अटल बिहारी वाजपेयी जी को जब भी मौका मिला उन्होंने अपने पड़ोसी देशों से रिश्ते बहतर करने की कोशिश की. 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार में वह विदेशमंत्री बने तो उन्होंने पाकिस्तान आने जाने की सुविधायें बढ़ाएँ. इसके बाद जब 1998 में वह दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने पाकिस्तान के साथ बातचीत शुरू की और स्वयं एक सार्वजनिक डेलीगेशन के साथ 20 फरवरी 1999 को दिल्ली-लाहौर बस की उद्घाटन सेवा से पाकिस्तान तशरीफ़ ले गए. इस सेवा को सदा ऐ सरहद का नाम दिया गया. इस यात्रा में वह अपने साथ प्रताप के संपादक स्वर्गीय के नरेंद्र जी को भी ले गए थे, जिसे के नरेंद्र जी एक यादगार यात्रा बताया करते थे.
इस यात्रा में अपने साथ जाने के लिए उन्होंने अली सरदार जाफरी को भी आमंत्रित किया था लेकिन क्योंकि उनकी तबियत उस समय खराब थी इसलिए उन्होंने अपनी अक्षमता जताई मगर अपनी एलबम 'सरहद' की 10 केस्टें बाजपई जी को भेजीं ताकि वह उनहें पाकिस्तान के कवियों और लेखकों को प्यार और दोस्ती के संदेश के रूप में दे सकें.
इस एलबम में पांच कविताएँ थीं जो भारत और पाकिस्तान की जनता के प्रेम और भाईचारे की भावना के नाम की गई थीं जिनमें से एक कुछ इस प्रकार है:
इस यात्रा में अपने साथ जाने के लिए उन्होंने अली सरदार जाफरी को भी आमंत्रित किया था लेकिन क्योंकि उनकी तबियत उस समय खराब थी इसलिए उन्होंने अपनी अक्षमता जताई मगर अपनी एलबम 'सरहद' की 10 केस्टें बाजपई जी को भेजीं ताकि वह उनहें पाकिस्तान के कवियों और लेखकों को प्यार और दोस्ती के संदेश के रूप में दे सकें.
इस एलबम में पांच कविताएँ थीं जो भारत और पाकिस्तान की जनता के प्रेम और भाईचारे की भावना के नाम की गई थीं जिनमें से एक कुछ इस प्रकार है:
गुफतगू बंद न हो, बात से बात चले
सुबह तक शम्मे मुलाकात चले
रेगज़ारों से अदावत के गुजर जाएंगे
खून के दरियाओं से हम पार उतर जायेंगे
बाजपेयी साहब ने और पाकिसतान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ साहब ने इस यात्रा के दौरान लाहौर घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए जिसमें सभी समस्याओं को बातचीत से हल करने, व्यापारिक संबंधों को बढ़ाने और आपसी दोस्ती को विस्तृत करने पर बल दिया गया जिससे 1998 के परमाणु परिक्षण के बाद पैदा हुई कड़वाहट को कम करने में मदद मिली. इसके बाद न केवल दोनों देशों ने राहत की सांस ली बल्कि दक्षिण एशिया के अन्य देशो और दुनिया ने इसका स्वागत किया.
मगर जहां एक तरफ नवाज शरीफ और वाजपेयी गले मिल रहे थे वहीं दूसरी ओर पाकिस्तानी सेना परवेज़ मुशर्रफ़ के नेतृत्व में दूसरे महाज़ पर काम कर रही थी. पाकिस्तानी सेना ने कारगिल में घुसपैठ शुरू कर दी थी और दरअंदाज़ों में आतंकवादी और पाकिस्तान के साधारण कपड़ों में सैनिक शामिल थे जो पाकिस्तानी सेना के पारंपरिक हथियारों से लेस थे और वे तेजी के साथ पहाड़ी चोटियों पर कबज़ा करते हुए आगे बढ़ रहे थे. हालांकि यह अभियान कारगिल पर केंद्रित था लेकिन इसमें बालटक और अखनुर सेक्टर भी शामिल था और सियाचिन में आरटीलरी गोलीबारी हुई. इस हमले का भारत ने मुंह तोड़ जवाब दिया और पाकिस्तानी सेना को मुंह की खानी पड़ी. इस हमले के लिए पाकिस्तानी प्रशासन ने बाद में माफी मांगी लेकिन मुशर्रफ ने जो नुकसान करना था वह तो कर ही चुके थे. फिर 1998 में एक सैनिक तख्ता पलट में परवेज़ मुशर्रफ़ ने नवाज़ शरीफ़ को हटा कर पाकिस्तान की सत्ता पर कब्जा कर लिया और उसके बाद एसा लगा कि बातचीत के सभी रास्ते बन्द हो गए हैं.
