बाबा रामदेव का हठ योग राज योग के आगे नहीं टिक सका. बाबा के साथी और सहयोगी बाल कृष्ण ने सरकार को लिखित आश्वासन दिया था कि वह अपना अनशन खत्म कर देंगे लेकिन जब सरकार को यह लगा कि वह अपनी बात से मुकर रहे हैं और उनका अनशन समाप्त करने का कोई इरादा नहीं है तब लगभग छह सौ पुलिसकर्मियों ने रात एक बजे राम लीला मैदान में बाबा राम देव और उनके हजारों प्रशंसकों को तितर बितर करने के लिए कार्रवाई की जिसमें आंसू गैस का भी प्रयोग किया गया. इस कार्रवाई में कुछ लोगों को मामूली चोटें आने की ख़बर है, पुलिस ने अपने एक बयान में कहा कि इस कार्रवाई में लाठी चार्ज नहीं किया गया और जो भी लोग घायल हुए हैं, भगदड़ के कारण हुए हैं.
इस कार्रवाई में बाबा रामदेव को शहर बद्र कर दिया गया और दिल्ली में उनके प्रवेश पर पंद्रह दिन के लिए रोक लगा दी गई. इसके बाद एक विशेष विमान से उन्हें देहरादून ले जाया गया ओर देहरादून से कार द्वारा उन्हें हरिद्वार में स्थित उनके आश्रम पातांजलि योग पीठ ले जाया गया और वहां पर उन्हें छोड दिया गया. बाबा रामदेव को राम लीला मैदान से जबरदस्ती ले जाया गया क्योंकि पुलिस से बचने के लिए वह अपने प्रशंसकों की भीड़ में कूद गए थे. इसके बाद भीड़ भड़क गई और उसने पुलिस पर जो कुछ हाथ आया फेंकना शुरू कर दिया. बाद में पुलिस ने सत्याग्रह के लिए लगाए गए शानदार पंडाल को भी खाली करा लिाया. राम लीला मैदान के क्षेत्र में जहां यह आंदोलन किया जा रहा था अब लोगों को फिर से जमा होने से रोकने के लिए धारा एक सौ चौवालीस लगा दी गई है.
रामदेव ने शनिवार की सुबह भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी आन्दोलन शुरू किया था और उन्होंने कहा कि जब तक सरकार उनके मांगें स्वीकार नहीं करती वह भूख हड़ताल पर बैठे रहेंगे. इस आन्दोलन में बड़ी संख्या में उनके प्रशंसक भी शामिल थे. सरकार ने बाबा राम देव को भूख हड़ताल का इरादा छोड़ने पर राजी करने के लिए लंबी बातचीत की और जैसा कहा जा रहा है कि दोनों के बीच तीन तारीख को ही समझौता हो गया था और बाबा के साथी बालकृष्ण ने लिखकर दिया था कि वह अपना अनशन खत्म कर देंगे लेकिन जब सरकार को लगा कि बाबा अपनी बात से मुकर रहे हैं तो कपिल सिब्बल ने एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर बालकृष्ण द्वारा दिए गए लिखित आश्वासन को सार्वजनिक कर दिया. इस पर बाबा और ज्यादा नाराज हो गए और उन्होंने सरकार पर विश्वास घात का आरोप लगाते हुए अपना आंदोलन जारी रखने की घोषणा कर दी.
बाबा राम देव भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार द्वारा कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे थे और उनकी मुख्य मांग है कि विदेशी बैंकों में जमा भारतीय नागरिकों का काला धन वापस लाया जाए और भ्रष्टाचार के शामिल पाए जाने वालों के खिलाफ बहुत सख्त कार्रवाई की जाए. लेकिन सत्तारूढ़ कांग्रेस का आरोप हे कि भाजपा और आरएसएस जैसे दल बाबा रामदेव का इस्तेमाल करके सरकार को अस्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं.
सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों ने सरकार की कार्रवाई की निंदा करते हुए कहा है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग का कोई औचित्य नहीं था और सरकार को इस्तीफा दे देना चाहिए. लेकिन सरकार का कहना है कि बाबा रामदेव को केवल योग शिविर लगाने की अनुमति दी गई थी और जब उन्होंने वहां प्रदर्शन का सिलसिला शुरू किया तो प्रशासन ने यह अनुमति रद्द कर दी. सच्चाई भी यही है कि बाबा राम देव को राम लीला मैदान में बीस दिन के लिए योग शिविर लगाने की अनुमति पुलिस द्वारा दी गई थी और कहा यह गया था कि इस शिविर में दैनिक पांच हज़ार लोग आएंगे. अब सवाल यह उठता है कि केवल पाँच हजार आदमी के आने की बात कर बाबा ने योग शिविर की अनुमति क्यों ली? क्यों नहीं, उन्होंने सत्याग्रह करने की विधिवत अनुमति मांगी?
