सुप्रीम कोर्ट तक पैर पसार लेना एक हैरानी और दुख की बात थी. आपको यह जानकर खुशी होगी के दो-दो अदालतों से मुकदमा हारने के बावजूद, और इतना सब कुछ होने के बावजूद इस मामले में न्याय की ही जीत हुई और हम यह मामला जीत गए. इस सब का लब्बोलुबाब यह है उस समय सुप्रीम कोर्ट ही न्याय का एक आसरा थी और हर एक को यह विश्वास था कि अगर उसे निचली अदालतों से न्याय न भी मिला तो सुप्रीम कोर्ट से तो न्याय मिल ही जाएगा.
ऐक समय प्रधानमंत्री का पद भी बहुत ही मुतबरिक समझा जाता था मगर इसके बावजूद और बावजूद इसके कि वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह स्वयं बहुत ही ईमानदार व्यक्ति हैं उन पर भी भ्रष्टाचार या इस में लिप्त लोगों पर लगाम न लगाने यानी मनमानी करने की खुली छूट देने के आरोप लगाने वालों की कोई कमी नहीं है.
अतीत में जजों, मंत्रियों और प्रधानमंत्री पर आरोप लगे. एक नहीं दोदो प्रधानमंत्रीयों पर आरोप लगे, एक तो वह जिस पर पहले आरोप लगाया गया था दूसरा वह जिस ने आरोप लगाया था ओर इस आरोप पर सवारी करते हुए जब वह खुद प्रधानमंत्री की गद्दी पर बिराजमान हो गया तो उस पर भी भ्रष्टाचार का आरोप लगाया गया, पहले पर तो कोई भी आरोप साबित नहीं हो सका तो दूसरे पर लगाया गया आरोप गलत साबित हुआ और उसके बाद गलत आरोप लगाने के लिए जाली दस्तावेज तैयार करने वालों के खिलाफ मामले स्थापित किए गए.
इसी तरह कुछ समय बाद यह भी हो सकता है कि लोकपाल समिति के दस में से एक सदस्य या कई सदस्यों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों लगने लगें, यह झूठे भी हो सकते हैं और सच्चे भी. ऐसे में हम क्या करेंगे. क्या हम प्रधानमंत्री से शिकायत करेंगे, नहीं क्योंकि हो सकता है कि प्रधानमंत्री के खिलाफ कुछ अर्ज़ियाँ लोकपाल के पास विचाराधीन हों, तब यह कहा जाएगा कि क्योंकि प्रधानमंत्री के खिलाफ याचिका विचाराधीन हैं इसलिए उनको लोकपाल के खिलाफ कार्रवाई करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है. ऐसे में क्या हम सुप्रीम कोर्ट का रुख करेंगे, लेकिन हो सकता है कि उस समय सुप्रीम कोर्ट के किसी जज के खिलाफ और यह भी हो सकता है कि कइ जजों या मुख्य न्यायधीश के खिलाफ कोई शिकायत लोकपाल के पास विचाराधीन हो, अगर ऐसा हुआ तो लोग यही कहेंगे कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले पर विचार करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है क्योंकि इसके जज पहले ही शक के दायरे में हैं जिनकी जांच खुद लोकपाल कर रहा है, यह भी हो सकता है कि लोकपाल के खिलाफ लगाए गए आरोप बेबुनियाद पाए जाएं और सुप्रीम कोर्ट लोकपाल को किसी शिकायत में क्लीन चिट दे दे, तो लोग (सिविल सोसाइटी) यह कह सकती है कि सुप्रीम कोर्ट ने लोक पॉल को शायद इसलिए क्लीन चिट दे दी है क्योंकि उसके ओर लोक पाल के बीच सौदा हो चुका है कि बाद में लोकपाल भी सुप्रीम कोर्ट के जज को क्लीन चिट दे देगा. यह भी हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट को लगे कि लोकपाल के खिलाफ शिकायत में कुछ दम हे और उसके खिलाफ लगाए गए आरोप सही हों ऐसी स्थिति में क्या यह नहीं कहा जाएगा कि लोकपाल के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का फैसला द्वेश से प्रेरित है क्योंकि लोकपाल ने सुप्रीम कोर्ट के किसी जज के खिलाफ कोई मामला दर्ज करने के लिए कह दिया.
आजकल हम सीबीआई जांच की मांग करते हुए नहीं थकते, रोज यह मांग उठती है कि अमुक मामले में स्थानीय पुलिस से जांचा हटाकर सीबीआई के सुपुर्द की जाए. मगर क्या सीबीआई दूध की धुली है, क्या वह दबाव, लालच और प्रभाव में नहीं आती, बेशक आती है. सीबीआई जाँच का हाल तो आप जानते ही है, और अधिकतर बड़े बड़े मामलों में इसकी सजा दिला पाने का रेट न के बराबर हे. बड़े बड़े बयान देने के बावजूद ट्रायल के समय वकीले सफाइ सीबीआई के मामले की धज्जयां उड़ा देते हैं और सीबीआई के गवाहों को या तो खरीद लिया जाता है या खदेड़ दिया जाता है या वह अपने बयानों से मुकर जाते हैं.
सरकार और सिविल सोसाइटी सदस्यों के बीच विवाद का कारण यह है कि सरकार यह चाहती है कि लोकपाल के दायरे से प्रधानमंत्री को बाहर रखा जाए क्योंकि उनके पद की मर्यादा हे और ऐसा करने से प्रधानमंत्री कोई भी ज़िम्मेदारी खुलकर निभाने से हिचकाएगा और देश के सारे कामकाज ठप हो जाएंगे. जबकि सिविल सोसाइटी यह चाहती है कि लोकपाल के दायरे में मुख्य न्यायाधीश और प्रधानमंत्री सहित सभी लोग आने चाहिए, लेकिन हम लोकपाल एक दो दिन या एक दो साल के लिए या मोजूदा स्थिति या मौजूदा प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश को घेरने के लिए तो बना नही रहे हैं, लोकपाल तो अगले सभी वर्षों के लिए बनाया जा रहा है, और लोकपाल बन जाने के बावजूद अगर मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी या प्रधानमंत्री की कुर्सी पर एक करपट आदमी पहुंच जाता है तो फिर ऐसे लोकपाल का क्या लाभ होगा, जिसके होते हुए भी एक करपट व्यक्ति दिन दोनी रात चौगनी तरक्की करते हुए इतने बड़े और मुतबरिक पद तक पहुंच सका.
आम लोगों का तो यह मानना है कि लोकपाल की वजह से भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त किया जा सकेगा ओर यदि जड़ ही समाप्त हो जाएगी तो भ्रष्टाचार का पेड़ सूख कर मिट्टी में मिल जाएगा. अगर ऐसा होता है तो देश के इतने बड़े पदों तक भ्रष्ट लोग पहुंच ही नहीं पाएंगे और अगर पहुंच गए तो लोकपाल की क्या उपयोगिता रह जाएगी.
आज उन्हीं संस्थानों, जिन पर कभी भ्रष्टाचार की रोकथाम की जिम्मेदारी थी पर खुलेआम भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं, क्या पता कुछ समय बाद लोकपाल पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगें. तब लोकपाल में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कौन सा पाल विधेयक लाया जाएगा.
Tags: Anna Hazare, Corruption, Daily Pratap, Lok Pal Bill, Prashant Bhushan, Shanti Bhushan, Supreme Court, Vir Arjun

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