फिर 15 और 16 जुलाई 2001 को बाजपई और मुशर्रफ के बीच आगरा में शांति बातचीत हुइ दो दिनों में ही बातचीत असफल हो गई और कोई औपचारिक समझौता नहीं हो सका. बातचीत विफल होने के बावजूद बाजपई और मुशर्रफ़ ने दोनों देशों से पुराने मन मुटाव भुलाने की अपील की और कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच समस्याऐं काफी पैचीदा हैं और इतने कम समय में उन्हें हल नहीं किया जा सकता. मुशर्रफ़ ने बाजपेयी को पाकिस्तान आने का निमंत्रण भी दिया.
लेकिन 13 दिसंबर 2001 को जेशेमोहम्मद और लश्कर के आतंकवादियों ने जिन के पीछे मदद कथित तौर पर पाकिस्तान कर रहा था भारतीय संसद पर हमला कर दिया उसके बाद भारत पाक संबंधों में बहुत बड़ी खाई आड़े आ गई. भारतीय जनता के भारी दबाओ के आगे भारत ने अपनी सैना भारत पाक सीमा और कश्मीर में एलओसी पर लगा दी और पाकिस्तान ने भी अपनी सेनाएं सीमा पर लगा दीं.
काफी दिनों तक दोनों ओर की सेना युद्ध के लिए पूरी तरह से तैयार सीमा पर तैनात रहीं. इसके बाद थोड़ा झुकते हुए 12 जनवरी 2002 को जनरल मुशर्रफ़ ने भारत को सांत्वना देने के लिए यह बयान जारी किया कि पाकिस्तान अपनी धरती पर आतंकवाद से निपटे गा. मगर फिर भी वह कश्मीर का राग अलापने से नहीं चूके.े
अगस्त 2003 में बाजपेयी जी ने पाकिस्तान के साथ शांति स्थापित करने की एक अंतिम कोशिश की वकालत की. चारों ओर से पड़ने वाले दबाव के बाद मुशर्रफ ने 25 सितंबर 2003 को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में भारत और पाकिस्तान के बीच सीज़ फ़ाइर की मांग उठाई. काफी तग व दो के बाद 25 दिसंबर 2003 को दोनों देशों ने सीज़ फायर की घोषणा की.
इस्लामाबाद में होने वाले सार्क शिखर सम्मेलन में दोनों देशों के प्रमुखों ने 5 जनवरी 2004 को मुलाकात की तत्पशचात बातचीत और विश्वास बनाने का दोर दोबारह शुरू हुआ.
2004 में चुनाव जीतने के बाद मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे और उन्होंने भी बातचीत के सिलसिले को जारी रखा और विश्वास बनाने के कई कदम उठाए जिनमें नया रेल रूट और कश्मीर से जुड़े कई विश्वास बनाने के कदम शामिल हैं जैसे के तिहरा इनट्री परमिट जारी करना ताकि एलओसी पार करने में सुविधा हो सके, दोनों देशों के मंत्रियों ने कई व्यापारिक रास्तों को खोलने पर भी सहमति जताई जिसमें वाघा-अटारी रोड लिंक और खोकरापार-मनाबाउ रेल लिंक और कश्मीर में श्रीनगर-मुज़फ़्फ़राबाद और पुंछ-रावलकोट रोड लिंक भी शामिल हैं.