यह भी सवाल पैदा होता है कि जब बाबा और सरकार के बीच समझौता हो गया था तो बाबा ने सत्याग्रह वापस क्यों नहीं लिया? कहीं ऐसा तो नहीं उनके पास सत्याग्रह वापस लेने की कोई ताकत नहीं थी और वह एक कठ पुतली की तरह काम कर रहे थे जिसकी डोर कोई पर्दे के पीछे से हिला रहा था?
सभी हालात और घटना क्रम को देख कर यही लगता है कि सरकार ने इस मामले को शतरंज की चाल की तरह खेला है. पहले तो जनता को यह दिखाया गया कि सरकार भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए बहुत चिंतित है और इसे साबित करने के लिए उसने अपने बड़े बड़े मंत्रियों को एयरपोर्ट पर बाबा रामदेव से मिलने के लिए भेज दिया और दूसरी ओर इस कदम को मीडिया में खूब उछाला और लोगों को यहाँ तक कहने पर मजबूर कर दिया कि सरकार का बाबा के आगे इतना झुक जाना बिल्कुल गैर जरूरी है और यह सरकार की कमजोरी को प्रदर्शित करता है. इसके बाद सरकार ने बाबा रामदेव की सारी वैध मांगें मान लीं और उनके साथी बाल कृष्ण से लिखवाकर ले लिया कि वह अपना आन्दोलन वापस ले लेंगे और उसकी जल्द घोषणा कर देंगे. मगर उसके बाद कांग्रेस ने बाबा राम देव पर सीधा हमला बोल दिया सिंघवी ने एक संवाददाता सम्मेलन करके यह आरोप लगाया कि बाबा राम देव आरएसएस और भाजपा के हाथों खेल रहे हैं, और उनके आंदोलन में साध्वी रितम्भरा जैसे नेता का शामिल होना इस बात का जीता जागता सबूत है. कांग्रेस का खुलकर बाबा रामदेव के विरोध में आना बहुत ही महत्वपूर्ण था क्योंकि अभी तक केवल दिग्विजय सिंह ही बाबा रामदेव के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे. इसके बाद कपिल सिब़्बल ने सरकार की ओर से हमला बोला और बाबा पर वादा खिलाफी का आरोप लगाते हुए बाल कृष्ण द्वारा दी गई इस पत्र की प्रति प्रेस को दिखाई ओर कहा कि बाबा ने वादा खिलाफी की है.
इस पत्र को दिखाने के बाद बाबा पहले तो खिसया गए और बाद में उन्होंने सरकार पर धोखाधड़ी का आरोप लगाया ओर कहा कि यह पत्र तो केवल मनमोहन सिंह को दिखाने के लिए दिया गया था और उसका सार्वजनिक किया जाना उनके साथ धोखे बाज़ी है. मगर सवाल यह पैदा होता है कि जब बाबा ने सरकार के साथ एक गुप्त समझौता कर ही लिया था तो वह भोली भाली जनता को क्यों बेवकूफ बनाते रहे कि अभी तक सरकार ने उनकी मांगें नहीं मानी हैं? ऐसी कौन सी मांग थी जो नहीं मानी गई थी? कहीं कोई व्यक्तिगत इच्छा तो नहीं थी जिसे सरकार ने न माना हो? आखिर कब तक यह बाबा लोग भोली भाली जनता को बेवकूफ बनाते रहेंगे? कब जनता जागरूक होगी?
हम एक तरफ तो हर जगह पारदर्शिता की बात करते हैं मगर जब सरकार और बाबाउो और अन्य नेताओं के बीच बातचीत होती है तो इसमें केवल कुछ लोग ही शामिल होते हैं और बाहर आकर गलत सही जो चाहे बयान देकर जनता को गुमराह करते हैं. ऐसा मुद्दा जिससे आम आदमी जुड़ा हो उसकी हरेक बात बंद कमरे के बजाय टीवी कैमरे पर होना चाहिये ताकि बाद में कोई भी पक्ष यह न कह सके कि मैंने यह बात नहीं कही थी, और इस तरह से बैठक में जाने वाले लोग अपने निजी हितों की बात करने के बजाय आम आदमी के हितों की ही बात करेगा.
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