मगर 26 नवंबर 2008 को हुए मुंबई हमले में यह पाए जाने के बाद कि इस हमले में जिसमें लगभग 180 नागरिक और पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे शामिल लोगों का संबंध पाकिस्तान से था और उनकी दरपरदा मदद करने वाले लोग भी पाकिस्तान में ही हैं और कसाब की गिरफ्तारी के बाद जिसने सारी कहानी विस्तार से बताई भारत और पाकिस्तान के कूटनीतिक संबंधों में फिर से एक खाड़ी पैदा हो गई और इसके बाद बातचीत एक बार फिर टूट गई क्योंकि पाकिस्तान ने अपने देश में बैठे हुए आतंकवादियों के हैंडलरस को भारत के हवाले करने से इनकार कर दिया और कहा कि वह उन्हें अपने देश में ही सजा दिलाये गा.
इसके बाद जुलाई 2009 में मिस्र की गर्मी से भारत पाक संबंधों की बर्फ उस समय पिघली जब दोनों देशों के प्रधानमंत्री ने नोन अलाईंड सिमट के दौरान एक दूसरे से अलग से मुलाकात की और यह बयान दिया कि वह भारत पाक संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए राह हमवार कर रहे हैं.
बाद में भारतीय विदेश मंत्री ने जुलाई 2010 में इस्लामाबाद में पाकिस्तान के अपने समकक्ष कुरैशी से मुलाकात की, भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बुलावे पर विशव कप का सेमीफाइनल मैच देखने मोहाली आए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री गिलानी की मुलाकात और बातचीत हुई.
पिछले शुक्रवार को इस्लामाबाद में संपन्न हुई सचिव स्तर की बातचीत के बारे में यह कहा जा रहा है कि इसमें कोई खास प्रगति नहीं हुई है मगर हिन्दोस्तान, पाकिस्तान को यह संदेश देने में सफल रहा है कि भारत पाक संबंधों में सैन्य टकराव की कोई जगह नहीं है और बनदूक की नोक नीची होनी चाहिए.
इस प्रगति की पहली निशानी साझा प्रेस कांफ्रेंस थी और दूसरी साझा बयान. पाकिस्तानी विदेश सचिव सलमान बशीर ने खामोशी से भारतीय विदेश सचिव निरूपमा राव के आतंकवाद से संबंधित बयान को सुना. निरुपमा राव ने 26/11 हमले में शामिल आरोपियों के धीमे ट्रायल और धीमी गति से चल रही जांच की मद्दा उठाया और शिकागो में तहव्वुर राणा के ट्रायल में सामने आए सबूतों का मामला उठाया. राव ने लश्कर और आईएसआई के बीच रिश्ते की जांच की मांग भी रखी. हालांकि बशीर ने यह वादा तो नहीं किया कि वह ट्रायल को तेजी से आगे बढ़वाएँ गे या भारत की ओर से उपलब्ध कराए गए सबूतों को गहराई से लिया जाएगा मगर माहोल गर्म नहीं होने पाया.
इस मुलाकात ने दोनों देशों के विदेश मंत्रीयों के बीच संभावित बातचीत के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध करा दी है और अब यह देखना है कि बातचीत किस राह पर आगे बढ़ती है.
इतिहास बताता है कि दुनिया की बड़े से बड़ी समस्या बातचीत से हल हुई है और बातचीत का कोई दूसरा विकल्प नहीं है.
Tags: 26/11, Afif Ahsen, Atal Behari Vajpayee, Daily Pratap, ISI, Krishna, Manmohan Singh, Nawz Sharif, Pakistan, Parvez Musharraf, Vir Arjun
सुबह तक शम्मे मुलाकात चले
रेगज़ारों से अदावत के गुजर जाएंगे
खून के दरियाओं से हम पार उतर जायेंगे
बाजपेयी साहब ने और पाकिसतान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ साहब ने इस यात्रा के दौरान लाहौर घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए जिसमें सभी समस्याओं को बातचीत से हल करने, व्यापारिक संबंधों को बढ़ाने और आपसी दोस्ती को विस्तृत करने पर बल दिया गया जिससे 1998 के परमाणु परिक्षण के बाद पैदा हुई कड़वाहट को कम करने में मदद मिली. इसके बाद न केवल दोनों देशों ने राहत की सांस ली बल्कि दक्षिण एशिया के अन्य देशो और दुनिया ने इसका स्वागत किया.
मगर जहां एक तरफ नवाज शरीफ और वाजपेयी गले मिल रहे थे वहीं दूसरी ओर पाकिस्तानी सेना परवेज़ मुशर्रफ़ के नेतृत्व में दूसरे महाज़ पर काम कर रही थी. पाकिस्तानी सेना ने कारगिल में घुसपैठ शुरू कर दी थी और दरअंदाज़ों में आतंकवादी और पाकिस्तान के साधारण कपड़ों में सैनिक शामिल थे जो पाकिस्तानी सेना के पारंपरिक हथियारों से लेस थे और वे तेजी के साथ पहाड़ी चोटियों पर कबज़ा करते हुए आगे बढ़ रहे थे. हालांकि यह अभियान कारगिल पर केंद्रित था लेकिन इसमें बालटक और अखनुर सेक्टर भी शामिल था और सियाचिन में आरटीलरी गोलीबारी हुई. इस हमले का भारत ने मुंह तोड़ जवाब दिया और पाकिस्तानी सेना को मुंह की खानी पड़ी. इस हमले के लिए पाकिस्तानी प्रशासन ने बाद में माफी मांगी लेकिन मुशर्रफ ने जो नुकसान करना था वह तो कर ही चुके थे. फिर 1998 में एक सैनिक तख्ता पलट में परवेज़ मुशर्रफ़ ने नवाज़ शरीफ़ को हटा कर पाकिस्तान की सत्ता पर कब्जा कर लिया और उसके बाद एसा लगा कि बातचीत के सभी रास्ते बन्द हो गए हैं.
फिर 15 और 16 जुलाई 2001 को बाजपई और मुशर्रफ के बीच आगरा में शांति बातचीत हुइ दो दिनों में ही बातचीत असफल हो गई और कोई औपचारिक समझौता नहीं हो सका. बातचीत विफल होने के बावजूद बाजपई और मुशर्रफ़ ने दोनों देशों से पुराने मन मुटाव भुलाने की अपील की और कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच समस्याऐं काफी पैचीदा हैं और इतने कम समय में उन्हें हल नहीं किया जा सकता. मुशर्रफ़ ने बाजपेयी को पाकिस्तान आने का निमंत्रण भी दिया.
लेकिन 13 दिसंबर 2001 को जेशेमोहम्मद और लश्कर के आतंकवादियों ने जिन के पीछे मदद कथित तौर पर पाकिस्तान कर रहा था भारतीय संसद पर हमला कर दिया उसके बाद भारत पाक संबंधों में बहुत बड़ी खाई आड़े आ गई. भारतीय जनता के भारी दबाओ के आगे भारत ने अपनी सैना भारत पाक सीमा और कश्मीर में एलओसी पर लगा दी और पाकिस्तान ने भी अपनी सेनाएं सीमा पर लगा दीं.
काफी दिनों तक दोनों ओर की सेना युद्ध के लिए पूरी तरह से तैयार सीमा पर तैनात रहीं. इसके बाद थोड़ा झुकते हुए 12 जनवरी 2002 को जनरल मुशर्रफ़ ने भारत को सांत्वना देने के लिए यह बयान जारी किया कि पाकिस्तान अपनी धरती पर आतंकवाद से निपटे गा. मगर फिर भी वह कश्मीर का राग अलापने से नहीं चूके.े
अगस्त 2003 में बाजपेयी जी ने पाकिस्तान के साथ शांति स्थापित करने की एक अंतिम कोशिश की वकालत की. चारों ओर से पड़ने वाले दबाव के बाद मुशर्रफ ने 25 सितंबर 2003 को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में भारत और पाकिस्तान के बीच सीज़ फ़ाइर की मांग उठाई. काफी तग व दो के बाद 25 दिसंबर 2003 को दोनों देशों ने सीज़ फायर की घोषणा की.
इस्लामाबाद में होने वाले सार्क शिखर सम्मेलन में दोनों देशों के प्रमुखों ने 5 जनवरी 2004 को मुलाकात की तत्पशचात बातचीत और विश्वास बनाने का दोर दोबारह शुरू हुआ.
2004 में चुनाव जीतने के बाद मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे और उन्होंने भी बातचीत के सिलसिले को जारी रखा और विश्वास बनाने के कई कदम उठाए जिनमें नया रेल रूट और कश्मीर से जुड़े कई विश्वास बनाने के कदम शामिल हैं जैसे के तिहरा इनट्री परमिट जारी करना ताकि एलओसी पार करने में सुविधा हो सके, दोनों देशों के मंत्रियों ने कई व्यापारिक रास्तों को खोलने पर भी सहमति जताई जिसमें वाघा-अटारी रोड लिंक और खोकरापार-मनाबाउ रेल लिंक और कश्मीर में श्रीनगर-मुज़फ़्फ़राबाद और पुंछ-रावलकोट रोड लिंक भी शामिल हैं.
मगर 26 नवंबर 2008 को हुए मुंबई हमले में यह पाए जाने के बाद कि इस हमले में जिसमें लगभग 180 नागरिक और पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे शामिल लोगों का संबंध पाकिस्तान से था और उनकी दरपरदा मदद करने वाले लोग भी पाकिस्तान में ही हैं और कसाब की गिरफ्तारी के बाद जिसने सारी कहानी विस्तार से बताई भारत और पाकिस्तान के कूटनीतिक संबंधों में फिर से एक खाड़ी पैदा हो गई और इसके बाद बातचीत एक बार फिर टूट गई क्योंकि पाकिस्तान ने अपने देश में बैठे हुए आतंकवादियों के हैंडलरस को भारत के हवाले करने से इनकार कर दिया और कहा कि वह उन्हें अपने देश में ही सजा दिलाये गा.
इसके बाद जुलाई 2009 में मिस्र की गर्मी से भारत पाक संबंधों की बर्फ उस समय पिघली जब दोनों देशों के प्रधानमंत्री ने नोन अलाईंड सिमट के दौरान एक दूसरे से अलग से मुलाकात की और यह बयान दिया कि वह भारत पाक संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए राह हमवार कर रहे हैं.
बाद में भारतीय विदेश मंत्री ने जुलाई 2010 में इस्लामाबाद में पाकिस्तान के अपने समकक्ष कुरैशी से मुलाकात की, भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बुलावे पर विशव कप का सेमीफाइनल मैच देखने मोहाली आए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री गिलानी की मुलाकात और बातचीत हुई.
पिछले शुक्रवार को इस्लामाबाद में संपन्न हुई सचिव स्तर की बातचीत के बारे में यह कहा जा रहा है कि इसमें कोई खास प्रगति नहीं हुई है मगर हिन्दोस्तान, पाकिस्तान को यह संदेश देने में सफल रहा है कि भारत पाक संबंधों में सैन्य टकराव की कोई जगह नहीं है और बनदूक की नोक नीची होनी चाहिए.
इस प्रगति की पहली निशानी साझा प्रेस कांफ्रेंस थी और दूसरी साझा बयान. पाकिस्तानी विदेश सचिव सलमान बशीर ने खामोशी से भारतीय विदेश सचिव निरूपमा राव के आतंकवाद से संबंधित बयान को सुना. निरुपमा राव ने 26/11 हमले में शामिल आरोपियों के धीमे ट्रायल और धीमी गति से चल रही जांच की मद्दा उठाया और शिकागो में तहव्वुर राणा के ट्रायल में सामने आए सबूतों का मामला उठाया. राव ने लश्कर और आईएसआई के बीच रिश्ते की जांच की मांग भी रखी. हालांकि बशीर ने यह वादा तो नहीं किया कि वह ट्रायल को तेजी से आगे बढ़वाएँ गे या भारत की ओर से उपलब्ध कराए गए सबूतों को गहराई से लिया जाएगा मगर माहोल गर्म नहीं होने पाया.
इस मुलाकात ने दोनों देशों के विदेश मंत्रीयों के बीच संभावित बातचीत के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध करा दी है और अब यह देखना है कि बातचीत किस राह पर आगे बढ़ती है.
इतिहास बताता है कि दुनिया की बड़े से बड़ी समस्या बातचीत से हल हुई है और बातचीत का कोई दूसरा विकल्प नहीं है.
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